शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

दशकों से काबिज, पीलीभीत के लिए विकास-मॉडल तैयार करने में बीजेपी असफल- मोहम्मद जावेद

दशकों से काबिज बीजेपी, पीलीभीत के लिए विकास-मॉडल तैयार करने में असफल रही है- मोहम्मद जावेद



पूरे देश में चुनावी मेला सज चुका है| हर प्रदेश अपने अपने चुनावी मुद्दों के साथ चुनावी मैदान है| हर प्रदेश के अपने चुनावी मुद्दे है अपने अपने नेता है| इन्ही प्रदेशों में एक प्रदेश है जिसका नाम उत्तर प्रदेश है, जहां की राजनीति देश की राजनीति में अहम् भूमिका निभाती है| कहा ये जाता है की दिल्ली की कुर्सी उत्तर प्रदेश से होकर जाती है| इसी प्रदेश में एक क्षेत्र है पीलीभीत जिसे बांसुरी नगरी भी कहा जाता है| 

देश की लगभग 95% बांसुरी बनाने वाली, बांसुरी नगरी पीलीभीत, उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड क्षेत्र में भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित है| जिसकी साक्षरता दर 64% है| पीलीभीत क्षेत्र की आबादी 20 लाख से अधिक है जिसमे हिन्दू आबादी 71%, और मुस्लिम 24% हैं, पुरुष लगभग 10 लाख 72 हज़ार और 9 लाख 60 हज़ार महिलाएं हैं| 

पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में कुल16 लाख 71 हज़ार 151 हैं जिन्हे आने वाली 23 को अपने मत का प्रयोग करना है| पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत 5 निर्वाचन क्षेत्र: बहेड़ी, बरखेडा, पूरनपुर, बीसलपुर और पीलीभीत आते हैं|   

पीलीभीत में पहले आम चुनाव 1952 में हुए जिसमे कांग्रेस पार्टी के मुकुंद लाल अग्रवाल ने जीत दर्ज की| उसके बाद 1980 और 84 के दशक में पीलीभीत सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा| 1989 और 1996 में मेनका गांधी ने जनता दल के टिकट पर चुनाव जीतकर अपनी मजबूत दावेदारी पेश की| मेनका गाँधी ने पहली बार 2004 में बीजेपी के टिकट पर बड़े मार्जिन से चुनाव जीता| उसके बाद 2009 में उन्होंने अपनी ये सीट अपने बेटे वरुण गाँधी को दे दी जिन्होंने गौरक्षा पर दिए गए बिबादित बयानों के चलते इस सीट को जीता| 2014 मेनका गाँधी ने एक बार फिर बीजेपी से जीत हासिल की|

2014 में बीजेपी की मेनका गांधी ने 5 लाख 54 हज़ार वोट पाकर जीत को अपने नाम किया, सपा प्रत्याशी वुद्धसेन वर्मा 2 लाख 72 हज़ार 882 वोटों के साथ दुसरे नंबर पर रहे|

इस बार फिर बीजेपी के वरुण गाँधी और गठबंधन प्रत्याशी हेमराज चुनावी मैदान में आमने सामने हैं| इन दोनों के बीच काटें की टक्कर मानी जा रही है|  हालांकि अभी कांग्रेस ने अपने कैंडिडेट का एलान नहीं किया है| जहां एक तरफ वरुण गांधी का उनकी माँ द्वारा बनाया गया वोट बैंक है तो वहीं दूसरी तरफ हेमराज वर्मा एक स्थानीय प्रत्याशी है जो कि 2012 में असेंबली इलेक्शन जीत चुके हैं उन्होंने बीजेपी के प्रवक्तानन्द को भारी बहुमत से हराया था|

दूसरी तरफ 2009 में पीलीभीत से सांसद रह चुके हैं वरुण गांधी हैं जिन्होंने पीलीभीत से ही पहला चुनाव लड़ते हुए 4 लाख 19 हजार 539 वोटों से जीत हासिल की थी| उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी वीएम सिंह थे, जो उनकी मां मेनका गांधी के चेचेरे भाई हैं| 29 साल के वरुण एक रैली में संबोधित 'विवादास्पद बयान' देकर सुर्खियों में आए थे| इस बयान के बाद लगा कि भारतीय जनता पार्टी को वरुण गांधी के रूप में युवा चेहरा मिल गया| लेकिन पिछले कुछ दिनों तक वरुण अपनी ही पार्टी में हाशिए पर थे|

जहां एक तरफ बीजेपी नेता वरुण गांधी पर पीलीभीत में भड़काऊ भाषण देने, सांप्रदायिक सौहार्द को ठेस पहुँचाने, दंगा जैसे हालात पैदा कराना जैसे संगहीन मामले उनके विरुद्ध दर्ज हैं| वहीं हेमराज वर्मा पर भी एक मामला पब्लिक सर्वेंट को अपने कर्तव्य का पालन न करने देने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का मामला दर्ज हैं|

संपत्ति के मामले में हेमराज वर्मा के पास 55,000 कॅश के साथ साथ एक ट्रेक्टर और एक बाइक भी है| जिनकी सालाना कमाई लगभग 4 लाख है इसके साथ साथ 90 लाख के एसेट्स हैं| इससे पहले 2017 में वे लगभग 7 लाख का इनकम टैक्स रिटर्न भर चुके हैं| वही राहुल गांधी से भी चार गुना अमीर हैं वरुण गांधी| 2014 में दायर किए चुनाव एफिडेविट के मुताबिक वरुण गांधी की संपत्ति 35 करोड़ से भी अधिक है| करोड़पति होने के बावजूद राहुल और वरुण गांधी ने अपनी कार नहीं खरीदी है जो कि बेहद ताज्जुब की बात है|

पीलीभीत में गरीबी और बेरोजगारी अहम् चुनावी मुद्दे माने जा रहे हैं| अगर इलाके की गरीबी की बात करें तो पीलीभीत की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे अपनी ज़िंदगी गुज़र बसर कर रही है| इसके अलावा इलाके का लगभग 45% युवा बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा है| पिछले 6 दशकों में कोई ऐसा विकास का मॉडल तैयार नहीं गया जिससे युवा रोजगार हो सके|

मेनका गांधी के 6 बार संसद रहने के वाबजूद भी पीलीभीत की जनता को इसका कोई ख़ास फायदा नहीं हुआ है| जनता आज भी गरीबी और बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है| मेनका गाँधी लम्बे समय से यहाँ की सांसद हैं लेकिन फिर भी यहां कोई ख़ास विकास होता हुआ नज़र नहीं आता है|

शनिवार, 30 मार्च 2019

पीलीभीत की पुकार हेमराज वर्मा क्यों- अकरम क़ादरी

पीलीभीत की पुकार हेमराज वर्मा क्यों - अकरम क़ादरी

2019 लोकसभा की जबसे सुगबुगाहट शुरू हुई है तबसे पीलीभीत की जनता में हेमराज वर्मा का विश्लेषण शुरू हो चुका है क्योंकि ज़िले के अंदर यही एक ऐसा कद्दावर नेता है जो विधायक का चुनाव बसपा से हारने के बाद फिर सपा से चुनाव जीतने के बाद, दोबारा चुनाव हारने के बाद भी कभी भी दुबककर नही बैठा जबकि अमूमन पीलीभीत में होता यह है कि चुनाव के छः महीने के आसापास ही नेता कलफ वाला कुर्ता पहनकर जनता के बीच मे मडराने लगते है लेकिन यह एक ऐसा नेता है जो विधानसभा हारने के बाद भी जनता के द्वार पर जाता रहा, उनके दुःख-सुख में बराबर का भागी भी रहा चाहे वो मज़दूरों, किसानों को नरभक्षी शेर के मारने की घटनाएं हो या फिर किसी कृषक के बीमारी की छोटी सी घटना हो उस पर पहुंचकर हर पल साथ देने का कमिटमेंट पीलीभीत की जनता को रास आ रहा है जब हेमराज वर्मा किसी कारणवश ज़िले में मौजूद नही होते है तो उनके भाई ब्लॉक प्रमुख अरुण वर्मा मोर्चा संभालते है और गरीब मजदूर जनता के काम को तल्लीनता से अंज़ाम देते है।
आखिरकार पीलीभीत की जनता के सामने यह बड़ा प्रश्न है इतना सबकुछ करने के बाद भी हम हेमराज वर्मा को क्यों पीलीभीत का सांसद चुने आखिर ऐसी क्या वजह है जिन लोगो ने इस सेवक को कार्य करते देखा होगा वो तो परिचित ही है फिर भी उनके ज्ञानवर्धन के लिए कुछ मुख्य कार्य बता देता हूँ कि उन्होंने अपनी विधायकनिधि के माध्यम से मझोला से डुनिडाम रोड, मझोला से भिखारीपुर रोड, गुप्ता कालोनी से नहर और बीसलपुर, बरखेड़ा तक का रोड, पीलीभीत गोहानियाँ चौराहे से माला कालोनी तक का रोड, बरखेड़ा में जीटीआई कॉलेज का निर्माण, 50 बेड का हॉस्पिटल तथा पीलीभीत से मझोला तक रोड का चौड़ीकरण का काम कराया, उसके अलावा बहुत ऐसे छोटे-छोटे काम है जिनको बताना शायद सम्भव नही है लेकिन जनता जानती है
हेमराज वर्मा ज़िला पीलीभीत का एक ऐसा व्यक्तित्त्व है जो युवाओं का चहेता तो है ही उसने कभी हिन्दू-मुस्लिम में भेदभाव नही किया कभी ऐसे भाषण नही दिए जिससे सामाजिक तानाबाना टूटे और नफरत की राजनीति करके वो आगे बढ़ जाये,
पीलीभीत की जनता को अब सोचना यह है कि जो लोग बाहर से आकर यहां चुनाव लड़ते है फिर अपने घर चले जाते है उनको चुनना है या फिर एक सामाजिक कार्यकर्ता, युवा जोश और किसानों के सच्चे मसीहा को चुनना है जो आपके बीच चौबीस घण्टे, सात दिन मौजूद है....लोकतंत्र में जनता हमेशा राजा होती है और उसके बनाये प्रतिनिधि उनकी भावनाओं को समझते है जबकि गन्ना किसानों की घटनाएं पूरे देश मे वायरल हुई थी जो बहुत ही पीड़ाजनक भी था, पिछले वर्ष जो कुपोषित बच्चो की रिपोर्ट आई थी उसमे पीलीभीत पहले स्थान पर था यह सबसे ज्यादा शर्मनाक बात थी, क्योंकि वो जिला जिसकी प्राकृतिक सम्पदा इतनी विशाल है जिसमे उत्तर-प्रदेश का सबसे अच्छा आयुर्वेदिक कॉलेज है वहां के बच्चे कुपोषित हो रहे है यह सब सोचने समझने के मुद्दे है ...जनता को झूठे, खोखले, वादों से बचकर, असली विकास, रोज़गार, किसानों की खुशहाली के लिए वोट करना होगा

जय हिंद
अकरम हुसैन
पॉलिटिकल एनालिस्ट

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

किसानों की बेइज़्ज़ती कर रही है बीजेपी- सय्यद मसूद उल हसन

मैं भी एक किसान हूँ और मेरे कुछ सवाल हैं जुम्लेन्द्र सरकार द्वारा लाए गए हाल के बजट पर और किसानों को जो रोज़ की 16 रुपए 43 पैसे की भीख देने की योजना है उस पर:-
जो डीज़ल हमें 2014 तक 50 रुपए प्रति लीटर मिल जाता था 2014 के बाद 70 रूपये प्रति लीटर खरीद चुके हैं, जबकि कच्चे तेल की एक बैरल 50 डालर से भी कम हो गई थी।
जो यूरिया 150 रुपए मे 50 किलो मिलता था 2014 तक वो आज ही 340 रुपए का 45 किलो मिल पाया है, गेहूं की बुवाई मे लगने वाला डी0ए0पी 850 से 950 तक मिलता था 50 किलो 2014 तक, इस साल 1345 रुपए का 45 किलो  ही मिला है, ये तो हुई केन्द्र सरकार की किसानों पर मार अब आते हैं उत्तर प्रदेश पर ब्लॉक से गेहूं का बीज खरिदा 1 कुंटल  40 किलो दाम था 40 किलो के एक बैग का 1040 रुपए, ब्लाॅक वालो ने कहा सबसिडी मिलेगी 15 दिन में 60% मिली 2 महीने में 50% बीज की गुणवत्ता थर्ड क्लास सो अलग, अखिलेश यादव जी की पिछली सरकार ने आब पाशी फ्री कर दी थी ढोंगी बाबा ने फ़िर से पैसे वसूलने शुरू कर दिये हैं। गन्ने का पैसा जो हम किसानों को अखिलेश सरकार में एक से दो महीने में मिल जाता था अब उस पैसे को साल-साल भर गन्ना मिलें अपने बैंक खाते में जमा रख कर जो ब्याज कमा रही उस्से ढ़ोंगी बाबा के आॅफिस की चाय बन रही है? एक वादा किसानों से यह किया गया है बजट में की मोदी सरकार किसानों को 6000 रुपए सालाना भत्ता देगी तो सरकार ये जो 6000 हैं साल के वो दिन के 16 रुपए 43 पैसे तो इस्से ज़यादा की बिड़ी किसान भाई रोज़ पी जाते हैं तो यह भीख देने का क्या औचित्य है आप इस भीख को अपने पार्टी फंड में जमा कर लो और 16 रुपए रोज़ तो हम किसान आपको भी दे सकते हैं इतनी हैसियत तो हिन्दुस्तान के किसान रखते हैं, ये 16 रुपए 43 पैसे की भीख दे कर बग़ले बजाना बेहद दुखद है। इन सवालों का कोई जवाब हो तो बताना। जुम्लेन्द्र जी और ढ़ोंगी बाबा जी।
सय्यद मसूद उल हसन,
पूर्व उपाध्यक्ष,
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ।

शनिवार, 26 जनवरी 2019

तिरंगे की बेइज़्ज़ती करने वाले तिरंगा यात्रा का ढोंग ना करे- अकरम क़ादरी

एक वो है जो झण्डा बनाता है...
दूसरा वो है जो झण्डा फहराता है....
तीसरा वो है जो झण्डे से तिरंगा यात्रा के नाम पर खेलता है.....
उसको ही पहचानना ज़रूरी है....
फिर वो दाबे करता है कि वो देशभक्त है जबकि वो देशभक्त नही  बल्कि दंगाई है, दिमाग़ी गंदगी भरे हुए है जिसका उदाहरण हमें कठुआ में एक बलात्कारी के लिए निकाली तिरंगा यात्रा, और कासगंज में तिरंगा यात्रा के नाम पर मुस्लिम बस्तियों में जाकर गाली गलौज, उसके बाद एक युवक की मौत.....तो भाइयो, बहनों और मोदी जी के फ़र्ज़ी मित्रों तिरंगा यात्रा निकालने से पहले उसका इतिहास भी समझो क्योंकि कभी भी तुम्हारे बाप-दादा ने तिरंगे के बारे में तो जाना नही बल्कि उसको कई बार जलाया है पिछले दिनों मुरादाबाद के एक बीजेपी पार्षद ने तिरंगे को पैरो से कुचला था जिसकी फोटोज बहुत वायरल हुई थी, दूसरी बात तुम जिस तिरंगे की बात कर रहे हो उसका सम्मान करना ही है तो नागपुर और झंडेवालान के कार्यालय पर लहरा के देखो तो हमें भी यकीन होगा तुम देशभक्त हो वरना दोगले तो 1857 से ही हो, दूसरा कारण यह भी है संघ के जो बड़े-बड़े तथाकथित प्रचारक हुए है उन्होंने कभी भारतीय झण्डे को अपना ध्वज माना ही नही है.....फ़र्ज़ी राजनीति करने से अच्छा है थोड़ा पढ़ भी लेते.......जो कुछ तुम बोल पाते और लिख पाते......जो चैनल यह फ़र्ज़ी डिबेट चला रहे है उनमें छी न्यूज़ के सुभाष चंद्रा जी निवेशकों से पत्र लिखकर माफी मांग चुके है दूसरे चैनलों का भी नम्बर आने वाला....देश की जनता 2019 में जी रही है वो तुम्हारे 5 साल का रिपोर्ट कार्ड भी हाथ मे रखे बैठी है और तुम्हारी फ़र्ज़ी तिरंगा यात्रा भी समझती है और तुम्हारे दिमागो में भरे गुबार भी जल्दी ही वो इसका जवाब दे देगी बस तुम EVM सही रखना.....
जय हिंद

#समी_क़ादरी

सोमवार, 21 जनवरी 2019

यूनिट्री फाउंडेशन के सोहैल यूनिटी कर रहे है एएमयू का नाम रौशन- अकरम क़ादरी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का एक ऐसा साबिक तालिब-ए-इल्म जो यारो का यार है जिसके अंदर सियासत के साथ-साथ कौम और मिल्लत की मदद करने का जज़्बा कभी कम नही हुआ जिसका सही नाम तो सोहैल अबरार है लेकिन लोगो को जोड़कर, मोहब्बत, हंसी-खुशी और प्यार से एक रखने की वजह से लोग उसको सोहैल यूनिटी के नाम से ज्यादा जानते है जिससे मेरी भी कई नाइत्तेफाकिया रही, लेकिन उसने कभी दोस्ती यारी से मुँह नही मोड़ा हमेशा मजबूती से साथ खड़ा रहा, एएमयू से सेक्रेटरी का चुनाव लड़ना चाहा लेकिन कुछ मजबूरियों की वजह से उसका यह सपना पूरा नही हुआ, लेकिन उसको तो इदारे की मोहब्बत और अलीगढ़ की फ़िक़्र कौम और मिल्लत की फ़लाह के लिए काम करना था तो उसने बगैर किसी ओहदे के अपने ही शहर में ग़रीबों और मज़लूमो की मदद करना शुरू कर दिया, जब उसको ख़्याल आया यह काम वो ओर भी अच्छे से कर सकता है तो कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उसने #यूनिट्री_फाउंडेशन के नाम से एक NGO बनाई जिसमे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साबिक तालिब-ए-इल्म और कुछ मौजूदा एएमयू दोस्तो, हमदर्दों को लेकर गांव देहात में घूम-घूम कर गरीब बच्चों के एएमयू में फॉर्म अप्लाई कराये जिससे ज़्यादा से ज़्यादा गरीब लोगो के बच्चे अलीगढ़, जामिया और दूसरी यूनिवर्सिटीज में पहुंच सके, कुछ सालो से वो समाजवादी पार्टी के झण्डे के नीचे रहकर भी सियासी काम कर रहा है जिससे कौम को उसका फ़ायदा भी नज़र आ रहा है....सोहैल यूनिटी हमेशा किसी भी फालतू काम मे ना पढ़कर बल्कि ऐसा काम करता है जिससे सबका फायदा हो और किसी का भी नुकसान ना हो .....मुझे फ़क्र है कि मैं एक ऐसे हमदर्द, हँसमुख का दोस्त हूँ....... एएमयू के तलबा को आप पर फ़क्र है जो आप बगैर किसी ओहदे के एएमयू में गरीब बच्चों को भेज रहे हो और ज़रूरत पड़ने पर उनकी फीस भी दे रहे हो
#शुक्रिया_यूनिटी

अकरम क़ादरी

रविवार, 13 जनवरी 2019

हेमराज वर्मा ही दे सकते है, मेनका गांधी को टक्कर- अकरम क़ादरी

हेमराज वर्मा ही दे सकते है मेनका गांधी को टक्कर- अकरम क़ादरी

चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही हर जिले में पार्टियों ने अपने-अपने प्रत्याशी को टटोलना शुरू कर दिया है, फिर उसमें जातिगत मैथमेटिक्स हो या फिर धर्मगत आंकड़ा जो भी प्रत्याशी इन आकड़ो में मजबूत नज़र आएगा पार्टी उसको ही अपना प्रत्याशी चुनेंगी।
जबसे सपा-बसपा का गठबन्धन हुआ है तब से जिला पीलीभीत के राजनीतिक हलकों में चहल-पहल शुरू हो चुकी है क्योंकि जिला पीलीभीत में ही भाजपा की कद्दावर नेता कैबिनेट मिनिस्टर लगभग पैंतीस वर्षो से एक छत राज करने वाली श्रीमती मेनका संजय गांधी को अब तक कोई भी पार्टी हरा नही पाई है जबकि मेनका गांधी जी की जीत की शुरुआत ही 2 लाख से ऊपर से होती है जोकि पिछले चुनावों के परिणामों से ही पता चलता है।
इस बार भाजपा कार्यकाल में हुए झूठे वादे, और जिले को कुपोषण में प्रथम स्थान पर रहने से और दो क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन से मेनका गांधी जी को चुनाव में काफी मुश्किल हो सकती है अगर पीलीभीत जनपद की गंठबंधन वाली सीट अगर सपा के खाते में पहुंचती है तो पूर्व राज्यमंत्री हेमराज वर्मा ही सबसे अच्छे कैंडिडेट होंगे क्योंकि जिले के कद्दावर नेता हाजी रियाज़ भी सांसद का चुनाव लड़ चुके है जिनको उम्मीद से काफी कम वोट मिले थे, दूसरी तरफ बुद्धसेन वर्मा और भगवत शरण गंगवार की भी दावेदारी नज़र आ रही है लेकिन जातिगत, धर्मगत और साफ छवि, ईमानदार, कर्मठ प्रत्याशी के रूप में हेमराज वर्मा को ही टिकट मिलता है तो दिल्ली की संसद में यह सीट पक्की हो सकती है हेमराज वर्मा एक ऐसे प्रत्याशी है जिनके प्रति युवाओं में काफी जोश है वो हर धर्म, मज़हब, जाति और पिछले दिनों बाघों से मरे हुए लोगो के घर लगातार सांत्वना देने पहुंच रहे है और किसी भी परेशानी के समय जिला पीलीभीत के किसी भी व्यक्ति को अपने स्तर से हर प्रकार की मदद भी कर रहे है जिससे उनसे जिले के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक का विश्वास लगातार बढ़ रहा है दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के युवा पूर्व मुख्यमंत्री भी अखिलेश यादव अपनी पीढ़ी के नेताओ पर ज्यादा विश्वास रखते है जिस प्रकार से उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री रहते हुए युवाओं को ज्यादा मौका दिया जिससे उनकी सोच साफ झलकती है कि वो कि युवा जोश और पुराना अनुभव मिलकर अगर काम करेगा तो निश्चित ही पार्टी का जनाधार बढ़ेगा जिससे आने वाले वक्त में अखिलेश यादव प्रधानमंत्री के भी उम्मीदवार हो सकते है.....
हेमराज वर्मा ही पीलीभीत जिले के एक मात्र ऐसे नेता है जो किसी भी पार्टी कार्यकर्ता या फिर एक आम आदमी की कॉल पर तुरंत काम करते है और उसका हरसंभव साथ देने का प्रयत्न करते है, हेमराज वर्मा मृदुभाषी और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी है अगर समाजवादी पार्टी गठबंधन से हेमराज वर्मा को अपना टिकट देती तो लोधी समाज, दलित समाज, वैश्य समाज, कुर्मी समाज के अलावा ब्राह्मण समाज का भी समर्थन हासिल हो सकता है जबकि अल्पसंख्यक समाज मे मुस्लिम, ईसाई और पंजाबी अधिकतर हेमराज वर्मा को ही वोट करेगा
जय हिंद जय भारत
.......
अकरम हुसैन क़ादरी
पॉलिटिकल एनालिस्ट

सोमवार, 19 नवंबर 2018

उपन्यास 'दरमियाना' लेखक सुभाष अखिल से डॉ. फ़िरोज़ ख़ान की बातचीत

कथाकार/संपादक सुभाष अखिल से फ़ीरोज़ और डॉ. शमीम की बातचीत

आप अपने जन्म स्थान, घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएँ।
 मेरा जन्म अवश्य दिल्ली में हुआ, मगर हम लगभग 350 वर्षों से ग़ाज़ियाबाद निवासी हैं। पिता जी भारत सरकार में राजपत्रित अधिकारी थे। लिहाजा मेरी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश दिल्ली में ही हुई। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से 1978-79 में एम.ए. किया और फिर पी.एच-डी. करने के दौरान दिल्ली में ऑटो भी चलाया। इसके बाद दिल्ली प्रेस पत्रा प्रकाशन समूह में पत्राकार बन जाने के बाद पी.एच-डी. छूट गई।
 मैंने 10वीं कक्षा  से  ही लेखन  कार्य शुरू कर दिया था। लेखन के संस्कार भी मुझे   पारिवारिक रूप से ही मिले। पिता जी (स्व.) श्री सी.पी. अखिल स्वयं बहुत अच्छे कवि थे। उन्होंने अनेक खण्ड काव्य लिखे, जिनमें  ‘यशोधरा’, ‘सत्य पुष्प’ एवं ‘कुंती’ आदि प्रमुख रहे। पिता जी आज़ादी के आंदोलन में भी  सक्रिय रहे।  उसी दौरान एक अवसर पर, पिता जी का काव्य पाठ सुन कर नेहरू जी तथा नीरज जी ने उन्हें ‘अखिल’ की उपाधि दी थी, क्योंकि उनकी कविता में अखिल भारत के स्वरूप का वर्णन था। बस तभी से वे ‘अखिल’ हुए और फिर मैं भी।
 ‘दिल्ली प्रेस’ में कार्य करने के बाद मैं टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप की बाल पत्रिका ‘पराग’ में चला आया और दस वर्षों तक बाल पत्राकारिता तथा बाल साहित्य पर जम कर कार्य किया। इसके बाद पंद्रह वर्ष तक ‘नवभारत टाइम्स’ दिल्ली में कार्य किया। यहाँ विशेष रूप से मुख्यधारा एवं प्रादेशिक पत्राकारिता पर विशेष कार्य किया। सन् 2005 में स्वेच्छा से नौकरी छोड़ दी तथा Connexxion media pvt. Ltd. संस्थान खड़ा किया और इसके बाद व्यावसायिक पत्राकारिता की शुरुआत की। यहाँ एक पत्रिका और एक अखबार का समूह संपादक रहा।
आपकी प्रिय विधा कौन-सी है और क्यों?
 यूँ तो मैंने लगभग सभी विधाओं में लिखा है, जिनमें- कहानी, कविता, व्यंग्य, उपन्यास, संस्मरण, आलोचना, पटकथा लेखन आदि सभी कुछ रहा। फिर भी कहानी और व्यंग्य के साथ ही कविताओं में विशेष रुचि रही। मुझे लगता है कि कहानी विधा में अपनी बात कहने के लिए विस्तार मिलता है। यहाँ पात्रों का सृजन करते हुए, जब आप ‘परकाया प्रवेश’ करते हैं, तब भिन्न-भिन्न पात्रों और उनकी मनःस्थितियों को समझने में आनंद आता है। कहानी जहाँ ठोस धरातल पर उगती है, वहीं कविता का जन्म बहुत ही भावुक या संवेदनशील अनुभूतियों से होता है... और व्यंग्य तो समाज तथा व्यवस्था की विद्रूपताओं पर कटाक्ष करने का एक सशक्त माध्यम है। यहाँ भी हमें हास्य और व्यंग्य के बीच एक महीन अंतर को समझना चाहिए। व्यंग्य आनंद नहीं देता, बल्कि झकझोरता है।
‘दरमियाना’ उपन्यास लिखने का उद्देश्य क्या था?
 दरअसल, अपने बचपन में कभी मैं किसी ‘किन्नर’ के संपर्क में आया। बाद में बड़े होने तक भी वे स्मृतियाँ मन में कुलबुलाती रही थीं। फिर जब लेखन शुरू हुआ और उसमें कुछ परिपक्वता आने लगी, तब सबसे पहले मैंने ही इस विषय पर ‘दरमियाना’ शीर्षक से एक कहानी लिखी, जो उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सारिका’ के अक्टूबर 1980 के अंक में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद कुछ संयोग ऐसा बना कि मुझे ‘इनके बीच’ और ‘इनके लिए’ कार्य करने का अवसर मिला। मेरे उन्हीं अनुभवों को देखते हुए, मित्रों का दबाव बना कि ‘दरमियाना’ को उपन्यास बना देना चाहिए। सो, अब 38 वर्ष बाद यह उपन्यास सामने आ पाया। इस बीच व्यावसायिक व्यस्तताओं और प्रतिबद्धता के चलते समय नहीं मिल पाया। अब सेवा निवृत्ति का लाभ उठाते हुए उस     अधूरे स्वप्न को पूरा कर पाया। उद्देश्य तो केवल यही था कि ‘किन्नर विमर्श’ को भी समाज की मुख्य चिंतनधारा के पटल पर लाया जाना चाहिए। वे भी हमारी तरह ही हाड़-मांस के इंसान हैं और उनकी भी भावनाएँ, संवेदनाएँ, आकांक्षाएँ, इच्छाएं, आवश्यकताएँ और सम्मान है- जो इन्हें मिलना ही चाहिए।... और यह सम्मान, समानता के स्तर पर ही मिल सकता है।
क्या कारण है कि हिंदी के अधिकांश लेखक किन्नर पर लिखना पसंद नहीं करते?
 इसका प्रमुख कारण तो यही है कि इनकी अपनी दुनिया बहुत संदिग्ध है और प्रायः ये अपने बीच सामान्य लोगों को नहीं आने देते। इनकी अपनी सांकेतिक भाषा, अपने रीति-रिवाज, परम्पराएँ, मान्यताएँ, अपनी देवी, अपने नियम-कायदे होते हैं, जो प्रायः सामान्य जनजीवन से भिन्न हैं।
 दूसरा प्रमुख कारण यह है कि अभी तक समाज में इनकी स्थिति भी घृणात्मक, नकारात्मक और त्याज्य व्यक्ति के रूप में ही बनी हुई है। इसी के चलते ज्यादातर लेखक इनसे दूरी बनाये रखते हैं या फिर इनके बारे में जानते ही नहीं।... और कुछ केवल ‘खबरों की कतरनों में कल्पना के रंग भरकर’ रचना करते हैं। बहुत कम लोगों ने इनके निकट जा कर समझने का प्रयास किया है। सच तो यह भी है कि आप इनके साथ होते हैं या ये आपके घर आते-जाते हैं, तो आप भी संदिग्ध दृष्टि से ही देखे जाते हैं। इसीलिए लोग इनके बारे में कम जान पाते हैं। फिर ये लोग भी अपने जीवन और समाज की विद्रूपताओं को सामने आने देना नहीं चाहते हैं।
15 अप्रैल 2014 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किन्नरों को  L.G.B.T की मान्यता दी है, फिर भी केंद्र/राज्य सरकारें 4 साल बीत जाने पर भी लागू नहीं कर पाई हैं। उत्तर प्रदेश और दिल्ली में इनकी स्थिति क्या है?
 प्रश्न केवल मान्यता दे दिये जाने भर का नहीं होता। यहाँ दो बातें विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं- एक, यह कि ‘अधिकार देने वाले की इच्छाशक्ति कितनी है?’... और दूसरा, यह कि ‘अधिकार लेने वाले की समझ और संगठन शक्ति कितनी है?’ सरकारें प्रायः दूसरे ऊल-जलूल मुद्दों पर ही उलझी रहती हैं, उन्हें ‘इन जैसे नगन्य’ विषयों पर सोचने की फुर्सत ही कहाँ है! फिर ये स्वयं इतने शिक्षित, जागरुक, समर्थ और संगठित ही नहीं हैं कि अपने अधिकार माँग सकें।
 फिर भी, कुछ जगहों पर इनमें से बहुत सारे लोग सामने आये हैं, जिन्होंने ऊँचे पदों तक भी अपनी पहुँच बनाई है। कुछ जगह पुलिस भर्ती में इनकी एक अलग बटालियन है, कोई    प्राध्यापक हैं तो कोई प्रधानाचार्य भी हैं। अन्य पेशों में भी अब ये लोग सामने आ रहे हैं।
 जहाँ तक उत्तर-प्रदेश और दिल्ली की बात है, तो जो लोग गुरु-शिष्य परंपरा में एक कुनबे की तरह रहते हैं, वे अधिक सुरक्षित और सम्पन्न भी हैं। जो लोग एक-दो की टोली में रहते हैं, उनमें से अधिकतर सड़कों- पार्कों, ट्रेनों, चौराहों पर भीख माँगते हुए मिल जाते हैं। इन्हीं में से कुछ देह व्यापार में भी लिप्त पाये जाते हैं, जहाँ हस्तमैथुन, गुदामैथुन, मुखमैथुन आदि क्रियाओं के अलग-अलग दाम होते हैं। यूँ कमोबेश देश-भर में इनकी स्थिति लगभग एक जैसी ही है।
 इनमें एक विशेषता यह भी है कि हिंदू गुरु की चेली मुस्लिम और मुस्लिम गुरु की चेली हिंदू भी हो सकती है।
आम पाठक असली और नकली में फर्क कैसे जान पायेगा?
 दरअसल इनमें भी कई श्रेणियाँ होती हैं। प्रायः लिंग सहित वाले को ‘अकुआ’ और लिंग हटवा देने वाले को ‘छिबरी’ कहा जाता है। कुछ ‘सुच्चे’ भी होते हैं, जो प्रायः जन्म से ही यौनिक विकलांग के रूप में पैदा होते हैं। शेष में, हार्मोनिक संतुलन गड़बड़ा जाने के कारण यह समस्या होती है। इन तीनों वर्गों को असली माना जा सकता है।
 किन्तु ‘मुफ्त की कमाई’ के लालच से, कुछ सामान्य युवक भी इनका ‘भेष धारण कर’ नाचने-गाने और माँगने के धंधे में लग जाते हैं।
 एक अन्य स्थिति यह भी है कि जो लोग ‘अपने ही इलाके’ में माँगते हैं- वे ‘पन के’ कहलाते हैं... और जो ‘दूसरों के इलाकों’ में घुस कर माँगने लगते हैं, वे ‘खैर गल्ले के’ कहलाते हैं।
आपके उपन्यास के माध्यम से पाठक किन्नर संस्कृति व भाषा को बहुत करीब से देख व जान पाता है। आपके अपने जीवन में किन्नरों के प्रति क्या अनुभव रहे हैं?
 दोनों ही प्रकार के अनुभव रहे हैं- अच्छे भी और बुरे भी। किन्तु ज्यादातर अच्छे ही रहे हैं। यदि आप इन्हें प्यार, आदर और अपनापन देते हैं, तो उनसे भी आपको यही मिलता है। अनेक बार ‘इन्हें समझने’ के लिए ‘ऐसी गलियों’ से भी गुजरना पड़ा, जो किसी सम्भ्रांत व्यक्ति के लिए सहज और सुरक्षित नहीं होतीं। इनके सम्पर्क में कई प्रकार के खतरों की संभावनाएँ भी बनी रहती हैं।... क्योंकि अशिक्षा, सामाजिक-पारिवारिक तिरस्कार, यौनिक कुंठाएँ और असामान्य परवरिश के कारण से भी ये स्वाभाविक सहज नहीं रह पाते। मेरा ‘पत्राकार होना’ भी इस दृष्टि से काफी फायदेमंद रहा, क्योंकि अनेक स्तरों तथा परिस्थितियों में, मैं इनके लिए सहायक ही बना रहा। अनेक बार यह तथ्य छिपाना भी पड़ा कि मैं पत्राकार हूँ। ऐसा इसलिए कि वे मुझे एक ‘सामान्य व्यक्ति’ मानकर सहज बने रहें।
आपके द्वारा प्रयोग किया गया शब्द ‘दरमियाना’, इससे पूर्व प्रचलन में नहीं रहा है। आप इस शब्द की पृष्ठभूमि से अवगत कराने का कष्ट करें।
 वस्तुतः मैं ‘इनके’ लिए- हिजड़ा, छक्का, नामर्द या किन्नर जैसे शब्द प्रयोग करना नहीं चाहता था। पहले के तीन या इस प्रकार के अन्य शब्द एक तिरस्कारात्मक ध्वनि देते हैं। फिर हिमाचल प्रदेश में एक जिला है- ‘किन्नौर’। वहाँ के लोग अपने को ‘किन्नर समाज’ का कहलाना पसंद करते हैं। वहाँ सदियों तक ‘बहुपति प्रथा’ अर्थात् एक से अधिक पति रखने की परंपरा चली आती रही है। वहाँ एक भाई विवाह करता है और वह महिला सभी की पत्नी होती है। इसके बहुत से सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक कारण रहे हैं, किन्तु वह प्रसंग फिर कभी। मैंने ‘किन्नौर’ पर भी शोध कार्य किया है और एक वृत्तचित्रा भी किन्नौर पर लिखा है। वस्तुतः उन्हें ‘इनके लिए’ ‘किन्नर’ कहे जाने पर आपत्ति है।
 एक अन्य कारण यह भी रहा कि जिस समय यह कहानी लिखी गई थी, ‘किन्नर’ शब्द उतना प्रचलन में नहीं था। तीसरा, यह कि मैंने ‘इन्हें’ कभी भी ‘तीसरा’ (यानी थर्ड) नहीं माना। मेरा मानना रहा कि जो न जनाना है, न मर्दाना- वह ‘दरमियाना’ है। अर्थात् ‘तीसरा नहीं’, बल्कि स्त्रा और पुरुष के ‘मध्य’ (दरम्यान) में है।
जेण्डर और सेक्स को समानार्थी मानने वाले समाज में L.G.B.T को जिस प्रकार प्रभावित किया है, उसके प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?
 वस्तुतः पहले तो यही समझना चाहिए कि जेण्डर और सेक्स समानार्थी हैं ही नहीं। जेण्डर तो स्त्री-पुरुष या अन्य होना हो सकता है और सेक्स इनके बीच होने वाली ‘काम क्रीड़ा’ है। अब यह दूसरा विषय है कि यह रति क्रिया कितनी स्वाभाविक, नैसर्गिक, प्राकृतिक और मनःस्थिति के अनुकूल है या विपरीत। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि यहाँ पहले L.G.B.T को समझा जाए।
 L.- प्रयोग होता है ‘लेस्बियन’ के लिए, जब दो स्त्रियाँ परस्पर समानधर्मा होते हुए यौनाचार करती हैं। इसी प्रकार G.- से यहाँ तात्पर्य है, जब दो पुरुष आपस में यौनाचार करते हैं। तीसरा वर्ग है B.- जब स्त्री या पुरुष, दोनों ही, दोनों ही के साथ यौनाचार करते हों।
 इन तीनों वर्गों का यौनाचार इनकी मानसिक बुनावट, झुकाव, लगाव आदि कारणों से समलैंगिक या समानधर्मा होता है।... किन्तु जिसे चौथे पायदान पर रखा गया है, वह है T.- अर्थात् ट्रांसजेण्डर। यहाँ सबसे अधिक विचारणीय विषय है कि इस ‘थर्ड जेण्डर’ या ‘अन्य’ का यौनाचार तो उनकी यौनिक विकलांगता के कारण होता है। यहाँ मानसिक बुनावट या अन्य किसी प्रकार की क्रियाओं का तो विकल्प ही नहीं है। इससे इतर, पहले के तीनों वर्गों में सिलेब्रिटी भी शामिल हैं, जो गर्व से कहते हैं कि हाँ हम ‘ऐसे’ हैं। यही वे लोग भी हैं, जो शिक्षित हैं, समर्थ हैं, जागरुक हैं और साधनसंपन्न भी हैं। सच पूछें तो अदालती लड़ाई भी इन्हीं तीनों वर्गों ने, चौथे वर्ग के कंधों पर चढ़ कर लड़ी गई... और जश्न भी उन्हीं लोगों ने ही ज्यादा मनाया। चौथे वर्ग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि धारा-377 रहती या खत्म हो जाती।
 अब प्रश्न यह भी उठता है कि इस लड़ाई से ‘इन्होंने’ क्या पाया?... जबकि वास्तव में तो इन्हें ही आरक्षण, संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पुनर्वास की आवश्यकता है। इस विषय पर अभी भी, सरकारें और समाज बहुत ज्यादा सोचने या कुछ करने की मानसिकता में नहीं हैं।
आपकी कहानी ‘दरमियाना’ प्रतिष्ठित कहानी की पत्रिका ‘सारिका’ में, अक्टूबर 1980 में छपी और लम्बे अंतराल के बाद अब उस कहानी ने उपन्यास का रूप लिया। कोई खास वज़ह?... और हाँ, जब यह ‘सारिका’ में प्रकाशित हुई थी, तब पाठकों की क्या प्रतिक्रिया रही?
 लगभग इसी समय मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कदम रखा था। सच पूछें तो पत्रकारिता बहुत सहज-सरल कार्य नहीं है। यदि आप बेहतरीन कार्य करना चाहते हैं, तो आपको बहुत अध्ययन और परिश्रम करना पड़ता है। ऐसे में अपने और परिवार के लिए भी समय का अभाव बना रहता है। फिर दूसरा कारण यह भी रहा कि इस दौरान मैं ऐसे अनेक पात्रों के संपर्क में आया, जिनसे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला। फिर सेवानिवृत्ति के बाद, जब सहयोगी मित्रों और अमन प्रकाशन के भाई श्री अरविंद वाजपेयी जी का दबाव बना- कि इतनी बेहतरीन रचना को आप अपने भीतर क्यों छिपाये हुए हैं- तब इस उपन्यास का जन्म हुआ।
 हाँ, जिस समय यह ‘सारिका’ में प्रकाशित हुई थी, उस समय तो जैसे कोई विस्फोट हुआ था। ‘सारिका’ के तत्कालीन संपादक कन्हैयालाल नंदन सहित सभी हमारे समकालीन और वरिष्ठ साहित्यकार ‘उछल’ पड़े थे। किसी के लिए भी यह कल्पना करना कठिन हो रहा था कि ‘इस उम्र का कोई लड़का’... ‘ऐसी कहानी’ लिख सकता है। कारण कि उस समय यह सोच पाना भी बहुत असम्भव-सा था कि ‘ये लोग साहित्य का पात्र भी हो सकते हैं?’
 वरिष्ठ साहित्यकार जैनेंद्र कुमार, कमलेश्वर, अजित कुमार, विष्णु प्रभाकर, राजेंद्र यादव, नरेंद्र कोहली... और तमाम साहित्य जगत यह सोचकर रोमांचित था कि जो विषय प्रेमचंद जैसे महानतम कथाकार से भी छूट गया, उसे ‘यह लड़का’ निकाल कर लाया है।... क्योंकि प्रेमचंद ने जीवन और समाज का शायद ही कोई पहलू छोड़ा हो। सभी ने ‘दरमियाना’ को इस विषय पर पहली रचना माना था। पाठकों के बहुत पत्रा मेरे पास तथा ‘सारिका’ कार्यालय भी आये थे। कुछ ने इस कहानी का अन्य भाषाओं में अनुवाद भी किया था।
मुगल काल के पतन के साथ किन्नर समाज भी हाशिए पर आ गया, जबकि हम देखते हैं कि हिंदू संस्कृति में इन्हें सम्मानपूर्वक स्थान मिला हुआ था। फिर आज इनकी इस दशा का कारण क्या है?
 जिन्हें हम किन्नर कह रहे हैं, वे तो युगों से रहे हैं। पहले इनकी यौनिक विकलांगता तो हास्य, घृणा, त्याज्य जैसी मानसिकता के साथ नहीं देखा जाता था। इसका एक प्रमुख कारण तो यही समझ में आता है कि पहले ‘इन्हें’ राजाश्रय प्राप्त होता था। मुगलों के दौर में भी ये राजाओं के संरक्षण में रहते थे। इस कारण भी इन्हें माँगना-कमाना नहीं पड़ता था... और रनिवासों एवं जनानखानों की सुरक्षा में रहने के कारण ये राजाओं के ‘निकट’ भी समझे जाते रहे। अलाउद्दीन खिलजी का निजी अंगरक्षक भी इसी वर्ग से था।
 फिर जैसे-जैसे ‘संरक्षण’ खत्म होता रहा, इन्हें जीवन-यापन के लिए नाचना-गाना-कमाना, माँगना पड़ा। ... फिर अपनी कुछ ‘विशेषताओं’ या ‘विवशताओं’ के कारण इन्होंने भी समाज से एक दूरी बना ली। धीरे-धीरे ये समाज के लिए भी ‘अजूबा’ होते चले गये- और दोनों के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती चली गई।
 अब पुनः इन्हें हाशिए से उठाकर ‘किन्नर विमर्श’ को साहित्य और समाज के केंद्र में लाने की जरूरत है।
आपके उपन्यास में सुनंदा का चरित्र तथा इस चरित्र से संबंधित कहानी कुछ अधूरी रह जाती है। आपका इस संबंध में क्या विचार है?
 दरअसल सुनंदा का चरित्र थोड़ा-सा जटिल है। इस चरित्र की खूबसूरती, ताई अम्मा और सुलतान के साथ उसके संबंधों की बुनावट में है। उसका व्यक्तित्व बहुत ही सुलझा हुआ, स्पष्ट और दृढ़ है। एक ओर वह किसी भी हद तक जाकर इन दोनों की मदद करती है, वहीं एक गलत बात पर वह अपने ‘गिरिया’ तक को थप्पड़ मार कर निकाल देती है। इस दृष्टि से यहाँ कहानी उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाती, जितना कि इन पात्रों का चरित्र-चित्रण या फिर परिस्थितियों का आकलन महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वह कहानी इस कारण अधूरी-सी लग सकती है कि उस घटना के बाद स्वयं सूत्रधार खुद को जिम्मेदार मानते हुए उन पात्रों के जीवन से हट जाता है।... उसके बाद क्या हुआ होगा, यह महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाता।
रेशमा का चरित्र-चित्रण अद्वितीय है। वह एक दोस्त और माँ के रूप में भी सूत्रधार के जीवन में आती है। उनके बारे में कुछ बताएँ!
 रेशमा के चरित्र में बहुत-से ‘शेड्स’ हैं। वह खिलंदड़ी भी हैं, तो गंभीर भी है। उनमें ममता भी है और आक्रामकता भी है। वह अपनी तारा गुरु के प्रति समर्पित भी है और आशु के प्रति स्नेह भी रखती है। वे संध्या को गाली देकर दुत्कारती भी है और अंत में उसका शव लेने चली भी आती है। सूत्रधार के साथ उसकी पत्नी को देखकर वह तुरंत अपना हास्य रोक लेती है और आदरसूचक सम्बोधन में बात करने लगती है।
ताई अम्मा के बारे में कुछ बताइये!
 ताई अम्मा का चरित्र बहुत उदात्त है। वे पाँचों वक़्त की नमाज़ी मुस्लिम महिला हैं, जिन्होंने एक हिंदू लड़के को अपने बच्चे की तरह सम्भाला। यह पता चलने पर भी कि वह वास्तव में किन्नर है, उसका साथ नहीं छोड़ा। बाद में स्थितियाँ बदल गईं और फिर सुनंदा ने ताई अम्मा और सुलतान को सम्भाला। वे हमेशा सुनंदा को अपनी पुत्र की तरह ही मानती रहीं। उसका हर तरह से ख्याल रखती रहीं। दरअसल, ताई अम्मा का चरित्रा किसी भी माँ की तरह बहुत भावपूर्ण है। सुनंदा के अपने परिजनों ने उन्हें त्याग दिया, मगर ताई अम्मा ने जीवन-भर उनका हाथ नहीं छोड़ा।
संजय और संध्या में बहुत भ्रम बना रहता है! एक व्यक्ति को दो तरह से कैसे देखा जा सकता है? कोई विशेष कारण?
 वस्तुतः संजय आगरा का रहने वाला है, जहाँ उसकी माँ, छोटी बहन और एक छोटा भाई रहता है। वह ‘अकुआ’ (लिंग सहित) और ‘कड़ेताल में’ (पुरुष वेशभूषा) में रहने के कारण, आगरा में ‘संजय’ ही जाना जाता है। वह अपनी बहन ‘संध्या’ से बहुत प्यार करता है, इसलिए दिल्ली आ जाने और ‘सात्रे’ (स्त्री वेश) में रहने पर वह अपना नाम ‘संध्या’ ही बताता है। थोड़ा भ्रम वहाँ जरूर होता है, जब उसकी माँ अपने दोनों बच्चों के साथ, उससे मिलने दिल्ली चली आती हैं और सूत्रधार से मिलती हैं। इससे पूर्व संजय ने सूत्रधार को अपने दोनों ही नाम बताये थे। इसलिए थोड़ा भ्रम होता है, किंतु ध्यान से पकड़ने पर संजय और ‘दोनों संध्याओं’ का अंतर समझ में आ जाता है।
आपने थर्ड जेण्डर वर्ग से संबंधित कुछ शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे ‘कड़ेताल’ या ‘सात्रे’ आदि। क्या आपका आगे के लेखन में इनकी भाषा पर कुछ लिखने का विचार है?
 यूँ इनके बीच बहुत-से गुप्त या कोड शब्दों की शब्दावली होती है, जिसका प्रयोग ये प्रायः आपसी बोलचाल में करते हैं। ऐसा वे कई कारणों से करते हैं। मसलन यदि वे कहीं नाच-गा रहे हैं, तो वे नहीं चाहेंगे कि आप उनकी बातचीत समझें।... दूसरा इनकी अपनी दुनिया काफी संदिग्ध होती है, जिसे ये समाज के सामने नहीं खुलने देना चाहते। मैंने उन्हीं स्थानों पर इनकी शब्दावली का प्रयोग किया है, जहाँ पात्रों और परिस्थितियों के अनुसार उन शब्दों की आवश्यकता पड़ी है। यूँ अलग से इनकी भाषा या शब्दों पर लिखने का कोई विचार नहीं है। फिर स्थान और स्थानीय भाषा के अनुसार भी इनके शब्दों में अंतर आ सकता है। जैसे, उत्तर भारत और दक्षिण भारत की भाषाओं में अंतर होने के कारण हो सकता है।
आपने उपन्यास के समस्त अध्यायों में गुरु-चेला परंपरा का उल्लेख किया है, फिर भी कहीं-कहीं चेलों ने अपने गुरुओं से बगावत की है। गुरु-चेला संबंधों और उनके    मध्य स्थापित होने वाले रिश्तों के बारे में बताएँ!
 दरअसल, गुरु परिवार के मुखिया की तरह होती हैं। उन्हें वह इलाका अपनी गुरु से पारंपरिक विरासत की तरह से मिला होता है। फिर या तो कोई चेली स्वयं ही अपनी वास्तविकता को समझते हुए किसी गुरु के पास चली आती है या फिर गुरु ही अपनी अन्य चेलियों के साथ ऐसे व्यक्ति को ‘उठा’ लाते हैं। एक गुरु की चेलियाँ भी, किसी नई चेली को, अपनी चेली बना लेती हैं। वह तीसरी पीढ़ी कहलाई जाएगी। हर ‘कुनबे में’ वरिष्ठता के अनुसार सभी का स्थान होता है। इनमें भी उत्तराधिकार के प्रश्न पर अनेक बार टकराव हो जाता है। सम्पत्ति, मकान, इलाका, सोना-चाँदी, गाड़ी आदि के मुद्दों पर कई बार तो वरिष्ठ गुरु पहले ही स्थिति स्पष्ट कर देती हैं या फिर गुरु के बाद सभी चेलियाँ मिल-बैठ कर इन मसलों को सुलझा लेती हैं। अनेक बार, अनेक कारणों से बगावत भी हो जाती है। कई बार ‘गिरिया’ (कोई पुरुष) रखने के नाम पर भी, यदि गुरु को पसंद नहीं, तब भी बगावत हो जाती है। जैसा हमारे समाज में भी उत्तराधिकार या प्रेम संबंधों के कारण ऐसा हो जाता है।
 प्रायः गुरु ही सभी चेलियों और उनकी भी चेलियों के लिए संरक्षक होती हैं। अनेक बार नाचने-गाने-माँगने के अलावा भी मकानों या अन्य कारोबार में भी ये पैसा लगाते हैं। जैसे कोई टैक्सी, ऑटो आदि डाल दिया। इस प्रकार सारी कमाई पहले गुरु के पास ही आती है और वे ही आवश्यकता के अनुसार सभी की जरूरतें पूरी करती हैं। यदि कुछ सामूहिक खर्चा होता है, वह भी गुरु ही करती है। कोई-कोई अपनी बचत में से कुछ पैसा ‘गिरिया’ पर भी खर्च करती है और कुछ अपने ‘गिरिया’ से भी खर्चा-पानी लेती रहती हैं।
 कुनबे की परंपराओं या गुरु द्वारा निर्धारित नियम-कायदों का पालन सभी चेलियों को करना पड़ता है। कोई चेली चोरी-छिपे भी ऐसा कुछ कर लेती है, जो गुरु को पसंद नहीं। कोई दो-तीन चेली, आपस में भी एक-दूसरे की राजदार बनकर, कुछ काम कर लेती हैं।... किन्तु आर्थिक, सामाजिक या सांस्कृतिक आधार पर, कुनबे के सभी सदस्यों को परस्पर मिल-जुलकर ही रहना पड़ता है। हाँ, यहाँ उन किन्नरों की बात अलग है, जो गुरु-चेला परम्परा में नहीं रहते। ऐसे किन्नर दो-तीन की टोली में मिले रहते हैं और सड़कां-चौराहों पर मांगने का काम करते हैं।... या फिर देहव्यापार, चोरी-चकारी, राहजनी, लूट, ठगी, नशाखोरी जैसे जरायमपेशा कामों में लिप्त रहते हैं।
‘खैरगल्ले’ के किन्नरों की क्या पहचान होती है?
 जैसा मैंने बताया कि हर गुरु का अपना एक ‘इलाका’ होता है, जो प्रायः उसे अपने गुरु से विरासत में मिला होता है।... या फिर किसी गुरु द्वारा ही किसी नई विकसित हो रही कॉलोनी को, अपनी मंडली के ‘दमखम’ पर, ‘नया इलाका’ घोषित कर, अपनी किसी चेली को सौंप दिया जाता है।... जो लोग ‘अपने इलाके’ में ही माँगते हैं, वे ‘पन के’ कहलाते हैं और जो ‘किसी दूसरे के इलाके’ में चोरी-छिपे घुसकर माँगते हैं, उन्हें ‘खैरगल्ले’ के कहा जाता है।
 ऐसा करने वालों में, किसी गुरु से बगावत कर अपनी मंडली बना लेने वाली चेली भी हो सकती है और ‘छुट्टे घूमने वाले’ किन्नर भी हो सकते हैं। कुछ जगह ऐसा भी देखा गया है कि ठीक-ठाक सामान्य युवक भी, जो नाचने-गाने का हुनर रखते हैं, वे भी बेरोजगारी के चलते या मुफ्त की कमाई के लालच में ऐसा करते हैं। ‘खैरगल्ले’ वालों की अलग से कोई पहचान नहीं होती। उनसे केवल पूछ कर ही जाना जा सकता है। ऐसे में, जो ‘पन के’ होंगे उनमें एक आत्मविश्वास होगा... और ‘खैरगल्ले’ के होंगे, वे जान जाएँगे कि आप इनके बारे में जानते हैं। कोई चेली, किसी दूसरे गुरु की चेली हो जाने पर यदि उसके इलाके में माँगती है, तो वह खैरगल्ले की नहीं कहलाएगी।
 ‘इलाकों’ पर कब्जा करने या अपने कब्जा बनाये रखने के लिए, इनके गुटों में प्रायः काफी खून-खराबा तक हो जाता है। यूँ, जो ‘पन के’ होते हैं, वे अपने इलाकों के लोगों को सीधे तौर पर भी जानते हैं। इन इलाकों के प्रेस वाले, पान-बीड़ी वाले या ठेले-खोमचे वाले भी इनके लिए मुखबरी का काम करते हैं। ये लोग ही इन्हें बता देते हैं कि कहाँ बच्चा हुआ है या शादी हुई है। इसलिए ये लोग भी अपने इलाके के किन्नरों को पहचानते हैं कि यही यहाँ के वास्तविक और ‘पन के’ हैं। कई बार ये लोग भी ‘खैरगल्ले’ वालों के आने की सूचना ‘पन के’ किन्नरों को पहुँचा देते हैं।

डॉ. फीरोज/डॉ. शमीम, हलीम मुस्लिम पी.जी. कॉलेज, कानपुर
सुभाष अखिल, सत्यपुष्प कुटीर, सेक्टर-2, बी/507, वसुंधरा, गाजियाबाद, 201012