रविवार, 23 अप्रैल 2017

देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने का श्रेय अगर किसी प्रदेश को है तो वो उत्तर प्रदेश को ही है जिसने अपने शहरो से प्रधानमंत्री जिताकर दिल्ली की सत्ता में बैठाए है।  लगभग 17 साल पहले जिस नेता ने अपने जादू से देश के हीरा व्यापारी राज्य गुजरात से मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब देखा था जब उसको अपने प्रधानमंत्री बनने के सपने को पूरा करना होता है तो वो श्रद्धा और आस्था के शहर उत्तर प्रदेश के काशी में आता है रिकॉर्ड वोट से जीतकर दिल्ली पर काबिज़ हो जाता है।
कांग्रेस के बुरे हालात और परफॉर्मेन्स को देखते हुए किसी भी विद्वान और राजनैतिक एनिमल को नही लगता है कि कांग्रेस फिर से दिल्ली की सत्ता तक पहुँच पाएगी जबकि आजकल पोलिटिकल एनिमलस को महसूस हो रहा है कि कहीं न कहीं मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ 2019 तक पहुँचते पहुँचते कम हो जाएगा और योगी आदित्यनाथ एक मज़बूत कैंडिडेट के रूप में नज़र आएंगे उनको देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के लिए बीजेपी की मातृ संस्था आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू महासभा ने काफी जोर लगाया उसके बाद उनकी खुद की सेना हिन्दू दुर्गा वाहिनी का भी सहयोग उनके साथ पहले से ही था।फिर काफी मंथन करने के बाद योगी को उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने अपनी पार्टी के विधायक दल की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया और जैसे ही आनन फानन में योगी जी ने शपथ लेने से ही पहले मुख्य अधिकारियो को निर्देश जारी कर दिए कि उनके समर्थक अति उत्साह में आकर कहीं राज्य की कानून व्यवस्था के खिलाफ कोई ऐसा काम ना करदे जिससे उनका प्रदेश में आने से ही पहले कुछ अशुभ ना हो जाए। शपथ लेने  से पहले ही इतनी चाकचौबंद व्यवस्था से तो लगता है कि योगी आदित्यनाथ की मंशा ज़ाहिर है वो कानून व्यवस्था के साथ कोई खिलवाड़ नही होने देंगे और “सबका साथ सबका विकास” को यथार्थ करके, प्रदेश में भृष्टाचार, ठगी, बलात्कार, बहुजनो और अल्पसंख्यको को साथ लेकर गुड गवर्नेन्स के संकेत देंगे और जो कहा है उसको करके दिखाएंगे ।
कुछ मीडिया चैनलो पर खबर चल रही है योगी जी ने दूसरे दिन ही ब्यूरोक्रेट्स को अपनी पार्टी का घोषणा पत्र थमा दिया और उनको कड़े शब्दों में कहा कि मुझे इसको पूरा करके दो बस ??? दूसरी तरफ उन्होंने इलाहाबाद के दो अवैध बूचड़खाने बन्द करवा दिए। जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि जिन मुद्दों पर नरेंद्र मोदी फेल नज़र आये है उन मुद्दों पर योगी आदित्यनाथ खरे नज़र आएंगे और फिर इस राज्य के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुँचने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे । जो प्रदेश, देश और भारतीय राजनीति के लिए सुनहरा पल साबित हो सकता है और कहीं ना कहीं इस देश को फिर स्वामी विवेकानंद की तर्ज पर कोई गेरुए ( केसरिया) कपड़ो में देश दुनियाँ की धरती पर रिप्रेजेंट करेगा….
अकरम हुसैन क़ादरी

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

यूज़ & थ्रो है आजकल की विचारधारा

यूज़ & थ्रो है आजकल की विचारधारा : मंगलेश डबराल

अलीगढ़। 'प्रोफेसर के. पी. सिंह मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट' के तत्त्वाधान में आयोजित मलखान सिंह सिसोदिया कविता पुरस्कार 2016 के उपलक्ष्य में कवि, आलोचक, शिक्षाविद् मंगलेश डबराल और ट्रस्ट की अध्यक्षा प्रोफेसर नमिता सिंह, पद्मश्री क़ाज़ी अब्दुल सत्तार साहब, उद्भावना पत्रिका के संपादक अजेय कुमार जी, हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर अब्दुल अलीम तथा अमर उजाला के संपादक/कवि अरुण आदित्य जी ने इंजीनियर, वैज्ञानिक, युवा कवि प्रदीप मिश्र को उनके कविता संग्रह "उम्मीद" के लिए शाल, प्रमाण पत्र, प्रतीक चिन्ह और सहायता राशि देकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के आर्ट्स फैकल्टी लॉन्ज में सम्मानित किया। जिसमेें सभी विद्वानों ने अपने-अपने विचार रखे । मुख्य अतिथि के तौर पर कवि मंगलेश डबराल ने वर्तमान देश की स्थिति, नैतिक मूल्यों का हनन, साम्प्रदायिकता, विस्थापन, शिक्षा जैसे अनेक गम्भीर मुद्दों पर अपने विचार रखे जिसमें उन्होंने आज के युवाओं की स्मृति का हाशिये पर चले जाना और उससे ह्रदय से निकलती कविता की पंक्तियों के लोप पर एक गंभीर चिंतन व्यक्त किया और कहीं ना कहीं इसके लिए तकनीक को ज़िम्मेदार माना जिसकी वजह से देश मेें भूमंडलीकरण, साम्प्रदायिकता, बाज़ारीकरण का प्रभाव देखने को मिल रहा है. चर्चा करते हुए उन्होंने आगे कहा कि यह समय " ऐज ऑफ फॉरगेटिंग" के दौर से भी गुज़र रहा है. कवि ने अपने शहर टिहरी गढ़वाल का भी ज़िक्र किया और बताया कि तीस सालों में जो नष्ट हुआ है उसको केवल कविता, आलेख या कथा साहित्य में ही देखा जा सकता है क्योंकि इस तकनीकी दौर ने हमारी स्मृतियों को हमसे छीन लिया है जबकि जितनी भी हिन्दी साहित्य में  कालजयी कविताएँ हैं वे स्मृतियों पर ही आधारित हैं, स्मृतियों से ही कल्पनाशक्ति आती है. जब स्मृति ही नहीं होगी तो फिर कहाँ से कल्पनाशक्ति आएगी और कहां से हम देश, 

दुनिया, मानवता के लिए दूरदर्शितापूर्ण सोच रख सकेंगे ? 1992 विध्वंस और 2014 के बाद पनपे हालात पर अपने पुरस्कार वापसी के सिलसिले में बोलते हुए कवि ने कहा कि नई मनुष्यता और विकृतियों का समय है. बाज़ारीकरण, साम्राज्यवादी ताकतों में शुमार अमेरिका हमारे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनाने में भी उत्प्रेरक का काम कर रहा है।

विशिष्ट अतिथि के तौर पर "उद्भावना" पत्रिका के सम्पादक अजेय कुमार जी ने चंद शब्दों में बहुत बड़ी सोच का परिचय देते हुए बताया कि आजकल देशभर में मंदिर मस्जिद के नाम पर लाखों करोड़ों लोग घर से बाहर निकल आते हैं लेकिन सामाजिक कार्यों, संगोष्ठियों में इतनी भीड़ नहीं दिखती है, मतलब साफ है लोगों को धर्म दिखता है लेकिन कहीं ना कहीं मानवता खतरे में जा रही है वो नहीं दिखता, दूसरी तरफ छद्म राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, जैसे अनेक मुद्दों पर राजनैतिक पार्टियों को खूब लाभ हो रहा है तो वो क्यों ऐसे संगोष्ठी की ओर मंच मुहैया कराएँ जिससे उनकी सत्ता की कुर्सी छिनती नज़र आये, आजकल ज्यादातर लोग समझते हैं कि विचारधारा अनुभव की  रिप्लेसमेंट है जबकि ऐसा नहीं है. विचारधारा आजकल यूज़ एंड थ्रो हो गयी है. जब तक मर्ज़ी चाहे इस्तेमाल करो और जब मर्ज़ी चाहे फेंक दो. जबकि किसी भी गंभीर व्यक्तित्त्व में विचारधारा का होना बहुत आवश्यक है।

पुरस्कृत कवि प्रदीप मिश्र जी ने कुछ स्मृतियों के बारे में प्रोफेसर कुंवरपाल सिंह को रेखांकित करते हुए कहा कि " क़ब्र को खोदोगे तो हड्डियां ही उछलेंगी" कहने का तात्पर्य था कि जिस प्रकार से देश में अस्थिरता की स्थिति को उत्त्पन्न किया जा रहा है उससे केवल आपसी मनमुटाव ही बढे़गा और मानवता खतरे में चली जायेगी हमें मनुष्यता और विकास के बारे में सोचकर आगे बढ़ना चाहिए जिससे देश तरक़्क़ी के नए प्रतिमान स्थापित करेगा और मानवता की सही से सेवा हो पाएगी। 

कार्यक्रम के अंत में पुरस्कृत कवि ने अपने कविता संग्रह से कुछ कविताओं का पाठ किया जिससे उपस्थित शिक्षकगण, शोधार्थी, अतिथिगण वाह-वाह कहने से नहीं रोक पाए. कार्यक्रम में उपस्थित अरुण आदित्य जी ने भी काव्य पाठ किया. कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर राजीवलोचन नाथ शुक्ल ने किया और अंत में पधारे बुद्धिजीवियों का धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर नमिता सिंह जी ने किया।

         प्रस्तुति 
अकरम हुसैन क़ादरी 
शोधार्थी हिंदी विभाग 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
(अलीगढ़)

ईमेल- akramhussainqadri@gmail.com

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

देश की वर्तमान पत्रकारिता

आजकल देश मे राजनीति के प्रचार प्रसार का सबसे सशक्त माध्यम मीडिया बन चुका है जिसमे सोशल मीडिया की भी अहम भूमिका है जिसको राजनेता अपने अपने तरीके से अपना प्रचार प्रसार करते है पहले विज्ञापन के ही समय विज्ञापन आता था लेकिन कुछ समय से न्यूज़ रूम में बैठा एंकर भी किसी भी पार्टी का प्रचार करता रहता है, या तो वो सवाल वो करता है जो सत्तारूढ़ पार्टी को लाभ पहुंचाए ओर विपक्षी को को नुकसान या तो फिर किसी ऐसी धर्मगत, जातिगत सवालो में उलझा देता है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी एक पार्टी के लिए लाभकारी सिध्द होता है उदाहरण देने की आवश्यकता शायद अब बची नही है, मैन स्ट्रीम मीडिया भी ऐसे मुद्दों पर बहस कराना चाहती है जिससे समाज से सरोकार तो होता नही है लेकिन वो पार्टी के लिए लाभकारी होता है । जिस प्रकार से मीडिया का स्तर लगातार गिर रहा है उससे यह सिद्ध होता है कि किस प्रकार देश के महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की परंपरा पर देश के चंद रसूखदार नेताओ ने सेंध मारी है जो आज उनके वफादार कुत्ते बने थे है और देश और मानवता के लिए कोई ऐसे सवाल ही नही करते है जिनको उनको देने में दिक्कत आये........
अगर देश को बचाना है तो गणेश शंकर विद्यार्थी को फिर से ज़िंदा करके देश के वर्तमान पत्रकारों को उनके बारे में बताना बेहद ज़रूरी है

#अकरम_हुसैन_क़ादरी

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

कृष्ण भक्ति काव्यधारा की प्तमुख विशेषताएं

ष्ण भक्ति काव्यधारा की प्रमुख विशेषतायें

भारतीय धर्म और संस्कृति के इतिहास में कृष्ण सदैव एक अद्भुत व विलक्षण व्यक्तित्व माने जाते रहें है| हमारी प्राचीन ग्रंथों में यत्र – तत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है जिससे उनके जीवन के विभिन्न रूपों का पता चलता है|
यदि वैदिक व संस्कृत साहित्य के आधार पर देखा जाए तो कृष्ण के तीन रूप सामने आते है –
१. बाल व किशोर रूप, २. क्षत्रिय नरेश, ३. ऋषि व धर्मोपदेशक |
श्रीकृष्ण विभिन्न रूपों में लौकिक और अलौकिक लीलाएं दिखाने वाले अवतारी पुरूष हैं | गीता, महाभारत व विविध पुराणों में उन्ही के इन विविध रूपों के दर्शन होतें हैं |
कृष्ण महाभारत काल में ही अपने समाज में पूजनीय माने जाते थे | वे समय समय पर सलाह देकर धर्म और राजनीति का समान रूप से संचालन करते थे | लोगों में उनके प्रति श्रद्या और आस्था का भाव था | कृष्ण भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा – कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाकर वॄहद काव्य सॄजन किया। इस काव्यधारा की प्रमुख विशेशतायें इस प्रकार है–
१. राम और कृष्ण की उपासना
समाज में अवतारवाद की भावना के फलस्वरूप राम और कृष्ण दोनों के ही रूपों का पूजन किया गया |
दोनों के ही पूर्ण ब्रह्म का प्रतीक मानकर, आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया |
किंतु जहाँ राम मर्यादा पुरषोत्तम के रूप में सामने आते हैं, बही कृष्ण एक सामान्य परिवार में जन्म लेकर सामंती
अत्याचारों का विरोध करते हैं | वे जीवन में अधिकार और कर्तव्य के सुंदर मेल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं |
वे जिस तन्मयता से गोपियों के साथ रास रचाते हैं , उसी तत्परता से राजनीति का संचालन करते हैं या फ़िर महाभारत के युद्ध भूमि में गीता उपदेश देते हैं |
इस प्रकार से राम व कृष्ण ने अपनी अपनी चारित्रिक विशेषताओं द्वारा भक्तों के मानस को आंदोलित किया |
२. राधा-कृष्ण की लीलाएं
कृष्णा – भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा – कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाया |
श्रीमदभागवत में कृष्ण के लोकरंजक रूप को प्रस्तुत किया गया था |
भागवत के कृष्ण स्वंय गोपियों से निर्लिप्त रहते हैं |
गोपियाँ बार – बार प्रार्थना करती है , तभी वे प्रकट होतें हैं जबकि हिन्दी कवियों के कान्हा एक रसिक छैला बनकर गोपियों का दिल जीत लेते है |
सूरदास जी ने राधा – कृष्ण के अनेक प्रसंगों का चित्रण ककर उन्हें एक सजीव व्यक्तित्व प्रदान किया है |
हिन्दी कवियों ने कृष्ण ले चरित्र को नाना रूप रंग प्रदान किये हैं , जो काफी लीलामयी व मधुर जान पड़ते हैं |
३. वात्सल्य रस का चित्रण
पुष्टिमार्ग प्रारंभ हुया तो बाल कृष्ण की उपासना का ही चलन था | अत : कवियों ने कृष्ण के बाल रूप को पहले पहले चित्रित किया |
यदि वात्सल्य रस का नाम लें तो सबसे पहले सूरदास का नाम आता है, जिन्हें आप इस विषय का विशेषज्ञ कह सकते हैं | उन्होंने कान्हा के बचपन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियाँ भी ऐसी चित्रित की है, मानो वे स्वयं वहाँ उपस्थित हों |
मैया कबहूँ बढेगी चोटि ?
किनी बार मोहिं ढूध पियत भई , यह अजहूँ है छोटी |
सूर का वात्सल्य केवल वर्णन मात्र नहीं है | जिन जिन स्थानों पर वात्सल्य भाव प्रकट हो सकता था , उन सब घटनाओं को आधार बनाकर काव्य रचना की गयी है | माँ यशोदा अपने शिशु को पालने में सुला रही हैं और निंदिया से विनती करती है की वह जल्दी से उनके लाल की अंखियों में आ जाए |
जसोदा हरी पालनै झुलावै |
हलरावै दुलराय मल्हरावै जोई सोई कछु गावै |
मेरे लाल कौ आउ निंदरिया, काहै मात्र आनि सुलावै |
तू काहे न बेगहि आवे, तो का कान्ह बुलावें |
कृष्णा का शैशव रूप घटने लगता है तो माँ की अभिलाषाएं भी बढ़ने लगती हैं | उसे लगता है की कब उसका शिशु उसका शिशु उसका आँचल पकड़कर डोलेगा | कब, उसे माँ और अपने पिता को पिता कहके पुकारेगा , वह लिखते है –
जसुमति मन अभिलाष करै,
कब मेरो लाल घुतरुवनी रेंगै, कब घरनी पग द्वैक भरे,
कब वन्दहिं बाबा बोलौ, कब जननी काही मोहि ररै ,
रब घौं तनक-तनक कछु खैहे, अपने कर सों मुखहिं भरे
कब हसि बात कहेगौ मौ सौं, जा छवि तै दुख दूरि हरै|
सूरदास ने वात्सल्य में संयोग पक्ष के साथ – साथ वियोग का भी सुंदर वर्णन किया है | जब कंस का बुलावा लेकर अक्रूर आते हैं तो कृष्ण व बलराम को मथुरा जाना पङता है | इस अवसर पर सूरदास ने वियोग का मर्म्स्पर्सी
चित्र प्रस्तुत किया है | यशोदा बार बार विनती करती हैं कि कोई उनके गोपाल को जाने से रोक ले |
जसोदा बार बार यों भारवै
है ब्रज में हितू हमारौ, चलत गोपालहिं राखै
जब उधौ कान्हा का संदेश लेकर आते हैं, तो माँ यशोदा का हृदय अपने पुत्र के वियोग में रो देता है, वह देवकी को संदेश भिजवाती हैं |
संदेस देवकी सों कहियो।
हों तो धाय तिहारे सुत की कृपा करत ही रहियो||
उबटन तेल तातो जल देखत ही भजि जाने
जोई-चोर मांगत सोइ-सोइ देती करम-करम कर न्हाते |
तुम तो टेक जानतिही धै है ताऊ मोहि कहि आवै |
प्रात: उठत मेरे लाड लडैतहि माखन रोटी भावै |
४. श्रृंगार का वर्णन
कृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण व गोपियों के प्रेम वर्णन के रूप में पूरी स्वछंदता से श्रृंगार रस का वर्णन किया है | कृष्ण व गोपियों का प्रेम धीरे – धीरे विकसित होता है | कृष्ण , राधा व गोपियों के बीच अक्सर छेड़छाड़ चलती रहती है –
तुम पै कौन दुहावै गैया
इत चितवन उन धार चलावत, यहै सिखायो मैया |
सूर कहा ए हमको जातै छाछहि बेचनहारि |
कवि विद्यापति ने कृष्ण के भक्त-वत्सल रूप को छोड़ कर शृंगारिक नायक वाला रूप ही चित्रित किया है |
विद्यापति की राधा भी एक प्रवीण नायिका की तरह कहीं मुग्धा बनाती है , तो कभी कहीं अभिसारिका | विद्यापति
के राधा – कृष्ण यौवनावस्था में ही मिलते है और उनमे प्यार पनपने लगता है |
प्रेमी नायक , प्रेमिका को पहली बार देखता है तो रमनी की रूप पर मुग्ध हो जाता है |
सजनी भलकाए पेखन न मेल
मेघ-माल सयं तड़ित लता जनि
हिरदय सेक्ष दई गेल |
हे सखी ! मैं तो अच्छी तरह उस सुन्दरी को देख नही सका क्योंकि जिस प्रकार बादलों की पंक्ति में एका एअक
बिजली चमक कर चिप जाती है उसी प्रकार प्रिया के सुंदर शरीर की चमक मेरे ह्रदय में भाले की तरह उतर गयी
और मै उसकी पीडा झेल रहा हूँ |
विद्यापति की राधा अभिसार के लिए निकलती है तो सौंप पाँव में लिप्त जाता है | वह इसमे भी अपना भला
मानती है , कम से कम पाँव में पड़े नूपुरों की आवाज़ तो बंद हो गयी |
इसी प्राकार विद्यापति वियोग में भी वर्णन करते हैं | कृष्ण के विरह में राधा की आकुलता , विवशता ,
दैन्य व निराशा आदि का मार्मिक चित्रण हुया है |
सजनी, के कहक आओव मधाई |
विरह-पयोचि पार किए पाऊव, मझुम नहिं पति आई |
एखत तखन करि दिवस गमाओल, दिवस दिवस करि मासा |
मास-मास करि बरस गमाओल, छोड़ लूँ जीवन आसा |
बरस-बरस कर समय गमाओल, खोल लूं कानुक आसे |
हिमकर-किरन नलिनी जदि जारन, कि कर्ण माधव मासे |
इस प्रकार कृष्ण भक्त कवियों ने प्रेम की सभी अवस्थाओं व भाव-दशाओं का सफलतापूर्वक चित्रण किया है |
५. भक्ति भावना
यदि भक्त – भावना के विषय में बात करें तो कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास , कुंमंदास व मीरा का नाम उल्लेखनीय है |
सूरदासजी ने वल्लभाचार्य जी से दीक्षा ग्रहण कर लेने के पूर्व प्रथम रूप में भक्ति – भावना की व्यंजना की है |
नाथ जू अब कै मोहि उबारो
पतित में विख्यात पतित हौं पावन नाम विहारो||
सूर के भक्ति काव्य में अलौकिकता और लौकितता , रागात्मकता और बौद्धिकता , माधुर्य और वात्सल्य सब मिलकर एकाकार हो गए हैं |
भगवान् कृष्ण के अनन्य भक्ति होने के नाते उनके मन से से सच्चे भाव निकलते हैं | उन्होंने ही भ्रमरनी परम्परा को नए रूप में प्रस्तुत किया | भक्त – शोरोमणि सूर ने इसमे सगुणोपासना का चित्रण , ह्रदय की अनुभूति के आधार पर किया है |
अंत में गोपियों अपनी आस्था के बल पर निर्गुण की उपासना का खंडन कर देती हैं |
उधौ मन नाहिं भए दस-बीस
एक हुतो सो गयो श्याम संग
को आराधै ईश |
मीराबाई कृष्ण को अपने प्रेमी ही नही , अपितु पति के रूप में भी स्मरण करती है | वे मानती
है कि वे जन्म – जन्म से ही कृष्ण की प्रेयसी व पत्नी रही हैं | वे प्रिय के प्रति आत्म – निवेदन व उपालंभ के रूप
में प्रणय – वेदना की अभिव्यक्ति करती है |
देखो सईयां हरि मन काठ कियो
आवन कह गयो अजहूं न आयो, करि करि गयो
खान-पान सुध-बुध सब बिसरी कैसे करि मैं जियो
वचन तुम्हार तुमहीं बिसरै, मन मेरों हर लियो
मीरां कहे प्रभु गिरधर नागर, तुम बिन फारत हियो |
भक्ति काव्य के क्षेत्र में मीरा सगुण – निर्गुण श्रद्धा व प्रेम , भक्ति व रहस्यवाद के अन्तर को भरते हुए , माधुर्य
भाव को अपनाती है | उन्हें तो अपने सांवरियां का ध्यान कराने में , उनको ह्रदय की रागिनी सुनाने व उनके सम्मुख नृत्य करने में ही आनंद आता है |
आली रे मेरे नैणां बाण पड़ीं |
चित चढ़ी मेरे माधुरी मुरल उर बिच आन अड़ी |
कब की ठाढ़ी पंछ निहारूं अपने भवन खड़ी |
६. ब्रज भाषा व अन्य भाषाओं का प्रयोग
अनेक कवियों ने निःसंकोच कृष्ण की जन्मभूमि में प्रचलित ब्रज भाषा को ही अपने काव्य में प्रयुक्त किया। सूरदास व नंददास जैसे कवियों ने भाषा के रूप को इतना निखार दिया कि कुछ समय बाद यह समस्त उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा बन गई।
यद्यपि ब्रज भाषा के अतिरिक्त कवियों ने अपनी-अपनी मातृ भाषाओं में कृष्ण काव्य की रचना की। विद्यापति ने मैथिली भाषा में अनेक भाव प्रकट किए।
सप्ति हे कतहु न देखि मधाई
कांप शरीर धीन नहि मानस, अवधि निअर मेल आई
माधव मास तिथि भयो माधव अवधि कहए पिआ गेल।
मीरा ने राजस्थानी भाषा में अपने भाव प्रकट किए।
रमैया बिन नींद न आवै
नींद न आवै विरह सतावै, प्रेम की आंच हुलावै।
प्रमुख कवि
महाकवि सूरदास को कृष्ण भक्त कवियों में सबसे ऊँचा स्थान दिया जाता है। इनके द्वारा रचित ग्रंथों में “सूर-सागर”, “साहित्य-लहरी” व “सूर-सारावली” उल्लेखनीय है। कवि कुंभनदास अष्टछाप कवियों में सबसे बड़े थे, इनके सौ के करीब पद संग्रहित हैं, जिनमें इनकी भक्ति भावना का स्पष्ट परिचय मिलता है।
संतन को कहा सींकरी सो काम।
कुंभनदास लाल गिरधर बिनु और सवै वे काम।
इसके अतिरिक्त परमानंद दास, कृष्णदास गोविंद स्वामी, छीतस्वामी व चतुर्भुज दास आदि भी अष्टछाप कवियों में आते हैं किंतु कवित्व की दृष्टि से सूरदास सबसे ऊपर हैं।
राधावल्लभ संप्रादय के कवियों में “हित-चौरासी” बहुत प्रसिद है, जिसे श्री हित हरिवंश जी ने लिखा है। हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में मीरा के अलावा बेलिकिशन रुक्मिनी के रचयिता पृथ्वीराज राठौर का नाम भी उल्लेखनीय है।
कृष्ण भक्ति धारा के कवियों ने अपने काव्य में भावात्मकता को ही प्रधानता दी। संगीत के माधुर्य से मानो उनका काव्य और निखर आया। इनके काव्य का भाव व कला पक्ष दोनों ही प्रौढ़ थे व तत्कालीन जन ने उनका भरपूर रसास्वादन किया। कृष्ण भक्ति साहित्य ने सैकड़ो वर्षो तक भक्तजनो का हॄदय मुग्ध किया । हिन्दी साहित्य के इतिहास मे कृष्ण की लीलाओ के गान, कृष्ण के प्रति सख्य भावना आदि की दॄष्टि से ही कृष्ण काव्य का महत्व नही है, वरन आगे चलकर राधा कृष्ण को लेकर नायक नायिका भेद , नख शिख वर्णन आदि की जो परम्परा रीतिकाल में चली , उस के बीज इसी काव्य मे सन्निहित है।रीतिकालीन काव्य मे ब्रजभाषा को जो अंलकॄत और कलात्मक रूप मिला , वह कृष्ण काव्य के कवियों द्वारा भाषा को प्रौढ़ता प्रदान करने के कारण ही संभव हो सका।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

300 दिनों में 600 साम्प्रदायिक दंगे मोदी युग


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600 Communal Violence Incidents in 300 Days of Modi Govt

Rights activist and Christian community leader Dr John Dayal addresses the day-long sit in against growing attacks on minorities under the Modi government that completed 300 days in power. Image credit Mukul Dube
Rights activist and Christian community leader Dr John Dayal addresses the day-long sit in in New Delhi against growing attacks on minorities under the Modi government that completed 300 days in power. Image: Mukul Dube
NEW DELHI – Several social and human rights organizations and political parties held a day-long sit-in near Parliament House here Thursday to protest rise in attacks on minorities since BJP came to power and Narendra Modi became Prime Minister of the country in May 2014. The protest demonstration was organized on the occasion of completion of 300 days of the Modi government at the center, reports indiatomorrow.net.
“Human Rights and Civil Society groups have documented at least 43 deaths in over 600 cases of violence, 149 targeting Christians and the rest Muslims, have taken place in 2014 in India till March this year, marking 300 days of the National Democratic Alliance government of Mr. Narendra Modi,” said eminent rights activist and Christian leader Dr. John Dayal while speaking at the event.
He further said: “The Christian Persecution data lists 168 cases. An analysis of the Christian data alone shows Chhattisgarh topping the list with 28 incidents of crime, followed closely by neighboring Madhya Pradesh with 26, Uttar Pradesh with 18 and Telangana, a new state carved out of Andhra Pradesh, with 15 incidents. The rape of the aged Catholic Nun in a Convent and School in Ranaghat in West Bengal, is the most horrendous crime reported in the first quarter of 2015,” he said.
“The 300 days have also seen an assault on democratic structures, the education and knowledge system, Human Rights organizations and Rights Defenders and coercive action using the Intelligence Bureau and the systems if the Foreign Contributions Regulation Act and the Passport laws to crack down on NGOs working in areas of empowerment of the marginalized sections of society, including Dalits, Tribals, Fishermen and women, and issues of environment, climate, forests, land and water rights,” said the organizers in a detailed report.
They alleged that Prime Minister Narendra Modi refuses to reprimand his Cabinet colleagues, restrain the members of his party members or silence the Sangh Parivar which claims to have propelled him to power in New Delhi.
Eminent politicians who address the event included Ajay Makan of Congress, Raghuvansh Yadav of RJD and Ali Anwar Ansari of JDU. Eminent social activists to address the gathering were Shabnam Hashmi, Ram Puniyani and Navaid Hamid.

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

टॉलरेंस

वीविल नॉट टॉलरेट इन्टॉलरेन्सश् भारत में हाल में जो हालत बने हैं उससे संबंधित एक सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री जी ने लंदन में कहा। उन्होने यह भी कहा कि भारत बुद्ध और गांधी का देश है। मोदी शायद यह नही कहना चाहेंगे कि भारत हेडगेवार या सावरकर का देश है या फिर ये कि भारत तो परशुराम का देश है। इनके नाम से सहिष्णुता के प्रचार पर बट्टा लग जाएगा। लेकिन जिस संगठन के वे प्रचारक रहे हैं वो तो हेडगेवार को ही अपना आदर्श मानता है। प्रधानमंत्री जी झंडेवालां या नागपुर में संघ के दफ़्तर में भी क्या ये समझाना चाहेंगे कि भारत बुद्ध और गांधी का देश है।
प्रधानमंत्री जी के इस लंदन बयान से ठीक पहले गिरीश कर्नाड को हत्या की धमकी मिली क्योंकि उन्होने यह कह दिया था कि बंगलौर हवाई अड्डे का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जा सकता है। कर्नाड को माफी मांगनी पड़ी। प्रोण् कलबुर्गी की हत्या के बाद कर्नाड को अंदाजा है कि यहां क्या हो सकता है। इससे कुछ दिन पहले ही एक भाजपा नेता ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री का सर कलम कर उससे फुटबॉल खेलने की धमकी दी क्योंकि मुख्यमंत्री जी ने कहा था बीफ खाना उनका अधिकार है। इस तरह और भी उदाहरणों की कोई कमी नही है। लेकिन शायद ये प्रधानमंत्री जी के लिए असहिष्णुता की श्रेणी में नही आते हैं क्योंकि इस तरह की धमकियां देने वालों के खिलाफ़ न प्रधानमंत्री की तरफ से न उनकी पार्टी से और न ही पार्टी के आका संगठन ;यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघद्ध की तरफ से कार्यवाही तो दूर भत्र्सना का कोई बयान ही आया। बल्कि इसके उलट बिहार चुनाव में खुद प्रधानमंत्री ने अपनी शैली में बड़े सहिष्णुतापूर्ण बयान दिए।
संभवत: यह पहली बार हुआ है कि विदेश में किसी प्रधानमंत्री से देश में सहिष्णुता के बारे में चिंता प्रकट करते हुए सवाल पूछे गए। मोदी भक्त कहीं इसे भी भारत में रहने वाले ष्पाकिस्तानियोंष् की साजिश न करार दें। अभी कुछ दिन पहले अरुण जेटली ने कहा ही था कि कहां है असहिष्णुता! साहित्यकारोंए कलाकारों व बुद्धिजीवियों के भारी विरोध और पुरस्कार.वापसी को जेटली ने सरकार के खिलाफ़ खड़ी की गई एक श्मैनुफ़ैक्चर्ड क्राइसिसश् ;छद्म संकटद्ध भी कहा था।
हजामत मंगलवार को बनाना चाहिए या नहीं इस बात पर कहीं हिंसा हो रही है। कहीं पर गौ.मांस के नाम पर इंसानों की हत्या हो रही है। सरकार के विरोध में बोलने वालों को पाकिस्तानी कहा जा रहा है। हत्या की धमकियां दी जा रही हैं। जेटली के लिए ये संकट नही है। घड़ी.घड़ी सोशल मीडिया पर ष्ट्वीटष् करने वाले प्रधानमंत्री इन घटनाओं पर चुप्पी साधे रहते हैं और बहुत दबाव में मुंह खोलते है तो कहते हैं कि ये तो राज्य सरकार का मामला है। ये सब जेटली की नजर में संकट नही है। संकट तब है जब इसके विरोध में आवाज उठाई जाती है!
लेकिन संकट इतना भर ही नही है। संकट तो ये भी है कि इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री विदेश में बयान देते हैं कि असहिष्णुता के प्रति सहिष्णुता नही बरती जाएगी। बहुत लोग इस तरह के झूठे बयान को शायद संकट की श्रेणी में न रखें। सच बोलने के लिए नेताओं की ख्याति लंबे समय से नही बची है। मोदी जी भला अपवाद क्यों रहें। पंद्रह.पंद्रह लाख रुपए हर खाते में जमा करने के वादे से ये जबसे मुकरे हैं तबसे तो लोगों की रही.सही उम्मीद भी जाती रही है।
भाजपा.संघ समर्थकों का एक बड़ा समूह है जो ये कह रहा है कि इस ष्असहिष्णुताष् में नया क्या है। वो बोल रहे हैं कि इस तरह की घटनाएं तो देश में हमेशा से होती रही हैं फिर अभी इस तरह का विरोध क्यों। ये सब बस मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए हो रहा है। मै ये नही कहूंगा कि ये लोग पूरी तरह गलत हैं। लेकिन बात सिर्फ 1984 के दंगों या कश्मीरी पंडितों की ही क्यों होघ् अगर असहिष्णुता का इतिहास खंगालना ही है तो शुरुआत और पहले होनी चाहिए। तपस्या कर रहे शंबूक की हत्या इसका पुराना उदाहरण है। चार्वाकों का पूरा भौतिकवादी साहित्य ब्राह्मणों ने नष्ट कर दिया ये दूसरा उदाहरण है। ब्राह्मणवादी शासकों द्वारा बौद्धों का बड़े पैमाने पर किया गया संहार एक और उदाहरण है। जाति प्रथा व छुआ.छूत और सती प्रथा दूसरे उदाहरण हैं। मनु.स्मृति तो असहिष्णुता का स्मारक ही है। तो यह तो बिल्कुल सही है कि असहिष्णुता इस देश के लिए नई घटना नही है।
लेकिन ये सिर्फ एक तिहाई सच है पूरा सच नही। बाकी एक तिहाई सच ये है कि इस असहिष्णुता के खिलाफ़ आवाज पहले भी उठी है। शंबूक की हत्या को दर्ज करने वाला भी तो साहित्यकार ही था। ब्राह्मणवादी असहिष्णुता के खिलाफ़ आवाज उठाने वाले कवियों और दार्शनिकों की तो समृद्ध परंपरा ही रही है देश में। हमारे आधुनिक साहित्यकारों ने इस परंपरा को और समृद्ध किया है। औपनिवेशिक शासन के खिलाफ़ उभरे राष्ट्रीय आंदोलन में साहित्यकार व बुद्धिजीवी मुखर रहे हैं। आज़ादी के बाद भी देश के साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों के बड़े हिस्से की आवाज़ सामाजिक विसंगतियों और सत्ता के प्रतिपक्ष की ही रही है। तो ये कहना कि साहित्यकार या बुद्धिजीवी इससे पहले चुप रहे हैं सही नही है।
इस तस्वीर का तीसरा एक तिहाई पक्ष ये भी है कि पिछले कुछ समय से देश में असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली ताकतों को बल मिला है। समाज के वे हिस्से जो पहले दमन या असहिष्णुता के निशाने पर सीधे.सीधे नही थे उनपर भी निशाना साधा गया है। इसकी संगठित शुरुआत शायद एमण् एफ़ण् हुसैन या तसलीमा नसरिन के साथ ही शुरु हो गई थी और उसके बाद ये असहिष्णुता तेजी से आगे बढ़ी है। असहिष्णुता की प्रवृतियों में एक गुणात्मक दुस्साहस पनपा है जिसकी झलक वर्तमान सरकार और संघ गिरोह में देखने को मिल रही है। ये और कुछ नही बल्कि आधुनिक व समतावादी विचारों व आंदोलनों के खिलाफ़ प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवाद का हमला है। मोदी चाहे जो बोलेंए यह याद रखना चाहिए कि ये उस याज्ञवल्क्य का देश है जो गार्गी के सवालों से घबराकर उसका सर फोडऩे की धमकी देते हैं।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

धर्म से षड्यंत्र



                      धर्म से षड्यंत्र
                                                            अकरम हुसैन
वर्षो पुरानी सभ्यता से चली आ रही हमारे देश की संस्कृति तथा उस संस्कृति से हमारे देश में व्याप्त भाई-चारा आपसे मेलभाव तथा एकता का बोलबाला रहा है .हमारी संस्कृति ही है जिससे देश के समस्त नागरिको को एक धागे में माला की तरह पिरोये रखा है हम सब देशवासी एक दुसरे के सुख दुःख में बराबर के भागी रहते थे. क्यूंकि उस समय देश की आर्थिक ,राजनैतिक ,सामाजिक तथा धार्मिक विचारधारा सामान थी ,सभी लोग भिन्न भिन्न धर्मो के होते हुए भी समान सम्मान करते थे .सभी देवी देवताओ को भी आदर की दृष्टी से देखते थे ,मगर पिछले कुछ दशको से देश में षड़यंत्र रचने का कार्य प्रगति पर है और वह इस पूरे देश में कैंसर की भांति फ़ैल रहा है .इस षड्यंत्र के पीछे केबल उनका व्यक्तिगत लाभ ही होता है. आखिर यह कौन लोग है , जो भावनात्मक बातें करके धर्म का व्यापार करते है और धर्म के आधार पर समाज के हर तबके को लूटने का कार्य करते है ,अपना स्वार्थ पूर्ण हो जाने पर यह लोग जनता की आँखों में धूल झोक कर सूक्ष्मदर्शी से भी नहीं दिखाई देते है आखिर कौन लोग है, यह जानने की इच्छा आज हर एक उस नागरिक की है जो देश के संविधान और देश से अटूट प्रेम करता है ,आजकल देश के ज्यादातर भू भाग में धर्म के रंग में रंगे सियार घूम रहे है . वह धर्म जैसे पवित्र नाम को लेकर अपने व्यक्तिगत लाभ को साधने की पुरजोर कोशिश भी कर रहे है जनता की अज्ञानता और भावुकता के कारण यह रंगे सियार कही न कहीं कामयाब भी नज़र आ रहे है .
                       यदि हम इतिहास के कुछ पन्नो को पलटे तो देखते, है कि रावण जैसा व्यक्ति भी इनसे कम बुरा प्रतीत होता है क्यूंकि कहा जाता है रावण अपने दस मुंह से बोलता था .लेकिन हर मुंह से एक ही बात बोलता था मगर आज तथाकथित देशभक्त मोदी सरकार और उसके पीछे खड़े संघ परिवार के अनेक मुंह है और सब अलग अलग बातें एक साथ बोलते है जैसे कोई कहता है छार बच्चे पैदा करो तो कोई उससे भी आगे बढकर कहता है दस बच्चे पैदा करो तथा दूसरा सबसे बड़ा उदाहरण वर्तमान में गोउ माता को लेकर हो रही राजनीति है उसी पार्टी और संघ विचारधारा के लोग गोउ मांस खाने को मना करते है तथा कुछ कहते है हम तो खाते है - जिसको जो करना है करले .आज देश के जागरूक और शिक्षित लोगो को भी इस मौजूदा केंद्र सरकार के बारे में सोचना पड़ेगा कि आखिर इनका दृष्टिकोण काया है ? देश को चलाने की इनकी क्या नीति है ? जिस नाम पर देश के बुजुर्गो ,नवयुवको , और किसानो ने अपना मत दिया था .आज वह अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है . चुनाव के समय जिस प्रकार से इस पार्टी के नेता देश की मनोवैज्ञानिकता को समझकर भाषण बाज़ी कर रहे थे .आज वह पूरी तरह से तहस नहस हो चुकी है . भाषणों में नवयुवको को रोज़गार और तमाम सुविधाय देने का वादा किया गया था .वह आजकल खोखले साबित हो चुके है .इसके बाद संघ विचारधारा ने लोगो को धर्म के नाम पर ठगा था .वह भी अपने आपको असहाय महसूस कर रहे है क्यूंकि लोगो का ध्यान बाँटने और उन्हें अपने असली इरादों के बारे में पूरी तरह भ्रम में डालने का यह इनका पुराना कारगार नुस्खा है .चुनाव के पहले से ही यह खेल ज़ारी था - जैसे उत्तर प्रदेश के भिन्न -भिन्न भागों में सांप्रदायिक दंगे तथा सत्ता की लोलुप्सा . सत्ता में आने के बाद चतुराई के साथ जो खेल आज अल्पसंख्यक ,दलित और आदिवासियों के साथ खेलला जा रहा है वह बहुत ही निंदनीय है क्योंकि किसी को धर्म के नाम पर सताया जा रहा है तो किसी को जाति के नाम पर, आदिवासियों को उनकी ज़मीन के चक्कर में आज आज केंद्र सरकार अपने पूंजीपति आकाओ को खुश करने के लिए उनकी जामीनो पर आधिग्रहण किया जा रहा है .इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश विकाश की नहीं ओर नहीं बल्कि विनाश की ओर अग्रसर हो रहा है .
                  एक ओर नरेन्द्र मोदी 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से कहते है मेल मिलाप और आपसी झगडे मिटाकर देश को विकास की ओर ले जाना है .और अपने आपको उदारवादी एवं सबको साथ लेकर चलने वाला दिखने की हरचंद नाकाम कोशिश कर रहे है ,दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार के सांसद और संघ के लोग सांप्रदायिक विष फैलाने तथा धार्मिक आधार पर धुव्रीकरण के तरह तरह के हथकण्डे अपनाते है जैसे वर्तमान में सूर्य नमस्कार और योगा यह षड्यंत्र रचने का सबसे बड़ा कारण देश के दो सबसे बड़े हिन्दू बहुलवादी राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव के कारण फिर से नफरत और मानसिक साम्प्रदायिकता की राजनीति करके वोटो की फसल काटकर सत्ता में वापसी करना है .
                 इतिहास ,शिक्षा और संस्कृति के पुरे ढांचे के भगवाकरण करने के क़दमो से लेकर ज़मीनी स्तर घनघोर साम्प्रदायिकता और झूठे प्रचार में सरकार और संघ प्रचारक अलग अलग लगे हुए है .मोदी देश दुनिया में घूम घूम कर लगातार विकास की बातें कर रहे है ,वे इतना विकास विकास चिल्ला रहे है कि व्यंग्यकारों ने उनको 'विकास के पापा' के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया .वे लगातार देश की जनता को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे है कि एक बार विकास की " आंधी " या विकास की गंगा (जो चाहे समझ लिजिए ) चली नहीं कि सारी समस्याए छूमन्तर की तरह उड़ जाएगी .लेकिन उनको मालूम नहीं है कि विकास के लिए देश में सांप्रदायिक सोहार्द, अमन और समानता  के साथ साथ आधारभूत संरचना का होना ज़रूरी है .जो अब तक देश की सबसे बड़ी कमी रही है ना ही वर्तमान सरकार  की कोई इस मुद्दे पर कोई दूरदर्शिता परतीत हो रही है वो तो केबल धर्म का नाम लेकर आपसी मेलभाव ,एकता और भाईचारे को नष्ट करने के लिए बार बार प्रयत्न कर रही है क्यूंकि उसका मुद्दा केबल हिंदुत्व है वो भी धर्म के सच्ची विचारधारा के लिए नहीं बल्कि सत्ता को पाने के अहंकार के कारण ही वो बार बार धार्मिक भावनाओ के षड्यंत्र को रच रही है जिससे देश के सोहार्द को बहुत नुक्सान होता है और बार बार मानवता का क़त्ल करने की साजिश रची जाती है . क्योंकि उनको मालूम है सत्ता तक पहुचने का सबसे सस्ता और सीधा रास्ता यही है .
                       देशभर में सुनियोजित सांप्रदायिक तनाव भड़काने और नियंत्रित दंगे फसाद करने की रणनीति भी धर्म के सहारे जारी है जिसको संचालित करने का कार्य पारंगत तरीके से अमित शाह जैसे लोग कर रहे है , जो कि गुजरात से लेकर देश के अन्य भागो में करने के लिए माहिर है . यदि धर्म के साथ हो रहे षड्यंत्र को रोका नहीं गया तो देश का भविष्य अँधेरे में है .इस कार्य को करने के लिए देश का नौजवान आगे आये और देश के भविष्य के साथ साथ आने वाली पीढियों के बारे में सोचे !
       सांप्रदायिक दंगो की खेती धार्मिक ठेकेदारों के लिए खाद एवं उर्वरक का कार्य करती है, अगर धार्मिक अल्पसंख्यक ,दलित समाज के लोग मिलकर सांप्रदायिक रूपी खाद एवं उर्वरक धार्मिक ठेकेदारों को देना बंद कर दे तो इन ठेकेदारों की यह ज़हरीली लहलहाती खेती सूख जाएगी एवं धर्म के ठेकेदारों यह सामाजिक असमानता वाली भूमि उसर-बंज़र हो जाएगी भारत-भूमि की उर्वरक शक्ति को बचाने के लिए धार्मिक ठेकेदारों को नष्ट करना बहुत ही आवश्यक हो चूका है . याद रखे तभी भारत की भूमि में  समरसता , मानवता के बीज नवांकुर होंगे जो मानवता ,एकता समरसता तथा प्रेम-सोहार्द से लबालब भरे होंगे और भारत भूमि का मान सम्पूर्ण विश्व में पुनः स्थापित होगा ........
                                             अकरम हुसैन
                                             पीएचडी  ( हिंदी )
                                          अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (अलीगढ़)
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