शनिवार, 20 नवंबर 2021

डॉ. आज़ममीर ख़ान पीलीभीत की पहली पसंद- अकरम क़ादरी

डॉ. आज़ममीर ख़ान पीलीभीत की पहली पसंद- अकरम क़ादरी


चुनावी सरगर्मियों में नेता लम्बे-लम्बे लिखे हुए भाषण देकर खुद को बहुत अच्छा समझते है जबकि जनता केवल नेता के काम पर विश्वास करती है। हद से ज़्यादा बोलना भी कैंडिडेट के लिए नुकसानदायक हो जाता है। क्योंकि वो जनता और उसके असल मकसद को समझ ही नहीं पाता है। और झूठे वादे करके लॉलीपॉप देकर रफूचक्कर हो जाता है। मौजूदा सरकार में बोलने वाले ऐसे-ऐसे धनुर्धारी है जो कुछ सेकण्ड में ही पानी मे आग लगा दे। लेकिन जनता के बीच उनका काम निल है। जिसके कारण उनको मुंह की भी खानी पड़ती है। 
पीलीभीत की जनता ऐसे लोगो को एक लम्बे समय से जानती है जो नफरती बातें करके आपसी चैन सुकून, मेलजोल ख़त्म करना चाहते है। मेरा बड़ा साफ मक़सद है कि कोई भी ज़िला तब ही तरक़्क़ी करेगा जब सब धर्म, जाति, पंथ के लोग मिलकर कोशिश करेंगे। 
मेरे अपने शहर के भाइयों/बहनो से विनती है कि राजनीति अलग चीज़ है सबसे पहले अपना भाईचारा, अमन क़ायम रखो जहां पर मोहब्बत होती है वहां राजनीति भी अच्छी होती है और ज़िला भी विकास की ओर गामज़न होता है। अंततः मेरा मकसद मोहब्बत है जहां तक फैले।
डॉ. आज़ममीर ख़ान जब 2012 में नई नवेली पीस पार्टी से कैंडिडेट थे जनता ने इसी प्रेम, मोहब्बत और अमन वाले पैग़ाम के कारण उनको बत्तीस हज़ार वोट से नवाज़ा था, जबकि उस वक़्त सूबा ए उत्तरप्रदेश के कद्दावर नेता, पुराने राजनीतिक पांच बार के विधायक मरहूम हाजी रियाज़ अहमद साहब ज़िंदा थे। हाजी साहब का इस दुनिया मे जाना सच मे बहुत दुःख का विषय है लेकिन इस समय पीलीभीत की जनता कोई ऐसा नेता नज़र नहीं आया जिसमे हाजी जी के बराबर दमदारी हो, जो जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठा सके। 
डॉ. आज़ममीर ख़ान साहब में पीलीभीत की जनता को वो खूबियां नज़र आती है जो पीलीभीत की जनता चाहती है क्योंकि डॉ. आज़ममीर ख़ान साहब को राजनीति का अच्छा अनुभव है वो एएमयू से ही छात्र राजनीति में सक्रिय चेहरा रहे है और अपने ज़िले के बहुत लोगो को उन्होंने इलाज, शिक्षा जैसे बुनियादी मसलों को हल करने का काम किया है। 
वास्तव में पीलीभीत की जनता की कुछ ही डिमाण्ड रही है जिसमे शिक्षा और स्वास्थ्य मुख्य है। डॉ. आज़म मीर खान इन मुद्दों को भलीभांति समझते भी है क्योंकि वो स्वयं एक डॉक्टर है और शिक्षा के मैदान में भी उनका अहम योगदान है। अलीगढ़, जामिया, दिल्ली और इलाहाबाद में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की आपने उनके एंट्रेंस में भी मदद की है। कई छात्र-छात्राओं को कोचिंग के ज़रिए अच्छे कोर्स में एडमिशन कराया है इस कारण ही पीलीभीत की जागरूक जनता आज़म मीर ख़ान को अपने विधायक बनाने के लिए आतुर है। 
डॉ. साहब ने जबसे समाजवादी पार्टी जॉइन की है तबसे जनता में भी उम्मीद की किरण नज़र आती है क्योंकि जब वो किसी पद पर नहीं थे तो लगातार जनता की मदद कर रहे थे। आने वाले समय मे अगर पार्टी प्रमुख का आशीर्वाद मिला और जनता ने अपना अप्रितम समर्थन दिया तो पॉवर के साथ जनता के मुद्दों पर जमकर काम करने का प्रयत्न करेंगे।
समाजवादी पार्टी की नीतियों का प्रचार-प्रसार में संलग्न आज़म मीर खान ने बताया कि जनता का उत्साह, पार्टी के पिछले कार्यो को पॉजिटिव रेस्पांस निश्चित ही 2022 में सफलता दिलाएंगे फिर से जनता से न्याय होगा सबको समानता का अधिकार मिलेगा

बुधवार, 17 नवंबर 2021

किसान आंदोलन और यूपी, उत्तराखंड चुनाव- अकरम क़ादरी

किसान आंदोलन और यूपी, उत्तराखंड चुनाव- अकरम क़ादरी

किसान आंदोलन को लगभग ग्यारह महीने हो चुके है। आंदोलित किसानों ने हाड़-मास कपाती सर्दी भी देखी है, पिघलने वाली गर्मी भी और सर्द हवा के साथ बारिश भी। कई बार ज़ोरदार आंधी में टेंट भी उड़ गए फिर भी भीगते हुए किसान धैर्य से बैठे रहे, अनेक मुसीबतों का सामना करते रहे उसके अलावा प्रशासनिक धमकियां, पत्रकारों की उलूल-जुलूल मीडिया डिबेट (ट्रायल), सत्ता समर्थित पत्रकारों और तथाकथित मीडिया वालों ने किसानों की इमेज कभी खालिस्तानी बनाई, कभी आतंकवादी कहा, तो कभी किसी भी विपक्ष पार्टी का प्रोपगंडा कहकर नकारने की भरपूर कोशिश करते रहे। सत्ता, मंत्री और उनका आई.टी सेल इवेंट मैनेजमेंट करने में लगा रहा है, बदनाम करने की कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी, सत्ता पक्ष के लोगो का ब्रह्मास्त्र 'हिन्दू-मुस्लिम' का रूप देने की भी कोशिश बर्बाद हो गयी। क्योंकि वास्तव में देश मे धार्मिक विविधता तो है वो अनेक धर्मो का मानने वाला हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई तो है लेकिन उससे पहले वो एक किसान है उनकी आजीविका का मुख्य साधन फसल ही है जहां से वो अपने बच्चे का लालन-पालन करता है, अपनी लड़की के हाथ पीले करता है, बेटे को फ़ौज की नोकरी में भेजता है खुद खेती करके देश की जनता की पेट की आग बुझाता है।
आंदोलित किसानों के साथ लगातार घटनाएं हो रही है, अभी कुछ दिन पहले ही लखीमपुर की हृदय विदारक घटना हुई है जिससे कथित तौर पर मंत्री के बेटे ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे  किसानों को अपनी महेंद्रा थार से कुचल दिया जैसा बताया जा रहा है।  कई किसान मौके पर ही शहीद हो गए, जिसमें एक पत्रकार भी शहीद हुआ है। जो लोग गाड़ी में सत्ता पक्ष के थे उन्होंने जब भागना शुरू किया तो उत्तेजित भीड़ ने उनको दौड़ाकर पीटा, सुनने में आ रहा है उनकी भी मृत्यु हो गई जिसकी ज़िम्मेदार अप्रत्यक्ष रूप से केंद्र और राज्य सरकार है। इस पूरे कांड में गृह राज्यमंत्री आशीष मिश्रा उर्फ टेनी महाराज के बेटे का नाम आ रहा है। जो महेंद्रा थार में मौजूद था, अभी उसकी गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन उसका पिता अभी भी गृह राज्यमंत्री बना हुआ है तो प्रतीत होता है कि वो जांच में कुछ दखल अवश्य करेगा जिससे शहीद किसानों को न्याय नहीं मिल सकता। किसान नेता और सभी पंजाब के जत्थेबंदी उसको बर्खास्त करने की मांग कर रहे है। जिससे शहीद किसानों को न्याय मिल सके और असली गुनहगार सलाखों के पीछे जा सके। 
किसान आंदोलन बहुत मज़बूती से दिल्ली के चारो तरह बॉर्डर पर चल रहा है। सभी किसानों के दल बैठे हुए है और वोट की चोट से अपनी मांग मंगवाने के लिए रणनीति तैयार कर रहे है हालांकि वो वेस्ट बंगाल में कामयाब भी हुए है लेकिन हिंदी हार्टलैंड में भी मज़बूती से लड़ रहे है। हो सकता है इसमें भी उनको कामयाबी मिल जाएं।
भाजपा के लिए इस समय देश में पांच जगह चुनाव है जो आगे-पीछे ही  चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तावित है। किसान नेताओ ने लखनऊ, देहरादून में अपनी मौजूदगी दिखाना शुरू कर दिया है क्योंकि जितनी भी मीडिया डिबेट हो रही है उसमें किसान नेता ज़रूर एक दो सेशन में दिख रहे है। इससे यह साबित होता है किसान आंदोलन भी यूपी, उत्तराखंड के चुनाव पर भरपूर असर करेगा। क्योंकि पश्चिमी उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड लगभग एक जैसी ही पृष्ठभूमि रखते है क्योंकि संस्कृति, भाषा और खान पान लगभग समान ही है। 
इस क्षेत्र का किसान जागरूक भी है और अपना हक लेना जानता भी है।
पिछले कई महीनों से किसानों के लिए बीजेपी नेताओ द्वारा आवाज़े उठना शुरू हो चुकी है जो पार्टी चुनाव के लिए अच्छे संकेत नज़र नहीं आते है।
पूर्व बीजेपी नेता और वर्तमान में गवर्नर सत्यपाल मलिक बराबर किसानों के मुद्दों को लेकर मुखर प्रतीत हो रहे है। वो जो बातें जनता के सम्मुख रख रहे है वो एकदम यथार्थ है। लेकिन पार्टी अपनी हठधर्मिता छोड़ना नहीं चाहती है।
पीलीभीत से बीजेपी के सांसद संजय  और मेनका गांधी के सपुत्र वरुण फ़ीरोज़ गांधी भी किसानों के लिए अपनी भावनाएं बता चुके है और मुखर रूप से अपनी ही सरकार का विरोध दर्ज करा चुके है। 
गौरतलब है किसानों के मुद्दे पर ही भाजपा का सबसे पुराना अकाली दल भी बाहर हो चुका है। और किसानों के मुद्दे पर डटकर सामना कर रहा है। बाकी हिंदी हार्टलैंड से न जाने कितने विधायक, नेता बीजेपी छोड़ चुके है जो निश्चित ही उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड के चुनाव में अपना असर दिखाएंगे ही उसके वाला बाकी तीन राज्यों में किसान आंदोलन का जबरदस्त प्रभाव देखने की उम्मीद है।

शनिवार, 19 जून 2021

हाँ-हाँ राजनीति में अनफिट है, राहुल गांधी - अकरम क़ादरी

हाँ-हाँ राजनीति में अनफिट है राहुल गांधी - अकरम क़ादरी

नेहरू-गांधी परिवार का कोई चश्मों चिराग़ अगर भारतीय राजनीति में अनफिट है तो सच में यह बहुत कुछ सोचने-समझने पर मजबूर करता है। आखिर ऐसा देश मे क्या हो गया कि इतने बड़े परिवार का व्यक्ति मुझ दो कौड़ी के इंसान को राजनैतिक अनफिट लग रहा है जिसको मैं लिखकर बता भी रहा हूँ।
एक लम्बे अरसे से भारतीय राजनीति में विचारधारा का घोर अकाल है मुठ्ठीभर लोग ही बचे है जो अपनी विचारधारा से समझौता नहीं करते है। वरना सुबह में जिन नेता जी के गले मे हरा पट्टा देखा था शाम होते ही भगवा होकर उसी पार्टी को बुरा भला कहते हुए देखा है जिसके लिए सुबह कसमें खा रहे थे। शाम को उन्हीं कसमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रहीं है। (दरअसल राजनीति में भी एक वाशिंग मशीन है जो सुबह में पड़े हुए पट्टे को धोकर साफ कर देती है अर्थात इधर से भ्रष्टाचारी मशीन में डालो उधर से सदाचारी निकलता है) वर्तमान सत्तारूढ़ दल में भी कांग्रेस से भगौड़े नेताओ की लंबी फेहरिस्त है। क्योंकि यह अधिकांशतः दागी तो है जिनका मकसद राजनीति में धनोपार्जन करना, ऐश, अय्याशी करना, आय से अधिक सम्पत्ति रखना, तथा कुकर्मों में रोज़ ही नाम आना और उन नामों को छुपाने का प्रयत्न करना। ऐसे नेताओं के लिए हमेशा सत्ताधारी दल अपने पालतू सरकारी तोते और तोतियाँ नामक परजीवी छोड़ देता है जो डायरेक्ट, इनडाइरेक्ट उस नेता को समझाती है कि अगर ऐसा करोगे वो सब चीज़ों से बच जाओगे और बिल्कुल ऐसा ही फिल्मी सीन होता भी है जो पार्टी दस दिन तक उस नेता के खिलाफ ट्विटर पर दलाली का ट्रेंड चला रही हो उसी को ही डिफेंड करना शुरू कर देती है। 
आखिर में बात यही आती है पिछले दो दशक से राजनीति के 'मूल' जीर्ण-शीर्ण अवस्था से विमुख होकर भरभराकर गिर चुके है। 
राहुल गांधी की काबिलियत पर शक करना तो शायद मुझे उचित नहीं लगता है क्योंकि वो वक्ता नहीं कर्ता है। जिस प्रकार से डॉ. मनमोहन सिंह जी अच्छे वक्ता नहीं थे लेकिन काम करता लाजवाब थे, डिग्रियों का अंबार था उनके खाते में ऊपर से क़लम भी वही पांच रुपये वाला रेनॉल्ड्स का जिसको देखकर कोई भी शरमा जाए। एक आज वाले नेता है जो वक्ता बहुत शानदार है, दस मिनट में ही रसगुल्लों की बारिश करा दे और जनता को एहसास भी करा दे कि उन्होंने बगैर चासनी के रसगुल्ले लील लिए है लेकिन मज़ा बाद में आएगा। 
दरअसल यह वो व्यापारी हैं जो पुराने सड़े-गले माल को नई पैकिंग के साथ करोड़ो में बेच देते है। जिससे लम्बे समय तक चलने वाले रिश्ते कुछ समय में ही खराब  हो जाते है।
इतना ज़्यादा कॉन्फिडेंट में बोलने के कारण कभी-कभी ऐसा बोल जाते है जिससे उनके समर्थकों को भी डिफेंड करने में हिचकिचाहट होती है। फिर भी वो बेचारे करते है(उनकी बुद्धिमत्ता को नमन) 
पिछले दिनों एक सिफोलॉजिस्ट कम पॉलिटिशियन एंड किसान नेता को सुन रहा था वो कह रहे थे- "देश मे बहुत प्रधानमंत्री आये, बहुत-बहुत निकम्मे, कामचोर भी थे, आलसी भी थे लेकिन इतना सफेद झूठ बोलने वाला पहली बार देखा है" यह विचार उनके सुनकर बहुत सोचा कि आखिर यह इंसान जो कह रहा है वो सच तो है, फिर राहुल गांधी के संदर्भ में सोचा तो कहानी बिल्कुल अलग लगी क्योंकि पिछले दिनों से लगातार एनालिसिस कर रहे है जो राहुल गांधी भविष्य के बारे में बताते है वो सच ही हो रहा है। जिसका नुकसान हमारे साथ -साथ मासूम स्टूडेंट्स का भी होता है।
मौजूदा बतौलेबाज़ ने ऐसे-ऐसे झूठ गढ़ दिए है जिसकी वजह से जागरूक जनता में उस पद की इज़्ज़त भी कम हुई है। कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण पेश कर रहा हूँ जिससे आपको पता चल सके मौजूदा राजनीति में राहुल गांधी क्यों अनफिट है
जब उन्होंने एक इंटरव्यू में बोला कि उन्होंने पहला ईमेल 1988 में किया था, उनके पास डिजिटल कैमरा भी था, फिर किसी भी बड़े प्राइम टाइम न्यूज़ एंकर ने उसकी पड़ताल की ...शायद किसी  पर भी नहीं हो सकता है NDTV ने कर दी हो लेकिन किसी भी गोदी मीडिया के पत्रकार ने दो लफ्ज़ भी इस वैज्ञानिक खोज पर बोले हो तो कोई हमें दिखा दे। 
हालांकि आजकल झूठ का सबसे ज्यादा प्रोपेगैंडा गोदी मीडिया के पत्रकार ही दो हज़ार के नोट में चिप दिखाकर कर रहे है।
हिंदी के तीन महान महापुरुषों को एक ही कालावधि का बता दिया जबकि उनकी उम्र में कम-से-कम 100 वर्ष का अंतर है। इस पर भी किसी प्राइम टाइम गोदी मीडिया ने कुछ नहीं बोला।
महानता का स्तर देखिए टीवी इंटरव्यू में गोदी मीडिया के पत्रकार से कह रहा है बादल की वजह से राडार काम नहीं करता है। 
पत्रकारों/ कैनेडियन कलाकारों के प्रश्न देखेंगे तो आंसू ही आ जाएंगे फिर भी वो मीडिया ट्रायल देते हुए कुछ नहीं बोलते है
आम आप चूसकर खाते है या काटकर?
आप कौनसा टॉनिक लेते है, आप थकते क्यों नहीं है?
आप बटुआ (पर्स) रखते है क्या?? 
दरअसल यह इंटरव्यू ज़्यादातर फिक्स ही होते है जिसको देखकर लगता है एक तरफा चल रहा है। 
दूसरी तरफ तथाकथित देशभक्त पार्टी की आई.टी. सेल ने एक पढ़े-लिखे युवा नेता को 'पप्पू घोषित करने के लिए मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक अपना जाल बिछाया और बहुत हद तक कर भी दिया' लेकिन पिछले दिनों अचानक एक सच्चाई निकल कर सामने आई जो भी राहुल गांधी ने भविष्यवाणी की थी वो एक एक करके सच साबित हो रही थी, इस बार बगैर किराए की जनता ने दूसरे लोगो को पप्पू बोलना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ कोरोना की सेकंड वेब ने पार्टी को धराशायी कर दिया है हर तरफ उनकी सच्चाई सामने आ गयी हैं। 
किसानों की समस्या का भी निपटारा नहीं कर पाए है बल्कि खुद के अन्नदाता को देशद्रोही, खालिस्तानी, आतंकवादी कहना शुरू कर दिया जिसका समर्थन गोदी मीडिया ने भी अपरोक्ष रूप से खूब किया लेकिन किसान आईटी सेल ने इनकी धज्जियां उड़ा दी और देश को सच्चाई पता चलती रही जिससे किसानों पर होने वाले दुष्प्रचार का सामना खुद किसान और उनके जागरूक पुत्रों ने किया है।

जय हिंद

अकरम क़ादरी

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

जिस पिता ने ज़िन्दगी दी, बेटे ने लीवर देकर अपना फ़र्ज़ निभाया - अकरम क़ादरी

जिस पिता ने ज़िन्दगी दी, बेटे ने लीवर देकर अपना फ़र्ज़ निभाया - अकरम क़ादरी
एक कहावत है- "बुरे वक्त पर ही अपने और गैरों का एहसास होता है" जो अपना होता है उसको कहने की ज़रूरत नहीं होती है और गैर से कोई कुछ कहता नहीं है। कुछ ऐसा ही हुआ है बेटे और वालिद के रिश्तों में-  रामपुर के हसनात अली खान अलीग ने पेश की मिसाल यह वो बेटा है जिसने अपने पिता को नया जीवन दिया है हालांकि यह ज़िन्दगी उन्हीं की दी हुई है। हसनात अली ख़ान ने अपना लीवर देकर इतना ही नहीं आजकल के बेटों के प्रति जागरुगता पैदा की है और मां-बाप की प्रति सेवा-भाव का उदाहरण भी पेश किया है। जबकि प्रोफेशनल लाइफ की वजह से संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है आजकल के रिश्तों में भावुकता नहीं है। जब हसनात को मालूम हुआ कि उनके पिता को लीवर की ज़रूरत है तो उन्होंने बड़ा दिल दिखाकर अपने पिता के लिए फ़र्ज़ अदा करने की एक छोटी से कोशिश की। पिता को भी अपने बेटे पर गर्व महसूस होता है।
रामपुर निवासी विज़ारत अली खान लम्बे समय से लीवर की बीमारी से पीड़ित थे सन 2015 में लीवर डैमिज होने के कारण डॉक्टर ने उन्हें जीवित रहने के लिए ट्रांसप्लांट ही अंतिम विकल्प बताया था, पिता को बचाने के लिए बेटा हसनात आगे आया उसने अपना 60 पर्सेंट लिवर पिता को मेदांता हॉस्पिटल गुरुग्राम में को प्रत्यारोपित करा दिया उसके ट्रांसप्लांट को लगभग 6 साल पूर्ण होने के उपलब्ध में मेदांता हॉस्पिटल लीवर ट्रांसप्लांट डिपार्टमेंट के डिरेक्टर पद्मश्री डॉक्टर ए. एस. सोनी ने बधाई देते हुए ट्वीट किया जिसकी बड़े-बड़े जर्नलिस्ट ने सराहना की तथा उस ट्वीट को कई जागरूक नागरिको ने रिट्वीट भी किया जिनमे मिस्टर राघव भल  फ़ाउंडर नेटवर्क 18 अथवा मिस्टर संजय पुगलिया प्रेसिडेंट एंड एडिटोरीयल डिरेक्टर दा क्विंट इण्डिया ने रिट्वीट कराकर हौंसला अफजाई करते हुए हर बेटे को ऐसा गौरवशाली काम करने का एहसास दिलाया आजकल लोग अपने माँ-बाप को चंद वजह से वृद्धाश्रम में छोड़कर चले आते है यह विदेशी अपसंस्कृति हमारे देश मे बहुत तेज़ी से पैर पसार रही है जिसको हसनात जैसे नोजवानो से सीख लेकर आजकल के बच्चों को अपने माँ-बाप की सेवा करना चाहिए। 
हसनात ने जब लीवर ट्रांसप्लांट कराया था जो साथ मे उनके हमदर्द, दोस्त, अजीजों अकारिब भी थे जिसमें फैज़ान शाहिद, अकरम क़ादरी ने उन्हें मुबारकबाद पेश की तथा खुद को गौरवान्वित महसूस किया और कहा कि ऐसे दोस्त पर हमें फक्र है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

किसान की लाठी, किसान का ही सिर- अकरम क़ादरी

किसान की लाठी, किसान का ही सिर- अकरम क़ादरी

एक पत्रकार दिल्ली में बगैर हेलमेट के जा रहा था, रास्ते मे एक पुलिस वाले ने रोका और बड़े रौब से पूछा कहाँ जा रहे हो ? पत्रकार ने बेधड़क होकर कहा "ग़ाज़ीपुर बॉर्डर किसान आंदोलन को कवर करने" इतने पर ही पुलिस वाले भाई साहब बिखर गए और आंखों में आंसू लिए बोले "बड़ी बदकिस्मती है भाई आज हम अपने ही बाप-भाइयों की पीठ पर लाठियां बरसा रहे हैं। उसी पीठ पर जिसपर बैठकर हम बड़े शौक़ से खेत पर जाया करते थे। पुलिस के आक़ाओं के हुक्मों का हवाला देते हुए उसने दबी आवाज़ से कहा अब उस बाप पर कैसे लाठियां बरसाई जाए जिसने खेती में रात-रात भर कपकपाती सर्दी में सिंचाई करके मुझे इस क़ाबिल बनाया है। एक भाई बॉर्डर पर दूसरा भाई भी बॉर्डर पर गाज़ीपुर वाले और माँ बाप सड़क पर ये क्या खेल रही है सरकार।

इतनी देर में पत्रकार साहब समझ चुके थे कि अंदर तक कितना हिला हुआ है यह पुलिस वाला, उनको संवेदनाए देते हुए कहा "चिंता ना करो जब तक हम है असली और सच्ची पत्रकारिता करेंगे चाहे हमारी जाति के बड़े गिद्ध कितने भी बिक जाए। हम आपके दर्द को बखूबी समझ रहे है और पेट की आग बुझाने की मजबूरी को भी।

पत्रकार महोदय को थोड़ा आगे ले जाकर पुलिस महोदय ने 500₹ का नोट दिया और कहा "वहां जाकर लंगर में दे देना"। उम्मीद की नज़रों से देखते हुए कहा भाई अपने पेशे से समझौता नहीं करना अभी तो लाखों लोग भूखे सो रहे है आने वाले वक्त में करोड़ो सोएंगे, हो सकता है उसमें आपकी और मेरी आने वाली पीढियां भी हो"

पत्रकार महोदय जब वहां से निकले तो पुलिस की जो दंगाई वाली इमेज आजतक बनाई गई थी यह तस्वीर उससे भी बिल्कुल अलग थी। कुछ देर आगे चलने के बाद उसके शब्दों की तासीर को समझते-समझते कब ग़ाज़ीपुर बॉर्डर आ गया पता नहीं चला, फिर अपने काम पर लग गया।

शनिवार, 23 जनवरी 2021

पिछले छः वर्ष का फ्लैशबैक है 'तांडव' - डॉ. शाबान ख़ान

सत्तापरक राजनीति और प्रतिरोध का तांडव - शाबान

     मौजूदा दौर में ओ.टी.टी प्लेटफॉर्म बॉलीवुड को भी पीछे छोड़ता जा रहा है और उसका कारण है कि कम समय में बहुत सारा मनोरंजन! इसके साथ ही आसानी, सहूलियत और दर्शकों की सीधी पहुंच ने इसे और अधिक लोकप्रिय बना दिया है। इस प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने वाली वेब सीरीज की सफलता और लोकप्रियता का एक कारण अच्छा कन्टेंट और नॉन सेंसरशिप भी है। नए लेखक, निर्देशक और कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है। यही कारण है कि बॉलवुड के पकाऊ राइटर्स और थकाऊ निर्देशकों की पिटी हुई पटकथा से इतर इस प्लेटफॉर्म पर नयापन है जो दर्शकों को पसंद आ रहा है।
      पिछले सप्ताह अमेज़न प्राइम पर अली अब्बास जफर निर्देशित 'तांडव ' वेबसीरीज रिलीज़ हुई। इस वेब सीरीज के लेखक गौरव सोलंकी तथा निर्माता हिमांशु कृष्ण मेहरा हैं। सीरीज के रिलीज़ होने के साथ ही इस पर विवाद और इसका विरोध होना भी आरंभ हो गया। बीजेपी विधायक राम कदम ने इसके विरोध में मोर्चा निकाला। दी इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक लखनऊ के  हज़रतगंज थाने के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में अमेज़ॉन प्राइम, निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और अभिनेता सैफ अली ख़ान, तथा मोहम्मद जीशान अय्यूब के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यही नहीं बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय चेयरपर्सन मायावती जी ने भी ट्विटर के माध्यम से विवादित सीन पर आपत्ति जताई। 
    'तांडव' वेबसीरीज पर विवाद होने का कारण उसमे दिखाए गए वीएमयू नामक शिक्षण संस्थान में मंचित होने वाले शिव और नारद नाटक का मंचन है। इस नाटक में शिव और नारद को आधुनिक वेशभूषा में दिखाया गया और उनके संवाद भी अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी में हैं। यही नहीं शिव जी का किरदार निभा रहा अभिनेता अंग्रेज़ी में गाली का भी प्रयोग करता है। इस सीन पर विवाद होना लाज़िमी है। जहां तक मेरा मानना है कि इस दृश्य की सीरीज में कोई आवश्यकता नहीं थी। फिर भी इस सीन का ड्रामे में होने  का उद्देश्य परिवेश का परिचय देना मात्र है। फिर भी इस सीन का होना ड्रामे में मात्र एक संयोग है।
    यदि देखा जाए तो धार्मिक भावनाओं का आहत होने के बहाने दिखाए गए राइटिस्ट राजनीति और वामपंथी प्रतिरोध के परिदृश्य को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। वेबसीरीज का आरम्भ किसान आंदोलन से होता है जो कि वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन से मेल खाता है, साथ ही उसका समर्थन भी करता है। ड्रामे का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष कॉलेज की राजनीति और सरकार के खिलाफ वामपंथी प्रतिरोध है। वामपंथी छात्रनेता शिवा किसानों और अल्पसंख्यकों का समर्थन करता है मुस्लिम छात्र की नाजायज़ गिरफ्तारी और फ़र्ज़ी एनकाउंटर का विरोध छात्रनेता शिवा ओर उसकी वामपंथी यूनिट करती है। ड्रामे में सत्ता में दक्षिणपंथी पार्टी को दिखाया गया है; इस सीरीज की पूरी कहानी दक्षिणपंथी सत्ताधारी पार्टी और वाम प्रतिरोध के इर्दगिर्द घूमती है। यह पूरा परिदृश्य वर्तमान सत्ता पक्ष और हाल में ही घटित घटनाओं के ताने बाने से बुना गया है। इसमें दिखाया गया  वीएमयू शिक्षण संस्थान जेएनयू का ही रूपांतरित नाम है। इसके साथ ही मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित छात्रनेता शिवा का चरित्र और उसके साथ घटित घटनाएं दर्शकों को कन्हैया कुमार से तुलना करने के लिए बाध्य करती है। देखा जाए तो पटकथा लेखक ने शिवा का चरित्र और छात्र राजनीति को कन्हैया कुमार और जेएनयू को सामने रखकर गढ़ा है।
       इस सीरीज का केंद्रीय मर्म और अभिव्यंजना तब उभरकर सामने आती है जब विजय प्राप्त दक्षिणपंथी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लेने जा रहे देवकीनंदन सिंह की हत्या उनके ही पुत्र द्वारा कर दी जाती है। उसके बाद देवकीनंदन का पुत्र समर प्रताप सिंह, अनुराधा किशोर और गोपालदास मिश्र प्रधानमंत्री बनने के लिए आपराधिक षड्यंत्र रचने लगता हैं। यहीं पर सीरीज अपने आरोही विकास पर पहुंचती है । प्रधानमंत्री बनने की होड़ में यह तीनों पात्र कहीं ना कहीं आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते है। यदि सीरीज के केंद्रीय भाव की बात करें तो वह सत्तापरक आपराधिक राजनीति और छात्रराजनीति के बीच होने वाला द्वंद ही है। अब सवाल यह है कि इसपर विवाद होने का क्या कारण है? तो यह साफ हो जाता है कि इसमें जिन नेताओं के काले कारनामो को सामने रखा गया है; उनका संबंध राइटिस्ट विचारधारा से है और वर्तमान समय में केंद्र की सत्ता पर दक्षिणपंथी पार्टी काबिज़ है। इसके साथ ही सीरीज में दिखाया गया है कि शासन में मौजूद पार्टी बहुजन, किसान तथा मुस्लिम विरोधी है जो राजनीतिक लाभ उठाने के लिए बहुजनो को साथ तो रखती है परन्तु अपने ब्राह्मणवाद का त्याग नहीं कर पाती है तथा अल्पसंख्यको का फ़र्ज़ी एनकाउंटर कराकर बहुसंख्यको को अपने पाले में कर लेती है। इत्तेफ़ाक़न वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी का चरित्र भी बहुत हद तक इसी तरह का है। बहुजनो को साथ लाने का प्रयास तथा अल्पसंख्यको के खिलाफ घृणा का माहौल बनाकर, बहुसंख्यको की भावनाओ से लाभ उठाने का काम मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी करती आ रही है। वेब सीरीज में रूलिंग पार्टी और उसकी आंतरिक राजनीति को दिखाया गया है परंतु इसमे पिटा हुआ विपक्षी दलपति और समस्त विरोधी पार्टियां नदारद है जैसे वर्तमान में भारतीय राजनीति से विपक्षी दल ग़ायब है। ड्रामे में सत्ताधारी पार्टी किसान विरोधी और पूंजीपतियों की समर्थक है। इसी कारणवश वह किसानों पर गोली भी चलवा देती है। देखा जाए तो इस वेब सीरीज ने वर्तमान भारतीय राजनीति को हमारे सामने, अतीत में घटित घटनाओं के साथ रखा है। इसी कारण सत्ताधारी पार्टी के समर्थक और कुछ अभिनय एवं कॉमेडी मंच से जुड़े अवसरवादी लोग तांडव का विरोध कर रहे है। ऐसे लोगो को डर है कि कहीं दर्शक इस ड्रामे को देखकर मौजूदा राजनैतिक ड्रामे और उनके असली तांडव को ना समझ जाये।

डॉ. शाबान खान 
एएमयू 
अलीगढ़

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

वैश्विक रचनाकार पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का हुआ उर्दू अनुवाद - अकरम क़ादरी

वैश्विक रचनाकार पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का हुआ उर्दू अनुवाद-   अकरम क़ादरी

अभी वर्तमान में उर्दू भाषा को यूनाइटेड स्टेट (संयुक्त राष्ट्र) के सेक्रेटरी जनरल (महासचिव)  एंटोनियो गुटर्स ने अपना संदेश उर्दू में दिया है जिससे प्रतीत होता है कि आने वाले समय में छः भाषाओं के साथ उर्दू भी यूनाइटेड स्टेट की भाषाओं में शामिल हो जाएगी। यह भारत के लिए अच्छी ख़बर है क्योंकि उर्दू की पैदाइश ही भारत में हुई है लेकिन कुछ मानसिक दिवालियापन के शिकार राजनेताओं ने इस भाषा में हिन्दू-मुस्लिम देखकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण किया है और भाषा का लगातार अपमान हो रहा है जबकि भाषाएं कभी भी किसी धर्म, जाति या प्रान्त की नहीं होती है बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर अधिकता या कमी से बोली या लिखी जाती है। भाषाएँ सीखना चाहिए इसमें कोई दिक्कत नहीं है बल्कि उस पर किसी तरह का लबादा नहीं चढ़ाना चाहिए। इससे देश की भाषाई आज़ादी को नुकसान होगा जो भाषा की दृष्टि से सही नहीं होगा। मुझे अभी तक हिंदी उर्दू का कोई ऐसा लेखक नहीं मिला जिसने केवल एक ही भाषा में अपने साहित्य का सृजन किया हो बल्कि उसकी रचना में सभी भाषाओं के शब्द प्राप्त होते हैं चाहे वो पात्र के चरित्र को दर्शाने हेतु उसकी ज़रूरत हो, मांग हो या फिर स्थान विशेष का भाषिक महत्त्व जिससे कि उस कही गई बात का संप्रेषण और प्रभावी हो सके। 

भाषाओं के मामले में महात्मा गांधी जी हिंदुस्तानी भाषा के पैरोकार थे। वो हिंदी-उर्दू में किसी भी प्रकार का भेद नहीं करते थे बल्कि ऐसी हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग करते एवं उस पर बल देते थे जिसमें कई भाषाओं, बोलियों का समन्वय हो और एक दूसरे को सबकी बात समझ में आये तथा किसी भी तरह से देश बटें नहीं बल्कि अनेकता में एकता का पुष्प भाषा के माध्यम से भी पुष्पित एवं पल्लवित हो। 

पिछले दो वर्षों में अनुवाद का कार्य चरम पर है और यह सही भी है। इससे वैचारिक ज्ञान का आदान-प्रदान भी होगा। साहित्य को एक सूत्र में पिरोने के मानवतावादी-कल्याणकारी कदम भी उठाए जाएंगे।

यायावर, प्रेम की कवयित्री, सूरीनाम गध साहित्य की अनन्य रचनाकार पुष्पिता अवस्थी एक वैश्विक रचनाकर हैं। उनके साहित्य अधिकतर सूरीनाम की भारतवंशी ज़मीं के संदर्भ में लिखा गया है और भारतवंशी की एकता का वर्णन मिलता है कि वो किस प्रकार भाषाई सामंजस्य
के माध्यम से सरनामी भाषा को हिंदुस्तानी भाषा कहते है। हिंदुस्तानी का अर्थ गांधी जी की भाषा से है जिस पर कई प्रवासी विशेषांक भी निकल चुके है।

पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का अनुवाद पिछले दो वर्षों में कई भाषाओं में हो चुका है लेकिन सबसे ज़्यादा स्वीकार्यता उर्दू में मिली है। उनकी पुस्तकों के अनुवादक, अफ़सानानिगार, तनक़ीदकार कई पुस्तकों के युवा लेखक डॉ. फरहान दीवान ने छिन्नमूल उपन्यास का अनुवाद किया है जिसमें वो कहते हैं कि "अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध रचनाकार प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी का भारतवंशी भारतीयों के जीवन पर लिखा गया उपन्यास "छिन्नमूल" भारतीय संस्कृति, संस्कार, भाषा और भारतवंशियों के कठोर परिश्रम की दारुण गाथा है। 

"छिन्नमूल" में दर्शाई गई विभिन्न संस्कृतियों के संगम, धर्म, समाज, राजनीतिक दांव पेंच और प्रेम की बेमिसाल दास्तान ने मुझे आकर्षित किया और इसका अनुवाद उर्दू में करने की इच्छा मैंने प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी जी से ज़ाहिर की।  उनकी अनुमति के बाद छिन्नमूल को " बोहरान " के नाम से उर्दू में अनुवाद किया जिसको के.एन.जी. प्रकाशन, बडगाम जम्मू और कश्मीर भेजा जा चुका है। जल्द ही " बोहरान " प्रकाशित होकर हमारे सामने होगी और हिंदी साहित्य के बाद उर्दू साहित्य में भी इसकी चर्चा समय के गर्भ में है। यह हिंदी में अन्तिका प्रकाशन गाज़ियाबाद से प्रकाशित है। सुधि पाठक वहां से लेकर दोनों भाषाओं में पढ़ सकते है।

इस उपन्यास के अतिरिक्त पुष्पिता अवस्थी के कहानी संग्रह "गोखरू" का अनुवाद मशहूर अफ़सानानिगार, कई संग्रहों के रचयिता 
सृजन साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ. तौसीफ बरेलवी ने किया है और वो कहानी संग्रह के बारे में कहते है:- 'गोखरू' डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की कहानियों का संकलन है जिसमें उन्होंने समाज के निचले तबक़े से लेकर आला तबक़े
तक के किरदारों पर लिखा और न केवल लिखा बल्कि उन कहानियों के ज़रिये समाज के सामने हक़ीक़त का आईना पेश किया। उनकी कहानियों का हिंदी से उर्दू में तर्जुमा करते वक़्त इस बात का एहसास भी हुआ कि उन्होंने अपनी कहानियों में छोटी- छोटी सी चीज़ों का भी खासा ध्यान रखा है जिससे उनकी कहानियों की मानवीयत बढ़ जाती है और उनकी बारीक-बिनी का भी अंदाज़ा बख़ूबी हो जाता है। गोखरू की कहानियों के शीर्षक भी कुछ ऐसे हैं जिनके ज़रिये से हिंदुस्तानी तहज़ीब का वो मंज़र आंखों के सामने आ जाता है कि जिसके लिए हिंदुस्तान जाना पहचाना जाता है और यही वजह रही कि इन
कहानियों को उर्दू में अनुवाद करते वक़्त बहुत ख़ुशी महसूस हुई"। 

यह कहानी संग्रह हिंदी में राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है और उर्दू में एडुकेशनल बुक हाउस दिल्ली से प्रकाशित है जिसको साहित्य जगत के पाठक लेकर पढ़ सकते हैं। हॉलैंड या नीदरलैंड की संस्कृति, संस्कार, समाज, सभ्यता एवं भाषा को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक नीदरलैंड डायरी का अनुवाद भी उर्दू में हुआ है जिसको उर्दू-अदब के उभरते हुए सृजनात्मक लेखक, तनक़ीदनिगार, अफसानानिगार, जोश अफ़रोज़ कविताएं लिखने वाले, मुर्दा दिल में वतन का जज़्बा भरने वाले 
अग़्यार के विरुद्ध बुलन्द आवाज़ के मालिक हाफ़िज़ डॉ. शाहिद खान मिस्बाही ने नीदरलैंड डायरी का उर्दू अनुवाद किया है जिसके बारे में वो कहते है कि ""नीदरलैंड डायरी" वो किताब है जो यूरोपीय संस्कृति और समाज की गिरहें खोलती है। वहीं दूसरी ओर यूरोप में अपनी जड़ें मज़बूत करती हुई हिन्दुस्तानी संस्कृति और ज़बानों की
सूरत-ए-हाल से आगाह करती है। यह किताब अपने मौज़ू और अपने मवाद दोनों ऐतबार से अहम है। यह किताब इंडो-यूरोपियन संस्कृति और समाज पर और खास तौर से ज़बान और साहित्य पर प्रकाश डालती है। जी.एन.के. पब्लिकेशन से प्रकाशित है जिसको अदब के पाठक हिंदी में किताबघर प्रकाशन दिल्ली से प्राप्त कर सकते है और यूरोपीय संस्कृति को बारीकी से जान सकते है। 

पुष्पिता अवस्थी के साहित्य का उर्दू जगत में छपना हिंदी-उर्दू के बीच उत्पन्न नफ़रत की खाई को कम करेगा। दोनों भाषाओं का सम्मान अपने-अपने स्थान पर होगा और दोनों ही तहज़ीब को समझने का मौका दोनों प्रकार के पाठकों को प्राप्त होगा । इसके अलावा अनुवाद के विद्यार्थी, शोधार्थी, भी आने वाले समय में शोध करेंगे और इन किताबों की महत्ता पर प्रकाश डालेंगे और मुझे उम्मीद ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि पुष्पिता अवस्थी जी का अग्रिम साहित्य उर्दू में जल्द प्रकाशित होगा और उर्दू के पाठकों तक पहुंचेगा

अकरम क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़