मंगलवार, 5 मई 2020

पक्ष, विपक्ष और जनपक्ष - अकरम क़ादरी

पक्ष, विपक्ष और जनपक्ष - अकरम क़ादरी

भारतीय लोकतंत्र में आज तक हमने सत्ता के दो पक्ष सुने है जिसमें एक पक्ष होता है दूसरा विपक्ष, जो भारतीय संविधान के अनुसार चलता है, पक्ष वो होता है जिसको संसदीय प्रणाली के अंतर्गत सबसे ज़्यादा वोट मिलते है अर्थात जिसके सबसे ज्यादा लोकसभा सदस्य होते है, विपक्ष वो होता है जिसके लोकसभा सदस्य कम होते है। ऐसे ही राज्यसभा होती है जिसमे जिस पार्टी के जितने विधायक होते है उसी के अनुसार उस पार्टी के उतने ही राज्यसभा सदस्य होते है और लोकतंत्र संविधान के अनुसार चलता रहता है जिसमे एक सत्तापक्ष किसी मुद्दे पर अपनी राय देता है और विपक्ष उसका एनालिसिस करके उसमें कुछ जोड़ता है या फिर उसके बिंदुओं पर चर्चा करके उस मुद्दे को खत्म कराता है या फिर संसोधन करके उस बिल को पास किया जाता है वरना उसको रोक दिया जाता है। अगर लोकसभा में सत्ता पक्ष के मैजोरिटी से ज्यादा सदस्य है तो थोड़ी बहुत बहस के बाद  पास हो जाता है जिसको फिर राज्यसभा में विपक्षी दल चैलेंज करता है यदि फिर भी इस बिल में कोई कमी महसूस होती है तो वो बिल सुप्रीम कोर्ट में जाता है, उसके बाद फैसला आता है अतः हमारा लोकतंत्र बहुत मजबूत स्थिति में प्रतीत होता है,
लेकिन पिछले कई वर्षों से देश मे विपक्ष लगभग दोनो हाउस में नगण्य स्थिति में आ गया है अर्थात विपक्ष के लिए जितने वोट और सदस्य होना चाहिए वो भी नहीं हो पा रहे है तो देश मे तीसरे पक्ष की भूमिका बाहर सशक्त हो जाती है क्योंकि डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि अगर सड़क वीरान हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी उनकी इस युक्ति में मुझे दम प्रतीत होता है क्योंकि बहुत से सरकारों के फैसले सड़क के माध्यम से भी बदले गए है और उनपर चुनी हुई सरकार भी बैकफुट पर आई है दरअसल वो लोग जो यह सब धरना प्रदर्शन करते थे वो अधिकतर हर प्रलोभन से दूर थे वो किसी भी पक्ष के चाटुकार और लोभी नहीं थे बल्कि वो जननेता थे जो अपनी आवाज़ इतनी साइंटिफिक तरीके से उठाते थे कि जनता को नज़र आता था कि यह पक्ष एकदम सही है लेकिन कुछ वर्षों से तीसरा पक्ष खत्म होता जा रहा है ।
दरअसल इस तीसरे पक्ष में वो लोग होते थे जो कलाकर्मी, रंगकर्मी, संस्कृति प्रेमी, लेखक, पत्रकार, सामान्यता जिनको बुद्धिजीवी समझा जाता था लेकिन वर्तमान समय मे टी.वी डिबेट में बैठा हुआ बुद्धिजीवी ज्यादातर किसी एक पक्ष की बात करते हुए नज़र आता है क्योंकि उसको भी पता है जनता राजनैतिक पार्टियों का चुनाव धर्म, मज़हब, जाति, पंथ, देखकर करती है तो वो क्यों विरोध करके स्वयं को खतरे में डाले, क्योंकि कुछ सिरफिरे लोग ऐसे लोगो पर हमला करा देते है। तीसरे पक्ष का उखड़ने का सबसे बड़ा कारण है मीडिया जो ज़्यादातर गोदी हो चुका है। जो हमेशा सत्ता की गोद मे बैठकर लॉलीपॉप का मज़ा लेता रहता है उन मुद्दों पर बहस करता है जो भावुक है एक धर्म की तरफ झुके होते है या फिर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता की हिमायत करते हुए नज़र आते है जिनको आने वाले चुनाव में लाभ होता है अधिकतर मीडिया गोदी मीडिया हो चुका है। इस कठिन दौर में जो भी असली पत्रकारिता करता है उसको बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ वो पक्ष जो ना ही जनता द्वारा चुना हुआ और ना ही वो किसी भी पार्टी का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से सदस्य है वो विशुद्ध रूप से लोकतंत्र और संविधान का रक्षक है वो सत्ता का विरोध करता है क्योंकि वो देश, समाज और मानवता का भला चाहता है, उसकी जो समाज मे कमी आई है एक वो भी बहुत बड़ी वजह है जिससे सरकारे भावुकता की तरफ मुड़ गयी है उनका जनता के असली मुद्दों से ज्यादा कोई मतलब नहीं है इसका सीधा नुकसान जनता को ही होगा वो राजनेता अपनी सत्ता भोग कर निकल लेंगे लेकिन जनता के सवाल यूं के यूँही रहेंगे... आज हमारे देश को तीसरे पक्ष की ज़रूरत है जिसमे सच्चे लेखक, कलाकर्मी, रंगकर्मी, हास्य कलाकार, व्यंग्यकर्मी ही हो सकते है जिनको नाममात्र का भी सत्ता का मोह ना हो ...वर्तमान समय मे अगर कोई लेखक किसी मुद्दे पर कुछ बोलता, लिखता, पढ़ता है तो जो सत्ता के समर्थक है या फिर फैन बन चुके है वो पूरी कुतर्को की जमात खड़ी कर देते है और वो लोग अपने नुकसान से भी बेपरवाह है। जिससे वो बुद्धिजीवी बोलना तो नहीं छोड़ता है बल्कि आवाज़ उठाता रहता है उसके बाद सत्ता के लोग उस पर व्यक्तिगत आक्षेप लगा देते है या फिर व्यक्तिगत हमला करते है फिर उसको अपनी अपनी आई. टी. सेल के द्वारा बदनाम किया जाता है। 
मेरी अपने देश के नोजवानो से अपील है कि संविधान, देश और मानवता को बचाना है तो किसी भी पार्टी का फैन मत बनिये जिसको भी अच्छा लगे वोट दीजिये लेकिन एक सीमा के बाद उसपर सवाल ज़रूर कीजिये जिससे आपकी छवि एक ज़िम्मेदार नागरिक की बने नाकि किसी पार्टी विशेष के भक्त की.....
आखिर तीसरे पक्ष का मज़बूत होता लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है 
जय हिंद
जय भारत

जनपक्ष
(सत्ता का परमानेंट विपक्ष और देश का सजग प्रहरी)

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें