शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

बड़ी कठिन है गुजरात की डगर - अकरम हुसैन क़ादरी

बड़ी कठिन है गुजरात की डगर- अकरम हुसैन क़ादरी


2013 के बाद से जिस गुजरात मॉडल को भारतीय जनता पार्टी, कुछ मीडिया घराने प्रचारित कर रहे थे अब उनकी पोल खुलने लगी है जिसको दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने एक टीवी डिबेट में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सामने पोल खोल दी थी ।
गुजरात तो हरेन पांड्या हत्याकांड से भारत मे बहुत मशहूर था लेकिन 2002 के दंगों ने गुजरात को देश विदेश में एक अलग ही पहचान दी जिसको माननीय कविवर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक सार्वजनिक मंच पर राज धर्म निभाने का बोल भी चुके तो और उस वक़्त के तत्कालीन मुख्यमंत्री को सबके सामने डाँट भी चुके थे । 2001 से ही गुजरात की राजनीति में जो उछल पुच्छल मच चुकी थी उसमे शुरुआत हत्या से हुई और कुर्सी तक पहुंचते पहुंचते नरसंहार कराने पढ़ें उसमे ना जाने कितनी महिलाओ को विधवा बनाया गया, हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किये गये, बच्चों को माँ का पेट फाड़कर मारा गया एेसे कुकृत्यों से देश शर्मसार हुआ। देश का विकास भी बाधित हुआ वो अलग। आज भी जिसकी लपटें हमें देखने को मिल जाती हैं
आगामी विधान सभा  चुनाव 2017 पर नज़र डाले तो हम देखते है कि इस बार गुजरात के 15 साल के इतिहास में पहली बार भाजपा को मात खानी पड़ सकती है क्योंकि गुजरात के सबसे बड़े तबके बीजेपी से पूरी तरह से रूठ चुके है उनको मनाने के लिए बीजेपी के शीर्षथ नेतागण, कैबिनेट मिनिस्टर भी बीजेपी में कुण्डली जमाये बैठे है लेकिन गुजरात की जनता खामोशी से अपना काम कर रही है उसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ का गुजरात का रोड शो है जिसमे अनेक जगह व्यापारियों ने काले झण्डे दिखाए और जिस प्रकार पूर्व में वहां पर किसी बीजेपी नेता की रोड शो में भीड़ नज़र आती थी वो बिल्कुल भी नज़र नही आई बल्कि पूरी तरह से रोड शो फ्लॉप नज़र आया जिसको भारतीय जनता पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा ने ट्वीट करके कहा कि योगी जी का रोड शो फ्लॉप होने का मतलब यह बिल्कुल नही है कि मोदी लहर ख़त्म हो गयी है मतलब साफ है कि अभी वो कोई नया साम्प्रदयिक पैंतरा आजमाने की सोच रहे हो जो गुजरात के मिजाज़ के अनुकूल होगा और वो कामयाब नज़र आ सकते है ।
पिछले दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष जिनको अब बोलना शायद आ चुका है वो भी अब खूब बढ़कर बोलने लगे है जो आक्रमकता की राजनीति को शायद अब समझ रहे है जोकि उनके पाले में जा रहे है अब मेनस्ट्रीम मीडिया का भी उनको साथ मिलना कुछ हद तक शुरू हो चुका है।
गुजरात में बीजेपी को गड्ढे में धकेलने में सबसे अहम किरदार पाटीदार समाज के कर्ता-धर्ता हार्दिक पटेल अदा करेंगे जिनको शिवसेना का तो समर्थन है ही उसके अलावा वो 'आप' में भी कुछ ज़मीनी स्तर पर काम कर चुके है और कांग्रेस तो पूरी तरह से पाटीदार समाज के प्रमुख के साथ खेल रही है
इसके साथ ही अब पटीदार समाज के नेता ही नहीं आम पाटीदार बीजेपी के विरोध में उतर चुका है। जिसको हम पाटीदार अंदोलन से अब तक देखते आ रहे हैं। अगर एेसा ही रहा तो हो सकता है कि यह मैच जीतने में कांग्रेस सफ़ल हो जाये और उसको गुजरात मे अपनी खोई ही प्रतिष्ठा को दोबारा प्राप्त कर सके। पर कांग्रेस को अभी अपनी गृहकलह पर ध्यान देना होगा। जिस तरह से शंकर सिंह वाघेला ने कांग्रेस को छोड़ा है, अगर एेसा ही रहा तो कांग्रेस बीजेपी विरोधी लहर जो बीजेपी की गलत नीतियों की वजह से उठ रही है, उसका फायदा नहीं उठा पायेगी। बीजेपी को अपने गढ़ गुजरात में पहले सोना व्यापारियों का कड़ा विरोध झेलना पड़ा था यहाँ तक की कई व्यापारियों ने अपना कारोबार बंद कर के विरोध जताया था। इसके बाद नोट बंदी से छोटे मोटे व्यापार मानो खत्म ही हो गये। अभी गुरात के व्यापारी इस सदमें से उबरे भी नहीं थे कि जी.एस.टी. ने सब की कमर तोड़ दी। आपको यह भी पता होगा कि व्यापारी इलैक्शन में बहुत बड़ा रोल अदा करते हैं क्योंकि पार्टियों की फंड़िंग में एक मोटा हिस्सा इन्हीं का होता है, जो हमने 2017 के इलैक्शन में देखा था।
गुजरात मे बीजेपी को हराने में कपड़ा व्यापारी अहम रोल अदा कर सकते है क्योंकि नोटबन्दी के बाद GST के बिल ने उनकी कमर तोड़ दी है जिसको वो मोदी सरकार को उनके डायरेक्ट पेट मे लात मारने जैसा समझ रहे है और उन्होंने GST के खिलाफ शुरू से ही सूरत में लाखों की तादाद में विरोध किया। सूरत के साथ ही अहमदाबाद और जामनगर में भी कपड़ा व्यापारियों ने बड़ी बड़ी रैलियाँ निकाली थी। लेकिन मुख्य मीडिया में वो सुर्खियां नही बटोर पायीं। जिससे उनके अंदर बहुत गुस्सा है जिसको वो इस चुनाव में भाजपा को विधानसभा चुनाव हराकर पूरा करने की कोशिश करेंगे। जबकि बीजेपी को सबसे ज्यादा समर्थन आजतक गुजरात के पाटीदारों और व्यापारियों से ही मिला है जो अब खिसकता हुआ नजर आ रहा है ऐसा प्रतीत भी हो रहा है कि आने वाले समय मे गुजरात की शक्ल बदल सकती है कोई दूसरा गुजरात मे काबिज़ हो जाएगा
इसके साथ ही ऊना कांड ने बीजेपी की पूरे देश में किरकिरी करवादी थी और आज भी गुजरात के दलित परेशान हैं। आज भी दलितों के साथ छुट पुट घटनाएँ होती रहती हैं। इसका असर सीधा गुजरात विधान सभा में देखने को मिलेगा। वहीं बीजेपी भी इन सब चीजों से अवगत है वह अपने तुरुप के पत्ते रखे हुए है जिनमें कांग्रेस की गृहकलह को हवा देना, पाटीदार अंदोलन को कमजोर करना, जीएसटी में कटौती करके कपड़ा व्यापारियों को मनाना आदि। अब देखना यह है कि कौन मौकों को भुनाकर बाजी मारता है।
अकरम हुसैन क़ादरी और आसिफ साबरी
जय हिंद

शनिवार, 14 अक्टूबर 2017

2019 का चुनाव तय करेगी छात्र राजनीति - अकरम हुसैन क़ादरी

2019 का चुनाव तय करेगी छात्र राजनीति- अकरम हुसैन क़ादरी

2014 के लोकसभा चुनाव में आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिस मजबूती से देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयो और कॉलेज स्तर पर अपनी पैठ बना रही थी उससे तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह छात्रशक्ति अपनी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी बीजेपी को कमसेकम 10 साल तक देश से उखड़ने नही देगी लेकिन 2017 में ही छात्रों का भरोसा वर्तमान सरकार की नीतियों से उठ गया है क्योंकि जबसे यह सरकार सत्ता में आई है तब से शिक्षा का बजट तो कम हुआ ही है उससे ज्यादा छात्रों पर दमनात्मक कार्यवाही भी बड़ी है और छात्र छात्राओं को मिलने वाले अनुदान में भी घटोत्तरी हुई है जिसकी वजह से उनकी छात्र इकाई कमज़ोर हुई है और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी बीजेपी को भी नुकसान हुआ है।
2014 के बाद देश के अनेक विश्वविद्यालयों में अजीब का मंज़र देखने को मिला सबसे पहले इसकी शुरुआत FTI से हुई जहां पर छात्रों ने गजेंद्र चौहान का विरोध किया है उसके बाद डॉ. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या फिर जेएनयू में फ़र्ज़ी देशद्रोह के मुक़दमे लगाए गए उसके बाद यूजीसी पर अपने फ़ेलोशिप के लिए लड़ाई लड़ रहे छात्रों पर दमनात्मक कार्यवाही हुई, जेएनयू छात्र नजीब को कुछ गुण्डो ने मार पीट की जो आज तक लापता है,  रामजस कॉलेज में एक शहीद सैनिक की पुत्री के कुछ ट्वीट कर देने पर एबीवीपी के छात्रों ने उसको रेप करने की धमकी दी आखिर में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं पर कुछ शोहदों और असामाजिक तत्त्वों ने बत्तीमीज़ी की और उनके साथ विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी न्याय नही किया बल्कि उन छात्राओं को अपशब्द बोले गए जिससे छात्र राजनीति और ज्यादा गर्मा गयी और छात्र छात्राओ का विश्वास वर्तमान सरकार से कम हो गया।
अभी पिछले तीन चार महीने में हुई अनेक विश्वविधायलयो में छात्रसंघ चुनाव सबमे आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सुफड़ा साफ हो गया ।

पिछले दिनों बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने 2019 में 350 सीट लाने का आंकड़ा पेश किया था कहीं ना कहीं यह प्रतीत हो रहा था कि यूपी चुनाव के बाद यह भविष्यवाणी सही साबित हो सकती है लेकिन जिस प्रकार से जाधवपुर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, जेएनयू, अखिल विद्यार्थी परिषद का गढ़ कही जाने वाली दिल्ली यूनिवर्सिटी और आखिर में इलाहाबाद विश्वविद्यायल में भी सुफड़ा साफ हो गया, यह कही ना कहीं यह दर्शाता है कि बीजेपी, आरएसएस की पकड़ विश्वविद्यालयो में कमज़ोर हुई है जो निश्चित ही आगामी लोकसभा चुनाव में अपना रंग दिखाएगी उसके अलावा अनेक भावनात्मक मुद्दों पर जिस प्रकार से बीजेपी ने काम किया है उसको देश के पढ़े लिखे युवा तो समझ गए है यदि जनता भी समझ जाएं तो परिणाम एकदम अलग होंगे देश मे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई की भाईचारे की बात होगी, हिन्दू मुस्लिम मुद्दा भी खत्म होने की कगार पर नज़र आ रहा है अब चुनाव विकास के मुद्दे पर होने की संभावना नज़र आ रही है

अकरम हुसैन क़ादरी

उपभोक्तावादी संस्कृति को ढोती महिलाएं- डॉ. नमिता सिंह

उपभोक्तावादी संस्कृति को ढोती महिलाएं-डॉ. नमिता सिंह
आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में जनवादी लेखक संघ, प्रगतिवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के संयुक्त तत्त्वाधान में मार्क्सवादी चिंतक, विदुषी स्त्री लेखन में अग्रणीय भूमिका निभाने वाली डॉ. नमिता सिंह जी की पुस्तक "स्त्री-प्रश्न" का विमोचन किया गया जिसकी अध्यक्षता समाजसेवी प्रोफेसर ज़किया अतहर सिद्दीकी और हिंदी विभाग के हरदिल अजीज़ अध्यक्ष प्रोफेसर अब्दुल अलीम  ने की जिन्होंने स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया है उन्होंने अपने अनुभवों को भी बांटा कार्यक्रम में पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत की गयी सर्वप्रथम डॉ. जया प्रियदर्शिनी शुक्ल ने पुस्तक की उपयोगिता पर बोलते हुए 'स्त्री-प्रश्न' जैसे मुद्दे पर बात की और स्त्री के बारे में गहराई से बताया कि किस प्रकार  अनेक विद्वानों ने बताया था कि 21 वी सदी महिलाओ की सदी होगी लेकिन आज स्त्रियों की दयनीय स्थिति को देखते हुए वो एक तरह से उपभोग की वस्तु बन चुकी है जिसको जैसी आवश्यकता होती है वो उसको वैसे इस्तेमाल करता है और छोड़ देता है जो समाज के लिए एक कलंक है। इसमें कोई संदेह नही है कि प्रगतिशील मानसिकता ने स्त्री की प्रतिष्ठा को तो बढ़ाया है लेकिन देखने मे आया है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है क्योंकि इसके गर्भ में दो मानसिकताओं, विचारधाराओं का टकराव है जिसकी वजह पूंजीवादी और सामंतवादी सोच है जिसने स्त्री को उपभोग की वस्तु बनाने में अहम भूमिका निभाई है जबकि पहले मातृसत्तात्मक समाज था लेकिन अब पितृसत्तात्मक समाज का बोलबाला है जिससे ना ही स्त्री स्वास्थ्य, कुपोषण, यौन हिंसा और ऑनर किलिंग जैसे मुद्दे पर कोई कुछ बोल पाता है ना ही उसको पूर्णतया न्याय मिलता है उसका सबसे बड़ा कारण स्त्रियों की राजनीति में बराबर की भागीदारी का ना होना भी है, समाज मे आज भी स्त्री को मासिक धर्म आने के समय उसको रसोई घर और घर मे बने मन्दिर में भी घुसने नही दिया जाता है जोकि संविधान में बराबरी के कानून की धज्जियां उड़ा रहा है, आजकल मध्यमवर्गीय परिवारों में लड़कियों को केवल स्टेटस मेन्टेन करने के लिए उनको थोड़ा बहुत शिक्षित किया जा रहा है जिससे उसकी शादी किसी अच्छे पढ़े लिखे लड़के से हो जाये और ससुराल में उसको ग्रहण कर लिया जाए।
इसी सिलसिले में हिंदी विभाग के अजय बिसरिया सर ने पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न' पर विचार रखते हुए उपभोक्तावादी समाज मे किस प्रकार स्त्रियों का दोहन हो रहा है उस संदर्भ में विस्तार से समझाया कि आज किस प्रकार धनी लोगो ने पूंजीवादी व्यवस्था के चलते हुए विज्ञापन में बाजारवादी संस्कारो ने स्त्री का प्रयोग किया है, स्त्रियों पर संस्कृति के नाम पर धर्म को थोपा जा रहा है क्योंकि पूंजीवादी,सामंतवादी,उपभोक्तावादी समाज की यह पहली पसंद भी है, इन सबसे बचने के लिए अब आने वाली नई पीढ़ी को अन्तररजातीय, अंतर्धार्मिक विवाह करने होंगे जिससे स्त्रियों को अपनी पसंद से वर चुनने की पूरी छूट होगी और समाज मे निश्चित ही बदलाव आएंगे और संविधान भी इसकी इजाजत देता है अगर ऐसा होता है तो हम कह सकते है कि बंधे कदमो से ही लम्बी छलांग लगाई है।
उसके बाद डॉ. नामिता सिंह जी ने स्वयं की पुस्तक पर ज्यादा ना बोलते हुए चन्द बातो में भी बात खत्म कर दी उन्होंने कहा मानव समाज का विकास स्त्री पराधीनता का भी विकास है जिस प्रकार मानव ने विकास क्या है ठीक उसी प्रकार स्त्री पराधीनता ने भी अपने पांव पसारे है तथा वर्तमान में बनारस हिन्दू विश्वविद्यायल का मामला हमारे सामने है कि किस प्रकार से पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्रियों से पढ़ने, लिखने, घूमने तक की आजादी को छिनने का षड्यंत्र रचा है और वो हमेशा औरतो को अपना ग़ुलाम बनाना चाहते है
कार्यक्रम में हिंदी विभाग अध्यक्ष हरदिल अजीज़ प्रोफेसर अब्दुल अलीम, प्रोफ़ेसर प्रदीप सक्सेना, प्रोफेसर आशिक़ अली, प्रोफेसर तसनीम सुहैल,प्रोफेसर रेशमा बेगम, प्रोफ़ेसर शम्भूनाथ तिवारी, प्रोफेसर कमलानंद झा, प्रोफ़ेसर समी रफ़ीक़, डॉ. जावेद आलम, डॉ. शाहवाज़ अली खान, डॉ. गुलाम फरीद साबरी, डॉ. राहिला रईस, नीलोफर उस्मानी के अलावा अनेक शहर के गणमान्य लोग मौजूद थे अंत मे प्रोफेसर आसिम सिद्दीकी सर ने धन्यवाद ज्ञापन किया,
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. दीपशिखा सिंह जी ने किया ......
प्रस्तुति
अकरम हुसैन क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

मुद्दों पर भावुक मुद्दे थोपने की कला

'मुद्दों पर भावुक मुद्दे थोपने की कला'
     अकरम हुसैन क़ादरी
वर्तमान राजनीति इतने बुरे दौर से गुज़र रही है जिसमे समस्याएं ही समस्याएं है लेकिन उनका संज्ञान ना ही पक्ष ले रहा है और ना ही विपक्ष, जबकि मानव की मूलभूत समस्याओं को पक्ष रखे या ना रखे लेकिन विपक्ष को अपनी राजनीति को बचाने के लिए मुद्दों के हिसाब से प्रहार करने चाहिए हर छोटे मुद्दे को बड़ा बनाकर प्रस्तुत करना चाहिए जिससे सत्तासीन सरकार उस मुद्दे पर अपना ध्यान लगाएं और जल्दी से जल्दी समाधान हो सके, लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि ना ही देश मे मजबूत विपक्ष बचा है और ना ही मीडिया सही से अपना उत्तरदायित्त्व निभा पा रहा है विपक्ष और मीडिया खानापूरी करके मुद्दों को भटकाने का भी प्रयत्न करता है जिससे सत्तासीन सरकार सवालो से बच जाती है और विपक्ष कमज़ोर पढ़ जाता है ।
किसी भी लोकतंत्र  को चलाने के लिए चारो स्तम्भो को अपना काम करना चाहिए जिससे देश की सत्ता रूपी चारपाई को सही ढकेला जा सकता है अब तो ऐसा प्रतीत होता है चारपाई का एक पैर टूट चुका है और चारपाई वेंटिलेटर पर जा चुकी है जिससे देश का लोकतंत्र खतरे में आ गया है
विपक्ष की निष्क्रियता का ही परिणाम है जिसकी वजह से हर बड़े मुद्दे पर वो भावुक मुद्दे छोड़ते गए कार्पोरेट मीडिया भी कुछ ना कर सका,
जहां पर देश की समस्याओं की बात होनी थी वहां पर वो लव जिहाद, गाय, गोबर, मजनू स्क्वाड, नाम बदलने जैसी फ़र्ज़ी बातो में मीडिया और जनता को ढोते रहे है जिससे बेरोज़गारी अपने चरम पर पहुंच गयी, जीडीपी लगातार लुढ़क रही है, शिक्षा व्यवस्था चरमराने की कगार पर है स्वास्थ्य सेवाओं का हाल पिछले तीन महीनों से किसी से छुपा नही है, रेल मंत्रालय की रोज़ पटरी उतर जा रही है उधर नेता बता रहे है अगस्त में ज्यादा बच्चे मरते है मीडिया टीआरपी के लिए बाबा और उनके काले कारनामो को ज्यादा ही जगह दिए हुए जिससे जनता के मुख्य मुद्दों पर सरकारी ऑफिस में रखी फाइलों की तरह धूल चढ़ती जा रही है जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था खराब हो रही है, बेरोज़गारी की वजह से अपराध के आंकड़े कम होने का नाम नही ले रहे है ।
अकरम हुसैन क़ादरी

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

समाजवादी सम्मेलन में नही दिखा समाजवाद

"समाजवादी सम्मेलन में नही दिखा समाजवाद"
       अकरम हुसैन क़ादरी
हाल में ही आगरा में सम्पन्न हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के सभी समाजवादी नेताओं और पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में जोर शोर से पार्टी को मजबूत करने का संकल्प तो लिया गया लेकिन कोई भी पार्टी कार्यकर्ता अपनी पूरी लय में नही दिखा और न ही किसी को समाजवादी पार्टी के इतिहास के बारे में मालूम था। चन्द पुराने समाजवादियों को छोड़कर बाकी सब यूँ ही खानापूरी करते हुए दिखे।
लगता है आजकल समाजवादी पार्टी अपनी विचारधारा से भटक रही है क्योंकि अधिकांश कार्यकर्ताओं को न तो डॉ. राममनोहर लोहिया की विचारधारा से मतलब है और न ही जनेश्वर मिश्र जैसे जांबाज़ों के योगदान से भलीभांति परिचित है। वे तो केवल अगले चुनाव में सत्ता हथियाने के चक्कर मे नज़र आये ।
पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गोरखपुर में मृत बच्चों के परिवारों की सहायता करके कुछ समाजवाद को ज़िंदा करने की कोशिश की; लेकिन राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कुछ ऐसा मजबूत भाषण नहीं दिया जो विचारधारा से लबरेज़ हो और जिसमें समाजवादी जननायकों को याद किया जाए। ऐसा प्रतीत हुआ कि यह सम्मेलन एक व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर रखा गया है, ताकि उनकी ताजपोशी हो जाये और सभी चलते बने। इसमें चापलूसी साफ झलक रही थी। 
पूरे सम्मेलन में जहां एक ओर धैर्य की कमी लगी वहीं पर नैतिकता, सामाजिकता और राजनीति के भी कोई ठोस लक्षण या क़दम नहीं दिखाई दिए जिससे समाजवाद कमज़ोर होने की कगार पर नज़र आ रहा है।
भाषणों पर अगर दृष्टिपात करें तो आज़म खान साहब ने कुछ सामाजिक, धार्मिक मुद्दों को समाजवाद के नज़रिए से छूने की कोशिश की लेकिन बीच में युवा समाजवादियों के नारों के चक्कर में वह स्वयं अपना इतिहास ही सुनना भूल गए जिसके जरिये आज़म ख़ान साहब सच्चे समाजवाद को पारिभाषित करना चाह रहे हैं। अखिलेश यादव और उनकी धर्मपत्नी सांसद डिम्पल यादव के भाषणों में समानता दिखी जबकि समाजवादी का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते अखिलेश यादव को 2019 का ख़ाका तो खींचना ही चाहिए था।  इसके अलावा, 2022 के उत्तर प्रदेश के चुनाव पर अपनी रणनीति के साथ साथ युवा नेताओ से आह्वान भी करना चाहिए था कि पिछले चुनाव में हुई ग़लतियों से सीख लेते हुए अगले चुनाव में उन ग़लतियों को दूर करना है। हर वोटर के घर घर जाकर समाजवाद को फैलाना है। इसके साथ, अनेकता को एकता में पारिभाषित करके साम्प्रदायिकता के दंश से प्रदेश में फैल रहे इस कैंसर से भी निजात दिलाने के लिए बूढ़े और नौजवान कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देकर जनता के बीच में जाने का आह्वान करना चाहिए था।
प्रदेश में अनेक ऐसे मुद्दे हो चुके हैं जिसको समाजवादियों ने सही से नहीं भुनाया है। वे लोग अपने साम्प्रदायिकरण को मजबूती दे रहे हैं, इधर आप लोग पैर पर पैर रखे बैठे हैं। अगर ऐसे ही बैठे रहे तो वो दिन दूर नहीं है जब आपकी भी हालत बहुजन समाज पार्टी जैसी हो जाएगी। न ही आपको यादवों का वोट मिलेगा और न ही अल्पसंख्यकों का, क्योंकि उसका सीधा कारण है कि जब उनके मुद्दे चल रहे थे तो तुम उस समय कहाँ थे .....
सच्चे समाजवादियों ने हमेशा देश, प्रदेश के विकास में विशेष योगदान दिया है चाहे वो देश का कोई भी कोना हो। जहां पर भी अत्याचार होता है वहां पर समाजवादी नज़र आते थे। न जाने अब क्या हो गया है इस समाजवाद को....अनेक मुद्दों को भुना ना पाने में उनकी राजनैतिक अपरिपक्वता नज़र आती है .....
अखिलेश यादव को अगर सपा को बसपा बनने से रोकना है तो समय की मांग के अनुसार, साम्प्रदायिकता, मानसिक साम्प्रदायिकता, छात्रों के हित, स्त्री विरोध को खत्म करके, ऊंच-नीच जैसे मुद्दों पर खुलकर सामने आना चाहिए।
दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर भी अपनी बेबाक और निष्पक्ष बात रखनी चाहिए। ओबीसी, माइनॉरिटी और दलितों के आरक्षण के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए।
जय हिंद
अकरम हुसैन क़ादरी

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

मुक्तिबोध और वर्तमान परिप्रेक्ष्य - जन संस्कृति मंच

मुक्तिबोध और वर्तमान परिप्रेक्ष्य - जसम

आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एन.आर.एस.सी. क्लब में मुक्तिबोध शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जन संस्कृति मंच अलीगढ़ ने "मुक्तिबोध का साहित्य: समय, सवाल और हम नाम से एक व्याख्यान माला का आयोजन किया जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट रामजी राय और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, मार्क्सवादी आलोचक, चिंतक प्रोफ़ेसर प्रदीप सक्सेना ने अपने विचार रखे
सर्वप्रथम प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने बोलते हुए कहा कि आजकल हत्याओं के दौर में मुक्तिबोध की प्रासंगिकता और अधिक बड़ जाती है क्योंकि मुक्तिबोध वास्तविकता के कवि है जिस वास्तविकता की मुक्तिबोध ने अपने साहित्य में जगह दी है वो आज हमारे सामने पल पल घटनाएं घट रही है लिखने, बोलने की आज़ादी को छीना जा रहा है जिससे बुद्धिजीवियों में रोष व्याप्त है, पिछले दिनों चली असहिष्णुता की बहस को वर्तमान घटनाओ ने पुख्ता कर दिया है।इसलिए मुक्तिबोध ने ऐसे प्रश्नों को अपनी कविताओं के भी माध्यम से उठाने का प्रयत्न किया है जैसे " चांद का मुंह टेड़ा है" नामक कविता को ले तो हम समझ सकते है कि लोकतंत्र में बहुमत की सरकार आने का मतलब है फासिज़्म की शुरुआत हो चुकी है जिसमे बुद्धिजीवी, आलोचक, लेखक, विद्वान, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासियों और महिलाओं का पीसना लाज़मी है जो वर्तमान में घटित हो रहा है, आजकल गोली चलाकर लड़ाई जीत सकते है यह एक नई विचारधारा पनपने लगी है जो समाज, देश और मानवता के लिए खतरा है आखिर में कथा साहित्य की तुलना करते हुए उन्होंने बताया कि प्रेमचंद जीवन संघर्ष की बात करते है जबकि मुक्तिबोध जीवन समस्या की बात करते है दोनों की प्रासंगिकता भिन्न भिन्न है लेकिन वर्तमान समस्याओं को देखते हुए मुक्तिबोध ज्यादा महत्त्वपूर्ण नज़र आते है।
पोलिटिकल एक्टिविस्ट रामजी राय ने मुक्तिबोध को दो शब्दों में समेट दिया " मुक्तिबोध का साहित्य 20 वीं सदी का सोशियो यूनिवर्स है" जिसको बड़े फ़लक में समझने की आवश्यकता है, कई मुद्दों पर इशारतन बात करते हुए अनेक ऐसे अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला जिस पर वहां पर बैठे अध्यापकगण, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को सोचने पर मजबूर कर दिया जिससे उनके मस्तिष्क में अनेक प्रश्न कौधने लगे। व्यंग्यात्मक अंदाज़ में बात करते हुए उन्होंने कहा "विश्वगुरु बनते बनते कहीं हमें नरक का दरोगा ना बना दिया जाए" अंत मे शेर का एक मिशरा कहते हुए अपनी बात खत्म करदी "बोले नही वो हर्फ़ जो ईमान में नही थे" जिससे वहां मौजूद अनेक लोगो ने उनका तालियां  बजाकर स्वागत किया
व्याख्यान माला में मार्क्सवादी आलोचक, चिंतक प्रोफ़ेसर प्रदीप सक्सेना जी ने अपने अंदाज में ऐसे सवाल दागे जो आजकल समझने और सोचने योग्य है जिसमे उन्होंने मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की एक पंक्ति कही " जब कोई मार जाता है तब ही वह महान क्यो होता है" उनका कहने का आशय था ना जाने कितने कवि, कथाकार गरीबी, मजबूरी और भूखे लिखते लिखते मर गए जिनको बाद में महान बनाया गया चाहे वो प्रेमचंद हो नागार्जुन हो या फिर मुक्तिबोध , मुक्तिबोध का कविता संग्रह " चाँद का मुँह टेड़ा है" जब छप रहा है था उस वक़्त वो अपने जीवन के आखिरी पल जी रहे थे जो कि एक कवि और लेखक के जीवन का भयावह सच है जिसको हम सोचना और समझना चाहिए, उन्होंने वहां पर उपस्थित सभी बन्धुओ को चिर परिचित अंदाज़ में यथार्थ का परिचय कराया और पढ़ने-लिखने, समझने और उसको जीवन मे उतारने का भी मंत्र मार्क्सवादी विचारधारा को बताया
अंत मे अध्यक्षीय भाषण में डॉ. नमिता सिंह जी ने मुक्तिबोध को वर्तमान समय की ज़रूरत बताया
कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर वेद प्रकाश जी ने किया
जिसमे प्रोफेसर तसनीम सुहैल, प्रोफेसर आशिक़ अली बलौत, प्रोफेसर शम्भूनाथ तिवारी, अजय बिसरिया, प्रोफेसर कमलानंद झा, प्रोफेसर रिज़वान सर, डॉ जावेद आलम, डॉ दीपशिखा, डॉ शहवाज अली ख़ान, नीलोफर उस्मानी, इस्लाम बाबू, ज्योति कुसुम्बल, उमेश सिरसवारी, मोहम्मद वारिस, अबुसाद अहमद, रामकुमार चौधरी, सलीम अहमद अनेक शोधार्थी, विद्यार्थीगण मौजूद थे

प्रस्तुति
अकरम हुसैन क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

बुधवार, 6 सितंबर 2017

मानवाधिकार रक्षकों को क्यो आतंकवादी, नक्सलवादी बताया जाता है - अकरम हुसैन क़ादरी

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अकरम हुसैन कादरी

भारतीय राजनीति में मानवाधिकार की बात करना अब आतंकवादी , नक्सलवादी सिम्प्थाइसर कहा जाने लगा है इस ज़हर को 2012 के बाद मीडिया ने बहुत तेज़ी से फैलाया क्योंकि इससे एक राजनैतिक पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में मदद मिलती है इंसानियत की बात करना अब कैंसर जैसा हो गया है जिसकी चपेट में अनेक लेखक, बुद्धिजीवी आ गए है चाहे वो कलबुर्गी, पानसरे, दाभोलकर हो या फिर कल की घटना गौरी लंकेश के साथ हुआ हश्र  दरअसल यह नफरतों को फैलाने का ही रिजल्ट है जिसको मीडिया की समय समय पर हो रही पिटाई, सम्मानित बुद्धिजीवी व्यक्तियों को धमकी देना एक आम बात हो गयी है जो समाज मे बहुत तेज़ी से फैल रही है जिससे लगातार इंसानियत शर्मशार हो रही है, एक बात सोचने योग्य है इसमें ज्यादातर अंधभक्त, अतिधार्मिक पाखण्डी लोग ही नज़र आते है वो अपनी कायरता और डरपोकपन का परिचय बुद्धिजीवियों के सीनों को गोलियों से भूनकर देते रहते है इसमें ज्यादातर हिन्दू अतिवादी ही नज़र आते है जबकि मरने वाले भी ज्यादातर हिन्दू ही है बस अंतर यह है कि वो दिमाग़ से सोचते है मारने वाले षड्यन्त के साथ साथ साथ कुछ राजनैतिक लाभ और चन्द सिक्को में अपनी इंसानियत को बेचकर किसी बुद्धिजीवी को गोलियों से भून देते है जो सभ्य समाज के लिए बहुत ही खतरा है जिससे समाज को समझने, परखने और बोलने वाले लोगो की कमी आएगी जिससे हमें नई सोच और इंसानियत के लिए काम करने वाले लोगो की कमी निकट भविष्य में महसूस होगी जो मानवता के लिए शुभ संकेत नही है, ऐसे कार्यो में वो लोग शामिल है जो भोले भाले है धर्म और राजनैतिक विचारधारा के चलते जिन्होने अपना दिमाग़ गिरवी रख दिया है इसका लाभ हमेशा फर्स्ट क्लास पॉलिटिशियन उठाते है उसके बदले में यह कुकृत्य करने वालो को केवल जेल और चन्द दिनों की पहचान और चन्द सिक्को से नवाज़ दिया जाता है
देश को बचाने के लिए यह बहुत ज़रूरी है ऐसे लोगो की खुलकर निंदा होनी चाहिए तथा इनको मिल रहा राजनैतिक संरक्षण भी रुकना चाहिए जिसके चलते यह कुकृत्य करते है मानवता शर्मशार होती है.. पिछले चार वर्षों से जो घटनाएं हुई है उनकी पृष्टभूमि लगभग सामान ही थी
ऐसे कुकृत्यों को रोकने के लिए देश के सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति को संज्ञान लेना चाहिए वरना देश मे असहिष्णुता का माहौल बन चुका है मानसिक साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है तथाकथित देशभक्त किसी बुद्धिजीवी, प्रतिरोध के शब्द लिखने वालों पर ऐसे अपमानजनक शब्दो का प्रयोग कर रहे है जो समाज और देश को खुलेआम चुनौती दे रहे है
जय हिंद
#अकरम_हुसैन_क़ादरी