शनिवार, 25 अगस्त 2018

दंगाई युवा नेता बनने की ख़्वाहिश - अकरम क़ादरी

दंगाई युवा नेता बनने की ख़्वाहिश- अकरम क़ादरी

आजकल हर किसी को युवा नेता बनने और दिखने की बड़ी ख्वाहिश होती है लेकिन जो होते है वो कहते नही, जो होते नही है वो दिखने की भरपूर कोशिश भी करते है।
आजकल युवा नेता बनाना बड़ा सरल हो गया है पहले तो युवा नेता किसी भी नेता का बेटा, या फिर किसी रसूखदार बेटे का बेटा होता था, लेकिन आज तो गले मे सोने की मोटी चैन, हाथ मे पांच तरह के धागे, दो बेहतरीन बड़ी फोर व्हीलर, 10 मुसन्डे किसी को भी पीट दिया,मार दिया जब मन चाहा किसी बड़े नेता के कहने पर बत्तीमीज़ी कर दी, गरीबो की दलाली खा ली, मजदूरों को परेशान कर लिया क्योंकि इतना सब ड्रामा करने के लिए पैसे की भी ज़रूरत होती है।

लेकिन पिछले चार साल में जितने युवा नेता पैदा हुए है इतने कभी नही हुए है क्योंकि अब तो भगवा कुर्ता पहनकर किसी को भी किसी भी बहाने से पीटकर वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करके स्वयं को धर्म का रक्षक बताना है फिर कुछ दिन बाद कोई बड़ा नेता जेल से छूटने पर स्वागत करेगा और इनाम भी देगा जिससे वो किसी एक धर्म का नेता कहलाने लगेगा और सबको घूम-घूमकर अपनी कायरता के किस्से भी सुनाते घूमेगा फिर भी लोग उसकी बेवकूफी को बर्दाश्त करते रहेंगे और वो इस भोली भाली जनता पर अपना सिक्का मजबूत करता रहता है आखिर में वो एक सफेदनुमा गुण्डा या तो नेता बनता है या फिर फिरौती वसूल करता रहता है ।
आजकल जितनी भी युवा नेताओ की प्रजाति देख रहा हूँ वो किसी भी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर देश की किसी भाषा मे दो पेज नही लिख सकते, बनते है खुद को बहुत बड़ा हमदर्द, गरीबो का मसीहा, जबकि सच यह है कि यही वो लोग है जो कुछ राजनैतिक पार्टियों को चला रहे है और ऐसे हॄदय विदारक कुत्संग करते है जिससे सच्चे मानवतावादी  इंसान की आत्मा ही मर जाएगी....

नेता बनिए उससे पहले अपना भविष्य देखिए पहले खुद को स्टेबल कीजिये
उसके बाद नेता बनना

आजकल गांव, शहर कस्बो में भी यह युवा नेता नाम की बीमारी बहुत तेज़ बड़ रही है कोई भी गरीब लड़का अपने नाम के आगे युवा नेता लिखकर सोशल मीडिया पर फैला देता है बाद में जब वो कुछ नही कर पाता है तो लोग उसकी मज़ाक बनाते है इधर उसकी एडुकेशन भी गयी, उधर माँ- बाप की उम्मीदे भी मिट्टी में मिल गयी ऐसे में उसको केवल दुनियाँ के सामने बेइज़्ज़त होना पड़ता है फिर वो कमज़रफी का शिकार हो जाता है।
इन सब चीज़ों से बचकर पहले अपने आपको क़लम से मजबूत करो, अपने अंदर टैलेंट क्रिएट करो फिर यह पार्टी के नेता तुम्हे खुद अपने पास बुलाएंगे क्योंकि आने वाला दौर पढ़े-लिखे नेताओ का है गुण्डे, मवाली, फिरौती वसूलने वालो का दौर खत्म होने वाला है .....

पहले तालीम फिर
नोकरी
फिर पॉलिटिक्स....
जय हिंद
जय भारत


अकरम क़ादरी

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

पुष्पिता अवस्थी कृत 'छिन्नमूल' हिंदी उपन्यास को मिला कुसुमांजलि 2018 का सम्मान - अकरम हुसैन

पुष्पिता अवस्थी कृत 'छिन्नमूल' हिंदी उपन्यास को मिला कुसुमांजलि 2018 का सम्मान - अकरम हुसैन

पुष्पिता अवस्थी को  एक प्रवासी प्रतिष्ठित साहित्यकार माना जाता है लेकिन वे भारतवंशियों की व्यथा- कथा लिखने वाली प्रथम साहित्यकार है जिन्होंने कैरिबियाई देशों में रह रहे भारतवंशियों को अपनी कथा का आधार बनाकर उनको नई संजीवनी देने का एक पुण्य कार्य किया है। जिसको आज भारतीय साहित्य के उत्थान और सम्मान के लिए सक्रिय गैर सरकारी संस्था कुसुमांजलि फाउंडेशन ने सम्मान दिया है यह सम्मान साहित्यकार डॉ. कुसुम अंसल द्वारा शुरू किया गया है दरअसल यह सम्मान हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले उत्कृष्ट रचनाकारों को दिया जाता है।
कुसुमांजलि सम्मान की शुरुआत 2012 में हुई थी जिसके अंतर्गत अनेक साहित्यकारों को यह सम्मान दिया गया है यह ऐसी संस्था है जो उत्कृष्ट साहित्यकारों को उनकी बेजोड़ और अद्वितीय रचना को सम्मानित करके उनका उत्साहवर्धन करती है  बहुत ही सुधी और प्रखर समिति के सदस्यों द्वारा इसका चयन होता है, जो किसी भी रचना को उसके अनेक मापदंडों पर तौल कर उसको पुरुस्कृत करती है। इस बार हिंदी और जो अन्य भारतीय भाषा के रचनाकारों को चुना गया है उसमें आसामी भाषा के डॉ. डेका और हिंदी भाषा की मर्मज्ञ, भाषाविद्, प्रेम की कवयित्री प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी के 'छिन्नमूल' नामक उपन्यास को चुना गया है । इस उपन्यास की खूबसूरती यह है कि यह प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी के पन्द्रह सालों की तपस्या है जिसको उनको 2001 से 2016 तक सूरीनाम के अपने और नीदरलैंड में रहकर स्वयं अपनी आंखों से देखा है उसका एहसास किया है तथा उसको मानवतावादी दृष्टिकोण से अपनी कलम से उकेरने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिसमे गिरमिटिया मज़दूरों की व्यथा तो है ही उसके अलावा भारतवंशियों के द्वारा अपनी भाषा, संस्कार, संस्कृति को भी बचाये रखने और उसको संजोए रखने का अनहद नाद भी है। इस उपन्यास में ऐतिहासिक दृष्टिकोण तो है ही उसके अलावा संस्कृति, संस्कार, परम्पराएँ, तुलसीदास की रामचरित मानस, और कबीर के बीजक का भी पुट देखने को मिलता है। जिसको कोई भी पाठक पढ़ता है तो उसका विश्लेषण अवश्य करता है और वो 5 जून 1873 की गिरमिटिया मजदूरों की कथा को देखता है जिसमे कॉलोनाइजरो द्वारा भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों के साथ हुई बर्बरता, दुराचार और उनको वर्षो तक शिक्षा से दूर रखने के छल प्रपंच को भी समझता है जिससे उसको मालूम होता है कि आखिर किस प्रकार उनके खून- पसीने को कॉलोनाइजर ने अपने लाभ के ख़ातिर गिरमिटिया मज़दूरों का दोहन किया है। इस उपन्यास में संवेदना के अभिव्यक्ति का स्तर बहुत उच्च कोटि का है जिसको एक आम पाठक पढ़ते हुए अनेक बार अपनी आंखें नम होते हुए अनुभव करता है। उन्ही नम आंखों, संवेदनाओं, गिरमिटिया मज़दूरों, भारतवंशियों के दर्द को भलीभांति समझकर आज कुसुमांजलि फाउंडेशन की ज्यूरी टीम ने इस उपन्यास को सम्मानित किया है जिससे सूरीनाम, नीदरलैंड और कैरिबियाई देशों में रह रहे भारतवंशियों की पीढ़ियों को सम्मान है। जो डच भाषा को छोड़कर विश्व की किसी भी भाषा को ध्यान में रखते हुए हिंदी भाषा मे पहला उपन्यास है जो कन्त्राकी बागान ( कॉन्ट्रैक्ट प्लांटेशन के तहत ले जाये गए हिंदुस्तानियों के दारुण संघर्ष का जीवित दस्तावेज़ी आख्यान है।

भारत और भारत से बाहर अनेक हिंदी विभाग के संस्थानों में प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी पर शोधकार्य हो रहा है, लगभग प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी ने 45 किताबो की रचना की...जिसमे सभी विधाओं में लिखा गया है.. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी तीन शोधार्थी प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी पर शोध कर रहे है जिनमे अकरम हुसैन सूरीनाम गध साहित्य में पुष्पिता अवस्थी का योगदान जैसे विषय पर काम कर रहे है जबकि मोहम्मद बिलाल चौधरी और शकील अहमद भी पुष्पिता अवस्थी पर शोध कर रहे है जिससे निश्चित ही पुष्पिता अवस्थी के द्वारा रचे गए साहित्य को बारीकी से समझा जा सकता है....अन्य भारतीय विश्विद्यालयों की बात की जाए तो केरल, बुंदेलखंड, वर्धा, आगरा अनेक विश्वविद्यालयो में शोधकार्य चल रहे है

प्रस्तुति
अकरम हुसैन
शोधार्थी
एएमयू अलीगढ़
सहसंपादक - वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका अलीगढ़

शनिवार, 4 अगस्त 2018

'अनुभव सिन्हा' की फ़िल्म 'मुल्क' मोहब्बत का पैग़ाम है- अकरम क़ादरी

एक ऐसा देश जहाँ अनेक धर्म, जाति, वर्ग, भाषा, संस्कृति, संस्कार, रीति- रिवाज़, परम्परा, तीज त्यौहार होने पर भी अनेकता में एकता की मिसाल है जिसको पूरी दुनियाँ मानती और समझती भी है, जो इस देश की अमूल्य धरोहर है। जिसके द्वारा यहां एक दूसरे को साथ चलने की परम्परा वर्षो पुरानी है, लेकिन फिर भी कुछ लोग अपने राजनैतिक महत्वाकांक्षाओ को पूरा करने के लिए एक लंबे समय से तोड़ने की कोशिश कर रहे है  जिससे उनको कुछ कामयाबी भी मिली है, वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा को तोड़ने के लिए उन्होंने सबसे पहले धर्म को अपना हथियार बनाया है जिससे इंसान को आसानी से तोड़ा जा सकता है और उसके प्रतिद्वंद्वी धर्म के खिलाफ ज़हर उगलकर किसी भी कम पढ़े-लिखे भोले भाले इंसान को बहला फुसलाकर वोट बैंक के साथ जोड़ा जा सकता है जिससे उस इंसान को महसूस होगा कि वो अपने धर्म को आगे बढ़ा रहा है जबकि सच तो यह है कि उसको नफ़रत की आग में झोंक कर उसका श्रद्धा के नाम पर वोट लेकर कुछ धर्म के षड्यंत्रकारी चंपक हो लेते है फिर कुछ समय बाद यह नफ़रत एक कारोबार में बदल जाती है, देश की मुख्य मीडिया जिसमे उनका बहुत हद तक साथ देती है वो हिन्दू-मुस्लिम डिबेट में रीति रिवाज़ो की चाशनी से इसको पक्का करती है जो उस भोले-भाले मासूम इंसान को लंबे समयतक लुटती रहती है वो उनको धर्म, श्रद्धा के नाम पर वोट देता रहता है जिससे भारतीय संस्कृति की महान परम्परा 'वसुधैव कुटुम्बकम' को बहुत बड़ा बट्टा लगता है। अंदर ही अंदर नफरत की ज़मीन तैयार हो जाती है कुछ समय बाद यही एक बड़ा ज्वालामुखी तैयार होता है, नफरत का ताप इतना बड़ा हो जाता है बात मॉब लिंचिंग तक जा पहुंचती है। फिर धर्म के नाम पर रोज़ इंसानियत का क़त्ल होता है एक आम इंसान रोज़ उससे दो-चार होता है। फिर भी वो खामोश ही रहता है क्योंकि उसको लगता है यह जो लोग करा रहे है बहुत शक्तिशाली लोग है वो कुछ भी कर सकते है दरअसल ऐसे लोगो ने धर्म से षड्यंत्र करके उस धर्म को बदनाम करने की जो कोशिश की है वो उनको साफ नजर भी आती है। लेकिन चाहकर भी कुछ कर नही सकते है।

इसी के मद्देनज़र देश की कला संस्कृति, मानवतावादी लोगो ने अपने अपने माध्यमो से आवाज़ उठाना भी शुरू की तो कुछ लोगो को आतंकवादी कहकर खामोश कर दिया कुछ लोग को धर्म का दुश्मन कहकर खत्म कर दिया तो कुछ को धमकियाँ देकर बर्बाद करने की बात कहीं जिससे उन मानवतावादी लोगो ने इन सबसे किनारा कर लिया और खुद की ज़िंदगी जीने लगे और कुढ़ने लगे जिसको चाहकर भी कुछ नही कह सकते ।
इसी बीच एक ऐसा निर्देशक, लेखक, कलाकर्मी अनुभव सिन्हा निकला जिसने इस मुद्दे को गहराई से समझा और ऐसी फिल्म को बनाया है जिससे लोगो के बीच जो नफ़रत बोई जा चुकी है उसको खत्म करने का एक साहसिक प्रयास किया और फ़िल्म को देखने वाले लोगो के दिमाग़ में वो सवाल उठाए जिससे उनको मालूम हो कि जिस रास्ते मे वोट बैंक की राजनीति धर्म की आड़ मे करने वाली राजनैतिक दलों के चक्कर मे फंसने वाले आम इंसान को मालूम हो कि आखिर वो कहाँ जा रहा है जिससे उसको और उसके बच्चों का जीवन इस नफ़रत की आग से बच सके, इसलिए अनुभव सिन्हा ने ' मुल्क' जैसी फ़िल्म बनाई है ।
अनुभव सिन्हा का इस फ़िल्म को बनाने की केवल एक ही मंशा है वो है प्रेम, मोहब्बत, इंसानियत फिर से समाज और देश मे फैल सके जिससे वो देश के लोग आगे बड़े और अपना भविष्य बचा सके वरना देश को तोड़ने वाली शक्तियां इसकी खूबसूरती को तहस-नहस कर देंगी ...आज अपने देश को बचाये रखने की ज़िम्मेदारी हर हिंदुस्तानी की है चाहे वह किसी धर्म, जाति वर्ग का ही क्यो ना हो.....
जय हिंद

अकरम हुसैन क़ादरी

बुधवार, 1 अगस्त 2018

अखण्ड भारत पर आरएसएस का सच- अकरम क़ादरी



अखण्ड भारत, भारत के प्राचीन समय के अविभाजित स्वरूप को कहा जाता है। प्राचीन काल में भारत बहुत विस्तृत था   जिसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, बर्मा, थाइलैंड आदि शामिल थे। कुछ देश जहाँ बहुत पहले के समय में अलग हो चुके थे वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि अंग्रेजों से स्वतन्त्रता के काल में अलग हुये।
अखण्ड भारत वाक्यांश का उपयोग हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों शिवसेनाराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा विश्व हिन्दू परिषद आदि द्वारा भारत की हिन्दू राष्ट्र के रूप में अवधारणा के लिये भी किया जाता है।
इन संगठनों द्वारा अखण्ड भारत के मानचित्र में पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि को भी दिखाया जाता है। ये संगठन भारत से अलग हुये इन देशों को दोबारा भारत में मिलाकर अविभाजित भारत का निर्माण चाहते हैं। अखण्ड भारत का निर्माण सैद्धान्तिक रूप से संगठन (हिन्दू एकता) तथा 'शुद्धि से जुड़ा है।
भाजपा जहाँ इस मुद्दे पर संशय में रहती है वहीं संघ इस विचार का हमेशा मुखर वाहक रहा है। संघ के विचारक हो०वे० शेषाद्री की पुस्तक The Tragic Story of Partition में अखण्ड भारत के विचार की महत्ता पर बल दिया गया है। संघ के समाचारपत्र 'ऑर्गनाइजर' में सरसंघचालक मोहन भागवत का वक्तव्य प्रकाशित हुआ जिसमें कहा गया कि केवल अखण्ड भारत तथा सम्पूर्ण समाज ही असली स्वतन्त्रता ला सकते हैं।
भारत में मुस्लिम शासकों से पूर्व भारत छोटे छोटी रियासतों में बंट गया था, जिन्‍हें पुन: मिलाकर मुस्लिम शासकों ने अखण्‍ड भारत की स्‍थापना की थी। वर्तमान परिस्थितियों में अखण्‍ड भारत के सम्‍बन्‍ध में यह कहना उचित होगा कि वर्तमान परिस्थियों में अखण्‍ड भारत की परिकल्‍पना केवल कल्‍पना मात्र है, ऐसा सम्‍भव प्रतीत नहीं होता है। शिवसेना के सुप्रिमो व हिन्दु ह्रदय सम्राट कहे जाने वाले बाल ठाकरे ने अखण्ड भारत कि स्थापना मे पहले बचे हुए भारत को हिन्दु राष्ट्र घोषित करने के लिए शिवसेना को चुनाव मे उतारा हैं।
अखंड भारत में आज के अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका आते है केवल इतना ही नहीं कालांतर में भारत का साम्राज्य में आज के मलेशिया, फिलीपीन्स, थाईलैंड, दक्षिण वियतनाम, कंबोडिया ,इंडोनेशिया आदि में सम्मिलित थे। सन् 1875 तक (अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका) भारत का ही हिस्सा थे लेकिन 1857 की क्रांति के पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी उन्हें लगा की इतने बड़े भू-भाग का दोहन एक केंद्र से  करना संभव नहीं है एवं फुट डालो राज करो की नीति अपनायी एवं भारत को अनेकानेक छोटे-छोटे हिस्सो में बाँट दिया केवल इतना ही नहीं यह भी सुनिश्चित किया की कालांतर में भारतवर्ष पुनः अखंड न बन सके।

अफ़ग़ानिस्तान (1876) :विघटन की इस श्रृंखला का प्रारम्भ अफ़ग़ानिस्तान से हुआ जब सन् 1876 में रूस एवं ब्रिटैन के बीच हुई गंडामक संधि के बाद अफ़ग़ानिस्तान का जन्म हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे देश बंटने लगे भूटान (1906),तिब्बत (1914),श्रीलंका (1935),बर्मा(1937),पाकिस्तान (1947) में बंट गया जिससे हमारी शक्ति भी कुछ कम हुई, इसके बाद आज कश्मीर को अलग होने की मांग हो रही है, गोरखालैंड की मांग, खालिस्तान की भी मांग हो रही है, लेकिन वर्तमान समय मे देश की सरकार ने जो कदम उठाए है वो हिन्दुत्त्व के मुद्दों के खिलाफ है जैसे असम में हिन्दू,मुस्लिमो और पूर्व सेना के सिपाहियों को भी वो वोटर लिस्टसे हटा दिया गया है आश्चर्य तो तब हुआ जब देश के पांचवे राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली मोहम्मद के परिवार के लोगो का भी उनकी लिस्ट में नाम नही था, बल्कि एक विद्यायक का भी नाम नही है जबकि वो वर्तमान में उसी विधानसभा से विधायक भी है, अब सोचना यह है कि यह सरकार केवल अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, विद्यार्थी और महिला विरोधी ही नही है बल्कि हिन्दू विरोधी भी है जो 40 लाख लोगों को अखण्ड भारत से कम करना चाहती है जिससे भारतीय संस्कृति, शिक्षा, संस्कार, और भाषा को प्रोत्साहन कैसे मिलेगा....सरकार पूरे तरह सत्ता की लोभ में फंस चुकी है...अगर हमे सच मे अखण्ड भारत बनाना है तो सबसे पहले मानवता का प्रचार प्रसार करना होगा उसके बाद, सबको अपना बनाकर अपने अखण्ड भारत के सपने को पूरा करना होगा, अंग्रेज़ो की भांति, फुट डालो राज करो कि नीति को छोड़कर सभी नागरिकों की शिक्षा, रोज़गार,, स्वास्थ्य, मकान की परवाह करके नागरिकों का दिल जीता जा सकता है, नफरत की राजनीति बन्द करके सबको साथ लेकर चलना होगा

- अकरम क़ादरी

रविवार, 22 जुलाई 2018

दिलो को मोहब्बत की रौशनी से भर, अज़हरी मियाँ हुए रुखसत- अकरम क़ादरी



आज बरेली शरीफ में हज़रत हुज़ूर अख्तर रज़ा खां उर्फ अज़हरी मियां हुज़ूर के नमाज़े जनाज़े में लगभग एक करोड़  लोगों ने शिरकत की,आज 10:30 बजे उनकी नमाज़ ए जनाज़ा अदा की गई इस ग़मज़दा माहौल में क्या मुसलमान क्या हिन्दू सबकी आँखे नम थी,जनाज़े में शामिल हर इंसान ने हिन्दुस्तान के सूफी परम्परा के फ़रज़न्द को नम आंखों से आखिरी विदाई दी, लगभग
तीस ज़िलों की पुलिस ने इंतेज़ाम को संभाला ।
भारत के लगभग हर राज्य से मुरीदीन आये उसके अलावा 127 मुल्क से आये जायरीन ने अपनी अक़ीदत का इज़हार किया और अज़हरी मियां के जनाजे में शामिल हुए जबकि तुर्की के राष्ट्रपति तय्यब एरदोगान ने भी ग़मज़दा होकर अपनी अक़ीदत का इज़हार रुंधे हुए गले से किया, उसके अलावा दावत ए इस्लामी के अमीर हज़रत मौलाना इल्यास अत्तार क़ादरी   ने भी गम का इज़हार किया इसके अलावा मारूफ और मशहूर पाकिस्तान के नात खां हज़रत ओवैस रज़ा क़ादरी ने भी अपने ग़म का इज़हार करते हुए हुज़ूर अज़हरी मियां के मुरीदीन को सब्र करने के लिए दुआ की। 
    बरेली शरीफ को आला हज़रत के नाम से पूरी दुनियाँ में जाना जाता है जिससे आला हज़रत के उर्स में भी जिस तरीके से हिन्दू- मुस्लिम मिलकर जायरीन की खिदमत करते है उसी तरह से आज ग़मज़दा माहौल में भी हिन्दू भाइयों ने गर्मी, बारिश को देखते हुए प्याऊ, कूलर, पंखे और अपने घर के दरवाज़े खोल दिए जिससे हिन्दू मुस्लिम एकता और मानवता का संदेश एक बार फिर बरेली शरीफ से दुनियाँ में पहुंचा जो सच मे इंसानियत का एक जीता जागता नमूना है। 
हुज़ूर ताजुशशरिया को शरीयत का ताज माना जाता था आपने दुनियाँ में अनेक इस्लामी, दुनियावी, समाजी मुद्दे पर क़ुरान, हदीस और शरीयत की रोशनी में फतवे दिए जिससे पूरी दुनियां को सूफी इस्लाम परम्परा का एक सही रुख नज़र आया। 
   हिंदुस्तान के सियासत के कई सूरमाओं ने उनको अनेक लालच दिए लेकिन उन्होंने हमेशा इसको नकार दिया, बल्कि यहां तक किसी भी राजनेता से मिलने तक को इनकार कर दिया, आपको पूरी दुनियां में तस्सवुफ को फैलाना था जो काम आपने अपने आखिरी समय तक किया, पिछली मीडिया रिपोर्ट से मालूम होता है कि फ़िल्म स्टार संजय दत्त, अमर सिंह, राहुल गांधी तक को मायूस होकर लौटना पड़ा था जब हज़रत ने उनसे मिलने को मना कर दिया था, एक दो बार कुछ राजनेताओं ने MLC बनाने की उनको ख्वाहिश पाली तो उनसे साफ मना कर दिया, 
दरअसल इन सबके पीछे उनकी तरबियत, और इस्लामी तालीम का ही नतीजा था जो वो किसी भी तरह के सियासी जाल में नही फंसे बल्कि तस्सवुफ और इंसानियत के लिए ज़िन्दगी भर काम करते है । अल्लाह से दुआ है कि ऐसी नेक सीरत और सूरत वली ए कामिल को जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मुकाम अता फरमा
अमीन 

अकरम हुसैन कादरी 
अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

मरे नही चले गए 'नीरज' - अकरम हुसैन

मरे नही चले गए 'नीरज' - अकरम हुसैन
मरना और चले जाना यह दो बातें अलग अलग है एक आम इंसान मर जाता है, लेकिन एक रचनाकार, शायर, साहित्यकर्मी, मानवतावादी और बुद्धिजीवी कभी नही मरता क्योकि उसके किए हुए कर्म हमेशा ज़िन्दा रहते है, बल्कि यूं कहें वो इतिहास के सुनहरे पन्नो में हमेशा ज़िन्दा रहता है और पूरी इंसानियत की सेवा अपनी कलाकृतियों से करता रहता है।
गत शाम को एक दिल दहला देने वाली ख़बर मिली कि साहित्य जगत के पुरोधा पद्मश्री गोपालदास नीरज इस आभासी दुनियाँ से कूच कर गए है खबर तो सच मे बहुत हॄदय विदारक थी लेकिन जब कुछ समय बाद मानसिक स्थिति ठीक हुई तो दिल और दिमाग ने यह गवारा नही किया कि नीरज जी हमारे बीच नही है बल्कि दिमाग मे तुरन्त आया कि वो तो हमारे बीच अपने गीतों के माध्यम से हमेशा ज़िन्दा रहेंगे, और ज़िन्दा है बल्कि कुछ यूं  कहें कि उनकी आत्मा तो ज़िन्दा ही है केवल शरीर ही साथ छोड़ गया है वैसे भी गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि 'आत्मा अजर और अमर' है।
अलीगढ़ आने के बाद गोपालदास नीरज जी से दो बार मिलना हुआ एक बार उनके घर पर तो दूसरी बार अमर उजाला के एक कार्यक्रम मे जिसमे उनके द्वारा बताए हुए इंसानियत के रास्ते हमेशा याद रहेंगे। क्योंकि उनके जीवन मे एक पर्याप्त अनुभव तो था ही उसके अलावा उन्होंने जीवन को कई उबड़-खाबड़ रास्तो से होकर गुजारा था तो वो उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करता रहता था, ज़िन्दगी में कितना भी कठिन समय आया उन्होंने उसका डटकर सामना किया और साहित्य के साथियों को हमेशा इंसानियत की सीख दी.....उन्होंने शुरू में टाइपराइटर के रूप में भी काम किया, अध्यापक भी रहे जब वो मायानगरी पहुंचे तो सबसे बड़े गीतकार भी बने, लेकिन उन्होंने सब मोह माया को छोड़कर इटावा से लेकर मुम्बई तक की ज़मीन नाप ली, फिर भी वो अलीगढ़ जैसे शहर में आकर बस गए और साहित्य के लिए तत्तपर रहे, ज़िन्दगी के नो से ज्यादा दशक गुज़ारने के बाद भी उनमें किसी भी प्रकार का कोई घमण्ड, गर्व नही था बल्कि वो जिससे मिलते थे तो वो उनका मुरीद हुए बिना नही लौटता था ...

बुधवार, 18 जुलाई 2018

टी.वी डिबेट की नफ़रत में मौलानाओं की ज़रूरत- अकरम क़ादरी

दोस्तो इससे पहले एक ब्लॉग लिख चुका हुं, जिसका सब्जेक्ट था 'टी. वी. डिबेट इंसानियत को खतरा'
टी. वी डिबेट में मौलानाओं का बुलाने का मक़सद बहुत साफ है कि यह मीडिया के काम को आसान करते है और शाम लगभग 5 से 10 बजे के वक़्त न्यूज़ चैनल की रंगत को बढ़ाया जाता है जहां से न्यूज़ चैनल को TRP  नाम की चिड़िया को भी पकड़ने में आसानी होती है।
आजकल जितने भी न्यूज़ चैनल है ज्यादातर की प्रतिष्ठा गिर चुकी है वो लोग एक षड्यंत्र के तहत काम कर रहे है जो किसी राजनैतिक पार्टी को एक तरफा लाभ पहुंचाने के लिए लगातार मेहनत कर रहे है । किसी भी न्यूज़ चैनल के डिबेट पैनल में एक दाढ़ी टोपी वाला व्यक्ति ज़रूर दिखेगा क्योंकि वही एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अभद्र भाषा के साथ जुमले सुन सकता है, मौका लगने पर पिट भी सकता है और किसी भी न्यूज़ चैनल, का कुछ भी नही बिगड़ता है क्योंकि वो तो अपने षडयंत्र में भरपूर तरीके से काम कर रहे है।
पिछले दिनों एक जुमला बड़ा मशहूर हुआ था किसी बड़े संगठन के प्रवक्ता ने टी.वी डिबेट में खुलेआम कहा था 15 सेकंड में अल्पसंख्यकों को खत्म कर देंगे, दूसरी तरफ एक प्रवक्ता ने कहा था कि 'मुल्ला जी मंदिर वही बनाएंगे' इस पर सोशल मीडिया पर काफी तंज़ भी हुए थे जिसमें जवाब में कहा गया था " लेकिन डेट नही बनाएंगे"
दरअसल वर्तमान सरकार ने जितने भी वादे किए थे उन वादों में से कोई वादा पूरा नहीं किया जिसके चलते देश के शीर्षस्थ संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति कहता है कि यह हिंदुओ की पार्टी है यह मुस्लिमो की, इससे उसकी मानसिकता और उसके पिछले 4 साल के कामकाज का स्तर समझ मे आता है, दूसरी पार्टी के बड़े नेता का बयान आता है कि अगर वो पार्टी सत्ता में आई तो हिन्दू पाकिस्तान बन जायेगा जिससे साफ लग रहा है जो मीडिया चाहता है वो मटेरियल हमारे नेता ईमानदारी से उपलब्ध करा रहे है जो जुमले बोले और ट्वीट किए जाते है उनपर जमकर बहस एक टोपी दाढ़ी वाले मौलाना साहब के साथ होती है जिससे माहौल खूब कम्युनल होता जाता है और तथाकथित देशभक्त पार्टी को वोट की लहलाती फसल मिल जाती है, इन टी.वी डिबेट के ही कारण नफरत इतनी फैल चुकी है कि मदर टेरेसा जैसे व्यक्तित्व से भी भारत रत्न वापस लेने की बात एक सांसद कर चुके है...भीड़ सड़क पर ही अफवाहों के चक्कर मे फैसला कर देती है, कभी कभी पुलिस मूकदर्शक बनकर देखती रहती है लेकिन मिदनापुर में जो घटना घटी है उसको भी ध्यान में रखना चाहिए। अति उत्साहित समर्थकों ने अब पुलिस को ही पीटना शुरू कर दिया है, जबकि यह पिछले 4 साल से एक धर्म विशेष के लोगो पर ही हमले कर रहे थे। यह सब घटनाएं ऐसे ही नही हो रही है बल्कि हर चौराहे पर यह टी.वी डिबेट के एंकर, प्रवक्ता, नफरत का व्यापार कर रहे है जिससे लोग किसी भी अफवाह में किसी भी को पीट दे रहे है
कल ही कि बात है कि महान मानवतावादी कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर भी एक पार्टी विशेष के युवाओं द्वारा एक कार्यक्रम से पहले पिटाई कर दी गयी जबकि वो काफी बुजुर्ग व्यक्ति है....देश मे संस्कारो का गिरता यह ग्राफ चीख चीख कर कह रहा है यह सब टी.वी डिबेट का ही ज़रिया है जिसके माध्यम से नफरत ही नफरत फैल रही है हमारे नोजवान दंगाई बन रहे है वो वक़्त भी दूर नहीं जब यही नोजवान अपने माँ-बाप, दादा, दादी पर भी धौंस जमाएंगे और उनपर पर हमला करेंगे अंततः मानवता का हनन ही होगा.....
अकरम हुसैन क़ादरी