गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

जिस पिता ने ज़िन्दगी दी, बेटे ने लीवर देकर अपना फ़र्ज़ निभाया - अकरम क़ादरी

जिस पिता ने ज़िन्दगी दी, बेटे ने लीवर देकर अपना फ़र्ज़ निभाया - अकरम क़ादरी
एक कहावत है- "बुरे वक्त पर ही अपने और गैरों का एहसास होता है" जो अपना होता है उसको कहने की ज़रूरत नहीं होती है और गैर से कोई कुछ कहता नहीं है। कुछ ऐसा ही हुआ है बेटे और वालिद के रिश्तों में-  रामपुर के हसनात अली खान अलीग ने पेश की मिसाल यह वो बेटा है जिसने अपने पिता को नया जीवन दिया है हालांकि यह ज़िन्दगी उन्हीं की दी हुई है। हसनात अली ख़ान ने अपना लीवर देकर इतना ही नहीं आजकल के बेटों के प्रति जागरुगता पैदा की है और मां-बाप की प्रति सेवा-भाव का उदाहरण भी पेश किया है। जबकि प्रोफेशनल लाइफ की वजह से संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है आजकल के रिश्तों में भावुकता नहीं है। जब हसनात को मालूम हुआ कि उनके पिता को लीवर की ज़रूरत है तो उन्होंने बड़ा दिल दिखाकर अपने पिता के लिए फ़र्ज़ अदा करने की एक छोटी से कोशिश की। पिता को भी अपने बेटे पर गर्व महसूस होता है।
रामपुर निवासी विज़ारत अली खान लम्बे समय से लीवर की बीमारी से पीड़ित थे सन 2015 में लीवर डैमिज होने के कारण डॉक्टर ने उन्हें जीवित रहने के लिए ट्रांसप्लांट ही अंतिम विकल्प बताया था, पिता को बचाने के लिए बेटा हसनात आगे आया उसने अपना 60 पर्सेंट लिवर पिता को मेदांता हॉस्पिटल गुरुग्राम में को प्रत्यारोपित करा दिया उसके ट्रांसप्लांट को लगभग 6 साल पूर्ण होने के उपलब्ध में मेदांता हॉस्पिटल लीवर ट्रांसप्लांट डिपार्टमेंट के डिरेक्टर पद्मश्री डॉक्टर ए. एस. सोनी ने बधाई देते हुए ट्वीट किया जिसकी बड़े-बड़े जर्नलिस्ट ने सराहना की तथा उस ट्वीट को कई जागरूक नागरिको ने रिट्वीट भी किया जिनमे मिस्टर राघव भल  फ़ाउंडर नेटवर्क 18 अथवा मिस्टर संजय पुगलिया प्रेसिडेंट एंड एडिटोरीयल डिरेक्टर दा क्विंट इण्डिया ने रिट्वीट कराकर हौंसला अफजाई करते हुए हर बेटे को ऐसा गौरवशाली काम करने का एहसास दिलाया आजकल लोग अपने माँ-बाप को चंद वजह से वृद्धाश्रम में छोड़कर चले आते है यह विदेशी अपसंस्कृति हमारे देश मे बहुत तेज़ी से पैर पसार रही है जिसको हसनात जैसे नोजवानो से सीख लेकर आजकल के बच्चों को अपने माँ-बाप की सेवा करना चाहिए। 
हसनात ने जब लीवर ट्रांसप्लांट कराया था जो साथ मे उनके हमदर्द, दोस्त, अजीजों अकारिब भी थे जिसमें फैज़ान शाहिद, अकरम क़ादरी ने उन्हें मुबारकबाद पेश की तथा खुद को गौरवान्वित महसूस किया और कहा कि ऐसे दोस्त पर हमें फक्र है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

किसान की लाठी, किसान का ही सिर- अकरम क़ादरी

किसान की लाठी, किसान का ही सिर- अकरम क़ादरी

एक पत्रकार दिल्ली में बगैर हेलमेट के जा रहा था, रास्ते मे एक पुलिस वाले ने रोका और बड़े रौब से पूछा कहाँ जा रहे हो ? पत्रकार ने बेधड़क होकर कहा "ग़ाज़ीपुर बॉर्डर किसान आंदोलन को कवर करने" इतने पर ही पुलिस वाले भाई साहब बिखर गए और आंखों में आंसू लिए बोले "बड़ी बदकिस्मती है भाई आज हम अपने ही बाप-भाइयों की पीठ पर लाठियां बरसा रहे हैं। उसी पीठ पर जिसपर बैठकर हम बड़े शौक़ से खेत पर जाया करते थे। पुलिस के आक़ाओं के हुक्मों का हवाला देते हुए उसने दबी आवाज़ से कहा अब उस बाप पर कैसे लाठियां बरसाई जाए जिसने खेती में रात-रात भर कपकपाती सर्दी में सिंचाई करके मुझे इस क़ाबिल बनाया है। एक भाई बॉर्डर पर दूसरा भाई भी बॉर्डर पर गाज़ीपुर वाले और माँ बाप सड़क पर ये क्या खेल रही है सरकार।

इतनी देर में पत्रकार साहब समझ चुके थे कि अंदर तक कितना हिला हुआ है यह पुलिस वाला, उनको संवेदनाए देते हुए कहा "चिंता ना करो जब तक हम है असली और सच्ची पत्रकारिता करेंगे चाहे हमारी जाति के बड़े गिद्ध कितने भी बिक जाए। हम आपके दर्द को बखूबी समझ रहे है और पेट की आग बुझाने की मजबूरी को भी।

पत्रकार महोदय को थोड़ा आगे ले जाकर पुलिस महोदय ने 500₹ का नोट दिया और कहा "वहां जाकर लंगर में दे देना"। उम्मीद की नज़रों से देखते हुए कहा भाई अपने पेशे से समझौता नहीं करना अभी तो लाखों लोग भूखे सो रहे है आने वाले वक्त में करोड़ो सोएंगे, हो सकता है उसमें आपकी और मेरी आने वाली पीढियां भी हो"

पत्रकार महोदय जब वहां से निकले तो पुलिस की जो दंगाई वाली इमेज आजतक बनाई गई थी यह तस्वीर उससे भी बिल्कुल अलग थी। कुछ देर आगे चलने के बाद उसके शब्दों की तासीर को समझते-समझते कब ग़ाज़ीपुर बॉर्डर आ गया पता नहीं चला, फिर अपने काम पर लग गया।

शनिवार, 23 जनवरी 2021

पिछले छः वर्ष का फ्लैशबैक है 'तांडव' - डॉ. शाबान ख़ान

सत्तापरक राजनीति और प्रतिरोध का तांडव - शाबान

     मौजूदा दौर में ओ.टी.टी प्लेटफॉर्म बॉलीवुड को भी पीछे छोड़ता जा रहा है और उसका कारण है कि कम समय में बहुत सारा मनोरंजन! इसके साथ ही आसानी, सहूलियत और दर्शकों की सीधी पहुंच ने इसे और अधिक लोकप्रिय बना दिया है। इस प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने वाली वेब सीरीज की सफलता और लोकप्रियता का एक कारण अच्छा कन्टेंट और नॉन सेंसरशिप भी है। नए लेखक, निर्देशक और कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है। यही कारण है कि बॉलवुड के पकाऊ राइटर्स और थकाऊ निर्देशकों की पिटी हुई पटकथा से इतर इस प्लेटफॉर्म पर नयापन है जो दर्शकों को पसंद आ रहा है।
      पिछले सप्ताह अमेज़न प्राइम पर अली अब्बास जफर निर्देशित 'तांडव ' वेबसीरीज रिलीज़ हुई। इस वेब सीरीज के लेखक गौरव सोलंकी तथा निर्माता हिमांशु कृष्ण मेहरा हैं। सीरीज के रिलीज़ होने के साथ ही इस पर विवाद और इसका विरोध होना भी आरंभ हो गया। बीजेपी विधायक राम कदम ने इसके विरोध में मोर्चा निकाला। दी इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक लखनऊ के  हज़रतगंज थाने के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में अमेज़ॉन प्राइम, निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और अभिनेता सैफ अली ख़ान, तथा मोहम्मद जीशान अय्यूब के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यही नहीं बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय चेयरपर्सन मायावती जी ने भी ट्विटर के माध्यम से विवादित सीन पर आपत्ति जताई। 
    'तांडव' वेबसीरीज पर विवाद होने का कारण उसमे दिखाए गए वीएमयू नामक शिक्षण संस्थान में मंचित होने वाले शिव और नारद नाटक का मंचन है। इस नाटक में शिव और नारद को आधुनिक वेशभूषा में दिखाया गया और उनके संवाद भी अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी में हैं। यही नहीं शिव जी का किरदार निभा रहा अभिनेता अंग्रेज़ी में गाली का भी प्रयोग करता है। इस सीन पर विवाद होना लाज़िमी है। जहां तक मेरा मानना है कि इस दृश्य की सीरीज में कोई आवश्यकता नहीं थी। फिर भी इस सीन का ड्रामे में होने  का उद्देश्य परिवेश का परिचय देना मात्र है। फिर भी इस सीन का होना ड्रामे में मात्र एक संयोग है।
    यदि देखा जाए तो धार्मिक भावनाओं का आहत होने के बहाने दिखाए गए राइटिस्ट राजनीति और वामपंथी प्रतिरोध के परिदृश्य को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। वेबसीरीज का आरम्भ किसान आंदोलन से होता है जो कि वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन से मेल खाता है, साथ ही उसका समर्थन भी करता है। ड्रामे का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष कॉलेज की राजनीति और सरकार के खिलाफ वामपंथी प्रतिरोध है। वामपंथी छात्रनेता शिवा किसानों और अल्पसंख्यकों का समर्थन करता है मुस्लिम छात्र की नाजायज़ गिरफ्तारी और फ़र्ज़ी एनकाउंटर का विरोध छात्रनेता शिवा ओर उसकी वामपंथी यूनिट करती है। ड्रामे में सत्ता में दक्षिणपंथी पार्टी को दिखाया गया है; इस सीरीज की पूरी कहानी दक्षिणपंथी सत्ताधारी पार्टी और वाम प्रतिरोध के इर्दगिर्द घूमती है। यह पूरा परिदृश्य वर्तमान सत्ता पक्ष और हाल में ही घटित घटनाओं के ताने बाने से बुना गया है। इसमें दिखाया गया  वीएमयू शिक्षण संस्थान जेएनयू का ही रूपांतरित नाम है। इसके साथ ही मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित छात्रनेता शिवा का चरित्र और उसके साथ घटित घटनाएं दर्शकों को कन्हैया कुमार से तुलना करने के लिए बाध्य करती है। देखा जाए तो पटकथा लेखक ने शिवा का चरित्र और छात्र राजनीति को कन्हैया कुमार और जेएनयू को सामने रखकर गढ़ा है।
       इस सीरीज का केंद्रीय मर्म और अभिव्यंजना तब उभरकर सामने आती है जब विजय प्राप्त दक्षिणपंथी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लेने जा रहे देवकीनंदन सिंह की हत्या उनके ही पुत्र द्वारा कर दी जाती है। उसके बाद देवकीनंदन का पुत्र समर प्रताप सिंह, अनुराधा किशोर और गोपालदास मिश्र प्रधानमंत्री बनने के लिए आपराधिक षड्यंत्र रचने लगता हैं। यहीं पर सीरीज अपने आरोही विकास पर पहुंचती है । प्रधानमंत्री बनने की होड़ में यह तीनों पात्र कहीं ना कहीं आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते है। यदि सीरीज के केंद्रीय भाव की बात करें तो वह सत्तापरक आपराधिक राजनीति और छात्रराजनीति के बीच होने वाला द्वंद ही है। अब सवाल यह है कि इसपर विवाद होने का क्या कारण है? तो यह साफ हो जाता है कि इसमें जिन नेताओं के काले कारनामो को सामने रखा गया है; उनका संबंध राइटिस्ट विचारधारा से है और वर्तमान समय में केंद्र की सत्ता पर दक्षिणपंथी पार्टी काबिज़ है। इसके साथ ही सीरीज में दिखाया गया है कि शासन में मौजूद पार्टी बहुजन, किसान तथा मुस्लिम विरोधी है जो राजनीतिक लाभ उठाने के लिए बहुजनो को साथ तो रखती है परन्तु अपने ब्राह्मणवाद का त्याग नहीं कर पाती है तथा अल्पसंख्यको का फ़र्ज़ी एनकाउंटर कराकर बहुसंख्यको को अपने पाले में कर लेती है। इत्तेफ़ाक़न वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी का चरित्र भी बहुत हद तक इसी तरह का है। बहुजनो को साथ लाने का प्रयास तथा अल्पसंख्यको के खिलाफ घृणा का माहौल बनाकर, बहुसंख्यको की भावनाओ से लाभ उठाने का काम मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी करती आ रही है। वेब सीरीज में रूलिंग पार्टी और उसकी आंतरिक राजनीति को दिखाया गया है परंतु इसमे पिटा हुआ विपक्षी दलपति और समस्त विरोधी पार्टियां नदारद है जैसे वर्तमान में भारतीय राजनीति से विपक्षी दल ग़ायब है। ड्रामे में सत्ताधारी पार्टी किसान विरोधी और पूंजीपतियों की समर्थक है। इसी कारणवश वह किसानों पर गोली भी चलवा देती है। देखा जाए तो इस वेब सीरीज ने वर्तमान भारतीय राजनीति को हमारे सामने, अतीत में घटित घटनाओं के साथ रखा है। इसी कारण सत्ताधारी पार्टी के समर्थक और कुछ अभिनय एवं कॉमेडी मंच से जुड़े अवसरवादी लोग तांडव का विरोध कर रहे है। ऐसे लोगो को डर है कि कहीं दर्शक इस ड्रामे को देखकर मौजूदा राजनैतिक ड्रामे और उनके असली तांडव को ना समझ जाये।

डॉ. शाबान खान 
एएमयू 
अलीगढ़

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

वैश्विक रचनाकार पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का हुआ उर्दू अनुवाद - अकरम क़ादरी

वैश्विक रचनाकार पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का हुआ उर्दू अनुवाद-   अकरम क़ादरी

अभी वर्तमान में उर्दू भाषा को यूनाइटेड स्टेट (संयुक्त राष्ट्र) के सेक्रेटरी जनरल (महासचिव)  एंटोनियो गुटर्स ने अपना संदेश उर्दू में दिया है जिससे प्रतीत होता है कि आने वाले समय में छः भाषाओं के साथ उर्दू भी यूनाइटेड स्टेट की भाषाओं में शामिल हो जाएगी। यह भारत के लिए अच्छी ख़बर है क्योंकि उर्दू की पैदाइश ही भारत में हुई है लेकिन कुछ मानसिक दिवालियापन के शिकार राजनेताओं ने इस भाषा में हिन्दू-मुस्लिम देखकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण किया है और भाषा का लगातार अपमान हो रहा है जबकि भाषाएं कभी भी किसी धर्म, जाति या प्रान्त की नहीं होती है बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर अधिकता या कमी से बोली या लिखी जाती है। भाषाएँ सीखना चाहिए इसमें कोई दिक्कत नहीं है बल्कि उस पर किसी तरह का लबादा नहीं चढ़ाना चाहिए। इससे देश की भाषाई आज़ादी को नुकसान होगा जो भाषा की दृष्टि से सही नहीं होगा। मुझे अभी तक हिंदी उर्दू का कोई ऐसा लेखक नहीं मिला जिसने केवल एक ही भाषा में अपने साहित्य का सृजन किया हो बल्कि उसकी रचना में सभी भाषाओं के शब्द प्राप्त होते हैं चाहे वो पात्र के चरित्र को दर्शाने हेतु उसकी ज़रूरत हो, मांग हो या फिर स्थान विशेष का भाषिक महत्त्व जिससे कि उस कही गई बात का संप्रेषण और प्रभावी हो सके। 

भाषाओं के मामले में महात्मा गांधी जी हिंदुस्तानी भाषा के पैरोकार थे। वो हिंदी-उर्दू में किसी भी प्रकार का भेद नहीं करते थे बल्कि ऐसी हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग करते एवं उस पर बल देते थे जिसमें कई भाषाओं, बोलियों का समन्वय हो और एक दूसरे को सबकी बात समझ में आये तथा किसी भी तरह से देश बटें नहीं बल्कि अनेकता में एकता का पुष्प भाषा के माध्यम से भी पुष्पित एवं पल्लवित हो। 

पिछले दो वर्षों में अनुवाद का कार्य चरम पर है और यह सही भी है। इससे वैचारिक ज्ञान का आदान-प्रदान भी होगा। साहित्य को एक सूत्र में पिरोने के मानवतावादी-कल्याणकारी कदम भी उठाए जाएंगे।

यायावर, प्रेम की कवयित्री, सूरीनाम गध साहित्य की अनन्य रचनाकार पुष्पिता अवस्थी एक वैश्विक रचनाकर हैं। उनके साहित्य अधिकतर सूरीनाम की भारतवंशी ज़मीं के संदर्भ में लिखा गया है और भारतवंशी की एकता का वर्णन मिलता है कि वो किस प्रकार भाषाई सामंजस्य
के माध्यम से सरनामी भाषा को हिंदुस्तानी भाषा कहते है। हिंदुस्तानी का अर्थ गांधी जी की भाषा से है जिस पर कई प्रवासी विशेषांक भी निकल चुके है।

पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का अनुवाद पिछले दो वर्षों में कई भाषाओं में हो चुका है लेकिन सबसे ज़्यादा स्वीकार्यता उर्दू में मिली है। उनकी पुस्तकों के अनुवादक, अफ़सानानिगार, तनक़ीदकार कई पुस्तकों के युवा लेखक डॉ. फरहान दीवान ने छिन्नमूल उपन्यास का अनुवाद किया है जिसमें वो कहते हैं कि "अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध रचनाकार प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी का भारतवंशी भारतीयों के जीवन पर लिखा गया उपन्यास "छिन्नमूल" भारतीय संस्कृति, संस्कार, भाषा और भारतवंशियों के कठोर परिश्रम की दारुण गाथा है। 

"छिन्नमूल" में दर्शाई गई विभिन्न संस्कृतियों के संगम, धर्म, समाज, राजनीतिक दांव पेंच और प्रेम की बेमिसाल दास्तान ने मुझे आकर्षित किया और इसका अनुवाद उर्दू में करने की इच्छा मैंने प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी जी से ज़ाहिर की।  उनकी अनुमति के बाद छिन्नमूल को " बोहरान " के नाम से उर्दू में अनुवाद किया जिसको के.एन.जी. प्रकाशन, बडगाम जम्मू और कश्मीर भेजा जा चुका है। जल्द ही " बोहरान " प्रकाशित होकर हमारे सामने होगी और हिंदी साहित्य के बाद उर्दू साहित्य में भी इसकी चर्चा समय के गर्भ में है। यह हिंदी में अन्तिका प्रकाशन गाज़ियाबाद से प्रकाशित है। सुधि पाठक वहां से लेकर दोनों भाषाओं में पढ़ सकते है।

इस उपन्यास के अतिरिक्त पुष्पिता अवस्थी के कहानी संग्रह "गोखरू" का अनुवाद मशहूर अफ़सानानिगार, कई संग्रहों के रचयिता 
सृजन साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ. तौसीफ बरेलवी ने किया है और वो कहानी संग्रह के बारे में कहते है:- 'गोखरू' डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की कहानियों का संकलन है जिसमें उन्होंने समाज के निचले तबक़े से लेकर आला तबक़े
तक के किरदारों पर लिखा और न केवल लिखा बल्कि उन कहानियों के ज़रिये समाज के सामने हक़ीक़त का आईना पेश किया। उनकी कहानियों का हिंदी से उर्दू में तर्जुमा करते वक़्त इस बात का एहसास भी हुआ कि उन्होंने अपनी कहानियों में छोटी- छोटी सी चीज़ों का भी खासा ध्यान रखा है जिससे उनकी कहानियों की मानवीयत बढ़ जाती है और उनकी बारीक-बिनी का भी अंदाज़ा बख़ूबी हो जाता है। गोखरू की कहानियों के शीर्षक भी कुछ ऐसे हैं जिनके ज़रिये से हिंदुस्तानी तहज़ीब का वो मंज़र आंखों के सामने आ जाता है कि जिसके लिए हिंदुस्तान जाना पहचाना जाता है और यही वजह रही कि इन
कहानियों को उर्दू में अनुवाद करते वक़्त बहुत ख़ुशी महसूस हुई"। 

यह कहानी संग्रह हिंदी में राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है और उर्दू में एडुकेशनल बुक हाउस दिल्ली से प्रकाशित है जिसको साहित्य जगत के पाठक लेकर पढ़ सकते हैं। हॉलैंड या नीदरलैंड की संस्कृति, संस्कार, समाज, सभ्यता एवं भाषा को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक नीदरलैंड डायरी का अनुवाद भी उर्दू में हुआ है जिसको उर्दू-अदब के उभरते हुए सृजनात्मक लेखक, तनक़ीदनिगार, अफसानानिगार, जोश अफ़रोज़ कविताएं लिखने वाले, मुर्दा दिल में वतन का जज़्बा भरने वाले 
अग़्यार के विरुद्ध बुलन्द आवाज़ के मालिक हाफ़िज़ डॉ. शाहिद खान मिस्बाही ने नीदरलैंड डायरी का उर्दू अनुवाद किया है जिसके बारे में वो कहते है कि ""नीदरलैंड डायरी" वो किताब है जो यूरोपीय संस्कृति और समाज की गिरहें खोलती है। वहीं दूसरी ओर यूरोप में अपनी जड़ें मज़बूत करती हुई हिन्दुस्तानी संस्कृति और ज़बानों की
सूरत-ए-हाल से आगाह करती है। यह किताब अपने मौज़ू और अपने मवाद दोनों ऐतबार से अहम है। यह किताब इंडो-यूरोपियन संस्कृति और समाज पर और खास तौर से ज़बान और साहित्य पर प्रकाश डालती है। जी.एन.के. पब्लिकेशन से प्रकाशित है जिसको अदब के पाठक हिंदी में किताबघर प्रकाशन दिल्ली से प्राप्त कर सकते है और यूरोपीय संस्कृति को बारीकी से जान सकते है। 

पुष्पिता अवस्थी के साहित्य का उर्दू जगत में छपना हिंदी-उर्दू के बीच उत्पन्न नफ़रत की खाई को कम करेगा। दोनों भाषाओं का सम्मान अपने-अपने स्थान पर होगा और दोनों ही तहज़ीब को समझने का मौका दोनों प्रकार के पाठकों को प्राप्त होगा । इसके अलावा अनुवाद के विद्यार्थी, शोधार्थी, भी आने वाले समय में शोध करेंगे और इन किताबों की महत्ता पर प्रकाश डालेंगे और मुझे उम्मीद ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि पुष्पिता अवस्थी जी का अग्रिम साहित्य उर्दू में जल्द प्रकाशित होगा और उर्दू के पाठकों तक पहुंचेगा

अकरम क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़

रविवार, 27 सितंबर 2020

नया किसान अध्यादेश आने वाली पीढ़ियों के लिए डेथ वारण्ट है- अकरम क़ादरी

नया किसान अध्यादेश आने वाली पीढ़ियों का डेथ वारण्ट है -अकरम क़ादरी


देश की संसद ने जिसप्रकार से कृषि अध्यादेश को पारित किया है तबसे किसानों में रोष व्याप्त है उसके अलावा कई सांसदों ने भी इसका दोनो सदन में भरपूर विरोध भी किया लेकिन सरकार के पास बहुमत होने के कारण यह किसान विरोधी अध्यादेश ध्वनि मत से पास हो गया जिससे किसान लगातार सड़को पर नज़र आ रहे है जिनके साथ मुख्य रूप से कांग्रेस और उसके घटक दलों के साथ-साथ दूसरे विपक्षी दल भी विरोध कर रहे है। इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सबसे वफादार अकाली दल भी साथ छोड़कर रवाना हो गयी है क्योंकि इस फैसले के विरुद्ध अकाली दल ने कई बार विरोध किया लेकिन उनको दरकिनार कर दिया गया जिसके चलते अकाली दल की एकमात्र केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने इस्तीफा दे दिया और किसानों के आंदोलन के साथ हो गयी। जिस फैसले को मोदी जी ऐतिहासिक बता रहे थे उस फैसले को वो अपनी केंद्रीय मंत्री को ही नही समझा सके तो फिर किसान कैसे समझ सकते थे फिर इस बार किसान दो-दो हाथ करने को तैयार है क्योंकि वो जानते है कि जो अध्यादेश पारित हुए है उनके माध्यम से उनकी खेती तो पूंजीपतियों के नाम मे हो जाएगी और वो केवल अपनी ही ज़मीन में मज़दूर बनकर रह जायेगा। वैसे भी इस देश मे प्राचीन काल से आजतक किसान ही सबसे ज्यादा सताया गया है किसान पहले भी लगान देता था उसके बाद साहूकारों, सेठों और जमींदारों ने लूटा फिर अंग्रेज़ो के साथ मिलकर डकैती हुई जिसका वर्णन हिंदी साहित्य के कई साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में किया है प्रेमचंद का "गोदान", श्रीलाल शुक्ल का "रागदरबारी" और वर्तमान में पंकज सुबीर का "अकाल में उत्सव" पढ़ेंगे तो किसानों की व्यथा को आसानी से समझा जा सकता है आज देश की सरकारें अपने पूंजीपति मित्रों के साथ मिलकर लूट कर रही है।
इस अध्यादेश का विरोध सबसे ज़्यादा  कृषि बाहुल्य प्रदेशो में पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, में हो रहा है इसके बाद दूसरे प्रदेशों में भी आग की तरह फैल चुका है और किसान हर माध्यम से अपना दुःख बता चुके है जबकि इस अध्यादेश का विरोध जिन किसान संगठनों ने भारत बंद का ऐलान किया है, उनमें अखिल भारतीय किसान संघ (AIFU), भारतीय किसान यूनियन (BKU), अखिल भारतीय किसान महासंघ (AIKM) और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) प्रमुख हैं। किसानों के आंदोलन का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखने को मिल रहा है, लेकिन कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के किसानों निकायों ने भी बंद का आह्वान किया है। यही नहीं किसानों के इस बंद को देश की कई ट्रेड यूनियंस ने भी अपना समर्थन दिया है। मज़ेदार बात यह है कि इस अध्यादेश का विरोध भारतीय जनता पार्टी की मातृसंस्था आरएसएस के किसान संगठन ने भी किया है।
जबकि सरकार का पक्ष है कि मूल्य आश्वासन पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश से कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा मिलेगा?
सरकार का तर्क है कि यह अध्यादेश किसानों को शोषण के भय के बिना समानता के आधार पर बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाएगा। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं कि इससे बाजार की अनिश्चितता का जोखिम किसानों पर नहीं रहेगा और किसानों की आय में सुधार होगा, लेकिन कृषि विशेषज्ञ तो कुछ और ही कह रहे हैं।
मध्य प्रदेश के युवा किसान नेता और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष राहुल राज कहते हैं कि ''इससे मंडी की व्यवस्था ही खत्म हो जायेगी। इससे किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट और बिचौलियों को फायदा होगा।" वे आगे कहते हैं, "फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस में वन नेशन, वन मार्केट की बात कही जा रही है लेकिन सरकार इसके जरिये कृषि उपज विपणन समितियों (APMC) के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है। अगर इसे खत्म किया जाता है तो व्यापारियों की मनमानी बढ़ेगी, किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिलेगी।" फिर किसान की बड़े स्तर पर लुटाई होगी इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े किसान हितैषी, किसानों के लिए अनेक धरना प्रदर्शन करने वाले सरदार वीएम सिंह कहते हैं, "30 साल पहले पंजाब के किसानों ने पेप्सिको के साथ आलू और टमाटर उगाने के लिए समझौता किया था। इस अध्यादेश की धारा 2(एफ) से पता चलता है कि ये किसके लिए बना है। एफपीओ को किसान भी माना गया है और किसान तथा व्यापारी के बीच विवाद की स्थिति में बिचौलिया भी बना दिया गया है। इसमें अगर विवाद हुआ तो नुकसान किसानों का है।"
"विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के अंदर समझौता मंडल में जाना होगा। वहां न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा। एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसानें को भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा। देश के 85 फीसदी किसान के पास दो-तीन एकड़ जोत है। विवाद होने पर उनकी पूरी पूंजी वकील करने और ऑफिसों के चक्कर काटने में ही खर्च हो जाएगी।" यह तर्कसंगत भी प्रतीत होता है अगर किसान यहीं करता रहा तो वो अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाएगा, अपनी बेटी के हाथ पीले करने की सोचेगा, माता-पिता की सेवा करेगा या फिर अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सोचेगा यह वो प्रश्न है जिसका उत्तर किसी के भी पास नहीं है। 
लम्बे अरसे से किसानों के लिए संघर्षरत, स्वराज इण्डिया के संस्थापक प्रोफेसर योगेंद्र यादव कहते है कि "किसानों के लिए यह बिल ऐसा है कि जैसे पहले किसान के सिर पर छप्पर था उसमें कुछ छेद थे, पानी तो आता था लेकिन बारिश में वो कुछ बचाव कर लेता था, लेकिन इस सरकार ने सिर के ऊपर की छत ही ग़ायब कर दी और किसान को लॉलीपॉप के रूप में बताया गया अब आप आत्मनिर्भर और आज़ाद है। इस जुमले को पुराने ज़माने के किसान तो नहीं समझ सकते है लेकिन वर्तमान दौर के युवा किसान इस पूरे फ़र्ज़ी ऐतिहासिक निर्णय को अच्छे से समझते है बल्कि पिछले जितने भी ऐतिहासिक फैसले बताये गए है वो सब आज फुस्स ही नज़र आ रहे है चाहे वो स्किल इण्डिया हो, स्वच्छ भारत अभियान हो, या फिर 15 किसान को न्यूनतम मूल्य वाला, किसान लागत का डेढ़ गुना मूल्य मिलने का जुमला हो वो सबको अब अपनी खुली आँखों से देख रहा है और इसका बराबर विरोध कर रहा है। निजीकरण के खिलाफ ज्यादातर सभी संगठन रोड पर है लेकिन भारत की मुख्य धारा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रिया, सुशांत, दीपिका में व्यस्त है क्योंकि यह मुद्दा बिहार चुनाव में भुनाने की साज़िश चल रही है। लेकिन कुछ मीडिया के असली पत्रकार आज भी भारत के मुख्य मुद्दों को स्थान दे रहे है जबकि वो टीआरपी में पिछड़ रहे है फिर भी देश और जनमानस के मुद्दों के साथ खड़े है। 
जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय हिंद
जय भारत...

अकरम क़ादरी

रविवार, 13 सितंबर 2020

हिंदी को दोयम दर्जे का क्यों समझा जाता है.?- पुष्पिता अवस्थी

हिंदी को दोयम दर्जे का क्यों समझा जाता है ?- पुष्पिता अवस्थी

अक्सर देखा यह गया है कि देश में हिंदी की जयकार करने वाले लोग, मंच, माला और माइक के साथ जब हिंदी का जयघोष करते है तो एक सामान्य भारतीय नागरिक को गर्व होता है होना भी चाहिए क्योंकि यह घोषित रूप से राष्ट्रभाषा तो नहीं है लेकिन राजभाषा तो है जिसको अधिकतर भारतीय बोलते, समझते और लिखते है और उनकी आम जनजीवन की भाषा भी हिंदी है जो देश को नाभिनाल से जोड़े रखने में सहायक है लेकिन भारत के राजनेताओ ने इस संदर्भ में ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने हिंदी भाषा का नाम लेकर, माइक, मंच से खूब हिंदी में लच्छेदार भाषण तो दिए लेकिन अमलीजामा पहनाने में नाकामयाब रहे है जिसको देखकर मुझे बहुत ताज्जुब होता है कि जो यह वादा करते है आखिर वो पूरा क्यों नहीं करते है।
हिंदी भाषा का प्रचार यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो प्रवासियों से ज़्यादा भारतवंशी प्रसार कर रहे है वो हमेशा देश और भाषा को स्वयं से जोड़े रखने में सेतु मानते है और भारतीय संस्कृति, संस्कार को विदेशों में फैलाने का एक मुख्य स्रोत समझते है इसलिए वो विदेशों में मंदिर, मस्ज़िद, मठ में हिंदी को सीखते है और जब वो आपस मे मिलते है तो हिंदी भाषा या भारतीय भाषाओं में ही बात करते है जबकि यूरोपियन देशों में रहकर यह भारतवंशी वहां की राजकीय भाषा को तो सीखते ही है फिर भी अपनी हिंदी को जोड़े रखते है कहा जा सकता है कि हर तरह से आधुनिक हुए है लेकिन कभी भी अपनी भाषा, संस्कृति और संस्कार से उन्होंने समझौता नहीं किया है। अगर समझौता कर लिया होता तो वो भी वही दिखते जो दूसरे दिखते है। हिंदी और भारतीय संस्कृति को साथ लेकर चलने वाले यह वो लोग है जो कभी भारत तो नहीं आये लेकिन अपने पूर्वजों के देश को बहुत सम्मान देते है। आज भी वो त्यौहार, तीज़, उत्सव, को मनाते ही है उसके अलावा भारत के स्वंतत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती को अपना त्यौहार समझते है। 
भारत मे अनेक सेमिनार, संगोष्ठियों में हिस्सेदारी करने के दौरान मैंने देखा है ज़्यादातर लोग मंच से नीचे उतरते ही फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बात करते है यधपि मुझे भाषाओं से कोई वैमनस्य नहीं है लेकिन हिंदी को दोयम दर्जे का समझना कतई बर्दाश्त नहीं है। यदि सामने वाले व्यक्ति को हिंदी या कोई दूसरी भारतीय भाषा नहीं आती है तो अंग्रेज़ी में बात करने से कोई गुरेज़ नहीं है लेकिन जो हिंदी कार्यक्रम में शामिल हुए है और हिंदी के अच्छे जानकार है जब वो अंग्रेज़ी मे बात करते है तो अजीब सा प्रतीत होता है जबकि विदेशों में हिंदी में ही बात करते है जहां पर भी भारतवंशी या फिर प्रवासी मिलता है क्योंकि मातृभाषा में बात करने से ह्रदय का हृदय से मिलन होता है शब्द सही से समझ और उनकी भावना भी समझ आती है। 
देश की जितनी भी भारतीय भाषाएं और बोलियां है वो बहुत व्यवस्थित है उनका व्याकरण बहुत अच्छा है शब्द सम्पदा भी अद्वितीय है फिर क्यों हम दूसरी भाषाओं का प्रयोग करें?
हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार भारत से ज़्यादा वैश्विक स्तर पर हो रहा है क्योंकि इसका सबसे अच्छा उदाहरण है विदेश में रह रहे भारतवंशी आज भी जब मिलते है तो वो हिंदी या भारत की बोलियों में ही बात करते है जबकि भारत में हिंदी के पुरोधा कहे जाने वाले लोग हिंदी मंच से उतरते ही फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बोलकर भाषा का अपमान करते है। देश की वर्तमान सरकार से मेरी विनती है कि भारत को राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी जैसा उपहार दे। यद्यपि यूरोपियन देशों में किसी भी नागरिक को नागरीकता देने का अधिकार ही भाषा है यदि उसको उस देश की भाषा आएगी तो वो नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है।

पुष्पिता अवस्थी
अध्यक्षा
आचार्यकुल वर्धा एवं हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन नीदरलैंड

शनिवार, 5 सितंबर 2020

उस्तादों ने इंसान बनने में मदद की - अकरम क़ादरी

उस्तादों ने इंसान बनने में मदद की- अकरम क़ादरी

"रचनात्मक अभिव्यक्ति और ज्ञान में आनंद जगाना शिक्षक की सर्वोच्च कला है" यह अल्बर्ट आइंस्टीन के शब्द है जिन्होंने बताने का प्रयत्न किया कि इंसान में रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से ज्ञान के भंडार को गुरु हीं जगाता है, वो ही एक पत्थर इंसान को तराशने का कार्य करता है जिससे वो सभ्य समाज मे रहने के लायक हो जाये और समाज को मानवतावादी दृष्टिकोण से देखे और इंसाफ के लिए सदा आगे आये। 
जिस प्रकार से आज शिक्षण संस्थानों में मशीन बनाने की जो प्रक्रिया चल रही है वो उसके एकदम ख़िलाफ़ हूं बल्कि यूं कहिए कि हर एक आदर्श शिक्षक इसके ख़िलाफ़ ही होगा। मेरे गुरुओं ने मुझे कभी मशीन बनने के लिए तैयार नहीं किया, बल्कि कुछ नया सोचने, समझने और लिखने के लिए प्रेरित किया जिसकी वजह से मैं लगातार कोशिश भी करता रहा।
आज इस समय किस उस्ताद के बारे में लिखूं सबने मुझे आगे बढ़ाने के लिए कोशिश की है बचपन में मेरे कस्बे के उस्ताद जहां से मेरी शुरुआती तालीम शुरू हुई उनमें हाजी इरफ़ान ख़ान साहब, हाजी रिज़वान ख़ान ने मुझे आगे बढाने के लिए कोशिश की उसके बाद उत्तराखंड के सैंट पैट्रिक के अध्यापकों में सिस्टर सैलिन, सिस्टर प्रेसी, राजेश सर, पंकज सर, ज्योत्सना मैम, रश्मि मैम, अलका मैम, पवन सर, रेनुका मैम, अबरार सर जैसे कुशल गुरुओं ने शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत मन से पढ़ाया जिससे हमारा किशोरावस्था में सही विकास हो सका जिसकी वजह से लगातार आगे बढ़ने के लिए तत्पर है। उसके बाद लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज का सफर तय हुआ वहां के भी टीचर्स ने खूब आगे बढ़ाया, 2008 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेकर लिटरेचर में अपना कैरियर बनाने की सोची और आज उसी तरफ आगे बढ़ रहे है। स्नातक, स्नातकोत्तर करने के बाद एम. फिल. मौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद से करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जहां पर प्रोफेसर टीवी कट्टीमनी, डॉ. सेषु बाबू जी के कुशल मार्गदर्शन में अपना शुरुआती शोध पूरा किया जिसमें विशेष सहयोग मातातुल्य प्रोफेसर शकीला ख़ानम का रहा जिन्होंने अपने सही मार्गदर्शन में मुझे अच्छा शोध करने के लिए प्रेरित किया उसके बाद दोबारा एएमयू में पीएचडी के लिए लौटना हुआ तो प्रोफेसर अब्दुल अलीम सर, प्रोफेसर रमेश रावत, प्रोफेसर आशिक़ अली बलौत, प्रोफेसर मेराज अहमद सर, प्रोफेसर इफ्फत असग़र मैम ने भी पिछला शोधकार्य देखकर मुझे आगे बढ़ने के लिए, अच्छे शोध के लिए सहयोग दिया जिनका मैं शब्दो मे शुक्रिया अदा नहीं कर सकता हूँ उनका आजीवन ऋणी रहूंगा। 
वर्तमान परिस्थिति में प्रोफेसर मेराज अहमद सर के कुशल मार्गदर्शन में पीएचडी सूरीनाम जैसे नए विषय पर कर रहा हूँ जिसमे वाङ्गमय पत्रिका के सम्पादक डॉ. फ़ीरोज़ ख़ान सर एवं डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ मैम लेखन के प्रति मुझे बहुत सहयोग दिया, वक़्त, बेवक्त बहुत समझाया, डांटा छोटे भाई जैसा प्रेम दिया और कुछ नए विषयों पर लेखन के लिए प्रोत्साहित किया जिनके अथक सहयोग के कारण मैं तीन पुस्तकें जिसमे एक मौलिक और दो सम्पादित कर सका, फिलहाल कई संस्थाओं में काम कर रहा हूँ और वाङ्गमय का सहसंपादक हूं। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओ में कमसेकम तीन दर्जन शोधालेख प्रकाशित हो चुके है। वैश्विक लेखिका यायावर, प्रेम की कवयित्री प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी ने मेरे शोध में भी बहुत सहयोग दिया है वो अनवरत रूप से मुझे समझाती रहती है किसी भी नए विषय पर लिखने के लिए आईडिया देती है। आजकल उन विषयों पर लिखने के लिए अधिक प्रोत्साहित करती है जिन विषयों पर कोई लिखना नहीं चाहता। 
स्वयं की इस ज़िंदा लाश को मैं कंधे पर लेकर इन्हीं सब गुरुओं की बदौलत चल रहा हूं आगे भी उम्मीद करता हूँ कि यह मुझे सहयोग करेंगे जिसके लिए मैं जीवनभर शुक्रगुज़ार रहूंगा और एहसानमन्द करूँगा....आपकी दुआओं का आकांक्षी - अकरम क़ादरी
जय हिंद