गुरुवार, 20 अगस्त 2020

सुरीनामी राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी ने बढ़ाया भारतवंशियों का मान- अकरम क़ादरी

सुरीनामी राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी ने बढ़ाया भारतवंशियों का मान - अकरम क़ादरी

यह लगभग 05 जून 1834 के आसपास की बात है जब लालारुख जहाज़ कलकत्ता प्रवासी घाट से उत्तर भारतीयों को कैरिबियाई देशों में ले जा रहा होगा तो उन गिरमिटिया मज़दूरों ने सोचा भी नहीं होगा कि जो लोग (डच कॉलोनाइजर) उनको दास बनाकर ले जा रहे है उनकी आने वाली पीढियां कभी उसी देश का नेतृत्व करेंगी। शायद एक श्रमिक के लिए यह सोचना बहुत मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं है। सूरीनाम जैसे विषय पर शोध एवं आदरणीया पुष्पिता अवस्थी के साहित्य का विश्लेषण करते हुए मुझे महसूस हुआ कि भारतवंशियों की भले ही यह पांच या छः पीढियां हो लेकिन उनकी भारतीयता अभी तक खत्म नहीं हुई बल्कि शोध से पता चलता है वो हमसे ज़्यादा भारतीय है क्योंकि वो आज भी हमारी संस्कृति, सभ्यता, समाज, संस्कार और भाषा को इतनी मज़बूती से पकड़े हुए है कि उनकी कई पीढियां बदल जाने के बाद भी वो नहीं बदले वो मेहनतकश भारतवंशी आज भी कई पीढ़ियों के गुज़र जाने के बाद भी वर्तमान समय के आधुनिकीकरण के दौर में भी आधुनिक खूब हुए लेकिन कभी भी अपनी संस्कृति, संस्कार, तीज़, त्यौहार, परंपराओं से समझौता नहीं किया बल्कि हिंदी भाषा को सीखने के लिए आज भी मंदिर, मस्ज़िद, मठ जाकर वो मन लगाकर सीखते है। भारत का सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो में स्थित दूतावास भी उनकी सहायता करता है लेकिन जो कार्य प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी ने 2001 के आसपास जाकर फर्स्ट सेक्रेटरी के रूप में किया वो सच मे काबिले तारीफ़ है उस पर भी गौर करना चाहिए। पुष्पिता अवस्थी ने सबसे पहले उनको भारतीय संस्कृति की अलख को दोबारा प्रज्वलित करने का संघर्ष किया है हालांकि यह उनके डीएनए में मौजूद थी लेकिन उसको सही दिशा देने में पुष्पिता अवस्थी ने साहित्य के माध्यम से जो काम किया वो विशिष्ट है। 
पूरी दुनिया मे छाए हुए भारतवंशियों की हाड़-मास तोड़ देने वाली मेहनत एकाग्रता और मेघा के ही बल पर पूरी दुनिया में अपना नाम रोशन कर रहे है। एक तो भारतवंशी रंग-रूप से तो अलग दिखते ही है फिर भी कुछ नस्लभेदी टिप्पणी करने वाले लोगो की आंखे की किरकिरी भी बने रहते है फिर भी अपनी मेहनत के द्वारा उन्होंने भारत का नाम रौशन किया है। 
सुरीनाम के भारतवंशी आज भी स्वयं को भारतवंशी ही कहलाने में गौरवान्वित महसूस करते है और अपने पूर्वजों की ज़मीन से पहुंचने वाले हर व्यक्ति का सम्मान वैसे ही करते है जैसे हमारे भारत मे होता है।
सुरीनामी की राजनीति में 42 प्रतिशत भारतवंशियों ने स्वयं को वहां सिद्ध किया है उसके अलावा इस छोटे से देश मे चायनीज़, जापानी, नीग्रो, मोरक्की और दूसरे देशों के भी नागरिक रहते है लेकिन गर्व का विषय यह है कि भारतवंशियों का डंका आज भी बज रहा है क्योंकि उसके पीछे उनका असाधारण विवेक, संस्कृति और उस देश के लोगो मे अपनी अलग पहचान को स्थापित करना है। यदि सूरीनाम के भारतवंशियों के बारे में जानने की उत्सुकता है तो पुष्पिता अवस्थी का साहित्य पढ़ना होगा जिसमें उन्होंने सूरीनाम नाम से ही दो किताबे लिखी है जिनमे सूरीनाम का इतिहास एवं भारतवंशियों के संघर्ष का विस्तृत वर्णन मिलेगा। उसके अलावा भारतवंशियों पर लिखे गए एक उपन्यास को भी पढ़ना चाहिए जो 2018 में कुसुमांजलि फॉउंडेशन द्वारा सम्मानित हुआ है। छिन्नमुल उपन्यास पर कई पत्रिकाओं ने अपने विशेषांक भी प्रकाशित किए है। 
अंततः कहा जा सकता है कि आज संतोखी जो राष्ट्रपति बने है वो भारतवंशियों की एकता, अपनत्त्व का भाव, संस्कृति से प्रेम, भाषा के प्रति अनुराग का ही परिणाम है क्योंकि वो दूसरे देश मे पीढ़ियों से रह रहे है लेकिन उन्होंने भारतीयता को खत्म नहीं होने दिया अपनी पहचान को बनाये रखा। कहा जाता है मानसिक रूप से हमे आधुनिक होना चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति, संस्कार को कभी नहीं छोड़ना चाहिए इसी कारण भारतवंशी विश्वपटल पर अपने को स्थापित कर रहे है और देश को गौरवान्वित महसूस करा रहे है। 
सूरीनाम के राष्ट्रपति ने शपथ वेद को हाथ मे लेकर ली हालांकि वहां की राजनीति में धर्मगत गठजोड़ नहीं है, ना ही किसी भी प्रकार से धर्म से नफरत की राजनीति की जाती है फिर भी अपने संस्कार को अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए ऐसा किया है कि मैं अपने देश के प्रति वफादार हूं और ईमानदारी से देश की सेवा करूँगा।
समाज का एका बनाने में  साहित्य की महती भूमिका है। अगर पुष्पिता अवस्थी जी द्वारा हिंदुस्तानियों के साहित्य को संग्रहित कर ,उनपर 15 वर्षों से लेखन कर जो महान कार्य किया गया है। उसका परिणाम आज
सामने है उन्होंने 2003 में साहित्य मित्र, और विद्यानिवास सूरीनाम साहित्य सन्स्थान, का गठन किया। जहाँ से शब्द -शक्ति और हिंदीनामा पत्रिका का प्रकाशन किया साथ ही यह वही पुष्पिता अवस्थी है जिन्हें कवि और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भेजते समय यह कहा था इस बार मै एक कवि को भेज रहा हूँ और उन्होंने वहाँ सातवे विश्व हिंदी सम्मेलन को आयोजित करने में सरकार के साथ मिलकर इसे सिद्ध कर दिया। भारतीय सांस्कृतिक केंद्र ,सूरीनाम में बतौर हिंदी प्रोफेसर सृजनात्मक काम करके देश का नाम  रौशन किया।

जय हिंद

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

अवाम की ज़ुबान थे, राहत इंदौरी - अकरम क़ादरी

अवाम की ज़बान थे, राहत इंदौरी- अकरम क़ादरी

बहुत से शायर, कवि गुज़रे है, जिन्होंने समसामयिक राजनीति या मुद्दों पर खुलकर बोला, लिखा है और जो बोला वो कड़वा सच भी था लेकिन कभी सत्ता वालो ने उनके साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया बल्कि उनसे सीख लेकर अच्छा करने का प्रयास किया, अगर अच्छा नहीं कर पाए तो खामोश रहे लेकिन कभी कुतर्क नहीं किया उनको जेलों में नहीं पहुंचाया उनपर संगीन धाराएं नहीं लगाई बल्कि आलोचना (तनक़ीद) को सिर माथे पर लेकर उनके सजेशन को समझा वाद-विवाद हुआ, कुछ अच्छा निकल कर आया जिससे मानवता का लाभ हुआ।
 डॉ. राहत इंदौरी कबीर के मानिंद एक फक्कड़ शायर, जनमंच की कड़वी और सच्ची आवाज़, जनपक्ष का नायक, दुनियाभर के मुशायरों की जान, मिजाज़ से ज़िद्दी, मीडिया की बुज़दिली के आलोचक, मज़हब के दौर में उसकी पहचान की राजनीति के घोर विरोधी।
राहत साहब इस देश मे धर्म निरपेक्षता के पक्षधर शायर थे, जो अपनी शायरी के माध्यम से शानदार कटाक्ष करते थे जिसको बहुत कम लोग समझते थे, जो समझते थे- वो बहुत हंसते थे और सोचने को मजबूर  भी हो जाते थे, जो कहना चाहते है वो कह चुके है और सत्ता के कानों तक उनकी आवाज़ पहुंच भी रही है जिसमे उन्होंने मशहूर शेर भी कहा है-
"हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते है।
मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते है।।"
इस शेर के माध्यम से वर्तमान स्थिति को बताना चाहते थे कि आखिर किस तरह से एक अल्पसंख्यक तबके को परेशान करने की साज़िश चल रही है। फिर भी वो इस देश की मिट्टी से बेइंतेहा मोहब्बत का सबूत पेश करते करते थक गया है लेकिन बहुसंख्यकवाद की राजनैतिक लोलुपसा ने देश को बर्बादी की तरफ मोड़ दिया है। वो हमेशा मंच, मुशायरों के माध्यम से देश के सभी राजनेताओ को हमेशा देश की उन्नति का संदेश देते रहे क्योंकि एक शायर रास्ता ही बता सकता है लेकिन अमल करना या नहीं करना यह राजनेताओ पर होता है। आजकल राजनेता के कान में जूं भी नहीं रेंगती है क्योंकि उनको पता है कि उनका सेक्युलरिज्म से कुछ नहीं होने वाला है उन मुद्दों को हवा दो जिससे उनका मकसद पूरा हो जिसमे वो कटाक्ष लहज़े में कहते भी है- 
"जुगनुओं को साथ लेकर रात रौशन कीजिये।
रास्ता सूरज का देखो तो सहर हो जाएगी।।"
इस शेर के ज़रिए वो कहना चाहते है कि देश मे अल्पसंख्यक नाम के जो छोटे छोटे जुगनू है उनको भी साथ लेकर चलो जिससे उजाला निश्चित ही होगा लेकिन तुम जिस सूरज को साथ लेकर चल रहे हो उसका अस्त होना निश्चित है और उसके ज़्यादा पास जाओगे तो जल भुन जाओगे इसलिए नफ़रत का रास्ता छोड़ो, देश को मोहब्बत से जोड़ना सीखिए इसी संदर्भ में वो कहते है कि- 
"मिरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे।
मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले।।"
भारत मे मोहब्बत के पैरोकार के रूप में राहत साहब को पहचाना जाता है, वो चाहते थे कि सभी लोग इस देश मे उसी मोहब्बत से रहे जिस मोहब्बत से अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ लड़कर उनको भगाया था, भाईचारा, प्रेम, मोहब्बत देश का गौरव है इसको बचाकर रखिये वरना आने वाला समय बहुत खराब होगा आज देश के पड़ोसी चारो तरफ से हमारे दुश्मन बने हुए है क्योंकि उनको पता है हमारे देश मे राजनेता अंदरूनी कलह को ज़िंदा रखना चाहते है पहले वो धर्म के नाम पर बांटते है फिर जाति, वर्ण के नाम पर भेद करते है फिर भी अगर पेट नहीं भरता या अभिलाषा पूरी नहीं होती है, तो क्षेत्र के नाम पर बांटकर अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करते है। पहले के नेता देश को जोड़ने की बात करते थे, लेकिन आज के नेता देश को तोड़ने की बात करते है। बहुसंख्यक राजनीति को वरीयता देते है हर पार्टी विशेष ने अपने-अपने खांचे तैयार कर लिए है अगर उन खांचों पर कोई मुद्दा फिट बैठता है तो उस पर आवाज़ उठाते है वरना खामोश रहते है। जिससे देश की धर्मनिरपेक्ष आत्मा को आघात पहुंचता है देश का ताना-बाना टूटने का डर बना रहता है जिस पर वो स्वयं कहते है - 
"घर के बाहर ढूंढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है"
इस दौर में मतलबी अदब के लोगो को उन्होंने अपने तरीके से जवाब दिया है क्योंकि इस देश मे अनेक अदब वालो की संस्थाएं है- लेकिन बहुत कम संस्थाएं आज दलित, आदिवासी,महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आवाज़ को उठाती है अपनी अदब बिरादरी को भी ललकारते हुए वो कहते है कि-
"हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे।
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते।।" 
साहित्य जगत से वो कहना चाहते है जिस प्रकार से वर्तमान समय मे ज्यादातर लेखक सहित्य से जुड़े लोग सरकारो की ग़ुलामी में लगे है देश की मानवता का चीर-हरण हो रहा है वो खामोश है उससे भी देश को बहुत खतरा है। हमे मिलकर एकजुट होकर देश को बचाने का प्रयास करना चाहिए सबको बिना किसी लाग-लपेट, धर्म-जाति, वर्ण-विभेद, ऊंच-नीच के देश की अखण्डता, एकता, संप्रभुता को बचाने का प्रयास करना चाहिए। 
एक जिंदादिल शायर जिसने अपना बचपन बहुत तंगियो में गुज़ारा फिर भी कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की खामोशी से इतनी मेहनत की इस देश का नाम पूरी दुनिया मे रौशन किया हर जगह इसकी पहचान को ज़िंदा रखा लेकिन जब भारत मे मुशायरा पढ़ा तो इश्क-मोहब्बत की शायरी भी की और सियासी तंज़ का भी जादू बिखेरा जो आज भी प्रासंगिक नज़र आती है। 
"बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए।
मैं पीना चाहता हूं पिला देनी चाहिए।।"
हिंदुस्तान के महबूब शायर के बारे में ज़्यादा लिख पाना मेरे बस की बात तो नहीं है लेकिन कुछ बातों को बताने का प्रयत्न ज़रूर किया है यह वो अज़ीम शायर था जिसको उसके दुश्मन भी इस्तेमाल करते थे और दोस्त भी, राहत इंदौरी ने कभी तुकबंदी और मंचीय शायरों को ज़्यादा तरज़ीह नहीं दी क्योंकि जो लोग केवल तुकबंदी करके जनता की भावनाओ को बस में करके उनको केवल भावुक करदे वो इसके ख़िलाफ़ थे बल्कि वो चाहते थे कोई भी मुशायरे में आये तो वो कुछ सीखकर जाए जो उसको तमाम उम्र काम आए आजकल ज्यादातर मुशायरों में फालतू की भगदड़, हू-हल्ला बचा है इसलिए एक दो शायर के साथ उन्होंने मंच शेयर करना बंद कर दिया था क्योंकि उन मुशायरों में वही लोग होते थे जो भावुक होते है लेकिन जहां गम्भीर और सीरियस लोग मुशायरा सुनने आते थे वहां पर राहत साहब ज़रूर जाने की कोशिश करते थे। आखिर में हिंदुस्तान की मोहब्बत के लिए उन्होंने जो शेर लिखा है उसको इस देश के सभी वर्गों को समझना चाहिए 
"मैं मर भी जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना।
लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना" 
राहत साहब ने तमाम उम्र अवाम के बीच में  रह कर अवाम की अवाज़ उठाई, उन के शेर हिन्दुस्तान के बच्चे बच्चे की ज़बान पर रटे  हुए थे, पिछ्ले कुछ  दिनों  में  उनकी ग़ज़ल  का एक शेर बहुत चर्चा में  रहा,
बुलाती है मगर जाने का नई
ये दुनिया है इधर आने का नई
बाद में  इस ग़ज़ल  पर राहत साहब ने बहुत से शेर जोड़े,  जिन में ये शेर अवाम के अन्दर के हौसले को ज़िन्दा रखने के लिए सदियों  तक याद किया जाता रहेगा
वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर ज़ालिम से डर  जाने का नई

डॉ. अकमल पीलीभीती का यह शेर राहत इन्दौरी की अचानक मौत के भाव को प्रदर्शित करता है-
अब तेरे शहर में  रुकने की इजाज़त ही नहीं, 
जा बचाने को कोई रख्त-ए-सफ़र चाहता  है


अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

बुधवार, 5 अगस्त 2020

नई शिक्षा प्रणाली से कैसे पैदा होंगे शास्त्री और कलाम- अकरम क़ादरी

नई शिक्षा प्रणाली से कैसे पैदा होंगे शास्त्री और कलाम - अकरम क़ादरी

देश में एक लंबे अरसे के बाद नई शिक्षा नीति आई, लेकिन इसमें सबकी प्रतिक्रियाएं अलग-अलग नज़र आई. कुछ सत्ता के लोभी लोगों ने इसको बग़ैर किसी विश्लेषण एवं दूरदृष्टि के अद्वितीय घोषित कर दिया तो कुछ विपक्षियों ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में विरोध किया लेकिन हकीकत कोई भी सामने नहीं रख सका. इस दौर में जहाँ एक तरफ़ वैश्विक महामारी (दुनियावी वबा) है जिसकी वजह से सड़कें सूनी है. उन पर जनपक्ष के लोगों का विचरण नहीं हो रहा है. कोई भी कुछ बोलने को राज़ी नहीं है. फिर भी ज़्यादा ना लिखते हुए चन्द बातों की तरफ ध्यान दिलाना चाहूंगा कि यह जो शिक्षा नीति है, इससे शिक्षा का बाज़ारीकरण हो रहा है जिसको देश के बड़े-बड़े पूंजीपति चलाएंगे, जिसके कारण देश के गरीब, मज़दूर, किसान, आदिवासी, दलित और 'सलीम' पंचर वाले क़ा बच्चा नहीं पढ़ पायेगा क्योंकि मुझे लगता है आत्मनिर्भर बनाने के चक्कर मे शिक्षा को तीन हिस्सों में विभाजित कर दिया गया है जिसमें रिसर्च यूनिवर्सिटीज को स्वायत्तता प्रदान की गई है जिसका सीधा मतलब पूंजीवाद से है जिसको अंग्रेज़ी में फाइनेंशियल ऑटोनोमी कहते है इसके तहत किसी भी यूनिवर्सिटी को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने ख़र्चों को खुद उठाना होगा जिससे जो शिक्षा गरीबों, दबे, कुचलों को मिल रही थी शायद वो ख़त्म हो जाएगी, उसकी जगह पर केवल अमीर के ही बच्चे पढ़ सकेंगे और "गुदड़ी के लाल" वाली कहावत समाप्त हो जाएगी. फिर जो लाखो रुपये में रिसर्च या पढ़ाई करेगा तो वो क्यों ना ज़्यादा पैसा कमाने की बात करेगा जिसके लिए वो चित-अनुचित सारे काम करेगा, प्राइवेटाईज़ेशन को बढ़ावा मिलेगा. पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटीज़ को बंद कर दिया जाएगा. फिर अगर आपके पास पैसा होगा तो आप पढ़ाइये वरना जो मेहनत मजदूरी बाप करता था वही मेहनत मज़दूरी बच्चा करेगा जिससे देश का असली टैलेंट मारा जाएगा. नेपोटिज़्म और फ़ेवरटिज़्म को बढ़ावा मिलेगा. 
जिस प्रकार से एक गरीब मछुआरे का बेटा साइंटिस्ट बनकर राष्ट्रपति  कलाम बन गया, एक गुदड़ी का लाल "लाल बहादुर शास्त्री" देश का प्रधानमंत्री बन गया, एक चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन गया तो क्या आने वाले समय में यह सोचा जा सकता है- जब शिक्षा महंगी हो जाएगी हम ऐसे साइंटिस्ट, राजनेता, उद्यमी, पब्लिक सर्वेंट पैदा कर पाएंगे जो देश को ख्याति प्रदान करे, जिससे देश विकास कर सके, शायद बहुत मुश्किल है फिर भी नामुमकिन नहीं है क्योंकि जो खुशबू होती है वो बाहर ज़रूर आती है. कुछ परेशानियां तो महसूस होती है लेकिन संघर्ष का फल बहुत अच्छा होता है. ऐसे प्रतिभावान लोग अपने दादा, परदादा, बाप की संपत्ति बेचकर शिक्षा ग्रहण करेंगे और  कोशिश करेंगे कि दूसरे लोगो के बराबर आ सके. देश में जितने भी मोस्ट सक्सेसफुल लोग हुए हैं वो ज़्यादातर गरीब, मज़दूर ही रहे है चाहे वो कोई भी हो इस शिक्षा नीति से मुझे नहीं महसूस होता है. ऐसे लोगों को बढ़ावा मिलेगा बल्कि इनके हौंसलो को कम किया जाएगा. इनको शिक्षा की पहुंच से दूर रखकर वो लोग सत्ता पर काबिज रहेंगे क्योंकि बाबा अम्बेडकर जी ने कहा था "शिक्षा वो शेरनी का दूध है जी पियेगा वो शेर की भांति दहाड़ेगा" जब वो पढ़ेगा ही नहीं तो बोलेगा कहाँ से फिर एक समय ऐसा आ जायेगा कि वो स्वयं को ज़िंदा रहने को ही बड़ी उपलब्धि मानकर ख़ामोश रहेगा. डेमोक्रेसी का धीरे-धीरे गला दबा दिया जाएगा. सत्ता में बैठे लोग हमेशा उस कुर्सी का मज़ा लेंगे. गरीब, मज़दूर, किसान, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक केवल मेहनत करेंगे और दो वक्त की रोटी का इंतेज़ाम करते रहे जाएंगे.

मुझे उमीद थी कि जब नई शिक्षा नीति आ रही है तो कुछ अच्छा होगा उसमे देश को फ्री शिक्षा दी जाएगी जो के.जी. से लेकर पीएचडी तक होगी क्योंकि शिक्षा लेना एक फंडामेंटल राइट के तहत आता है लेकिन यहां बहुत से अधिकार पहले ही छिन चुके है अब व्यापारी बनाने की कोशिश हो रही है.

स्कूल के मुख्य दरवाजे पर लिखा देखता हूँ "शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये" शायद वो अब हो जाएगा बाज़ारीकरण में आइये, व्यापारी बनकर जाइये" इससे सामाजिकता को तहस-नहस किया जा सकता है। 
सामाजिक बन्धुता को नुकसान पहुंच सकता है। देश की शिक्षा व्यवस्था को व्यापारीकरण से रोकना चाहिए पूंजीवाद जो शिक्षा व्यवस्था पर गिद्ध की तरह नज़रे गड़ाए बैठा है उसके मंसूबो को खत्म करना चाहिए। इसका उदाहरण एक वो यूनिवर्सिटी है जो अभी तक ज़मीन में आई ही नहीं है और उसको "यूनिवर्सिटी ऑफ एमिनेंस" का दर्जा मिल चुका है। लाखो करोड़ो रूपये उसको सत्ताधीशों ने दे दिए है क्या वो लोग गरीब, मज़दूर, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों के साथ साथ महिलाओं को फ्री में शिक्षा दे पाएंगे। जबकि अज़ीम प्रेमजी ने शिक्षा के विस्तार के लिए पूरे देश मे ऐसे फैलाया है कि उनके वालंटियर सरकारी स्कूलों में जाकर पढ़ाते है, गरीबो की मदद करते है कोई उनसे पैसा नहीं लेते है। क्योंकि वो शिक्षा को आम करना चाहते है हर गरीब के बच्चे को मजबूत आधार देना चाहते है जिससे देश नए आयाम स्थापित करे और विकास के पथ पर अग्रसर हो सके।
जय हिंद

शनिवार, 25 जुलाई 2020

महामना के साथ बचाऊ यादव का अहम किरदार है बीएचयू बनाने में - अमित शाश्वत

#BHU बनाने में एक बचाऊ सिंह यादव अहम योगदान।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय और शेर-ऐ-बनारस पहलवान बचाऊ सिंह यादव की अमर गाथा

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़ी रोचक घटना जब शेरे-ऐ-बनारस पहलवान बचाऊ सिंह यादव ने मदन मोहन मालवीय जी को बचा खुद शहीद हो गए थे।

पवित्र बनारस भोलेनाथ भगवान शंकर की नगरी है तथा यहीं स्थित है विश्व की सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय, "बनारस हिंदू विश्वविद्यालय"।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना, दिनांक  4 फरवरी 1916 को पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने किया था।

जिस जगह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बना है वहाँ की ज़मीन के विवाद को लेकर बनारस के कुछ दबंग सर्वण महामना (पंडित मदन मोहन मालवीय) जी को परेशान किया करते थे तथा उन्हें मारने की भी कई बार कोशिश की गई थी।

महामना जी उच्च विचारधारा के एक अच्छे और नेक इंसान थे लेकिन वहाँ के दबंग नहीं चाहते थी कि "बनारस हिंदू विश्वविद्यालय" की स्थापना हो।

उस समय बनारस में पहलवान सरदार वीर सिंह यादव (बचाऊ ) काफ़ी प्रसिद्ध थे अपनी दिलेरी और बहादुरी के लिए।

महामना जी भी पहलवान बचाऊ वीर अर्थात यादवजी से भलीभाँति परिचित थे

ऐसा माना जाता है कि सरदार बचाऊ यादव से बड़ा पहलवान तथा उन्हें दंगल में हराने वाला कोई पैदा नहीं हुआ था उस वक्त।

बचऊ यादव को उनके शानदार व्यक्तित्व के लिए भी जाना जाता था।

6.5 फीट ऊंचा कद, गोरा रंग, सर पर सफ़ेद साफ़ा, लंबी रौबदार मूँछें और बुलंद आवाज़ के बचाऊ यादव से बड़े बड़े दबंग भी खौफ़ खाते थे।

अब महामना कहीं भी जाते बचाऊ यादव उनकी रक्षा के लिए साथ खड़े रहते थे।

जिस दिन विश्वविद्यालय की स्थापना होनी थी उसी दिन महामना जी पर रास्ते में घात लगाकर लगभग 25 दबंगों ने हमला करा तभी पहलवान बचाऊ यादव गुप्त सूचना अनुसार पहुँचकर उन्होंने दिलेरी और अपना निष्ठावान पराक्रम दिखा मदन मोहन जी को वहाँ से सुरक्षित बचाकर निकाल दिया तथा अपना  धर्म निभा अपनी लठ्ठ के दम पर अकेले उन 25 दबंगों से भिड़ गए।

बचऊ यादव अकेले उन 25दबंगों से काफ़ी देर तक भिड़ते रहे फिर आखिरकार लड़ते लड़ते बहादुर बचाऊ यादव धर्म की स्थापना के लिए शहीद हो गए।

महामना जी को सरदार बचाऊ यादव की मृत्यु से बहुत अघात पहुंचा और वे भावुक हो रोने लगे।

पंडित महामना जी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पास में ही बचाऊ यादव की याद में "सरदार बचाऊ यादव मंदिर" की स्थापना कराई और उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए लिखवाया " वीरों में वीर बचाऊ वीर"। ये मंदिर आज भी यहाँ स्थित है।

 बचाऊ यादव का जन्म BHU के समीप स्थित सिरगोवर्धन गाँव में हुआ था।

बचाऊ यादव को शेर-ऐ-बनारस भी कहा जाता है

पहलवान बचाऊ के इस दमखम,
 दिलेरी तथा साहस के लिए उन्हें सरकार ने "शेर-ऐ-बनारस" की उपाधि से नवाज़ा।
शत शत नमन

रविवार, 12 जुलाई 2020

अंग्रेज़ो ने हिन्दू-मुस्लिम की साझा विरासत को भाषा के द्वारा तोड़ा - तसनीम सुहेल

अंग्रेज़ो ने हिन्दू-मुस्लिम की साझा विरासत को भाषा के द्वारा तोड़ा - तसनीम सुहेल

वाङ्मय पत्रिका और विकास प्रकाशन कानपुर के संयुक्त व्याख्यानमाला के  अंतर्गत आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर तसनीम सुहेल ने अपने विचार "नवजागरण युगीन हिंदी-उर्दू उपन्यासों में साझी विरासत" के माध्यम से रखे जिसमें उन्होंने हिंदुस्तान की संस्कृति गंगा-जमुनी तहजीब रही है और इस साझी विरासत में एक ओर बढ़ावा दिया गया तो दूसरी ओर कट्टरवादियों से उसे टक्कर भी लेनी पड़ी। भारत में आरम्भ से ही अनेक जातियां आयी तो उन्होंने यहां के लोगों की एकता को खंडित करने के लिए धर्म के नाम पर समाज और भाषा दोनों को बांटने का प्रयत्न किया।
अंग्रेजों की भाषा नीति ने हिंदी को हिंदुओ से जोड़ दिया और उर्दू को मुसलमानों से। इस भाषा नीति ने हिंदुस्तान की साझा संस्कृति में सेंध मारने का काम किया और भाषा विवाद को जन्म दिया। 19वी शताब्दी में जो उर्दू हिंदी उपन्यास लिखे गए उसपर इसका प्रभाव पड़ा। इसीलिए इस युग के हिंदी उपन्यासकारों में कोई मुस्लिम उपन्यासकार नहीं दिखाई देता है जबकि अपभ्रंश से लेकर भक्तिकाल तक हिंदी में बेहतरीन काव्य करने वाले मुस्लिम रचनाकारों की पूरी श्रृंखला मौजूद है। इस युग के उर्दू उपन्यासकारो में पंडित रतन नाथ सरशार के रूप में एक ऐसा उपन्यासकार दिखाई देता है जिसने अपने उपन्यास 'फसाना ए आज़ाद' में लखनऊ के मुस्लिम समाज का सजीव चित्रण किया है जिसकी प्रशंसा करते हुए चकबस्त कहते है- काश, हिंदुस्तान के सारे हिन्दू मुसलमान पर इसी तरह एक दूसरे का रंग चढ़ जाता।
नवजागरण ने यूरोप को आधुनिकता प्रदान की तथा हिंदी साहित्य में भी नवजागरण का प्रादुर्भाव सम्भव हो पाया, आस्था के स्थान पर तर्क को प्रसस्त किया गया, इस आंदोलन में अरबी विचारकों ने भी अपना योगदान दिया यूनानी परंपरा का विकास हुआ।
अंग्रेज़ो ने आधुनिकता को तो बल दिया लेकिन साझी विरासत को तोड़ने की भी कोशिश की जिससे वो 'फूट डालो राज करो' कि नीति को अमलीजामा पहना सके। इस फेसबुक लाइव में बहुत से देश-विदेश के विद्वान, शोधार्थी एवं विद्यार्थी भी शामिल हुए।
इस फेसबुक लाइव को आप निम्न यूट्यूब चैनल पर दोबारा सुन सकते है.....

https://youtu.be/Y5rMP9ilJO8

अकरम हुसैन
सहसंपादक 
वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका
अलीगढ़

शनिवार, 11 जुलाई 2020

बहुत आसान नहीं है, माफिया डॉन बनना - अकरम क़ादरी

बहुत आसान नहीं है माफिया डॉन बनना- अकरम क़ादरी

संसार मे कोई काम आसान नहीं है। आखिर कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है इस विश्लेषण में मैं किसी दुर्दांत अपराधी, गुण्डे, मवाली, बदमाश, माफिया का समर्थन नहीं कर रहा हूँ बल्कि उसको इंसान से हैवान बनने में जो दिक्कत होती है उसका विश्लेषण करने का प्रयास कर रहा हूँ।
वर्तमान स्थिति में पूरे देश मे विकास दुबे नामक गैंगस्टर, माफिया का नाम चल रहा है। इसके पहले भी बहुत ख़तरनाक अपराधी हुए है और उन्होंने अपना एम्पायर खड़ा किया है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि किसी भी अच्छे, बुरे एम्पायर को खड़ा करने के लिए बहुत मेहनत, कठिनाइयां और दुर्गम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है तब कहीं जाकर कोई अच्छा और बुरा इंसान बनता है। 
अच्छा इंसान बनना तो कठिन है लेकिन बुरा इंसान बनने उससे भी ज्यादा कठिन और मुश्किल है क्योंकि   सबसे पहले अपनी इच्छाओं को मारना पड़ता है, शुरुआती दौर मे कुटाई, पिटाई भी बेहद होती है वो चाहे कॉलेज में हो या फ़िर महाविद्यालय या विश्वविद्यालय लेवल पर हर कहीं बहुत परेशानियों को झेलना पड़ता है। फिर कहीं कोई इंसान की खाल में जानवर बनता है मनोवैज्ञानिकता के आधार पर उसकी संवेदनाएं बहुत हद तक मर जाती है कुछ रिश्ते को छोड़कर वो सब रिश्तों को पैनी दृष्टि से देखता है और उनपर हमेशा नज़र रखता है कि किसी भी प्रकार से यह व्यक्ति उसको नुकसान ना पहुंचा सके। 
पिछले दो सप्ताह से गैंगस्टर विकास दुबे का नाम सुर्खियों में है क्योंकि उसने उत्तरप्रदेश पुलिस के 8 जवानों को शहीद कर दिया है क्योंकि वो उसके गांव बिकरु दबिश देने गए थे जिसके बारे में उसको पहले से थाने के किसी मुखबिर ने सूचना दे दी जिसके कारण वो पहले से ही तैयार था और उसने जैसे ही पुलिसकर्मियों को देखा उसके गुर्गों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरूकर दी जिसमे कुछ पुलिसकर्मी शहीद हो गए कुछ को गम्भीर चोटे आयी। 
गैंगस्टर विकास दुबे के कारवां की शुरुआत छात्रराजनीति से हुई जब वो विश्वविद्यालय में अपने लड़को को चुनाव लड़ाता था उनको जिताता था तथा उसके माध्यम से अपने गैर जरूरी और इललीगल काम कराता था, ठेकेदारी, रंगदारी वसूलता था। राजनीति तो उसको विरासत में मिली थी। उसके पैतृक निवास में उसके दादा कई बार के प्रधान थे। विश्वविद्यालय छोड़ने के बाद जब घर पर आया तो उसने वहां पर भी अपना काम शुरू रखा गरीबो की मदद करना, उनके उल्टे-सीधे काम कराना जिससे गांव वालों को यह महसूस होता था कि विवेक दुबे का अपना रसूख है जिसके कारण उसके काम हो जाते है। इसके बाद वो जरायम पेशा, भूमाफ़ियागिरी जैसे कार्य मे हाथ आज़माता है, लड़ाई-झगड़े की ज़मीन को औने-पौने दामो में खरीदकर, कब्ज़ा करके बेंच देता है जिससे वो बहुत सारा धन इकट्ठा करता है तथा अपने गैंग में सब तरह के लोग धाक बन जाने के कारण जुड़ने लगते है वो ईमानदारी की कसौटी पर भी सबको मापता है एक बात याद रखना चाहिए 'जितना भी गन्दा काम होता है वो सब ईमानदारी से ही होता है' उसके बाद उनका इस्तेमाल करता है ऐसे ही छोटे-मोटे कार्यों में वो शामिल रहता है उसके बाद 2001 में वो भाजपा के दर्जा प्राप्त मंत्री को पुलिस थाने में मौत के घाट उतार देता है जो सच मे बहुत ही भयानक घटना होती  है, लेकिन उससे ज्यादा ही बड़ी ट्रेजेडी यह है कि थाने में मर्डर करने के बाद भी कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता क्योंकि न्यायपालिका अधिकतर गवाहों पर चलती है और जब गवाह ही किसी षड्यंत्र के तहत पलट जाए तो न्यायपालिका का कोई मतलब नहीं रह जाता है और अपराधी आराम से बच निकलता है। सोचने वाली बात यह है कि इस दुर्दांत अपराधी ने इतना रसूख और डर कायम कर लिया था जिस पुलिस को संविधान की रक्षा करते हुए अपराधी को सज़ा दिलानी थी वही पुलिस पलट गई और दुबे आराम से साफ बच निकला जिससे विकास का हौसना बड़ा उसने उसके बाद भी अनेक बुरे व्यसन किये, कुलमिलाकर उसके खाते में 60 केस हो गए जिससे कुछ अतिसंवेदनशील क्राइम भी थे। जिसमे उसको बचना भी नहीं था। लेकिन राजनेताओ ने खुद को बचाने और गुंडे पालने के शौक ने उनको बचाये रखा होता है यह सब जानते है इस समय जो गुण्डई का कठिन समय था वो गुज़र गया था उसके पास पैसों के साथ साथ राजनैतिक घरानों में भी पैठ बढ़ गयी थी वो सारे काले कारनामे करने या करवाने के बाद अपने आकाओं की गोद मे बैठ जाता रहता होगा। 
जो पुलिस, राजनेता उसको बचाते थे अब उसने पुलिस से ही पंगा ले लिया जो उसको बहुत महंगा पड़ गया। जिससे उज्जैन में गिरफ्तार होने के बाद कानपुर के पास आकर उसको एसटीएफ ने मौत के घाट उतार दिया लेकिन जब उसके गांव वालों का इंटरव्यू लिया गया तो उन्होंने विकास दुबे को अपना मसीहा बताया। यह भी सच है कि जितने भी अपराधी, गुण्डे, मवाली, बदमाश, भूमाफिया अभी तक  हुए है वो अपने गांव, कसबे वालो की बहुत मदद करते है जैसे वीरप्पन स्वयं कई गांव वालों को रोज़ी, रोटी देता था, अब भी कई गैंगस्टर ऐसे है जो गरीबो की बहुत मदद करते है लेकिन धंधे उनके काले ही होते है यह मामूली मदद ही उनको बड़ा नेता, मसीहा बनाती है और उनका रुतबा कायम रहता है वो समय समय पर गांव वालों दिक्कतों को चुटकियों में दूर कर देते है इसलिए उनको गांव के लोग मसीहा समझते है उनके साथ रहते है उनको मदद करते है जब भी ज़रूरत होती है तो उनको बचाने का प्रयास करते है जिससे वो गैंगस्टर की वफादारी वाली नज़र में आ जाते है और उसका आने वाले वक्त में फ़ायदा उठाते है। 
यह सच है कि गुण्डों को नेता, ही पालते पोषते है और उनका प्रयोग अपने काम के अनुसार करते है। 
आज के नोजवानो को सोचना चाहिए कि गुण्डा बनने के लिए सबसे पहले अपने अंदर का इंसान मारना पड़ता है फिर रिश्ते, नातों की भी कोई अहमियत नही होती है जितनी कठिनाई और दिक्कत इस काम मे है उससे कम दिक्कत और परेशानी बड़ा अधिकारी बनने में है। इसलिए इंसान बनिये इंसानियत की सेवा कीजिये

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

मौजूदा दौर में खानकाहों की ज़रूरत- अकरम क़ादरी

मौजूदा दौर में खानकाहो की ज़रूरत - अकरम क़ादरी

खानकाहों का नाम आते ही दिमाग़ में कुछ पुराने ज़माने के सिस्टम या निज़ाम कौंधने लगता है महसूस होता है कि यह सिस्टम पूरी दुनिया मे कहाँ-कहाँ लागू होता है । दरअसल खानकाह का मतलब होता है-आश्रम , यह संस्कृति का शब्द है और इसका देशज  नाम मठ है ,जिसको उर्दू में खानकाह कहते है। खानकाह ऐसी जगह है ,जहां अल्लाह के नेक बंदे आम लोंगों को सीधा रास्ता दिखाते हैं और दुनिया से दुत्कारे हुए लोगों को भी गले लगाते हैं। इन खानकाहों का मकसद बहुत विराट और विशाल है ,जिसको मौजूदा दौर में समझना जरूरी है क्योंकि आजकल मारकाट, लूटपाट अपने चरम पर आ चुकी है ।पेट की भूख कहे या फिर अपनी ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश या आजकल ऐश और लक्ज़री ज़िन्दगी बिताने के लिए इंसान को वक़्त ने इस दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है कि वो चन्द सिक्को के लिए किसी की जान लेने पर आमादा हो जाता है। आज की जीवन-शैली ने इंसान के अंदर खुदग़रज़ी को बढ़ावा दिया है। पहले दौर में ऐसा बहुत कम था क्योंकि लोग एक दूसरे की मदद करते थे ख्वाहिशें कम थी लेकिन एहसास बहुत था,  लोग दूसरे के दुख दर्द को महसूस करते थे, एक दूसरे से मोहब्बत बहुत थी, एक दूसरे में ग़म में लोग मर जाते थे क्योंकि मोहब्बत बहुत थी आपस मे अंडरस्टैंडिंग लाजवाब थी, एक दूसरे की आंख का इशारा समझते थे अगर इन सब इंसानी फितरत के पीछे अगर कोई था तो वो थी उसकी वो तालीम, तहज़ीब, संस्कार, तरबियत जो उसको खानकाही सिस्टम से मिली थी। खानकाहों में कोई भी पीर-मुर्शिद कभी भी अपने मुरीदों को कर्त्तव्य या फिर जादू टोना नहीं सिखाता है बल्कि वो इस दुनिया मे खुदा से मिलाने की बात करता है, इंसानों के दरमियान एक मज़बूत रिश्ता कायम करता है, मोहब्बत की दावत देता है, इंसानियत का पैग़ाम देता है लेकिन आजकल कुछ लोग मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम करने के लिए जो नफ़रत, मार काट, सुसाइड बॉम्बिंग, करते है वो कभी भी इस्लाम के सही मानने वाले नहीं हो सकते बल्कि वो धर्म के नाम पर फसाद फैलाने वाले हैं या फिर धर्म के षड़यंत्रकारी उनको ना ही किसी धर्म का पता है और ना ही उनकी शिक्षाओं का, आजकल जो भी इंसानियत को खत्म करने की साज़िश करें या फिर किसी इंसान की हत्या करे वो धार्मिक कतई नहीं है वो केवल धर्म से फ़ायदा उठा रहा है या उसके पीछे उनके सियासी मफाद हैं। आजकल राजनैतिक पार्टीयां भी अपने सियासी मफाद के लिए मज़हब को एस्तेमाल कर रही हैं। 
ख़ानक़ाही निज़ाम में सबसे पहले व्यक्ति को इंसान बनना सिखाया जाता है जो अपने सर्वशक्तिमान खुदा, ईश्वर, बनाने वाले, गॉड से प्रेम तो करता ही है उसके अलावा उसके द्वारा बनाई गई कायनात और इंसानियत से मोहब्बत करता है इसलिए वो कभी भी इंसानियत को नुकसान पहुंचाने की सोच ही नहीं सकता। 
आज पूरी दुनिया मे जो लंगर का सिस्टम चल रहा है वो सब सूफियों, दरवेशों के यहां ही होता है, आज भी जितनी पुरानी दरगाहे है ,वहाँ पर लंगर सबको तकसीम किया जाता है मतलब ग़रीबो, मज़दूरों, बेसहारो को खाना खिलाया जाता है जोकि दरगाह या खानकाहों में आने वाले ज़ायरीन, श्रुदालु अपनी इच्छा अनुसार देते है उनपर कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं होती है जबकि इस्लाम धर्म किसी भूखे को खाना खिलाने की बात पहले करता है, इंसानियत को फैलाने का पहले मशविरा देता है। इसी लंगर सिस्टम को आज पूरी दुनिया मे सिक्ख भाई लेकर गए जिन्होंने अपने धर्म को भूखे को खाना खिलाना माना है ।यह नैतिकता और मानवता का संदेश वो पूरी दुनिया मे लेकर जा रहे है जिनके लिए उनको धन्यवाद देना चाहिए।
कुछ वर्षों से जो लोग कम्युनिटी किचन की बात करते है वो यही लंगर सिस्टम है जो पूरी दुनिया मे चल रहा है जिसके माध्यम से सबको खाना मुहैय्या कराया जा रहा है। अगर हम अच्छे से इस लंगर सिस्टम को बढ़ावा दे तो पूरी दुनिया में कोई भी इंसान भूखा नहीं सोएगा बल्कि सबको खाना मिलेगा और जीवन जीने की सीख भी इसलिए आज पूरी दुनिया को सूफ़ी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहिए, खानकाहों को बढ़ावा देना चाहिए जिससे इंसानियत को बचाया जा सके।
एशिया में ही ऐसी दरगाहें है जहां पर आज भी लंगर चलता है गरीबो, मज़दूरों, बेसहारो को खाना खिलाया जाता है उसके साथ साथ उनको नैतिकता, इंसानियत से मोहब्बत की सीख दी जाती है। पूरी दुनिया मे इन सूफी संतों के मानने और मोहब्बत करने वाले लोग है जो सूफियों की बातों का अमल करते है कुछ लोग कहते है कि इन सूफियों की दरगाहों पर नहीं जाना चाहिए बल्कि वो बलपूर्वक इन लोगो को जाने से रोकते है जो बिल्कुल ग़लत है। इस्लामिक कानून के अनुसार क़ब्रो पर हाज़री देना और ईसाले सवाब करना चाहिए अर्थात जाना अच्छी बात है ना जाओ तो कोई बात नहीं है, और अगर क़ब्र किसी बरगुज़ीदा और अल्लाह के नेक बंदे की हो तो जाना बरकत और फैज़ान का बाइस है। उन के वसीले से दुआऐं क़बूल होती हैं। फिर इस्लाम की पवित्र पुस्तक क़ुरान शरीफ में भी वसीले का ज़िक्र है कहने का मकसद है कि अगर अल्लाह से नबियों, रसूलो और उसके  मोहतरम वलियो के सदके में दुआ करें तो बेशक ही कुबूल होती है जैसे बाबा आदम अलैहि इस्लाम की दुआ हुज़ूर अकरम सल्लाहो अलैहि वस्सलम के सदके में क़ुबूल हुई थी ....हमे सूफिज्म की हिकमत, इंसानियत को समझना होगा फिर ही हम इंसानियत को सही मायनों में समझ सकते है......सूफिज़्म के बारे में बहुत सी ग़लत फहमियां पैदा करने की कोशिश की जा रही है और इसे इस्लाम के खिलाफ बताने की कोशिश की जाती है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है.. सूफिज़्म इस्लाम के सही रास्ते की तरफ रहनुमाई करता है.. वही बीच का रास्ता जो इस्लाम का रास्ता है.. कामयाबी और निजात का रास्ता है।
 सूफिज्म धार्मिक कर्मकांड की अपेक्षा सह्रदयता, बंधुत्व, मानवीय मूल्यों, सामाजिक आदर्श, कर्म, पवित्रता और सहिष्णुता पर बल देता है। यही कारण है कि पुराने समय से इन खानकाहों पर हर धर्म,जाति, सम्प्रदाय या समाज के लोग बिना किसी भेदभाव के जाते रहे हैं। यहाँ धर्म प्राथमिक नहीं अपितु मानवीय मूल्य को बढ़ावा दिया जाता है। यही कारण है कि मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिये सूफियों ने भारतीय कथाओं और नायकों को लेकर प्रेम काव्य लिखे। जैसे मुल्ला दाऊद का चंदायन,जायसी का पद्मावत, नूर ,शेख नबी का ज्ञानदीप
 

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट