सोमवार, 11 जून 2018

कौन है यह साहित्य का साधक - अकरम हुसैन

तपते बदन और झुलसे हुए मन से निकलते है शब्द, तब होती है सृजनात्मक साहित्य की साधना ऐसा होते मैंने स्वयं देखा है जब एक साहित्य का सच्चा साधक जो सुबह की किरण फूटने के बाद दैनिक दिनचर्या से निपटकर हल्का फुल्का नाश्ता लेकर किताब की तरफ आगे बढ़ जाता है जो सोचता है कि कम समय मे साहित्य को कुछ  ज्यादा देकर जाए जिससे साहित्य की सही मायनों में सेवा हो सके, जब भी वो उठता,खाता, पीता है तो साहित्य के ही लिए सोचता है, वैसे तो वो लगभग 15 वर्ष से एक पत्रिका का संपादन कर रहे है, जिसने हिंदी साहित्य की अद्वितीय सेवा की है जिसको आज देश-दुनियां के हिंदी प्रेमी पड़ते भी है उसके अलावा कुछ ऐसे है जो कुछ कटु शब्द रखते है उस इंसान से वो दुसरो से पत्रिका मंगवाकर पड़ते है ऐसे लोगो को मैं सलाम पेश करता हूँ जो साहित्य की इज़्ज़त करना जानते है वो बात दूसरी है कि हमारे आपके सम्बन्ध ना मेल खाये, लेकिन अगर दुश्मन भी अच्छा काम करे तो उसकी प्रशंसा भी बड़े मन से होना चाहिए, पिछले लगभग दो वर्ष से किन्नर समाज के प्रश्नों को उन्होंने नए ढंग से उठाकर साहित्यप्रेमियों को सोचने, समझने पर मजबूर कर दिया हालांकि वो कहते है प्रथम कहानी 1915 में थी, प्रथम उपन्यास 1880 में लिखा गया, आखिर क्या वजह थी किसी भी साहित्यकार ने किन्नर समाज के बारे में हिंदी साहित्य में नही सोचा बड़े मुश्किल से सन दो हज़ार के आस-पास कुछ बुद्धिजीवियों ने सोचा भी लेकिन उनको प्रोत्साहन नही मिल पाया, उनका सृजनात्मक साहित्य की  साहित्य जगत में इतनी चर्चा भी नही हुई क्योंकि यह काम एकदम भिन्न है ऐसे लोगो के बीच से लिया जा रहा है ना ही उनका कोई धर्म है, ना कोईं लिंग, ना कोई जाति वो खुद में एक संपूर्ण समुदाय है जो लोगो के मध्य खुशी बांटने का व्यापार करता है, जबकि स्वयं को अपने परिवार से दूर पाता है, ऐसे वंचित समाज की पीड़ाओं को उन्होंने अपने पत्रिका और पुस्तक संपादन के माध्यम से उठाने का जटिल प्रयत्न किया है, एक ऐसा साधक जब उनके पास बैठो तो साहित्य के अलावा दूसरी चर्चा भी नही होती है कभी कभार खाने पीने की बात हो जाती है उसके अलावा कोई तीसरी चर्चा ही नही, इस पुस्तक पर यह काम बढ़िया रहेगा, उस पुस्तक का टाइटल बदलो वो पुस्तक शोध के लिए बढ़िया है, उस पुस्तक में  किन्नर विमर्श को अच्छे से उठाया है यही सब सुनने को मिलता रहता है, उनकी इस चर्चा से उनकी प्रिय पुत्री भी कभी कभी खीझने लगती है, कभी उनकी साहित्यप्रेमी पत्नी भी सवाल करने लगती हैं जब ऐसा होता है तब वैसा क्यो नही हुआ, इसमे आपने यह बोला तो वो क्यो नही हो सकता काफी साहित्यिक वाद-विवाद होता हम लोग रुचि से सुनते रहते फिर सोचने पर मजबूर हो जाते। कुछ समय बाद उसी वाद-विवाद से एक दाना अंकुरित होता फिर हमको नए विषय पर सोचने और लिखने की प्रेणना मिलती ।
एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने साहित्य को ही जिया है उनके साथ बैठकर हम अल्पज्ञानी भी कुछ आनन्दविभोर होते है, मज़ा लेते है, सीखते है, वो नए रास्ते बताते है हम उनपर कमर कसकर आगे बढ़ने की सोचते है, वो डांटते है प्यार करते है और समय समय पर एक ऐसा सुझाव देते है जिससे यकीनन हमारा और साहित्य का लाभ होता है.... इतना सब कुछ लिख दिया लोग समझते होंगे वो इंसान आखिर है कौन वो सच मे एक सच्चा इंसान, मानवता का प्रहरी डॉ. एम. फ़िरोज़ ख़ान सर है जिन्होंने हमारी रुचि को साहित्य की तरफ मोड़ दिया है, हम ईश्वर से कामना करते है कि ऐसे साहित्य प्रेमी को लम्बी आयु प्रदान करे और हमारे जैसे अनेक अल्पज्ञानियो का मार्गदर्शन कर सके

बहुत बहुत धन्यवाद
सर.........

बुधवार, 23 मई 2018

तुर्क तय्यब एरदोगान जब पहुंचे गरीब के घर इफ्तार करने- नावेद मुग़ल

इफ़्तार से चंद मिनट पहले तुर्की की दारूल हुकूमत अंकारा के एक गरीब इलाके में मौजूद एक मजदूर के घर की घंटी बजती है घर के मालिक 53 साला यलदरम जलैक जब दरवाजा खोलकर देखते हैं तो उनके हैरत का कोई ठिकाना नहीं रहता उन्हें अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आता और देखते हैं कि दरवाजे पर मुल्क में सदर रजब तैयब उरदगान और उनकी बीवी सैयदा अमीना उरदगान खड़े हैं यलदरम जलैक की हैरत को भांपते हुए तुर्क सदर  उन्हें तसल्ली देकर कहते हैं कि आज हम आपके मेहमान हैं आपके परिवार के साथ इफ्तार करेंगे यह सुनकर मेजबान खुशी से फूले नहीं समाते वह फौरन वापस जाकर अपने घरवालों को यह खुशखबरी देते है कि एक बहुत बड़े मेहमान की आमद है गरीब  यलदरम के परिवार ने अपने हैसियत के मुताबिक इफ्तार का मामूली इंतजाम कर रखा था घर के आठ अफराद दस्तरख्वान पर बैठे थे और इफ्तार के लिए खजूर पानी दूध और संतरा के अलावा दस्तरखान पर और कुछ नहीं था इसलिए परिवार के चेहरों पर अजीम मेहमान की आमद पर खुशी के साथ-साथ परेशानी के आसार भी नुमाया थे मगर तुर्क सदर और उनकी बीवी बिला किसी तकलीफ के यलदरम के अहले खाना के साथ दस्तरखान पर बैठ कर दुआ में मशरूफ हो गए यलदरम के अहले खाना को भी यकीन नहीं आ रहा था कि मुल्क का सदर और उनकी बीवी उनके घर में मौजूद और उनके साथ इफ्तार में शरीक है नाकाबिल यकीन मंजर देखकर यलदरम  और उनकी परिवार की आंखों से खुशी के आंसू निकल आए यलदरम और उनके परिवार ने सदर और उनकी बीवी को खुले दिल से खुशामदीद कहा तुर्की प्रेस के मुताबिक अंकारा के इलाके को एक सब्जी मंडी में मेहनत मजदूरी करते हैं यलदरम जलैक और उन्हें हर दिन 60 लैरा तुर्की करेंसी मजदूरी मिलती है जो कि 22 अमेरिकी डॉलर के बराबर हैं यलदरम जलैक के घर में  तुर्क सदर के आने  बाद यह भी मालूम हुआ कि वह किराए के मकान में रहते हैं जिस का किराया 1 महीने का 360 लैरा अदा करते हैं जोकि 135 अमेरिकी डॉलर होता है
इफ्तार के बाद सदर  और उनकी बीवी यलदरम के अहले खाना के साथ घुलमिल गए और उनसे उनके मसाइल भी पूछे यलदरम ने सदर को बताया कि  उनके 5 बच्चे हैं क्योंकि उनकी कमाई बहुत थोड़ी है इसलिए मैं अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में तालीम दिलवा रहे हैं दिलचस्प बाते हैं कि पांचवें रोजे के दिन इफ्तार के वक्त सदर उरदगान  के  यलदरम के मेहमान बनने पर इसी दिन यलदरम सबसे छोटे बेटे का पहला रोजा था इस मौके पर अचानक मुल्क के सदर की आमद ने यलदरम के अहले खाना की खुशियों को दोगुना कर दिया सदर  ने पहला रोजा रखने पर यलदरम के बच्चे को नगद इनाम के साथ कीमती तोहफे भी दिए जिस पर यलदरम के बाकी बच्ची सदर के दिये तोहफे को देख रहे थे तो उन्होंने घर के दिगर बच्चों को भी एक-एक लैपटॉप और टैबलेट दिया इफ्तार के बाद यलदरम के घर से रुखसत होने से पहले उनके पड़ोसियों को भी खबर लग गई कि मुल्क का सदर उनके पड़ोस में आया है इसलिए यलदरम के बहुत सारे पड़ोसी भी उनके घर में जमा हो गए और सदर के साथ ईशा की नमाज तक लंबी बातचीत की और अपने-अपने मसले से आगाह किया इस दौरान Recep Tayyip Erdoğan के सिकरेट्री समेत कुछ सरकारी अधिकारी भी यलदरम के घर पहुंच चुके थे तुर्क प्रेस के मुताबिक रजब तैयब एर्दोगान और उनकी बीवी अपनी पहली इफ्तारी तुर्की में बने रिफ़्यूजी कैम्प  जिसमें सीरिया के बच्चे हैं उनके साथ इफ्तार किया उन्होंने गरीब और अमीर का फर्क मिटाकर मुल्क में गरीबों के घर इफ्तार करने का मामूल बना लिया है अब तक वह इफ्तार के वक्त 5 मर्तबा गरीबों के घर मेहमान बनकर उनके साथ इफ्तार में शरीक हो चुके हैं सदर उरदगान  और उनकी बीवी इफ्तार से कुछ देर पहले अपनी गाड़ी में सदारती महल से निकलकर शहर के किसी भी गरीब इलाके में निकल जाते हैं जहां वह किसी भी शहरी के घर दरवाजे की घंटी बजाते और अहले खाना के साथ मिलकर इफ्तार करते हैं इसी दौरान सदर उरदगान  अहले खानां से उनके मसाइल पूछकर उन्हें हल भी करते हैं।।।

#नावेदमुग़ल

बुधवार, 9 मई 2018

संघ का निशाना यूनिवर्सिटीज़ क्यों- अकरम हुसैन क़ादरी

संघ का निशाना यूनिवर्सिटीज क्यों- अकरम हुसैन क़ादरी

एक ऐसा तथाकथित संगठन जिसकी पैदाइश 1925 में होते हुए भी देश की आज़ादी में कोई योगदान नहीं है, यह ऐसा संगठन है जिसको खतरा कभी अंग्रेज़ो से ना था, ना है ! बल्कि खतरा अगर किसी से है तो वो है आजकल के आधुनिक मानसिकता वाले, प्रश्नों की बौछार करने वाले, अपने लिए रोजगार की बात करने वाले, शिक्षा का अधिकार मांगने वाले, भाईचारे, मानवता से अपार प्रेम करने वाले, विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले, भारत की धड़कन, आधुनिकीकरण के ध्वजवाहक छात्र-छात्राओं से है, क्योंकि उनको मालूम है हमारे कुकर्मों को उजागर यही करेंगे कोई दूसरा नहीं कर पायेगा , इसलिए वो शिक्षा का बजट कम करते रहते हैं, आधुनिक सोंच रखने वालों पर अपने सहयोगी सोच रखने वाले स्टूडेंट से पिटवाते है, उन पर व्यक्तिगत हमले कराते है अगर इन सब में कामयाब नहीं होते हैं तो उनपर देशद्रोह जैसे मुकदमें लगवा देते है।
सोचने समझने लायक बात है आखिर यह लोग आने वाली पढ़ी-लिखी सोच को क्यों ख़त्म करना चाहते हैं, क्योंकि यह चाहते हैं देश मे एकरूपता हो जिसमें धर्म एक हो, संस्कृति एक हो, संस्कार एक हो, जो कभी हो नहीं सकता क्योंकि इस देश की खूबसूरती हमेशा बहुसांस्कृतिक रही है, अनेक धर्म है, अनेक भाषाएं है ।  समाज का नौजवान तबका यही चाहता है कि देश में डाइवर्सिटी हो लेकिन इस तरह के लोग देश को तोड़ने की साज़िश अपनी सत्ता को पाने के लिए कर रहे है।
साहब जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री के लिये नामित हुए तो 2013 के आस पास ही यूनिवर्सिटीज़ पर छुटपुट हमले शुरू हो गए, लेकिन इसने अपना रौद्र रूप तब धारण किया जब आरएसएस समर्थित सरकार सत्ता पर पूर्णतयाः काबिज़ हो गयी जिसमें सबसे पहले FTII जैसे इंस्टिट्यूट पर हमला हुआ, उसके बाद जाधवपुर यूनिवर्सिटी, फिर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक दलित छात्र एक्टिविस्ट डॉ. रोहित वेमुला को संदिग्ध हालात में मरवा दिया गया, बाद में मीडिया ने उसकी जाति पर बहस की यह बहुत घृणित कार्य था, जेएनयू को फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के नाम पर प्रताड़ित किया गया, लेकिन उसमें भी आज तक कोई इनकी पुलिस फाइनल रिपोर्ट नही लगा पाई है, फिर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी जैसी संस्था पर लड़कियों पर हमले कराए गए जो कि इतना घृणित कार्य था जिसकी जितनी निंदा की जाए कम है, रामजस कॉलेज में फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के चक्कर में एक फौजी की बेटी को रेप करने की धमकी दी गयी,
आजकल सबसे ज्यादा सुर्खियों में एएमयू है क्योंकि इसके नाम में मुस्लिम है जो इनको सत्ता भी देता है और फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद की धमाचौकड़ी मचाकर, नए नए लोगो को फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के नाम से मीडिया में सुर्खिया भी देता है जिससे इनको चुनाव के समय मुद्दे भी मिलते है, दरअसल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट यूनियन हॉल के एक कक्ष में मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगी है क्योंकि 1938 में जिन्ना को उस वक़्त की स्टूडेंट यूनियन ने लाइफ मेम्बरशिप दी थी, जोकि 1920 में देश के महात्मा गांधी को भी मिली थी, जबकि यह तस्वीर केवल एक इतिहास है, उसके अलावा कुछ नहीं,  दरअसल इस मुद्दे की ज़रूरत वर्तमान सरकार  को क्यों पड़ी  क्योंकि अलीगढ़ में पिछले मेयर के चुनाव में बीजेपी को मुँह की खानी पड़ी है उनको ऐसा लग रहा है कि 2019 में सांसद भी गवा बैठेंगे, इसलिए अलीगढ़ के मौजूदा सांसद ने यह फ़र्ज़ी मुद्दे को तूल दिया है,जबकि वर्तमान सरकार ने जो 2014 में वादे किए थे उनमें से कोई भी पूरा नही हुआ है, आगामी चुनाव 2019 में जनता के बीच जाने के लिए उनके पास मुँह दिखाने के लिए कोई काम नही है तो वो इन भावनात्मक मुद्दों को उठाकर धुर्वीकरण करके देश की शीर्ष सत्ता पर काबिज होने की ख्वाहिश है जिससे फिर देश मे झूठे वादों, और फ़र्ज़ी मुद्दों में फंसाया जाए, वर्तमान सरकार किसी भी वादे को पुरा नहीं कर सकी और मुद्दे पर पूर्णतया सही साबित नहीं हुई है जिसके लिए उसे देश की कुर्सी भी छोड़ना पड़ सकता है क्योंकि देश का पढ़ा-लिखा नौजवान उनकी यह धूर्त, गन्दी राजनीति को समझ चुका है और वह देश मे घूमघूम कर इनके कारनामों को बेनकाब करने की कोशिश करेगा, इसलिए संघ और उसके साथी संगठन यूनिवर्सिटीज़ पर हमला करके अपनी सोच को उजागर कर रहे है, जिसको देश का युवा  अच्छे से समझ रहा है
#जय_हिंद
#जय_भारत

अकरम हुसैन क़ादरी

गुरुवार, 3 मई 2018

संघियों का काला सच -अकरम क़ादरी

सुनो कंघी गुंडो तुम्हारा तो कोई इतिहास है ही नही दुसरो का इतिहास क्यो मिटाना चाहते हो, कंघियों का अगर कोई इतिहास है तो सावरकर, हेडगेवार से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक ने अपने अंग्रेज़ आकाओं से माफी मांगकर देश के आज़ादी के मस्तानो की लाश पर चढ़कर देशद्रोह किया है यह स्याह सच है जिसको तुम जैसे लोग ना समझ सकते है और ना ही समझेंगे, अगर तुम यह सोचते हो यहां कोई जिन्ना को मानता है तो यह तुम्हारी भूल है, जिन्ना को कल हमारे बुज़ुर्गो ने जूते की ठोकर पर रखा है आज हम भी उसको जूते की ही ठोकर पर रखते है जबकि तुम्हारे फ़र्ज़ी राष्ट्रभक्त तुम्हारे ही जनसंघ,आरएसएस से निकले लालकृष्ण आडवाणी ने जिन्ना की मज़ार पर चादर चढ़ाकर वहां पर शीश नबाया था और उसकी शान में कसीदे पढ़े थे, दूसरे तुम्हारे बड़े नेता पूर्व विदेश मंत्री जो कुख्यात आतंकवादी इंसानियत का दुश्मन मसूद अजहर कुत्ते को अफगानिस्तान छोड़कर आये थे और फिर घर आकर उन्होंने जिन्ना की तारीफ के कसीदे यहां तक पढ़े कि उसकी वफादारी में पूरी किताब ही लिख दी, तुम्हारे फ़र्ज़ी राष्ट्रभक्ति की पोल पूरी दुनियां जानती है, तुम ही हो जो 26 जनवरी को काला दिवस मनाते हो और संविधान को जलाने की भरसक कोशिश भी करते है, तुम्हारे ही संगठन के हिन्दू महासभा के लोग तीस जनवरी को नाथूराम गोडसे की पूजा करके शौर्य दिवस मनाते है बताओ जिसने देश के महात्मा को मार दिया आखिर वो कैसे देशभक्त हो सकतेहै, जहां तक मुद्दा एएमयू के स्टूडेंट यूनियन के हाल का है तो उन्होंने जिन जिन नेताओ, सामाजिक कार्यकर्ताओ को लाइफ़ मेम्बरशिप दी है तो उनके केवल फ़ोटो लगे है जबकि जिन्ना की फ़ोटो 1938 से यूनियन हॉल के रूम में है तो उससे किसी को क्या फर्क पढ़ सकता है जबकि एएमयू ने भारत को अनेक नेता, इंजीनियर, डॉ और सिविल सर्विसेज में काम करने वाले लोग दिए है, जबकि इतिहास के पन्नो को पलटा जाए तो हम देखते है महात्मा गांधी को महात्मा नाम ही अलीगढ़ ने दिया उसके बाद आज़ादी के दीवाने यही से गांधी जी के साथ चल दिये ......कंघियों बताओ कौन तुम्हारा देशभक्त ऐसा था जो आज़ादी की लड़ाई में शामिल था, तुम कल भी अंग्रेज़ो के ग़ुलाम थे और आज मानसिक ग़ुलाम हो.................

रविवार, 15 अप्रैल 2018

मीडिया डिबेट 'इंसानियत' को खतरा - अकरम हुसैन अलीग

जब हिंदुस्तानी मीडिया में डिबेट, बहस, तर्क, वितर्क का समय शुरू हुआ था उस वक़्त हिंदुस्तान के सबसे अच्छे पत्रकार रविश कुमार ने कहा था यह "'लोकतंत्र की हत्या की शुरुआत है" यह बात रविश कुमार ने लगभग 10, 12 साल पहले कही थी जो आज सच हो रही है जिसको आज मैं प्रूफ भी कर दूंगा क्या आपको मालूम है यह डिबेट सिस्टम मीडिया में क्यो आया, क्योंकि यह सब टीआरपी का खेल है टीआरपी की रेटिंग मीडिया की दुनियां में एक हफ्ते में बृहस्पतिवार यानि जुमेरात की रात को आती है, जब किसी भी न्यूज़ चैनल की लोकप्रियता का पता लगता है जिसमे जिस पूंजीपति का जो चैनल है उसके ज़रिये ही उसके प्रोग्राम में एडवरटाइजिंग का खेल शुरू होता है एडवरटाइजिंग के ही ज़रिए चैनल की कमाई होती है जिसको पूंजीपति लोग खूब आगे बढ़ाते है उनकी कोशिश भी होती है टीआरपी बड़े हमारे 2 दूना 8 होते रहे हमे ज्यादा कम्पनियों के एडवर्टिजमेंट मिलते रहे।
अब पूंजीपतियों को अपनी एडवरटाइजिंग और टीआरपी से मतलब है उनको किसी मानवता, राजनैतिक पार्टी, हिन्दू-मुस्लिम से नही मतलब है।
डिबेट की दुनियां की एंट्री जब हिंदुस्तानी मीडिया में हुई तो अनेक नामो से न्यूज़ चैनल ने डिबेट शुरू की, जिसमे एक बीजेपी का प्रवक्ता, एक कांग्रेस का प्रवक्ता, एक दाड़ी टोपी वाला मुस्लिम, एक किसी हिन्दू संगठन का प्रवक्ता और एक सो कॉल्ड सामाजिक कार्यकर्ता उसके अलावा एक एंकर जो बहुत हद तक किसी ना किसी तरह किसी राजनैतिक पार्टी की तरफ होता है उसका पक्ष भी लेते हुए दिखता है क्योंकि उसकी भी कुछ मजबूरियां है, जिसको समझा भी जा सकता है
आजकल हिंदुस्तान में जो घटनाये हो रही है उनका सम्बन्ध बहुत हद तक इन मीडिया डिबेट से ही होता है क्योंकि जिन नामो को ऊपर मैंने बताया उन सब लोगो ने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम जैसे मुद्दों पर ही डिबेट की, उन्होंने कभी भी ऐसी डिबेट नही की जिससे मानवता को आगे बढ़ाया जाए, आखिर उनको इससे सरोकार भी नही है फिर भी कुछ हल्का फुल्का एक दो घण्टे का साहित्य और कला का प्रोग्राम दिखा दिया उसके अलावा दिनभर हिन्दू- मुस्लिम डिबेट में ही लगे रहे, इधर जितनी वो डिबेट में लगे रहे उधर उतनी ही इंसानियत शर्मशार होती रही है। आज देश मे हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर कई तबके ऐसे है जो दिनभर 24×7 लड़ने झगड़ने किसी को मौत के घाट उतारने को तैयार खड़े है क्योंकि उनके दिलों में इन मीडिया बहस ने इतनी नफ़रत भर दी है वो अब एक दूसरे की जान लेने तक से नही चूकते, बल्कि गुस्सा में आकर अपने सभी रिश्तों को भी शर्मशार कर देते है। इससे कोई हिन्दू-मुस्लिम तो नही मरता बल्कि इंसानियत कुढ़-कुढ़ के मरती है
क्या भूल गए हम अपना इतिहास जब आज़ादी की लड़ाई में कोई हिन्दू-मुस्लिम नही लड़ा था बल्कि हिंदुस्तानी ही लड़े थे जिससे हमें अंग्रेज़ो से आज़ादी मिली, वो अंग्रेज़ जो डिवाइड एंड रूल की पालिसी पर बेहतरीन काम करते है, आज भी कुछ नेता डिवाइड एंड रूल की पालिसी पर काम कर रहे है और वो केवल सत्ता को हतियाना चाहते है उसके अलावा उनका कोई एजेंडा नही है, वो अब तक अपने एजेंडा में सफल भी हुए है लेकिन आपको क्या मिला कुछ दिन मीडिया की सुर्खियां, उसके बाद पुलिस केस, जेल फिर कोर्ट कचहरियों के रोज़ चक्कर उधर आपका भी परिवार उससे प्रभावित हुआ, जिसके साथ ज़ुल्म हुआ उसका भी परिवार प्रभावित हुआ बताइये इससे फायदा किसको हुआ है।

हाल के दशक में हुई दो घटनाओ ने दिल दहलाकर रख दिया है जब निर्भया का कांड दिल्ली में हुआ तो लोग तिरंगा लेकर न्याय की गुहार लगाने सड़को पर निकले थे, लेकिन आज जब उन्नाव पर एक राजपूत लड़की पर बलात्कार का केस हुआ तो विधायक जी के समर्थक उसकी जांच तक नही होने देने रहे है जिसको हाई कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लिया और उस विधायक पर कार्यवाही हो सकी बल्कि सूबे की पुलिस उडपर लीपापोती करती रही है, जिसके चक्कर मे उस पीड़िता को अपने पिता से भी हाथ धोना पड़ा सच मे यह बहुत खतरनाक है,
दूसरी तरफ कठुआ में एक 8 वर्षीय बच्ची के साथ एक धार्मिक स्थल में बर्बरतापूर्वक बलात्कार हुआ उसको नशे के इंजेक्शन देकर 8 दिन तक अपराधियो ने सबसे नीच हरकत करते रहे है यह सच है उनका कोई धर्म नही है लेकिन उन्होंने जिस धर्म की आड़ लेकर यह काम अंजाम दिया वो मीडिया की हिनू-मुस्लिम डिबेट का ही परिणाम है आज हमको फिर से सोचना पड़ेगा हमे क्या करना है किस तरफ जाना है....जिस प्रकार से मैं पहले ही अनुमान लगा चुका हुँ जिस तरीके से राजनैतिक पार्टिया सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है उस तरीके से हिंदुस्तान 20 साल तक पिछड़ चुका है अब देखना यह है कि कितना और ज्यादा पिछडेगा जिससे हमारे ऊपर विकसित देशों का धन इकट्ठा होता रहेगा, जिसको हम चुकाते-चुकाते मर जायेंगे हमारे बच्चों पर भी वो उधार रहेगा......आप सबसे मेरी विनती है, गुज़ारिश है, अपील है कि मीडिया के इस मुद्दे को समझे और डिबेट सिस्टम का खुला विरोध करे....जिससे हम खुद को भी बचाये और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अच्छा भविष्य पेश करे

जय हिन्द, जय भारत

अकरम हुसैन क़ादरी

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

क़ुरान का इंसान बने- अल्लामा क़मरूज़ज़्मा आज़मी

एएमयू के कैनेडी ऑडिटोरियम में मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के 14 वे सालाना अज़मत-ए-रसूल कॉन्फ्रेंस में ग्रेट ब्रिटेन के प्रवासी भारतीय अल्लामा क़मरूज़ज़्मा आज़मी ख़ान आज़मी ने छात्रों से मुख़ातिब होते हुए अनेक बिंदुओं पर अपनी राय रखी जिसमे उन्होंने सबसे पहले इंसान होने की शर्ते बताई जिसमे उन्होंने न्यूटन का ज़िक्र करते हुए बताया कि किस प्रकार से एक पेड़ के नीचे बैठे व्यक्ति का दिमाग़ काम करता है वो कितना बड़ा अविधकर कर देता है, दूसरी तरफ उन्होंने तलबा का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि जब एक इंसान नदी के किनारे बैठकर कंकड पानी की तरफ फेंकता है तो एक आवाज़ निकलती है जो उसको प्यारी लगती है फिर वो देखता है कि किस प्रकार कंकड़ पानी से एक आवाज़ करके निकल जाता है ठीक उसी प्रकार वो एक बड़ी लकड़ी को पानी मे फेंकते है तो देखते है कि वो डूबती नही है जिससे उनको महसूस होता है कि ज्यादा पानी मे बड़ी चीज रखी जाए तो वो तैरने लगती है जिसको आर्किमिडीज का सिद्धांत कहते है जिसके माध्यम से पानी के जहाज़, नाव का अविष्कार हुआ, कहने का तातपर्य यह है कि इंसान बनने के लिए व्यक्ति का मस्तिष्क खुला हुआ चाहिए, दिमाग तब ही खुला होगा जब वो समाज, दुनियाँ, मानवता के लिए सोचेगा इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कहा जब वो मानवता के बारे में सोचेगा तो उसको धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करना पड़ेगा, जिसमे अनेक आसमानी किताबे दुनियाँ में आई है, जिसके अनेक प्रकार से पढ़ा गया है लेकिन जो आखिरी किताब 14 सौ साल पहले आयी है उसके इन सबके बारे में विस्तार से बताया गया है अब यह इंसानो पर निर्भर है वो इनका प्रयोग किस लिए करेगा, क़ुरान दुनियां की एक मात्र ऐसी किताब है जिसमे पूर्ण मानवता का सार है केवल उसको सही मायनों में समझने की आवश्यकता है जिस प्रकार से लोग आजकल क़ुरान को आतंकवाद जैसे कैंसर के लिए इस्तेमाल कर रहे है वास्तव में उन्होंने क़ुरान का सही अध्ययन किया ही नही है अगर किया होता तो आज इस्लाम को इतना बदनाम नही किया होता, इस्लाम शांति, अमन का मज़हब है जिसके माध्यम से हम मानवता की पूर्ण सेवा सही मायनों में कर सकते है, दुनियाँ में अनेक विचारधाराएं आई और समय के अनुसार यूज़ एंड थ्रो हो गयी लेकिन क्या वजह है इस्लाम को आये 14 सौ वर्ष हो गए फिर भी वो खूब फल फूल रहा है दिन प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है जितना इस्लामिक मुखालिफ ताकते इस्लाम को बदनाम कर रही है यह मज़हब उतनी ही तेज़ी से देश दुनियाँ में आगे बढ़ रहा है क्योंकि इस्लाम मे ही जीवन जीने की पूर्ण पद्धति के साथ-साथ मानवता का सरोकार पूर्ण रूप से मिलता है, उसको समझाने के लिए उन्होंने कन्फ्यूशियस जैसे दार्शनिक का ज़िक्र किया कि किस प्रकार उसकी विचारधारा आयी है और समय के अनुसार वो चली गयी आज पूरे चीन में उसके मानने वाले मुठ्ठी भर लोग रह गए है, आखिर में उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म को आगे बढ़ने के लिए मानवता ही शर्त है जिसमे यह शर्त पूर्णरूप से नही पाई जाएगी वो धीरे धीरे खत्म हो जाएगा, एएमयू के नायब वाईस चान्सलर किछौछा शरीफ के खानवादे के प्रोफ़ेसर तबस्सुम शाहब ने छात्र- छात्राओं का ध्यान इधर भी पोलियो जैसी बीमारी की तरफ आकर्षित किया जिसमें उन्होंने बताया कि पिछले दशक में पोलियो के ज्यादातर मामले मुस्लिम कम्युनिटी में ही मिले थे जिसके लिए हमे तालीम की तरफ ध्यान देना होगा, जब हम तालीमयाफ्ता होंगे तो किसी भी बीमारी से लड़ने की कुब्बत हमारे ज़हन में होगी उसके लिए उपचार भी होगा, कांफ्रेस में अल बरकात एजुकेशन ट्रस्ट के  सरेसर्वा प्रोफ़ेसर अमीन मियां क़ादरी बरकाती सज्जाद नशीन मारहरा ने इस दौर में अपने ईमान को बचाने के लिए अपने दिल मे इश्क़ ए मोहम्मद के साथ साथ मोहब्बत पर ज़ोर दिया जिससे देश दुनियाँ में अमन का रास्ता बन सके, मुस्लिम स्टूडेंट आर्गेनाईजेशन के नेशनल प्रेसिडेंट इंजीनियर शुजात अली क़ादरी, एएमयू के प्रेसिडेंट जावेद मिस्बाही, वाईस प्रेसिडेंट मोहम्मद कैफ़, सेक्रेटरी मोहम्मद अनस, उर्दू मीडिया प्रभारी अज़हर नूर और हिंदी मीडिया प्रभारी अकरम हुसैन क़ादरी के अलावा अल बरकात एजुकेशन ट्रस्ट के सेक्रेटरी डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीकी ने कांफ्रेस का संचालन किया
#अकरम हुसैन क़ादरी

शनिवार, 3 मार्च 2018

सीरिया से पहले 1922 याद करो- अकरम हुसैन क़ादरी

सीरिया से पहले 1922 याद करो- अकरम हुसैन क़ादरी

इंसानियत, इंसान के दिल मे खिलने वाला सबसे आला तरीन खुशनुमा फूल है, लेकिन क्या वजह है आज हम खूब सीरिया पर आंसू बहा रहे है, बहाना भी चाहिए लेकिन हमें उस मंज़र को भी याद रखना चाहिए जिससे इस खूंखार दौर की शुरुआत होती है, जब तुर्को को कुछ अलग विचारधारा के लोगो ने हरम शरीफ जैसी मुक़द्दस जगह पर तुर्को को क़त्ल कर दिया लेकिन तुर्को ने हुज़ूर सल्लाहो अलैहे वस्सलम की वफादारी और इस्लामी इंसानियत के वजह से पूरी हरम शरीफ में तलवार नही चलाई क्योंकि वो जानते थे यह पाक जगह है इसको खून से लाल नही करना चाहिए लेकिन तथाकथित फ़र्ज़ी किंग डाकू सऊद और शहादत हुसैन जैसे ईमानी चोरों के कुत्तो ने हरम शरीफ में ही तुर्को का क़त्ल करके गारत कर दिया, यू तो दर्द हमे फ़िलिस्तीन, लेबनॉन, इराक़, अफगानिस्तान, चेचन्या, जैसे मुल्कों का बहुत है, लेकिन कभी भी हमने 1922 की तारीख का मुताला क्यो नही किया जिसको हमे करना चाहिए जिस तरह से कुछ लोगो ने मिलकर 1922 बाद अरब ( जिसको पहले हिजाज़ कहते थे) उसको लूटा आज भी उनकी औलादे लगातार मुस्लिम कन्ट्रीज को इन सऊदी के कुत्तो के साथ मिलकर लूट रही है आखिर क्या वजह है जब बर्मा में मुसलमानों पर हमले होते है तो तुर्क की सेना जाती है लेकिन जब फ़िलिस्तीन पर हमले होते है तो पड़ोस में सऊद अरब के कान में जूं भी नही रेंगती है आखिर वजह क्या है इसको हमको जानना चाहिए अगर अरब चाहता तो आज जिस तरीके से हमारे सामने जो परेशानियां दरपेश आ रही है वो बहुत हद तक नही आती

खून का व्यापार बड़ा ही है जिस तरह से पेट्रोल, डीज़ल का कारोबार सऊदी के चंद कुत्तो, अमेरिका के दुश्मनों और बिट्रेन के दलालो ने मिलकर लूटा है ....हमारी संवेदनाएं, दिल अज़ारी आज भी सीरिया के लोगो के साथ है एक इंसानी दिल होने के नाते लेकिन हमें अपने पुराने वक़्त को याद रखना चाहिए, जो कुछ फ़र्ज़ी विचारधाराएं पनप रही है चले उनको मुँह तोड़ जवाब देना चाहिए जो इस्लामी ड्रेस में ही हम सबको बरगलाती है, नए नए नोजवानों की जवानी लुटती है दरअसल यह सब ग़ुलाम कौम से पैदा हुए उनके कुत्ते ही है ......लौरेंस ऑफ अरबिया को पढो....इनकी तारीख को पढो सब मालूम हो जाएगा......

जय हिंद

#अकरम हुसैन क़ादरी