शुक्रवार, 23 मार्च 2018

क़ुरान का इंसान बने- अल्लामा क़मरूज़ज़्मा आज़मी

एएमयू के कैनेडी ऑडिटोरियम में मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के 14 वे सालाना अज़मत-ए-रसूल कॉन्फ्रेंस में ग्रेट ब्रिटेन के प्रवासी भारतीय अल्लामा क़मरूज़ज़्मा आज़मी ख़ान आज़मी ने छात्रों से मुख़ातिब होते हुए अनेक बिंदुओं पर अपनी राय रखी जिसमे उन्होंने सबसे पहले इंसान होने की शर्ते बताई जिसमे उन्होंने न्यूटन का ज़िक्र करते हुए बताया कि किस प्रकार से एक पेड़ के नीचे बैठे व्यक्ति का दिमाग़ काम करता है वो कितना बड़ा अविधकर कर देता है, दूसरी तरफ उन्होंने तलबा का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि जब एक इंसान नदी के किनारे बैठकर कंकड पानी की तरफ फेंकता है तो एक आवाज़ निकलती है जो उसको प्यारी लगती है फिर वो देखता है कि किस प्रकार कंकड़ पानी से एक आवाज़ करके निकल जाता है ठीक उसी प्रकार वो एक बड़ी लकड़ी को पानी मे फेंकते है तो देखते है कि वो डूबती नही है जिससे उनको महसूस होता है कि ज्यादा पानी मे बड़ी चीज रखी जाए तो वो तैरने लगती है जिसको आर्किमिडीज का सिद्धांत कहते है जिसके माध्यम से पानी के जहाज़, नाव का अविष्कार हुआ, कहने का तातपर्य यह है कि इंसान बनने के लिए व्यक्ति का मस्तिष्क खुला हुआ चाहिए, दिमाग तब ही खुला होगा जब वो समाज, दुनियाँ, मानवता के लिए सोचेगा इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कहा जब वो मानवता के बारे में सोचेगा तो उसको धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करना पड़ेगा, जिसमे अनेक आसमानी किताबे दुनियाँ में आई है, जिसके अनेक प्रकार से पढ़ा गया है लेकिन जो आखिरी किताब 14 सौ साल पहले आयी है उसके इन सबके बारे में विस्तार से बताया गया है अब यह इंसानो पर निर्भर है वो इनका प्रयोग किस लिए करेगा, क़ुरान दुनियां की एक मात्र ऐसी किताब है जिसमे पूर्ण मानवता का सार है केवल उसको सही मायनों में समझने की आवश्यकता है जिस प्रकार से लोग आजकल क़ुरान को आतंकवाद जैसे कैंसर के लिए इस्तेमाल कर रहे है वास्तव में उन्होंने क़ुरान का सही अध्ययन किया ही नही है अगर किया होता तो आज इस्लाम को इतना बदनाम नही किया होता, इस्लाम शांति, अमन का मज़हब है जिसके माध्यम से हम मानवता की पूर्ण सेवा सही मायनों में कर सकते है, दुनियाँ में अनेक विचारधाराएं आई और समय के अनुसार यूज़ एंड थ्रो हो गयी लेकिन क्या वजह है इस्लाम को आये 14 सौ वर्ष हो गए फिर भी वो खूब फल फूल रहा है दिन प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है जितना इस्लामिक मुखालिफ ताकते इस्लाम को बदनाम कर रही है यह मज़हब उतनी ही तेज़ी से देश दुनियाँ में आगे बढ़ रहा है क्योंकि इस्लाम मे ही जीवन जीने की पूर्ण पद्धति के साथ-साथ मानवता का सरोकार पूर्ण रूप से मिलता है, उसको समझाने के लिए उन्होंने कन्फ्यूशियस जैसे दार्शनिक का ज़िक्र किया कि किस प्रकार उसकी विचारधारा आयी है और समय के अनुसार वो चली गयी आज पूरे चीन में उसके मानने वाले मुठ्ठी भर लोग रह गए है, आखिर में उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म को आगे बढ़ने के लिए मानवता ही शर्त है जिसमे यह शर्त पूर्णरूप से नही पाई जाएगी वो धीरे धीरे खत्म हो जाएगा, एएमयू के नायब वाईस चान्सलर किछौछा शरीफ के खानवादे के प्रोफ़ेसर तबस्सुम शाहब ने छात्र- छात्राओं का ध्यान इधर भी पोलियो जैसी बीमारी की तरफ आकर्षित किया जिसमें उन्होंने बताया कि पिछले दशक में पोलियो के ज्यादातर मामले मुस्लिम कम्युनिटी में ही मिले थे जिसके लिए हमे तालीम की तरफ ध्यान देना होगा, जब हम तालीमयाफ्ता होंगे तो किसी भी बीमारी से लड़ने की कुब्बत हमारे ज़हन में होगी उसके लिए उपचार भी होगा, कांफ्रेस में अल बरकात एजुकेशन ट्रस्ट के  सरेसर्वा प्रोफ़ेसर अमीन मियां क़ादरी बरकाती सज्जाद नशीन मारहरा ने इस दौर में अपने ईमान को बचाने के लिए अपने दिल मे इश्क़ ए मोहम्मद के साथ साथ मोहब्बत पर ज़ोर दिया जिससे देश दुनियाँ में अमन का रास्ता बन सके, मुस्लिम स्टूडेंट आर्गेनाईजेशन के नेशनल प्रेसिडेंट इंजीनियर शुजात अली क़ादरी, एएमयू के प्रेसिडेंट जावेद मिस्बाही, वाईस प्रेसिडेंट मोहम्मद कैफ़, सेक्रेटरी मोहम्मद अनस, उर्दू मीडिया प्रभारी अज़हर नूर और हिंदी मीडिया प्रभारी अकरम हुसैन क़ादरी के अलावा अल बरकात एजुकेशन ट्रस्ट के सेक्रेटरी डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीकी ने कांफ्रेस का संचालन किया
#अकरम हुसैन क़ादरी

शनिवार, 3 मार्च 2018

सीरिया से पहले 1922 याद करो- अकरम हुसैन क़ादरी

सीरिया से पहले 1922 याद करो- अकरम हुसैन क़ादरी

इंसानियत, इंसान के दिल मे खिलने वाला सबसे आला तरीन खुशनुमा फूल है, लेकिन क्या वजह है आज हम खूब सीरिया पर आंसू बहा रहे है, बहाना भी चाहिए लेकिन हमें उस मंज़र को भी याद रखना चाहिए जिससे इस खूंखार दौर की शुरुआत होती है, जब तुर्को को कुछ अलग विचारधारा के लोगो ने हरम शरीफ जैसी मुक़द्दस जगह पर तुर्को को क़त्ल कर दिया लेकिन तुर्को ने हुज़ूर सल्लाहो अलैहे वस्सलम की वफादारी और इस्लामी इंसानियत के वजह से पूरी हरम शरीफ में तलवार नही चलाई क्योंकि वो जानते थे यह पाक जगह है इसको खून से लाल नही करना चाहिए लेकिन तथाकथित फ़र्ज़ी किंग डाकू सऊद और शहादत हुसैन जैसे ईमानी चोरों के कुत्तो ने हरम शरीफ में ही तुर्को का क़त्ल करके गारत कर दिया, यू तो दर्द हमे फ़िलिस्तीन, लेबनॉन, इराक़, अफगानिस्तान, चेचन्या, जैसे मुल्कों का बहुत है, लेकिन कभी भी हमने 1922 की तारीख का मुताला क्यो नही किया जिसको हमे करना चाहिए जिस तरह से कुछ लोगो ने मिलकर 1922 बाद अरब ( जिसको पहले हिजाज़ कहते थे) उसको लूटा आज भी उनकी औलादे लगातार मुस्लिम कन्ट्रीज को इन सऊदी के कुत्तो के साथ मिलकर लूट रही है आखिर क्या वजह है जब बर्मा में मुसलमानों पर हमले होते है तो तुर्क की सेना जाती है लेकिन जब फ़िलिस्तीन पर हमले होते है तो पड़ोस में सऊद अरब के कान में जूं भी नही रेंगती है आखिर वजह क्या है इसको हमको जानना चाहिए अगर अरब चाहता तो आज जिस तरीके से हमारे सामने जो परेशानियां दरपेश आ रही है वो बहुत हद तक नही आती

खून का व्यापार बड़ा ही है जिस तरह से पेट्रोल, डीज़ल का कारोबार सऊदी के चंद कुत्तो, अमेरिका के दुश्मनों और बिट्रेन के दलालो ने मिलकर लूटा है ....हमारी संवेदनाएं, दिल अज़ारी आज भी सीरिया के लोगो के साथ है एक इंसानी दिल होने के नाते लेकिन हमें अपने पुराने वक़्त को याद रखना चाहिए, जो कुछ फ़र्ज़ी विचारधाराएं पनप रही है चले उनको मुँह तोड़ जवाब देना चाहिए जो इस्लामी ड्रेस में ही हम सबको बरगलाती है, नए नए नोजवानों की जवानी लुटती है दरअसल यह सब ग़ुलाम कौम से पैदा हुए उनके कुत्ते ही है ......लौरेंस ऑफ अरबिया को पढो....इनकी तारीख को पढो सब मालूम हो जाएगा......

जय हिंद

#अकरम हुसैन क़ादरी

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

समलैंगिकता विषय पर वाङ्गमय पत्रिका का योगदान - अकरम हुसैन क़ादरी

आज वाङ्गमय पत्रिका के संबंध में वरिष्ठ आलोचक डॉ. वेद प्रकाश अमिताभ और प्रोफ़ेसर भरत सिंह जी से वाङ्गमय के नए अंक 'समलैंगिकता' पर चर्चा हुई जिसमें दोनों वरिष्ठ आलोचकों ने गहन विमर्श करते हुए कहा कि यह अंक समलैंगिकता जैसे उपेक्षित विषय पर मील का पत्थर साबित होगी और इस समय राजनैतिक रूप से भी इस विषय की काफी चर्चा है इसमें अनेक बुद्धिजीवी क़लम से लेकर सड़क तक दिखाई दे रहे है जो क़लम से लिखकर और सड़क पर लोगो को प्रोत्साहित कर रहे है जिससे एक ऐसे अपेक्षित समाज को साहित्य के साथ-साथ राजनैतिक रूप से स्थान मिल रहा है जो निश्चय ही मानवता की सेवा में एक अद्वितीय प्रयोग साबित होगा जिसके माध्यम से समाज के एक धड़े को इंसाफ मिलने की संभावनाएं बढ़ रही है मानवतावादी दृष्टिकोण के व्यक्ति भी इसमें बढ़ चढ़ के हिस्सा ले रहे है चाहे वो पत्रकार हो या फिर साहित्य की सेवा करने वाले रचनाकार, सभी वर्गों में इस विषय के प्रति रोचकता बढ़ रही है।
यदि ऐसे विषयो पर साहित्यकार, समाजसेवी, पत्रकार, राजनैतिक लोग रुचि लेने लगेंगे तो निश्चित ही समलैंगिकता जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा होगी और जब चर्चा होने शुरू हो जाएगी तो इस समाज को न्याय मिलेगा जो समाज, देश और मानवता के लिए आवश्यक भी है, जिससे देश मे उन्नति की एक नई लहर उत्तपन्न होगी।
इस परिचर्चा में दो वरिष्ठ साहित्यकर्मियों के अलावा वाङ्गमय पत्रिका के संपादक और हलीम पी जी कॉलेज कानपुर के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद फ़िरोज़ खान, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अब्दुल्ला वीमेंस कॉलेज की असिस्टेंस प्रोफ़ेसर और अनुसंधान पत्रिका की सम्पादक डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ और डॉ. आलोक कुमार सिंह तथा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शोधार्थी मनीष कुमार गुप्ता और अकरम हुसैन क़ादरी भी मौजूद थे।

प्रस्तुति

अकरम हुसैन क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

फ़िलिस्तीन मुद्दे पर सऊदी अरब का किरदार - अकरम हुसैन क़ादरी

फ़िलिस्तीन मुद्दे पर सऊदी अरब का किरदार - अकरम हुसैन क़ादरी

सऊदी अरब का नाम आते ही दिल में एक श्रद्धा उमड़ती है बात भी ठीक है वो मुस्लिमों की मुबारक जगह है जिसकी सरज़मीन पर नबी आये, सहाबा आये, लेकिन फिलिस्तीन मुद्दे पर एक लंबे वक्त से सऊदी अरब के ढुलमुल रवैया मुस्लिमों को सोचने पर मजबूर कर रहा है, आखिर क्या वजह है सऊदी अरब फ़िलिस्तीन मुद्दे पर ऐसे खामोश हो जाता है जैसे उसको सांप सूंघ गया हो, उधर मुस्लिमों का पहला  किबला बैतुल मुक़द्दस खतरे में आ गया है जिसको इसराइली भेड़ियों से बचाना बहुत ज़रूरी है ।
दरअसल 1922 से पहले जब सऊदी अरब में उस्मानियाँ सल्तनत का राज था जिसमे कहीं पर भी किसी भी जगह पर मुस्लिमों को परेशानी होती थी तो हिजाज़ ( सऊदी अरब) अपना किरदार बखूबी निभाता था, पिछले दिनों हुए अनेक हमलों ने इसकी पोल खोल कर रख दी जब हर मुद्दे पर सऊदी किंग की चुप्पी का मतलब है तुम तेल लुटाओ गैरों पर वो तुम्हारा खून चूसे, यह हक़ीक़त है आज हर मुद्दे पर तुर्की ही क्यों बोलता है क्योंकि यही वो लोग हैं जिन्होंने हिजाज़ में उस्मानियाँ सल्तनत के वक़्त हरमैन शरीफ में तलवार नहीं चलाई, खून नहीं बहाया लेकिन किंग सऊद के फ़र्ज़ी मुसलमानों ने तुर्कियो को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन उन्होंने उफ भी नहीं की और मिल्लत को बचाने का काम किया ।
1922 के बाद सऊदी में किंग सऊद का कब्ज़ा हो गया जिन्होंने इस्लाम की शिनाख्त को मिटाया, मिल्लत के खून से होली खेली ये वो ही लोग हैं जिन्होंने इक़्तेदार में आने के लिए हरमैन शरीफ में पहले तुर्कियों का खून पिया और अब अपनी सल्तनत चलाने के लिए मिल्लत के नौजवानों के खून चूस रही है चाहे वो इराक़ हो, अफगानिस्तान हो या फिर फ़िलिस्तीन पर इसराइली सेना का कब्जा करने में हाथ हो यह सब जगह दोहरी नीति का ही इस्तेमाल करते हैं।

अफसोस होता है जिस पैसे वाले मुल्क में आज मुस्लिमों के हालात तो खराब हैं ही उसके अलावा उसकी सीमाओं से लगे मुस्लिम मुमालिक के हालात तो रोज बिगड़ ही रहे हैं। इजराइली सेना के लोग बैतुल मुकद्दस पर कब्ज़ा कर रहे हैं लेकिन सऊदी किंग कुछ भी नहीं कहता है उसका सीधा मामला यही है कि यह 1922 कि बाद कि नस्ल है जो पूरी तरह से अमेरिका, इजराइल की वफादार है न कि मिल्लत की वफादार है ज़रा सोचिए समझिए सऊदी के किरदार को जिसकी वजह से आज दुनियाँ में मुस्लिम रुसबा हो रहा है। एक वो भी वक्त था जब हजरत उमर और सलाहुद्दीन अय्यूबी जैसे आशिक़ाने मुस्तफा ने बैतुल मुकद्दस को फतह करके इस्लामी हुकूमत के हवाले किया था। पर वो जज़्वा सऊदी हुक़ूमत में देखने को नहीं मिलता है।

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

एमएसओ एएमयू ने फल वितरित और जुलूस निकालकर मनाया ईद मिलाद उन नबी - अकरम हुसैन क़ादरी

एमएसओ एएमयू ने फल वितरित और जुलूस निकालकर मनाया ईद मिलाद उन नबी - अकरम हुसैन क़ादरी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की गैर सियासी तंज़ीम मुस्लिम स्टूडेंट आर्गेनाईजेशन ने आज ईद मिलाद उन नबी के मुबारक मौके पर अपने प्यारे नबी मानवता का संदेश पूरी दुनियां में फैलाने वाले हुज़ूर अकरम सल्लाहो अलैहि वस्सलम के जन्मदिन के मौके पर आज सबसे पहले सुबह साबिक में क़ुरान ख्वानी का एहतेमाम किया गया उसके बाद प्यारे नबी की सुन्नतों को समझते हुए मानवता की सेवा के लिए जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में मरीजों और तीमारदारों को फल वितरित किए गए जिससे वहां पर मौजूद लोगों के चेहरे पर एक अजीब खुशी का एहसास हुआ उन्होंने खुशी खुशी फलों को लिया और एमएसओ के कार्यो की तारीफ की
फल वितरण के बाद एमएसओ के ज़िम्मेदारान लोगो ने यूनिवर्सिटी में जुलूस ए मोहम्मददी का एहतेमाम किया गया जिसमें हम्द, नात, मनकबत और हुज़ूर सल्लाहो अलैहि वस्सलम की तालीमात को बताया गया कि किस प्रकार से उन्होंने पूरी दुनियाँ मे जब बच्चियों को ज़िंदा दफन कर दिया जाता था तो उस वक़्त आप हुज़ूर सल्लाहो अलैहि वस्सलम ने लोगो को लड़कियों को दफन करने से मना किया और उनकी रक्षा करने के लिए लोगो को संदेश दिया , जिस प्रकार से आजकल मज़दूर, गरीब, लाचारों पर जुल्म सितम हो रहे है उस पर नबी सल्लाहो अलैहि ने फरमाया कि मज़दूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी दे दी जाए जिससे उसका परिवार भी दो वक्त की रोटी जुटा सके और उसके पेट की आग बुझ जाए आखिर में बताया गया कि इस्लाम पूरी तरह से वेलफेयर मज़हब है जो किसी को ज़ुल्म ज्यादती की इजाज़त नही देता है जो लोग इस्लाम के नाम पर जुल्म ज्यादती आतंकवाद फ़ैला रहे है या तो वो दीन ए इस्लाम की तालीमात को नही समझते गया फिर वो इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश कर रहे है इस मुबारक मौके पर डॉ. अहमद मुज्तबा, डॉ. कमर आलम एमएसओ सदर जावेद मिस्बाही, मोहम्मद कैफ, काशिफ खान क़ादरी, अकरम हुसैन क़ादरी, मुसाब इल्मी, अनस, अलाउद्दीन, फरहान दीवान बरकाती, शम्स तबरेज़, वासिफ़ अन्सारी, शमीम अकरम, गज़नबी, मोहम्मद फ़हद और रफ़ीक़ अलीमी साहब अनेक लोग मौजूद थे।
अकरम हुसैन क़ादरी
रिसर्च स्कॉलर
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

गुजरात में न्यूरिया के लोगो की दर्द भरी दास्तान - अकरम हुसैन क़ादरी

आखिर कोई भी इंसान क्यो अपनी पैदायशी सरज़मी छोड़ता है यह एक सोचने, समझने और ध्यान देने का मुकाम ज़रूर है लेकिन पहले इस बात का भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि आखिर यह सब मजबूरियां क्यो और कैसे पैदा हुई जिसकी वजह से आज न्यूरिया की आधी आबादी गुजरात मे जा बसी है वहां उनकी केवल पेट की आग तो बुझ रही है उसके अलावा ना वहां पर उनके रिश्ते मजबूत हो रहे है और ना ही उनके बच्चों को ज़रूरी तालीम मिल पा रही है जोकि आने वाले वक्त की ज़रूरी मांग भी है अगर हम यह मांग पूरी नही कर सके तो हो सकता है आने वाले वक्त में कस्बे में तालीम का स्तर और ज्यादा गिर जाएगा क्योंकि जो आधी आबादी गुजरात मे बसी है वहां पर वो सुबह को कारखानों में निकल जाते है और देर शाम को घर पर लौटते है जिसकी वजह से ना ही उनको किसी तालीम का इंतेज़ाम है और ना ही माँ बाप के प्यार के मुस्तहिक़ हो पाते है बल्कि उनके अंदर अकेलापन, मायूसी और अपने पैदायसी वतन की मोहब्बत उनको ज़हनी तौर पर खूब परेशान करती है जिससे वो डिप्रेशन का शिकार हो जाते है और बुरी आदतों की गिरफ्त में आ जाते है जैसे सिगरेट, गुटखा, मावा और उससे आगे शराब के भी आदी हो जाते है दूसरी सबसे बड़ी वजह उनके पास मजदूरी का पैसा भी होता है जो उनको इन सब कामो में धकेलने में एक अहम रोल अदा करता है, आखिर ऐसा क्या होना चाहिए कि न्यूरिया में इनको दोबारा से वापस लाया जाए जिससे बच्चों का बचपन, लकड़पन, अपनापन, पैदाइशी जगह से मोहब्बत बरकरार रख सके, बुज़ुर्गो की शफ़क़्क़त, रिश्तेदारों का अपनापन फिर से मिल सके उसके लिए न्यूरिया के नेताओ को अब केवल न्यूरिया में फैक्ट्रीयां लाने का काम सोचना होगा जो पहले खो चुके है उसको भूलकर नई पहल शुरू करनी होगी फिर से न्यूरिया को ज़मीदारों की न्यूरिया बनाना होगा जिससे सभी धर्म, जाति के लोग एक होकर न्यूरिया को आगे की तरफ तरक़्क़ी करवा सके।

आजकल रोड, सड़क, गेट बनाकर आप उसको तरक़्क़ी नही कह सकते, बल्कि तरक़्क़ी उसको कहते है जब आपके यहाँ से ज्यादा से ज्यादा लड़के तालीम हासिल करें, अच्छे से अच्छे ओहदों पर पहुंचे वो लोग भी वापस आ जाये जो पेट की मजबूरी में मजदूरी कर रहे है उनके बच्चों को अच्छी, सस्ती तालीम मिल सके

बुज़ुर्गो का वक़्त तो अमूमन जा चुका है अब वक्त है हमे अपने मुस्तकबिल (भविष्य) के बारे में सोचना चाहिए न्यूरिया के बारे में सोचना चाहिए, जागो अब वक्त आ चुका है वरना वो वक़्त दूर नही है तुम्हे लोग कुचल के आगे निकल जाएंगे तुम लोग चन्द गुण्डे नेताओ के चंगुल में फंसे के फंसे रह जाओगे, जो तुम्हे चुनाव के वक़्त चाय, नाश्ता तो खूब कराएंगे दो, चार वक़्त का खाना भी खिला देंगे लेकिन आपका और आपके बच्चों का भविष्य ख़राब कर देंगे .....न्यूरिया को बचाइए, पढा लिखा शरीफ इंसान लाइये जो आपके हक़ और हुक़ूक़ की बात करे .....आपको तरक़्क़ी की नई राह पर ले जाये .....

जय हिंद

अकरम हुसैन क़ादरी

रिसर्च स्कॉलर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

2 बजकर 38 मिनट पर क्यों ठहर जाती है बरेली - अकरम क़ादरी, मीनू बरकाती

2 बजकर 38 मिनट पर क्यो ठहर जाती है बरेली- अकरम क़ादरी, मीनू बरकाती

आँसमां मे सूरज की किरणें फैलने के साथ ही पुरा शहर ए बरेली उर्स-ए-रजवी के रंग मे रंग जाता है। पुरा शहर आला हजरत की अकींदत मे सराबोर नजर आ रहा था।बुद्धवार को आला हजरत के उर्स की आखिरी रस्म अदा की गई।
इमाम अहमद रजा फाजिले बरेलवी के कुल शरीफ पर बुधवार को शहर में जायरीन का सैलाब उमड़ पड़ा। लाखों की संख्या में जायरीन ने कुल शरीफ में शरीक होकर आशिके रसूल आला हजरत को खिराज-ए-अकीदत पेश की। इस्लामियां मैदान और मथुरापुर स्थित इस्लामिक स्टडी सेंटर में कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। शहर के चारों तरफ आला हजरत जिंदाबाद के नारों की गूंज सुनाई दी। कुल की रस्म शुरू हुई तो जो जहां था वहीं दुआ के लिए हाथ उठाकर खड़ा हो गया। शहर की सड़कें जाम हो गईं। कुल के बाद उलेमा ने मुल्क में अमन, चैन और कौम की सलामती की दुआ मांगी। उर्स को लेकर सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम काफी चाक चौबन्ध किए गए। काफी पुलिस, पीएसी, आरएएफ और प्रशासनिक अमला तैनात रहा।
इस्लामियां मैदान और मथुरापुर स्थित इस्लामिक स्टडी सेंटर पर बुधवार को आला हजरत के कुल का नजारा देखने लायक था। दोनों तरफ के मार्गों पर हजारों की तादाद में लोग मौजूद रहे। दोपहर 02:38 बजे पर कुल शरीफ की रस्म शुरू हुई। उर्स के मंच से आतंकवाद के खात्मे को लेकर अपील की गई। इसके अलावा सूफी विचारधारा को अपनाने, दुनिया में शांति के प्रयास, खानकाह, मजार और दरगाहों और मसलके आला हजरत से मजबूती के साथ जुड़ने का संदेश दिया। मुल्क में फैलती नफरत को खत्म करने और वोटों की राजनीति से होने वाले नुकसान पर चर्चा की गई।
कुरान की तिलावत, मीलाद-ए-पाक और नात ओ-मनक़ब्त का नजराना पेश करने के बाद सज्जादनशीन मौलाना अहसन रजा खां कादरी ने मुल्क में अमन चैन के साथ मुसलमानों के मसाइल हल करने और मसलके आला हजरत पर चलने की तौफीक अता फरमाने की दुआ की। देश विदेश से आए उलेमा ने जायरीन को खिताब करते हुए आला हजरत के जीवन पर रोशनी डाली। आखिर में तमाम लोग दरगाह प्रमुख और सज्जादानशीन के मुरीद हुए कुल शरीफ की आखिरी रस्म अदा करने के बाद मुल्क अमन के लिये दुआ की गई।
इस बार उर्स ए आला हजरत मे लगभग चालीस लाख लोग पंहुचे बरेली शरीफ जिससे पुरा शहर जाम नजर आ रहा था।

जय हिंद
हिंदुस्तान ज़िन्दाबाद......