शनिवार, 27 अक्टूबर 2018

डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ को मिला स्वर कोकिला हब्बा खातून सम्मान - 2018

डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ को मिला स्वर कोकिला हब्बा खातून सम्मान 2018

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वीमेंस कॉलेज हिंदी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर और अनुसंधान त्रैमासिक हिंदी पत्रिका की विदुषी संपादक डॉ. शगुफ़्ता नियाज़  को हिंदी कश्मीरी संगम द्वारा प्रदान किया गया जिसमें हिंदी साहित्य अकादमी भोपाल के प्रोफेसर उमेश सिंह और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक प्रोफ़ेसर अवनीश कुमार की उपस्थिति में डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ के हिंदी सेवा और पत्रिका के संपादन के लिए दिया गया जिसमें अनेक पुस्तकों को संपादन भी शामिल है। डॉ. शगुफ़्ता लगभग एक दशक से हिंदी की सेवा में तत्पर है जिनके संपादकत्त्व में हिंदी की अनेक विधाओं में पुस्तकें आ चुकी है। जिससे हिंदी में एक वैश्विक स्तर का शोधकार्य भी हो रहा है।
डॉ. नियाज़ को यह सम्मान मिलने पर वाङ्गमय पत्रिका के संपादक डॉ. एम फ़िरोज़ ख़ान और उपसंपादक अकरम हुसैन ने उनको धन्यवाद प्रेषित किया, तथा हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर मेराज अहमद ने उनके द्वारा किए साहित्यिक कार्य की अनुशंसा करते हुए उन्हें शुभकामनाये दी है। इतने कम समय मे हिंदी की जो सेवा डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ द्वारा की गई है वो सच मे प्रशंसनीय है। एएमयू हिंदी विभाग के लिए भी यह गौरव का विषय है कि उनके विभाग के अध्यापक साहित्य के प्रति पूर्णता समर्पित है। डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ को सम्मान मिलने की खुशी में शोधार्थी मनीष कुमार गुप्ता, आसिफ अली साबरी ने भी उनको बधाईयां दी है।

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

क़ुरान में क्यों है बार-बार 'कुल'- अकरम क़ादरी, कमरुल इस्लाम


दुनियां भर के लगभग सभी मुसलमान क़ुरान पड़ते है, कुछ उसकी तफ़्सीर समझते भी है, दुनियाँ में जितनी भाषाओं में क़ुरान मजीद की तफ़्सीर हो सकती है, तो वो हाज़िर भी है फिर भी सब भाषाओं में क़ुरान की महत्ता को बताया गया है।
अरबी के बाद ही उन अलग अलग भाषाओं की तफसीर में 'कुल' शब्द को बताया और समझाया जा सकता है, आखिर क्या वजह है कि अल्लाह क़ुरान में बार बार 'कुल' शब्द पर ज़ोर दे रहा है अपने फरमान को अपने प्यारे आखिरी नबी हुज़ूर सल्लाहों अलैही से कहलवा रहा है जबकि वो खुद भी कह सकता है, यह तो सब मानते और जानते भी है हुज़ूर अकरम सल्लाहों अलैहि वसल्लम उसके प्यारे नबी और आखिरी संदेशवाहक भी है, अल्लाह ने उनको अपने नूर से पैदा भी किया है, उनको इल्म ए ग़ैब से भी  नवाज़ा है जिसको एक आम इंसान को समझ मे आना मुश्किल ही नही नामुमकिन सा लगता है क्योंकि क़ुरान की तफ़्सीर में इसलिए ही जो अल्लाह को कहना था वो अपने नबी से कहलवाता है कि ऐ नबी आप कह दीजिये आखिर क्या वजह है वो अपने आखिरी नबी से ही कहलवा रहा है क्या उसको भी किसी वसीले की ज़रूरत पेश आ रही है (नाओजबिल्लाह) लेकिन फिर भी वो अपने प्यारे नबी के द्वारा ही हर बार को कहलवा रहा है इसका मतलब सीधा है कि हमे वसीले की ज़रूरत होती है, बेशक अल्लाह हमे 60 मां से ज्यादा प्यार करता है। जिस तरह से वो क़ुरान में बार बार 'कुल' का इस्तेमाल करके दुनियाँ और आलम ए इस्लाम को मैसेज दे रहा है कि 'वसीले' का इस्तेमाल करो जिससे आप दुनियाँ के साथ-साथ आख़िरत को भी समझ सको।
इसके वाबजूद भी कुछ मौलानाओं के हुज़ूर के बारे में कुफ़्रियात कलीमात का इस्तेमाल किया जिससे आने वाले वक्त में लोगो से हुज़ूर की मोहब्बत बड़ेगी या कम होगी यह सब वो सवाल है जिनसे हमे दो चार होना पड़ेगा ऐसे लोगो के नज़रिए को समझिए यह इस्लाम के खुले दुश्मन है  ।
प्रूफ के लिए कुछ फ़र्ज़ी मौलानाओं के अक़ाइद लिख रहा हूँ जिसको आप उनकी किताबो से समझ सकते है
उलेमा ए देवबंद की वो कौनसी
गुस्ताखी थी जिसकी वजह से उनपर
33 उलेमा ए हरमैन ने कुफ्र का फतवा दिया
नीचे पढ़े
वो कुफ्रिया अक़ीदे जिसकी बिना पर
इन चारो उलेमा ए देवबंद और इनके
कुफ्र पर शक करने वालो पर कुफ्र का
फतवा दिया गया था नीचे देखिए
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1) रशीद अहमद गंगोही ने अपनी
फतावा ए रशिदिया में लिखा के
अल्लाह तआला झूट बोल सकता है
( फतावा ए रशीदिया पार्ट 1 पेज 20)
( मआज़ अल्लाह )
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2) अशरफ अली थानवी ने अपनी
किताब हिफ्जुल इमान में लिखा के
" नबी ए करीम का इल्म ऐसा है जैसा
बच्चो पागलो और जानवरों को भी
होता है
( हिफ्जुल ईमान सफा 8 )
( मआज़ अल्लाह )
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3) कासिम नानोतवी ने अपनी किताब
तःज़िरुन्नस में लिखा के
अगर मोहम्मद सललल्लाहो अलैहि
वसल्लम के बाद भी अगर कोई नबी
आ जाये तो खात्मे नबूवत पर कोई
फर्क नहीं पड़ेंगा
( तःज्हिरुन्नस सफा 24 )
( मआज़ अल्लाह )
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4) खलील अहमद अमेठवी अपनी
किताब बारहिने ए कतीय में लिखा के
नबी सललल्लाहो अलैहि वसल्लम
से जयादा इल्म शैतान को है
( बारहिने कातया पेज 51-52 )
(मआज़ अल्लाह )
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इन गुस्ताखियो की वजह से
उलेमा ए हरमैन ने सन 1903 में ये
फतवा दिया के यह चारो गुस्ताख
काफ़िर है और इनके कुफ्र पर शक
करने वाला भी काफ़िर है।

रिसर्च स्कॉलर सय्यद कमरुल इस्लाम भाई की मदद से इस ब्लॉग को तैयार किया गया है...


रविवार, 23 सितंबर 2018

इंसानियत की मिसाल है सूफी विचारधारा- MSO

देश का सबसे बड़ा अराजनैतिक छात्र संगठन मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन एएमयू यूनिट ने आज देश के विभिन्न कोने से पढ़ने आये छात्र छात्राओं का फ्रेशर मीट के जरिये उनका यूनिवर्सिटी में स्वागत किया, मौलाना नोमान अज़हरी ने छात्रों को यूनिवर्सिटी की रिवायत के बारे में बताया और किस प्रकार से आपको पढ़ाई करना है और किस प्रकार समाज को बदलने के लिए सूफिज्म की इंसानियतपसंद विचारधारा के माध्यम से देश-दुनियाँ को मानवता का पाठ पढ़ाया जा सकता है जिससे समाज मे फैली अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों का पर्दाफाश किया जा सके । एम. एस. ओ. यूनिट के सदर मौलाना हैदर मिस्बाही ने नए छात्राओं का स्वागत करते हुए उनको संबोधित किया और बताया कि आने वाले दिनों में एएमयू यूनिट किस तरह से छात्र हितों के लिए काम करेगी जिसमे उनका आधार सूफी विचारधारा ही होगा ।
अंत मे एम.एस.ओ के संस्थापक सदस्यों में शामिल करमफ़रमा डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीक़ी क़ादरी बरकाती ने देश दुनियाँ में फैल चुकी एम.एस.ओ के बारे में बताया कि सूफी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने किन-किन दुश्वारियों का सामना किया, लेकिन कभी भी सूफिज्म की रूह से समझौता नहीं किया बल्कि यूनिवर्सिटी के फ़लाह के लिए हमेशा तत्तपर रही है और देश को तसव्वुफ़ की विचारधारा से जोड़ने का सार्थक प्रयत्न किया है जितनी भी देश मे देशद्रोही विचारधाराएं चल रही है जो वतन को तोड़ने का लगातार कुकृत्य कर रही है उनकी कड़े शब्दों में हम निंदा करते है और देशभक्ति के सम्बंध में पैगंबर मोहम्मद साहब की मशहूर हदीस का बखान किया है जो मानवता से कहती है "अपने वतन से मोहब्बत करना आधा ईमान है" अर्थात बताने का यह प्रयत्न कर रहे है जो लोग आज अल्पसंख्यकों को देशद्रोही साबित करने के लिए अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करना चाहते है वो जंगे आज़ादी के शुरुआती दिनों को याद करे कि किस तरह से दिल्ली में लाहौर तक हिंदुस्तान के देशभक्त मौलानाओं की लाशें पेड़ो पर टंगी थी जिन्होंने अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ फतवा दिया था, लेकिन अफसोस आज उनके ही देश के लोग उनको देशद्रोही करने पर तुले हुए है जो सामाजिक सौहार्द के लिए अच्छा नही है, हमें मानवता को बचाने के लिए आज पूरी दुनियां में सूफिज्म को फैलाना होगा जिससे देश-दुनियाँ ही नही बल्कि पूरी मानवता को बचाया जा सके इस कार्यक्रम में मौजूदा एम.एस.ओ के नायब सदर नदीम अली, अदनान ज़फर और पूर्व सदर जावेद मिस्बाही, नायब सदर मौलाना कैफ, सय्यद कमरुल इस्लाम, हस्सान अलीमी, फ़ज़ल इलाही,मुसाब इल्मी, हिंदी मीडिया प्रभारी मोहम्मद आसिफ साबरी तथा अकरम हुसैन क़ादरी अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे

बुधवार, 29 अगस्त 2018

एएमयू : हिन्दू बहन को मुस्लिम भाइयों ने दिया कन्धा - अकरम क़ादरी



अभी दो-तीन दिन पहले ही रक्षाबंधन जैसा भाई-बहन के प्रेम का त्योहार हुआ है, फिर भी आजकल इतनी जल्दी धागों का रंग कच्चा पड़ जाता है यह नही मालूम था ।
एएमयू की दर्शनशास्त्र विभाग की शोधार्थी हेमा मेल्होत्रा की आकस्मिक  देहांत हो गया .... जिसका कारण उनकी दोनों किडनियाँ फेल हो जाना था ।वह पिछले दो वर्ष से डाइलाईसिस से जीवित थीं । यह ख़बर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं के लिए शोक का विषय है, जब उनके निधन की सूचना उनके विभाग के वरिष्ठ शोधार्थियों को मिली कि उनकी सहपाठी का देहांत हो गया है तो वह सब उनके अंतिम मुख दर्शन के लिए आनन-फानन में अपनी बहन के घर जनकपुरी (अलीगढ़) पहुँचे। जब उंहोंने वहां पर देखा कि उनके पास-पड़ोस के लोग भी बाहर निकल कर नही आए हैं और मेहरोत्रा परिवार में केवल उनके एक बुजुर्ग पिता और उनका एक पुत्र है जिसकी मानसिक स्थिति सही नही है दूसरी तरफ पिता जी की हालत इस क़ाबिल नहीं है जो वो कुछ कर सकें। इन्हीं सबके मद्देनजर सभी हिंदू-मुस्लिम भाईयों ने मिलकर किसी पड़ोस के पंडितजी से रीति-रिवाज को पूछकर अपनी बहन के लिए अर्थी तैयार कराई और जो भी धार्मिक कर्मकाण्ड होते हैं उनको पूरा किया उसके बाद उनकी अर्थी को ले जाकर अंतिम संस्कार की क्रिया को भी निभाया, यह सब देखकर शहर के अनेक लोगों को जब हिंदुस्तान अखबार के माध्यम से पता लगा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। यह सब पुनीत कार्य एएमयू के दर्शनशास्त्र के शोधार्थी मोहम्मद राशिद, सारिम अब्बास, शाहीदुल हक़, मुज़ाहिदुल हक़, नासिर, अहमद शाह, एजाज़ अहमद, मंसूर आलम, सलमान सिद्दीक़ी, अतिया लतीफ़ और निदा फातिमा आदि ने अंजाम दिया है जिसके लिए उनकी समस्त मानवता ऋणी रहेगी।
पिछले दिनों से जो लोग एएमयू को वोटबैंक की राजनीति का निशाना बना रहे थे उनके मुंह पर यह इंसानियत का जोरदार तमाचा था। जिसकी गूंज उनके चेहरे पर तो नहीं हुई होगी लेकिन उनके हृदय में एएमयू छात्र- छात्राओं के प्रति नफ़रत जरूर कम हुई होगी । जबकि यह सब नफ़रत पैदा करने वाले कुछ नेता और उनके किराए के गुण्डे थे जो हमेशा कुछ भावनात्मक मुद्दे उठाते रहते हैं और ऐसे संस्थान को बदनाम करते हैं जो हमेशा से मानवता, देशप्रेम का जीता जागता उदाहरण रहा है। जिस वक्त यूनिवर्सिटी को विलेन बनाने की कोशिश चल रही थी उसी वक़्त अनेक हिन्दू छात्र-छात्राओं ने सहज रूप से आगे बढ़कर अमुवि की साँझी- सामासिक सँस्कृति और हिंदू-मुस्लिम एकता को अपने उद्बबोधनों से स्पस्प किया था।
जो भी हमारे दुश्मन है हम अलीग उनको क़लम से भी जवाब देने में सक्षम है और अपनी मानवतावादी दृष्टिकोण से भी।
एएमयू ही हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनकर आगे बढ़ रहा है जो अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओ को एएमयू की आड़ में पूरा करना चाहते हैं उनके लिए यह संवेदनात्मक सौहार्द करारा जवाब है, जब तुम एएमयू पर कोई हिन्दू-मुस्लिम डिबेट चलाने के लिए नफ़रत की राजनीति करते हो तो हिन्दू छात्र-छात्राएं तुम्हे मुँह तोड़ जवाब देते है।
जब कोई हिन्दू भाई-बहन बीमार होता है या उसका देहांत हो जाता है तो एएमयू के भाई उनको कंधा देते है.....नफ़रत करने वालो आपकी नफ़रतों का जवाब यह मोहब्बत से कल भी देते थे और आज भी दे रहे हैं....अलीगों पर कोई प्रोपेगैंडा करने से पहले नेताजी और नेताओं के 100₹ वाले गुण्डों अच्छी तरह से सोच समझ लेना ....

जय हिंद
जय भारत

अकरम हुसैन
akramhussainqadri@gmail.com

सोमवार, 27 अगस्त 2018

भाजपा से दूर होती नैतिकता- अकरम क़ादरी



देश की एक ऐसी पार्टी जिसकी शुरुआत ही नैतिकता, संस्कार, संस्कृति से हुई है आज उसमे नैतिकता जैसे शब्दों का भारी अकाल आ गया है। पिछले दिनों दिवंगत हुए पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष कवि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु से लेकर शव यात्रा हो या फिर उनके अस्थि विसर्जन को लेकर जो फजीहत हुई है उससे पार्टी की छवि धूमिल करने में पार्टी के नेताओ से लेकर कार्यकर्ताओं तक की पोल खुल गयी जो एक अच्छी राजनैतिक पार्टी के लिए लंबे समय तक चल पाने के लिए शुभ संकेत नहीं है।
पिछले कुछ समय से देश की मीडिया  टी. वी डिबेट में जिस तरह से पार्टी का पक्ष रख रहे प्रवक्ताओं की बोली उनके हाव- भाव से भी पार्टी की नैतिकता की पोल खुल ही चुकी थी, लेकिन उस पोल पर आखिरी मोहर अटल जी के दिवंगत होने पर लगा दी गयी जिससे यह पार्टी भले ही सत्ता का मज़ा चख रही हो लेकिन नैतिकता बहुत हद तक जा चुकी है।
अटल जी के अंतिम संस्कार के समय जिस तरीके से देश का प्रमुख बैठा था, तथा उनके ही साथ पार्टी अध्यक्ष की बैठने की शैली से लग रहा था कि इनको सच मे दुःख है या नही इसको टीवी स्क्रीन के दर्शकों ने भलीभांति देखा है, उसके अलावा टीवी पर कई ऐसी रिपोर्ट्स आई जिसमे पता लगा कि अस्थि विसर्जन के समय किस प्रकार खिलखिलाकर नेता और कार्यकर्ता विसर्जन कर रहे थे उससे ज़ाहिर हो रहा था कि अटल जी की मृत्यु से इनको कोई दुःख नही है बल्कि यह बहुत खुश है और फ़ोटो खिंचाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे है जिससे पार्टी की विचारधारा, नैतिकता, संस्कार और संस्कृति पर सेंधमारी हो चुकी है जो आने वाले समय के लिए पार्टी के हिसाब से अच्छा नही होगा।
जिस तरह से मध्यप्रदेश, राजस्थान, और छत्तीसगढ़ के नेताओ की अस्थि के सामने की तस्वीरे आई है सच मे वो बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपने प्रिय नेताओ को किस प्रकार उनके विचारों का रोज़ गला घोंट रहे है। अटल जी की अंतिम यात्रा में पहुंचे भगवाधारी स्वामी अग्निवेश पर जिस प्रकार हमला हुआ यह भी पार्टी की विचारधारा और संस्कारो के साथ खुलेआम खिलवाड़ है इससे भी पार्टी की प्रतिष्ठा को संभवतः नुकसान ही होगा। जबकि माना यह जाता है कि बीजेपी भगवा वस्त्र धारण किये हुए व्यक्तियों का बहुत सम्मान करती है लेकिन उन्होंने क्यो ऐसे बुरे समय पर स्वामी अग्निवेश पर हमला किया जब पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता मृत्यु शैय्या पर जा चुके हो, क्या उनकी आत्मा इस कुकृत्य से खिन्न नही हुई होगी आज पार्टी के वरिष्ठ नेताओं कार्यकर्ताओं को भी इस विषय पर गहनता से सोचना चाहिए।
इस पूरी अस्थि कलश यात्रा की पोल अटल बिहारी वाजपेयी जी की भतीजी ने खोलकर रख दी उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि यही वो लोग है जिन्होंने अपने वयोवृद्ध नेता को पिछले 9 वर्षों से पार्टी के पोस्टर, फ्लेक्स से ग़ायब रखा अब उनका देहावसान हो जाने पर किस प्रकार 2019 की राजनीति को भुनाने की कोशिश कर रहे है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 4 वर्षों से भाजपा केंद्र सरकार और उनकी राज्य सरकारों को बचाने के लिए अब अटल जी को सामने लाकर दोबारा 2019 की सत्ता की वैतरणी पार करना चाहती है, जो मुद्दे 2014 में भाजपा ने उठाये थे उन सभी मुद्दों पर लगभग फेल हो चुकी सरकार को अब केवल अटल जी और उनके जीवन मूल्यों का ही सहारा है वरना इस पार्टी को सत्ता में दोबारा घुसने नहीं देगी जनता।
भारतीय जनता पार्टी को अब पुनः यह विचार करने का समय है कि जिस पार्टी को बनाने के लिए अटल जी ने कभी नैतिकता, संस्कृति, लोकतंत्र, संस्कार से समझौता नही किया क्या उनकी पार्टी अब दो कदम भी उनके सिद्धांतो पर चल रही है अगर चल रही तो बहुत अच्छी बात है और नहीं चल रही है तो विचारधारा को ज़िन्दा रखने के लिए मानवता को ज़िंदा करना होगा पार्टी को बचाना होगा । जब स्वस्थ लोकतंत्र होगा तो निश्चित ही देश मे विकास की व्यार बहेगी, देश उन्नति के शिखर पर अग्रसर होगा ।

जय हिंद
जय भारत
जय किसान

अकरम क़ादरी
akramhussainqadri@gmail.com

शनिवार, 25 अगस्त 2018

दंगाई युवा नेता बनने की ख़्वाहिश - अकरम क़ादरी

दंगाई युवा नेता बनने की ख़्वाहिश- अकरम क़ादरी

आजकल हर किसी को युवा नेता बनने और दिखने की बड़ी ख्वाहिश होती है लेकिन जो होते है वो कहते नही, जो होते नही है वो दिखने की भरपूर कोशिश भी करते है।
आजकल युवा नेता बनाना बड़ा सरल हो गया है पहले तो युवा नेता किसी भी नेता का बेटा, या फिर किसी रसूखदार बेटे का बेटा होता था, लेकिन आज तो गले मे सोने की मोटी चैन, हाथ मे पांच तरह के धागे, दो बेहतरीन बड़ी फोर व्हीलर, 10 मुसन्डे किसी को भी पीट दिया,मार दिया जब मन चाहा किसी बड़े नेता के कहने पर बत्तीमीज़ी कर दी, गरीबो की दलाली खा ली, मजदूरों को परेशान कर लिया क्योंकि इतना सब ड्रामा करने के लिए पैसे की भी ज़रूरत होती है।

लेकिन पिछले चार साल में जितने युवा नेता पैदा हुए है इतने कभी नही हुए है क्योंकि अब तो भगवा कुर्ता पहनकर किसी को भी किसी भी बहाने से पीटकर वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करके स्वयं को धर्म का रक्षक बताना है फिर कुछ दिन बाद कोई बड़ा नेता जेल से छूटने पर स्वागत करेगा और इनाम भी देगा जिससे वो किसी एक धर्म का नेता कहलाने लगेगा और सबको घूम-घूमकर अपनी कायरता के किस्से भी सुनाते घूमेगा फिर भी लोग उसकी बेवकूफी को बर्दाश्त करते रहेंगे और वो इस भोली भाली जनता पर अपना सिक्का मजबूत करता रहता है आखिर में वो एक सफेदनुमा गुण्डा या तो नेता बनता है या फिर फिरौती वसूल करता रहता है ।
आजकल जितनी भी युवा नेताओ की प्रजाति देख रहा हूँ वो किसी भी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर देश की किसी भाषा मे दो पेज नही लिख सकते, बनते है खुद को बहुत बड़ा हमदर्द, गरीबो का मसीहा, जबकि सच यह है कि यही वो लोग है जो कुछ राजनैतिक पार्टियों को चला रहे है और ऐसे हॄदय विदारक कुत्संग करते है जिससे सच्चे मानवतावादी  इंसान की आत्मा ही मर जाएगी....

नेता बनिए उससे पहले अपना भविष्य देखिए पहले खुद को स्टेबल कीजिये
उसके बाद नेता बनना

आजकल गांव, शहर कस्बो में भी यह युवा नेता नाम की बीमारी बहुत तेज़ बड़ रही है कोई भी गरीब लड़का अपने नाम के आगे युवा नेता लिखकर सोशल मीडिया पर फैला देता है बाद में जब वो कुछ नही कर पाता है तो लोग उसकी मज़ाक बनाते है इधर उसकी एडुकेशन भी गयी, उधर माँ- बाप की उम्मीदे भी मिट्टी में मिल गयी ऐसे में उसको केवल दुनियाँ के सामने बेइज़्ज़त होना पड़ता है फिर वो कमज़रफी का शिकार हो जाता है।
इन सब चीज़ों से बचकर पहले अपने आपको क़लम से मजबूत करो, अपने अंदर टैलेंट क्रिएट करो फिर यह पार्टी के नेता तुम्हे खुद अपने पास बुलाएंगे क्योंकि आने वाला दौर पढ़े-लिखे नेताओ का है गुण्डे, मवाली, फिरौती वसूलने वालो का दौर खत्म होने वाला है .....

पहले तालीम फिर
नोकरी
फिर पॉलिटिक्स....
जय हिंद
जय भारत


अकरम क़ादरी

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

पुष्पिता अवस्थी कृत 'छिन्नमूल' हिंदी उपन्यास को मिला कुसुमांजलि 2018 का सम्मान - अकरम हुसैन

पुष्पिता अवस्थी कृत 'छिन्नमूल' हिंदी उपन्यास को मिला कुसुमांजलि 2018 का सम्मान - अकरम हुसैन

पुष्पिता अवस्थी को  एक प्रवासी प्रतिष्ठित साहित्यकार माना जाता है लेकिन वे भारतवंशियों की व्यथा- कथा लिखने वाली प्रथम साहित्यकार है जिन्होंने कैरिबियाई देशों में रह रहे भारतवंशियों को अपनी कथा का आधार बनाकर उनको नई संजीवनी देने का एक पुण्य कार्य किया है। जिसको आज भारतीय साहित्य के उत्थान और सम्मान के लिए सक्रिय गैर सरकारी संस्था कुसुमांजलि फाउंडेशन ने सम्मान दिया है यह सम्मान साहित्यकार डॉ. कुसुम अंसल द्वारा शुरू किया गया है दरअसल यह सम्मान हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले उत्कृष्ट रचनाकारों को दिया जाता है।
कुसुमांजलि सम्मान की शुरुआत 2012 में हुई थी जिसके अंतर्गत अनेक साहित्यकारों को यह सम्मान दिया गया है यह ऐसी संस्था है जो उत्कृष्ट साहित्यकारों को उनकी बेजोड़ और अद्वितीय रचना को सम्मानित करके उनका उत्साहवर्धन करती है  बहुत ही सुधी और प्रखर समिति के सदस्यों द्वारा इसका चयन होता है, जो किसी भी रचना को उसके अनेक मापदंडों पर तौल कर उसको पुरुस्कृत करती है। इस बार हिंदी और जो अन्य भारतीय भाषा के रचनाकारों को चुना गया है उसमें आसामी भाषा के डॉ. डेका और हिंदी भाषा की मर्मज्ञ, भाषाविद्, प्रेम की कवयित्री प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी के 'छिन्नमूल' नामक उपन्यास को चुना गया है । इस उपन्यास की खूबसूरती यह है कि यह प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी के पन्द्रह सालों की तपस्या है जिसको उनको 2001 से 2016 तक सूरीनाम के अपने और नीदरलैंड में रहकर स्वयं अपनी आंखों से देखा है उसका एहसास किया है तथा उसको मानवतावादी दृष्टिकोण से अपनी कलम से उकेरने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिसमे गिरमिटिया मज़दूरों की व्यथा तो है ही उसके अलावा भारतवंशियों के द्वारा अपनी भाषा, संस्कार, संस्कृति को भी बचाये रखने और उसको संजोए रखने का अनहद नाद भी है। इस उपन्यास में ऐतिहासिक दृष्टिकोण तो है ही उसके अलावा संस्कृति, संस्कार, परम्पराएँ, तुलसीदास की रामचरित मानस, और कबीर के बीजक का भी पुट देखने को मिलता है। जिसको कोई भी पाठक पढ़ता है तो उसका विश्लेषण अवश्य करता है और वो 5 जून 1873 की गिरमिटिया मजदूरों की कथा को देखता है जिसमे कॉलोनाइजरो द्वारा भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों के साथ हुई बर्बरता, दुराचार और उनको वर्षो तक शिक्षा से दूर रखने के छल प्रपंच को भी समझता है जिससे उसको मालूम होता है कि आखिर किस प्रकार उनके खून- पसीने को कॉलोनाइजर ने अपने लाभ के ख़ातिर गिरमिटिया मज़दूरों का दोहन किया है। इस उपन्यास में संवेदना के अभिव्यक्ति का स्तर बहुत उच्च कोटि का है जिसको एक आम पाठक पढ़ते हुए अनेक बार अपनी आंखें नम होते हुए अनुभव करता है। उन्ही नम आंखों, संवेदनाओं, गिरमिटिया मज़दूरों, भारतवंशियों के दर्द को भलीभांति समझकर आज कुसुमांजलि फाउंडेशन की ज्यूरी टीम ने इस उपन्यास को सम्मानित किया है जिससे सूरीनाम, नीदरलैंड और कैरिबियाई देशों में रह रहे भारतवंशियों की पीढ़ियों को सम्मान है। जो डच भाषा को छोड़कर विश्व की किसी भी भाषा को ध्यान में रखते हुए हिंदी भाषा मे पहला उपन्यास है जो कन्त्राकी बागान ( कॉन्ट्रैक्ट प्लांटेशन के तहत ले जाये गए हिंदुस्तानियों के दारुण संघर्ष का जीवित दस्तावेज़ी आख्यान है।

भारत और भारत से बाहर अनेक हिंदी विभाग के संस्थानों में प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी पर शोधकार्य हो रहा है, लगभग प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी ने 45 किताबो की रचना की...जिसमे सभी विधाओं में लिखा गया है.. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी तीन शोधार्थी प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी पर शोध कर रहे है जिनमे अकरम हुसैन सूरीनाम गध साहित्य में पुष्पिता अवस्थी का योगदान जैसे विषय पर काम कर रहे है जबकि मोहम्मद बिलाल चौधरी और शकील अहमद भी पुष्पिता अवस्थी पर शोध कर रहे है जिससे निश्चित ही पुष्पिता अवस्थी के द्वारा रचे गए साहित्य को बारीकी से समझा जा सकता है....अन्य भारतीय विश्विद्यालयों की बात की जाए तो केरल, बुंदेलखंड, वर्धा, आगरा अनेक विश्वविद्यालयो में शोधकार्य चल रहे है

प्रस्तुति
अकरम हुसैन
शोधार्थी
एएमयू अलीगढ़
सहसंपादक - वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका अलीगढ़