मंगलवार, 27 अगस्त 2019

पिछले तीन वर्ष स्वर्णिम, एएमयू हिंदी विभाग के लिए आगे भी विशिष्ट पलो की उम्मीद - अकरम हुसैन

पिछले तीन वर्ष स्वर्णिम रहे एएमयू हिंदी विभाग के लिए आगे भी विशिष्ट पलो की उम्मीद - अकरम हुसैन


अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में आज प्रोफेसर रमेश रावत ने अध्यक्ष का कार्यभार ग्रहण कर लिया इससे पहले प्रोफेसर अब्दुल अलीम ने हिंदी विभाग में ऐसी साहित्यिक गतिविधियों को जारी रखा जिससे छात्र-छात्राओं और शोधार्थियों  को अत्यंत लाभ हुआ जैसे ही प्रोफेसर अब्दुल अलीम ने कार्यभार ग्रहण किया फौरन स्नातकोत्तर छात्र- छात्राओं के लिए साहित्य समिति का गठन किया जिसके प्रभारी प्रोफेसर शम्भुनाथ तिवारी बनाये गए उन्होंने 'भित्ति' पत्रिका के माध्यम से अनेक साहित्यकारों की रचनाओं को उकेरा जिसमे छात्र-छात्राएं को बहुत लाभ हुआ उनको किसी भी बड़े साहित्यकार को एक बार में ही समझा जा सकता है। इस कार्य से सभी लाभांवित हुए।
प्रोफेसर अब्दुल अलीम सर ने शोधार्थियों के लिए शोध समिति का गठन किया जिसका कार्यभार सृजनात्मक साहित्य के सिरमौर प्रोफेसर मेराज अहमद सर को सौंपा आपने अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए शोधार्थियों के आलेख वाचन के साथ साथ अनेक बुद्धिजीवियों के आने पर उनका एकल वक्तव्य रखा या फिर कविता पाठ कराया जिससे शोधार्थियों में शोधा-आलेख और आलेख लिखने की कला उत्पन्न हो वो सभी मुद्दों पर अपनी पैनी दृष्टि रख सके उसके अलावा विभाग में एक ऐतिहासिक सेमिनार महात्मा गांधी जी पर हुआ।
अगर कुछ महत्त्वपूर्ण विद्वानों की बात करे तो प्रवासी साहित्यकार प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी नीदरलैंड से लगभग तीन बार आई और अनेक विषयों पर उन्होंने अपना वक्तव्य दिया, उसके अलावा प्रोफेसर नंद किशोर पाण्डेय केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा से दो बार आये और बहुमूल्य विषयों पर अपने विचार रखे जिससे छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों और अध्यापको को लाभ हुआ पिछले तीन वर्ष में हिंदी विभाग ने लगभग सत्तर के आसपास पीएचडी की डिग्री भी दी होगी जो अपने आप मे एक मील का पत्थर है। प्रोफेसर अब्दुल अलीम सर के सभी कार्यों को लिख पाना मुश्किल है। उन्होंने हमेशा छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों और अध्यापकों की भावनाओ का ख्याल रखते हुए विभाग की उन्नति के बारे में सोचा जिसके लिए सभी हिंदी विभाग से प्रेम करने वाले उनका आभार प्रकट करते है।
प्रोफेसर रमेश रावत एक मार्क्सवादी चिंतक, विशिष्ट विद्वान है जिन्होंने अनेक ऐसे विषयों पर लिखा है जिनपर हिंदी जगत में विद्वान लिखना या बोलना नही चाहते थे उन्होंने 'मुक्तिबोध की आलोचना प्रक्रिया' पर विस्तार से लिखा दूसरी पुस्तक 'देसज आधुनिकता और कबीर' , भारतीय इतिहास में मध्यकाल (अनुवाद प्रो. इरफान हबीब), 'इतिहास और विचारधारा' (अनुवाद प्रो. इरफान हबीब), 'भाषा विज्ञान', 'हिंदी भाषा उद्भव और विकास' जैसी अनेक पुस्तको को रचा जिससे हिंदी साहित्य जगत को अनेक लाभ हुए उसके अलावा लगभग 26 शोध पत्र, अनेक संपादित पुस्तकों का संपादन किया अनेक बार यूपीएससी के सलाहकार भी रहे।
प्रोफेसर रमेश रावत सर अनेक क्षमताओं के धनी विद्वान है क्योंकि उनके लेखन को देखते हुए प्रतीत होता है उनकी प्रशानिक क्षमताएं भी अद्वितीय होंगी और विभाग ऐसे ही दिन दुगुनी रात चौगनी तरक़्क़ी करेगा।

अकरम हुसैन
शोधार्थी एएमयू
अलीगढ़

शुक्रवार, 16 अगस्त 2019

सच्चा हिन्दू, पक्का मुसलमान - अजय वालिया

"सच्चा हिन्दू, पक्का मुसलमान"
                        अजय वालिया✍

ये गफूर चाचा हैं। बहुत दिन बाद मिलने सीधे मेरे स्कूल आ गए । गफूर चाचा मेरे ससुराल किशनपुरा (यमुनानगर) के पास के गाँव कुटीपुर से हैं। ससुराल के पास के गाँव से होने के चलते मेरे बच्चे इन्हें नाना बोलते हैं।

गफूर चाचा से मेरा सम्बन्ध हमदर्दी और प्यार का है। गफूर चाचा उन चंद लोगों में से एक हैं जिनसे जुड़ने के बाद मैंने माना कि दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से ज्यादा बड़े होते हैं बशर्ते दोनों व्यक्ति इस रिश्ते को इतनी ही शिद्दत से निभाएं।

15 दिसम्बर 2012 को मैं अपने ससुराल गया हुआ था कि सवेरे सवेरे नाश्ता करते हुए सामने पड़े अखबार पर नजर गई जिस की एक headline सामने थी कि "टैक्स बैरियर पर करन्ट लगने से मजदूर की मौत" । इस खबर में जिस मजदूर की मौत का ब्यौरा था वो ससुराल के पास का गाँव कुटीपुर था। मन में जिज्ञासा उठी तो ससुर जी ने बताया कि इस मजदूर का पिता "गफूर" भी मजदूर है। बहुत गरीब लोग हैं। दो दिन पहले बिजली विभाग ने बिना सूचना दिए वहाँ लाइन गिराई हुई थी जिसकी चपेट में आने से "गफूर" का बेटा मर गया। मैंने पूछा बिजली विभाग पर कोई एफआईआर दर्ज हुई? किसी ने बिजली विभाग से बात की? ससुर जी बोले हम लोग गए थे पर वहाँ बिजली वाले टालमटोल कर गए। एफआईआर का पता नहीं।

बस पता नहीं कि दिल नहीं माना और मैं अपने बड़े साले साहब अमित को साथ लेके निकल पड़ा गफूर चाचा के घर।

उसके गाँव पहुँचे जहाँ से उसके घर गए। घर बिल्कुल छान का बना हुआ था और उसका गेट इतना छोटा था कि झुक के अंदर जाना पड़ा था। गफूर की अधेड़ उम्र की बीवी मिली उसने बताया कि गफूर काम पर चला गया है क्योंकि घर में जो पैसे थे वो बेटे के जनाजे और दूसरे खर्चों पर खर्च हो गए। उधार किसी से मिला नहीं तो वो काम पर चला गया। ये कहकर वो हमारे लिए पानी लेने चली गई।

मेरा दिमाग फटने वाली हालत में था कि भगवान तुम कहाँ हो? जिसने 2 दिन पहले अपना जवान बच्चा खोया वो आज परिवार का पेट भरने की मजबूरी में कौनसे मन से दिहाड़ी कर रहा होगा....

मैंने संपर्क करके गफूर चाचा को बुलाया और उसे विश्वास दिलाया कि मैं उठाऊंगा उसकी आवाज। गफूर चाचा  को भी पता नहीं क्यों पहली ही बार में मुझ पर ऐतबार हो गया।

बस मन बन गया कि मैं लड़ूंगा ये केस। वहाँ से थाने.... थाने से बिजली विभाग... पहले बिजली वाले अड़े रहे कि जो होता है कर लो... पर उसी शाम गफूर चाचा का फोन आया तो पता चला कि वो जनाजे के खर्च के तौर पर और कुछ दिन के गफूर  चाचा के खर्च के लिए 60000 रुपये अस्थायी मुआवजे के तौर पर देके गए हैं। मन को तसल्ली मिली कि कोशिश करूँ तो बुजुर्ग को और मुआवजा मिल जाएगा।

इसके बाद कोर्ट, वकील... मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, मुख्यमंत्री, सब जगह represntation दिए।

केस की तारीख को लेके कभी मैं गफूर चाचा से मिलता तो कभी चाचा घर आ जाते।

कोर्ट में मामला आया... केस चला.... 3 साल बाद 5 लाख रुपए अदालत ने गफूर चाचा  के खाते में डलवा दिये। बेटे की कमी तो माँ बाप के लिए कोई पूरा नहीं कर सकता हाँ मुआवजे के पैसे ने कुछ मरहम लगा दिया। अब हमने केस अगले कोर्ट में डाला...

पैसे मिले अभी मुश्किल से एक महीना हुआ था कि   गफूर चाचा ने मुझे फोन किया। मैंने नहीं उठाया क्योंकि पिता जी हस्पताल में एडमिट थे  और और next day उनका एक बड़ा ऑपरेशन होना था । ऑपरेशन को डॉक्टर सीरियस बता रहे थे।

उसके बाद थोड़ी थोड़ी देर बाद गफूर चाचा के कई फोन आए । आखिर मैंने थोड़ा गुस्से के साथ फोन उठाया और चाचा से बोला चाचा जब मैं फोन नहीं उठा रहा हूँ तब आपको समझना चाहिए कि मैं बिजी हूँ। अच्छा बताइये क्या बात है?

गफूर चाचा ने कहा कि बस यूं ही फोन कर लिया। तुम ठीक हो ना बेटा। घर सब ठीक है ना। मैंने सारी बात बताई कि मैं हस्पताल में हूँ और पिता जी का ऑपरेशन होना है। बोले कि मैं आ रहा हूँ। मैने कहा चाचा ये हस्पताल पंचकूला में है। आपको पता नहीं मिलेगा। आप मत आना। ये कहकर मैंने फोन काट दिया। 5-6 घण्टे बाद शाम के 8 बजे मुझे दोबारा चाचा का फोन आया । मैंने उठा लिया तो बोले कि बेटा कहाँ हो ? मैंने कहा हस्पताल में हूँ। बोले मैं हस्पताल के बाहर हूँ। मैं तेजी से बाहर गया तो वो बाहर खड़े थे।

मैं हैरान था क्योंकि मैंने ये तो बताया ही नहीं था कि मैं किस हस्पताल में हूँ और कैसे एक अनपढ़ बूढ़ा  आदमी सिर्फ मेरी परेशानी सुनकर मुझसे मिलने यहाँ तक आ गया। मैंने कहा आपने मुझे कैसे ढूँढ लिया? किसने बताया यहां का पता?

उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि बेटा जिस खुदा ने तुझको मेरे दर्द में मेरे पास भेजा था उसी खुदा ने मुझे तेरे पास भेज दिया।............... फिर उन्होंने तफसील से बताया कि वो पहले मेरे घर नारायणगढ़ गए, वहाँ घरवालों से एड्रेस लेके यहां आ गए। इसके बाद उन्होंने अपने एक मैले से थैले में हाथ डाला और पुराने से कपड़े में लिपटा हुआ एक बंडल मेरे हाथ पर रखा और बोले ये रख लो।
मैंने कपड़ा हटाया तो दो लाख रुपये मेरे हाथ में थे... बोले ये पैसे रख लो कल आपके पिताजी का ऑपरेशन हैं ... अभी ये पैसे मेरे किसी काम के नहीं....

मैं कभी उन पैसों को कभी गफूर चाचा को देख रहा था। आँखे बरस पड़ी थी । मैंने कहा चाचा मुझे पैसे की जरूरत नहीं है। मेरे लिए तो यही बड़ा अहसान था आपका कि आप यहाँ तक आए। पैसे वापिस लो। वो नहीं माने तो मैंने बताया कि मेरे पापा और मैं दोनों सरकारी मुलाजिम हैं तो हमारी बीमारी का खर्च सरकार उठाती है। तो मैंने जबरदस्ती वो पैसे वापिस कर दिए।
फिर मैंने कहा कि चलो आओ खाना खाते हैं।
Ajay walia✍✍✍

शुक्रवार, 14 जून 2019

आला हज़रत अपने वक़्त के इमाम अबू हनीफ़ा थे- अनीस शीराज़ी

यौमे रज़ा मुबारक

आला हज़रत,बड़े हज़रत,बड़े मौलाना साहिब,इमाम अहमद रज़ा के नामो से पहचाने जाने वाली शक्सियत मौलाना अहमद रज़ा खान'फाजिले बरेलवी' है। 10 शब्बाल 1272 हिजरी यानि 14 जून 1856 को उत्तर भारत  के रुहेलखंड इलाके के बरेली शहर में पैदा हुए। आपकी जात बहुत सारी खूबियों की मालिक थी। आपकी जात भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे मशहूर शक्सियत में से एक है। शायद ही कोई जगह ऐसी हो जहाँ उर्दू हिंदी बोलने वाले मुसलमान आबाद हो और आपका जिक्र न हो। भारतीय उप महाद्वीप के मुसलमानों की बहुसंख्या को आपके नाम की ही निस्बत से बरेलवी कहा जाता है। एक बात जो सिर्फ आपकी ही जात को हासिल है कि 200 साल में किसी भी आलिम ए दीन की हयात और खिदमात पर इतनी किताबे नहीं लिखी गई जितनी किताबें आपकी जिंदगी पर लिखी गई। जिनकी तादाद तक़रीबन 528 से ज्यादा है। जो अरबी,फ़ारसी, हिंदी,उर्दू,अंग्रेजी,डच,पंजाबी,पश्तो,बलूची,कन्नड़,तेलगू,सिंधी,बंगला,मलयालम आदि भाषाओं में है। इसके अलावा एक बात और जो काफी दिलचस्प है ये है कि आपके मुखालिफ फ़िक्र के लोगो ने आपको कम इल्म,जाहिल,बिदतियो का सरदार कहा लेकिन सच्चाई इसके उलट ही है। दुनिया के कमोबेश 15 से ज्यादा विश्वविधायलो जिनमे अमेरिका,मिस्र,सूडान,भारत,पाकितान,बांग्लादेश,इराक से आपकी जात पर पीएचडी और एमफिल की 35 से ज्यादा डिग्रियां मुकम्मल हो चुकी है। 56 से ज्यादा विषयो पर 1000 से ज्यादा किताबे आपने लिखी।आपने क़ुरान ए पाक का उर्दू में तर्जुमा कंजुल ईमान के नाम से किया। जो प्रकाशन संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा छपता है। उर्दू,अरबी,फ़ारसी में नाते पाक,दुआए और मशहूर जमाना सलाम मुस्तफा जाने रहमत पर लाखों सलाम आपके क़लम की देन हैं। ना कभी किसी नवाब,जमीदार की तारीफों के पुल बांधे ना कभी सियासी दरबारों में हाज़री लगाई। दुनिया के शाहों से बे नियाजी का आलम ये था कि खिलाफत आंदोलन के दौरान मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने जरिये गांधी जी ने मुलाकात करनी चाही। मगर मना कर दिया। क्योंकि वो तो आशिके रसूल थे। सच्चे सूफी थे। कभी हुकूमत की परवाह ही नहीं की। आपका इल्मी दबदबा इतना था कि उस वक़्त के क़ाज़ी ए मक्का,मुफ़्ती ए मक्का,इमाम इ हरम,मुफ़्ती ए मदीना,क़ाज़ी ए मदीना,उलेमा ए सीरिया,इराक,मिस्र आपकी तारीफ करते थे। आपकी शख्शियत की सबसे नुमाया बात आपकी हक़ गोई थी। शायद यही वजह थी कि शायर मशरिक डॉक्टर इक़बाल ने आला हज़रत के बारे में कहा था कि मौलाना साहिब अपने वक़्त के इमाम अबु हनीफा थे। ऐसी अनमोल शख्शियत आला हज़रत फाजिले बरेलवी की यौमे पैदाइश पर तमाम अहले अक़ीदत को मुबारक हो।

बड़े भाई मेरे अजीज़ हमदर्द

अनीस शीराज़ी भाई
स्वत्रंत लेखक

रविवार, 21 अप्रैल 2019

ज़ुल्म के ख़िलाफ़ एक आवाज़ है फैज़ुल हसन- वासिफ नेहाल अंसारी

AMUSU के पूर्व अध्यक्ष Faizul Hasan भाई को कौन नही जानता ? मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी के रिसर्च डिविज़न मे दिन रात गुज़ारने वाले फ़ैज़ुल हसन ने 2016 के स्टूडेंट्स के यूनियन के एलेक्शन से अपनी राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की और एएमयू छात्रों ने उन्हें 2662 वोटों से कामयाब किया। जब तक ये ए॰एम॰यू॰ एस॰यू॰ के अध्यक्ष रहे काफ़ी सक्रिय रहे ए॰एम॰यू॰ मे हर नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे।अध्यक्ष रहते हुए और उसके बाद भी हिंदुस्तान मे हर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी चाहे वो अख़लाक़ का मामला हो या हाफ़िज़ जूनेद का पहलू खाँ के ज़ुल्म की दास्तान हो या रोहित वेमुला के मौत की बात हर वक़्त फ़ैज़ुल हसन भाई को सबसे आगे पाया
मुझे याद है कि साल 2016 में नजीब के लिए पुरे हिंदुस्तान से आवाज़ उठायी गयी और ए॰एम॰यू॰ से इस आवाज़ को फ़ैज़ुल हसन भाई ने सब से पहले उठाया और दिसम्बर मे नजीब के मामले को ले कर हुकूमत पर दबाव बनाने के लिए उन्होंने एएमयू से रेल रोको आंदोलन किया और पुलिस की लाठियाँ तक खायीं ए॰एम॰यू॰ के छात्रों पे लाठियाँ चलवाने की वजह से उस वक़्त के डी॰एम॰ राजमणि यादव को सस्पेंड किया गया।आप को याद होगा केरल बाढ़ के बारे मे जब वहाँ पे हज़ारों लोग बेघर होगये थे और भूकों मर रहे थे उस वक्त वहाँ अपनी टीम के साथ जा के नाव मे बैठ कर हफ़्तों तक बाढ़ग्रस्त लोगों को राहत सामग्री और खाने पीने का सामान पहुँचाते रहे।
दिल्ली मे जब रोहिंग्या कैम्प मे भीषड़ आग लगने से उनके पुरे घर जल कर राख और तबाह हो गये थे तब फ़ैज़ुल हसन भाई ने वहाँ जा के कई दिनो तक अपने हाथो से खाना बना के खिलाया और दिल्ली से लेकर मेवात तक लगभग 350 किमी० की बाईक रैली की। उसी नजीब के मामले को लेकर लखनऊ,पटना,बहराइच समेत देश के लगभग 20 जिलों मे प्रोटेस्ट किया और दिल्ली पहुँच कर CBI हेड क्वार्टर जाम किया । सीरिया में इज़राइल के द्वारा ढाए जा रहे ज़ुल्म ओ सितम और बमबारी मे बेक़सूरों को मौत के घाट उतार दिया गया AMU से इसके लिए आवाज़ बुलंद किया और हुकूमत पर दबाव बनाने के लिए इज़राइल एंबेसी और सीरिया एंबेसी का घेराव किया और ज़बरदस्त प्रोटेस्ट किया ।
फ़ैज़ुल हसन भाई ने  पुरे ए॰एम॰यू॰ से लगभग 10 लाख रुपए चंदा इकट्ठा कर के सीरियाई मुसलमानों की मदद की और उस राशि को अपनी ज़िम्मेदारी से सीरिया पहुँचाया।फ़िलिस्तीन मे हो रही ज़ुल्म व बरबरियत के खिलाफ हमेशा आवाज़ बुलंद किया और जब वहाँ पे हज़ारों लोगों को शहीद कर दिया गया तब इधर ए॰एम॰यू॰ मे उनके लिए दुआ और क़ुरान ख्वानी का एहतेमाम किया।उस वक़्त के यू॰पी॰ के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को 18% रेजर्वेशन देने का वादा किया था जिसको पुरा नही किया फ़ैज़ुल हसन भाई ने उन्हें उनका वादा याद दिलाया और मुसलमानों के साथ किए गये विश्वाशघात को उजागर किया और AMU मे आने से रोक दिया और ख़ूब जम के उनके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया ।
2 साल पहले जब कासगंज मे दंगे हुए और मुसलमानों को घरों से निकाल के मारा जा रहा था उसके लिए सोशल मीडिया से लेकर एलेक्ट्रानिक मीडिया हर जगह आवाज़ उठाई और वहाँ के घायलों को अपनी जेब ख़र्च से लगभग 20 लोगों का AMU मेडिकल क़ालेज़ मे इलाज करवाया।बटला हाउस इनकाउंटर के ख़िलाफ़ हमेशा  आवाज़ उठाते रहे और उसके लिए कई बार जंतर मंतर पर धरना दिया और हुकूमत को ललकारते रहे । अलीगढ़ शहर मे जब बेक़सूर वसीम और आशू की दिनदहाड़े हत्या कर दी गयी और पुलिस द्वारा उनके घर वालों पर दबाव बनाने की कोशिश की गयी तब वहाँ फ़ैज़ुल हसन भाई ने जा कर उनके मुआविजे और मिट्टी होने से पहले कसूरवारों की गिरफ़्तारी की माँग की आख़िर में मजबूर होकर पुलिस ने फ़ौरन मुजरिमों को गिरफ़्तार किया ।
अलीगढ़ अतरौली कांड में फ़र्ज़ी इनकाउंटर मे मारे गये नौशद और मुस्तकीम के घर वालों को हक़ दिलाने के लिए सब से आगे आगे रहे और जब भगवा आतंकियों द्वारा किसी को उस गाँव मे जाने से जान मारने की धमकी मिलने लगी जिसका शिकार पंखुड़ी पाठक भी हुई थीं उस वक़्त अपनी मौत को दाँव पे लगा कर उस मामले को नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया के सामने लाया जिसमें उन पर फ़र्ज़ी मुक़दमे भी किए गये जिसका नतीजा ये हुआ कि उस वक़्त के एसएसपी को अलीगढ़ से हटना पड़ा ।और आज भी अपनी पीएचडी की सकालरशिप का आधा पैसा उनके परिवार की मदद के लिए दे रहे हैं ।
AMU के एक प्रोग्राम मे शहला राशिद को बुलाया गया था मगर उस से पहले उसके द्वारा नबी SAW ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बयान दिया गया जिसकी वजह से उसे ए॰एम॰यू॰ मे आने से रोक दिया गया और फ़ैज़ुल हसन भाई ने उस गुस्ताखी के लिए उस पर FIR करवाई।
मैंने जितना भी ब्यान किया ये सब वो बातें हैं जिसे मैंने ए॰एम॰यू॰ में रहते हुए देखा है।मैंने हमेशा हर जाएज और हक़ की लड़ाई में सब से आगे पाया है जिसका नतीजा ये हुआ कि अब तक उनपर 73 मुक़दमे हैं
मगर इन सब के बावजूद न कभी ये डरे और ना ही  इनके क़दम पीछे हटे हाँ मगर इन्हें हौसला ज़रूर मिलता रहा ।हाल ही मे इन्हो ने शिवपाल यादव की पार्टी ज्वाइन की जिसमें उन्होंने  हर मामले को उठाया और हमेशा हक़ की बात की ।
आज कल फ़ैज़ुल हसन भाई बेगुसराय के क़द्दावर और मुस्लिमों के हमदर्द सांसद पद के उम्मीदवार डा० तनवीर हसन के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं और दिन रात कड़ी मेहनत कर रहे हैं इंशाल्लाह कामयाब हो कर वापस आएँगे।
कुछ लोग अपने राजनीतिक फ़ायदे और अपनी Ideology के लिए उनकी मुख़ालिफ़त कर रहे हैं इस लिए मैंने सोचा कि उनके ये सारे काम जो उन्होने पिछले कुछ सालों मे किए उन्हें सामने लाना ज़रूरी है।इसपे भी मुख़ालफ़ीन बोलेंगे कि पैसे दिए गये हैं। बाक़ी आप समझदार हैं।

वासिफ नेहाल अंसारी (अलीग)
ए॰एम॰यू॰ अलीगढ़

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

किसानों और युवाओं की पहली पसंद हेमराज वर्मा - अकरम क़ादरी

किसानों और युवाओं की पहली पसंद  हेमराज वर्मा- अकरम हुसैन

देश मे हो रहे चुनाव में इस बार सबसे अहम भूमिका निभाने वाला अगर कोई है तो वो आत्महत्याएं कर रहे  किसान और उनके वारिस बेटे-बेटियां है जिन्होंने इस देश के लिए हमेशा अहम योगदान दिया है फिर भी सरकारों और पूर्ववर्ती सरकारों ने इन्हें खूब ठगा है इसके बावजूद इन्होंने इसको नियति मानकर बर्दाश्त किया और हमेशा यही कहकर खुद को तसल्ली दी कि हमतो धूव घास है जितना काटोगे उतना ही उग जाएंगे, लेकिन इस बार किसानों ने जागरूक होकर वर्तमान सरकार का विरोध कर दिया क्योंकि पहले सरकारों में जितनी किसान आत्महत्याएं करते थे उनकी गिनती में उत्तरोत्तर बृद्धि हो रही है बल्कि यूं कहें दो गुना नही बल्कि 4 गुना बढ़ोत्तरी हो रही है फिर किसानों ने ही समझ लिया कि खेत मे हम मर रहे है और हमारे बेटे देश की सीमा पर इसलिए किसानों ने देश की वर्तमान सरकार से बदला लेने का मन बना लिया, फिर उनको सबक सिखाने के लिए खुद मैदान में आ गए।
पिछले दिनों हद तो तब हो गयी जब किसान अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे थे तो उनके बेटों के ही द्वारा उनपर लाठीचार्ज कराई जो सच मे बहुत ही भयावह घटना हुई जिससे किसान बहुत हद तक टूट गया ।
जिला पीलीभीत लोकसभा में इन सब परेशानियों को देखते हुए मौजूदा सांसद उम्मीदवार हेमराज वर्मा ने मां शारदा के बच्चों (किसानों) को न्याय दिलाने के लिए उनके कंधों से कंधा मिलाकर उनको न्याय दिलाने के लिए साथ निकल आये।
एक बार तो ऐसा हुआ जब पीलीभीत की वर्तमान सांसद दौरे पर आई तो उन्होंने किसानों से दो टूक कहा कि मैं आपको मना करती हूं तो क्यों गन्ना लगाते हो यह वीडियो इनकी खूब वायरल भी हुई जिससे किसानो औऱ नोजवानों में भारी गुस्सा है और इस समय उनका साथ देने वाला अगर कोई नेता था तो वो धरती पुत्र के पार्टी के नेता हेमराज वर्मा ने उनका साथ निभाया क्योंकि हेमराज वर्मा भी एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते है और वो किसानों की दयनीय स्थिति को अच्छे से समझते भी है पिछले दिनों एक उनकी खेत मे चलाते हुए वीडियो भी खूब वायरल हुई थी, इस बार गठबंधन ने उनको अपना प्रत्याशी भी बनाया है इसलिए किसानों, मजदूरों और युवाओं ने उनमें भरोसा जताया है जिस गांव मोहल्ले में वो सभा कर रहे है उनको अपार समर्थन मिल रहा है.....
जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान

अकरम क़ादरी
पॉलिटिकल एनालिस्ट

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

दशकों से काबिज, पीलीभीत के लिए विकास-मॉडल तैयार करने में बीजेपी असफल- मोहम्मद जावेद

दशकों से काबिज बीजेपी, पीलीभीत के लिए विकास-मॉडल तैयार करने में असफल रही है- मोहम्मद जावेद



पूरे देश में चुनावी मेला सज चुका है| हर प्रदेश अपने अपने चुनावी मुद्दों के साथ चुनावी मैदान है| हर प्रदेश के अपने चुनावी मुद्दे है अपने अपने नेता है| इन्ही प्रदेशों में एक प्रदेश है जिसका नाम उत्तर प्रदेश है, जहां की राजनीति देश की राजनीति में अहम् भूमिका निभाती है| कहा ये जाता है की दिल्ली की कुर्सी उत्तर प्रदेश से होकर जाती है| इसी प्रदेश में एक क्षेत्र है पीलीभीत जिसे बांसुरी नगरी भी कहा जाता है| 

देश की लगभग 95% बांसुरी बनाने वाली, बांसुरी नगरी पीलीभीत, उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड क्षेत्र में भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित है| जिसकी साक्षरता दर 64% है| पीलीभीत क्षेत्र की आबादी 20 लाख से अधिक है जिसमे हिन्दू आबादी 71%, और मुस्लिम 24% हैं, पुरुष लगभग 10 लाख 72 हज़ार और 9 लाख 60 हज़ार महिलाएं हैं| 

पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में कुल16 लाख 71 हज़ार 151 हैं जिन्हे आने वाली 23 को अपने मत का प्रयोग करना है| पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत 5 निर्वाचन क्षेत्र: बहेड़ी, बरखेडा, पूरनपुर, बीसलपुर और पीलीभीत आते हैं|   

पीलीभीत में पहले आम चुनाव 1952 में हुए जिसमे कांग्रेस पार्टी के मुकुंद लाल अग्रवाल ने जीत दर्ज की| उसके बाद 1980 और 84 के दशक में पीलीभीत सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा| 1989 और 1996 में मेनका गांधी ने जनता दल के टिकट पर चुनाव जीतकर अपनी मजबूत दावेदारी पेश की| मेनका गाँधी ने पहली बार 2004 में बीजेपी के टिकट पर बड़े मार्जिन से चुनाव जीता| उसके बाद 2009 में उन्होंने अपनी ये सीट अपने बेटे वरुण गाँधी को दे दी जिन्होंने गौरक्षा पर दिए गए बिबादित बयानों के चलते इस सीट को जीता| 2014 मेनका गाँधी ने एक बार फिर बीजेपी से जीत हासिल की|

2014 में बीजेपी की मेनका गांधी ने 5 लाख 54 हज़ार वोट पाकर जीत को अपने नाम किया, सपा प्रत्याशी वुद्धसेन वर्मा 2 लाख 72 हज़ार 882 वोटों के साथ दुसरे नंबर पर रहे|

इस बार फिर बीजेपी के वरुण गाँधी और गठबंधन प्रत्याशी हेमराज चुनावी मैदान में आमने सामने हैं| इन दोनों के बीच काटें की टक्कर मानी जा रही है|  हालांकि अभी कांग्रेस ने अपने कैंडिडेट का एलान नहीं किया है| जहां एक तरफ वरुण गांधी का उनकी माँ द्वारा बनाया गया वोट बैंक है तो वहीं दूसरी तरफ हेमराज वर्मा एक स्थानीय प्रत्याशी है जो कि 2012 में असेंबली इलेक्शन जीत चुके हैं उन्होंने बीजेपी के प्रवक्तानन्द को भारी बहुमत से हराया था|

दूसरी तरफ 2009 में पीलीभीत से सांसद रह चुके हैं वरुण गांधी हैं जिन्होंने पीलीभीत से ही पहला चुनाव लड़ते हुए 4 लाख 19 हजार 539 वोटों से जीत हासिल की थी| उनके करीबी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी वीएम सिंह थे, जो उनकी मां मेनका गांधी के चेचेरे भाई हैं| 29 साल के वरुण एक रैली में संबोधित 'विवादास्पद बयान' देकर सुर्खियों में आए थे| इस बयान के बाद लगा कि भारतीय जनता पार्टी को वरुण गांधी के रूप में युवा चेहरा मिल गया| लेकिन पिछले कुछ दिनों तक वरुण अपनी ही पार्टी में हाशिए पर थे|

जहां एक तरफ बीजेपी नेता वरुण गांधी पर पीलीभीत में भड़काऊ भाषण देने, सांप्रदायिक सौहार्द को ठेस पहुँचाने, दंगा जैसे हालात पैदा कराना जैसे संगहीन मामले उनके विरुद्ध दर्ज हैं| वहीं हेमराज वर्मा पर भी एक मामला पब्लिक सर्वेंट को अपने कर्तव्य का पालन न करने देने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का मामला दर्ज हैं|

संपत्ति के मामले में हेमराज वर्मा के पास 55,000 कॅश के साथ साथ एक ट्रेक्टर और एक बाइक भी है| जिनकी सालाना कमाई लगभग 4 लाख है इसके साथ साथ 90 लाख के एसेट्स हैं| इससे पहले 2017 में वे लगभग 7 लाख का इनकम टैक्स रिटर्न भर चुके हैं| वही राहुल गांधी से भी चार गुना अमीर हैं वरुण गांधी| 2014 में दायर किए चुनाव एफिडेविट के मुताबिक वरुण गांधी की संपत्ति 35 करोड़ से भी अधिक है| करोड़पति होने के बावजूद राहुल और वरुण गांधी ने अपनी कार नहीं खरीदी है जो कि बेहद ताज्जुब की बात है|

पीलीभीत में गरीबी और बेरोजगारी अहम् चुनावी मुद्दे माने जा रहे हैं| अगर इलाके की गरीबी की बात करें तो पीलीभीत की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे अपनी ज़िंदगी गुज़र बसर कर रही है| इसके अलावा इलाके का लगभग 45% युवा बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा है| पिछले 6 दशकों में कोई ऐसा विकास का मॉडल तैयार नहीं गया जिससे युवा रोजगार हो सके|

मेनका गांधी के 6 बार संसद रहने के वाबजूद भी पीलीभीत की जनता को इसका कोई ख़ास फायदा नहीं हुआ है| जनता आज भी गरीबी और बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है| मेनका गाँधी लम्बे समय से यहाँ की सांसद हैं लेकिन फिर भी यहां कोई ख़ास विकास होता हुआ नज़र नहीं आता है|

शनिवार, 30 मार्च 2019

पीलीभीत की पुकार हेमराज वर्मा क्यों- अकरम क़ादरी

पीलीभीत की पुकार हेमराज वर्मा क्यों - अकरम क़ादरी

2019 लोकसभा की जबसे सुगबुगाहट शुरू हुई है तबसे पीलीभीत की जनता में हेमराज वर्मा का विश्लेषण शुरू हो चुका है क्योंकि ज़िले के अंदर यही एक ऐसा कद्दावर नेता है जो विधायक का चुनाव बसपा से हारने के बाद फिर सपा से चुनाव जीतने के बाद, दोबारा चुनाव हारने के बाद भी कभी भी दुबककर नही बैठा जबकि अमूमन पीलीभीत में होता यह है कि चुनाव के छः महीने के आसापास ही नेता कलफ वाला कुर्ता पहनकर जनता के बीच मे मडराने लगते है लेकिन यह एक ऐसा नेता है जो विधानसभा हारने के बाद भी जनता के द्वार पर जाता रहा, उनके दुःख-सुख में बराबर का भागी भी रहा चाहे वो मज़दूरों, किसानों को नरभक्षी शेर के मारने की घटनाएं हो या फिर किसी कृषक के बीमारी की छोटी सी घटना हो उस पर पहुंचकर हर पल साथ देने का कमिटमेंट पीलीभीत की जनता को रास आ रहा है जब हेमराज वर्मा किसी कारणवश ज़िले में मौजूद नही होते है तो उनके भाई ब्लॉक प्रमुख अरुण वर्मा मोर्चा संभालते है और गरीब मजदूर जनता के काम को तल्लीनता से अंज़ाम देते है।
आखिरकार पीलीभीत की जनता के सामने यह बड़ा प्रश्न है इतना सबकुछ करने के बाद भी हम हेमराज वर्मा को क्यों पीलीभीत का सांसद चुने आखिर ऐसी क्या वजह है जिन लोगो ने इस सेवक को कार्य करते देखा होगा वो तो परिचित ही है फिर भी उनके ज्ञानवर्धन के लिए कुछ मुख्य कार्य बता देता हूँ कि उन्होंने अपनी विधायकनिधि के माध्यम से मझोला से डुनिडाम रोड, मझोला से भिखारीपुर रोड, गुप्ता कालोनी से नहर और बीसलपुर, बरखेड़ा तक का रोड, पीलीभीत गोहानियाँ चौराहे से माला कालोनी तक का रोड, बरखेड़ा में जीटीआई कॉलेज का निर्माण, 50 बेड का हॉस्पिटल तथा पीलीभीत से मझोला तक रोड का चौड़ीकरण का काम कराया, उसके अलावा बहुत ऐसे छोटे-छोटे काम है जिनको बताना शायद सम्भव नही है लेकिन जनता जानती है
हेमराज वर्मा ज़िला पीलीभीत का एक ऐसा व्यक्तित्त्व है जो युवाओं का चहेता तो है ही उसने कभी हिन्दू-मुस्लिम में भेदभाव नही किया कभी ऐसे भाषण नही दिए जिससे सामाजिक तानाबाना टूटे और नफरत की राजनीति करके वो आगे बढ़ जाये,
पीलीभीत की जनता को अब सोचना यह है कि जो लोग बाहर से आकर यहां चुनाव लड़ते है फिर अपने घर चले जाते है उनको चुनना है या फिर एक सामाजिक कार्यकर्ता, युवा जोश और किसानों के सच्चे मसीहा को चुनना है जो आपके बीच चौबीस घण्टे, सात दिन मौजूद है....लोकतंत्र में जनता हमेशा राजा होती है और उसके बनाये प्रतिनिधि उनकी भावनाओं को समझते है जबकि गन्ना किसानों की घटनाएं पूरे देश मे वायरल हुई थी जो बहुत ही पीड़ाजनक भी था, पिछले वर्ष जो कुपोषित बच्चो की रिपोर्ट आई थी उसमे पीलीभीत पहले स्थान पर था यह सबसे ज्यादा शर्मनाक बात थी, क्योंकि वो जिला जिसकी प्राकृतिक सम्पदा इतनी विशाल है जिसमे उत्तर-प्रदेश का सबसे अच्छा आयुर्वेदिक कॉलेज है वहां के बच्चे कुपोषित हो रहे है यह सब सोचने समझने के मुद्दे है ...जनता को झूठे, खोखले, वादों से बचकर, असली विकास, रोज़गार, किसानों की खुशहाली के लिए वोट करना होगा

जय हिंद
अकरम हुसैन
पॉलिटिकल एनालिस्ट