सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

सर सय्यद ज़िंदा या मुर्दा- अकरम हुसैन क़ादरी

किसी का जिस्मानी तौर से इस दुनियाँ से चले जाने का मतलब यह नही है वो मर गया, कोई मरता तब है जब उसकी सोच मर जाती है यूँ तो हिंदुस्तान की सरजमीं पर अनेक महापुरुष आये और चले गए लेकिन उन्होंने अपनी सोच के माध्यम से समाज को एक नई दिशा प्रदान की।
सर सय्यद जैसी अज़ीम शख्सियत को मुर्दा कहने का मतलब है कि पूरी दुनियां के गोशे-गोशे में समाए अलीगेरियन के समाजी, मज़हबी और इंसानियत के काम को दरकिनार करना, जितने भी दुनियाँ में सक्सेस अलीगेरियन है वो ही सर सय्यद के ख्वाबो के असली पैरोकार है वो ही सर सय्यद के ख्वाबो की ताबीर करते हुए नज़र आते है उनका मकसद केवल एक ही होता है कि किसी तरह से सर सय्यद के तालीमी मिशन को आगे बढ़ाया जाए, पूरी दुनियां का अंधेरा अगर मिट सकता है तो वो केवल तालीम ही है मगर अफसोस मौजूदा समय मे हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा अनपढ़ लोग रहते है, अगर कुछ देर के लिए मान लिया जाए कि सर सय्यद मुसलमानों के तालीमी मसीहा थे फिर भी हिंदुस्तान में आज मुसलमान ही तालीमी तौर पर सबसे ज्यादा पिछड़े हुए है जिसकी ज़िंदा मिसाल सच्चर कमेटी की सिफारिशे और स्वामी रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट्स है जिनके जरिए हम समझ सकते है किस तरीके से तालीम ना होने की वजह से हम पूरी दुनियां में पिछड़ रहे है।
पूरी दुनियां के अलीगेरियन को फिर से समझना होगा कि आखिर क्या वजह है हिंदुस्तान में अल्पसंख्यक में शुमार मुस्लिम कौम क्यो तालीम में इतनी पिछड़ गयी जबकि जैन, सिक्ख और पारसी का तालीमी ग्राफ देखा जाए वो अक्सरियत से भी ज्यादा है,
जिन लोगो ने सर सय्यद को मुर्दा मान लिया है उनसे मेरी कोई तवक्को नही है बल्कि जो सर सय्यद की सोच को ज़िंदा रखते है और सर सय्यद को ज़िंदा मानते है वो लोग जिस भी गाँव, मोहल्ले, कस्बे, शहर और देश मे है वही से सर सय्यद के मिशन को शुरू करदो..अगर आपकी माली हक़ीक़त इस काबिल है कि आप कुछ गरीबो को पढा सकते है उसके हिंदुस्तान की दूसरी यूनिवर्सिटी में भेज सकते है उसका खर्चा उठा सकते है तो यह ही सर सय्यद के लिए सच्ची खिराजे अक़ीदत होगी... अगर एक अलीगेरियन अपनी ज़िंदगी मे दो गरीबो को पढा देगा तो यकीनन बहुत जल्दी हमारे मुआशयरे में बदलाव नज़र आना शुरू हो जाएंगे...अलीगेरियन में सबसे अच्छी बात यह भी है कि इनके ओल्ड बॉयज पूरी दुनियां में रहते है और जहां भी रहते है उनका अमल, दखल वहां की सियासी, मज़हबी या मासी हालात में ज़रूर रहता है जिससे वो ज्यादा से ज्यादा अपने बहनों, भाइयो को फायदा पहुंचा सकते है और सर सय्यद के जानशीन बन सकते है ... दुनियाँ में बहुत से ऐसे अलीगेरियन है जो दुनियाँ में जाने माने लोग है और वो लोग इस काम को बहुत ज़िम्मेदारी से कर भी रहे है उनको मुबारकबाद, जो अभी नही जागे है उनको जगाने की ज़रूरत है... सर सय्यद के नाम से हर शहर में एक ओल्ड बॉयज एसोसिएशन है उनका काम केवल सर सय्यद डे मनाकर बिरयानी, कोरमा खाना नही है बल्कि वहां पर गरीबो, मजदूरों के बच्चों को सस्ती तालीम देना भी है जिससे वो लोग समाज को नया रुख दे सके, तालीमयाफ्ता हो जाएंगे तो यकीनन गरीबी भी दूर हो जाएगी.....वतन भी तरक़्क़ी करेगा.. आजकल हिंदुस्तान में एक ट्रैप चल रहा है जिसको हिन्दू-मुस्लिम डिबेट कहते है उससे भी खास बचने की ज़रूरत है हमे वतन के लिए आगे बढ़ना है हम सब भाई-भाई है
आज से हर अलीगेरियन खुद से वादा करे कि वो अपनी ज़िंदगी मे एक गरीब लड़का और लड़की को अपने पैसे से पढ़ायेगा जिससे सर सय्यद को मुर्दा समझने वालों को ठोस जवाब भी मिलेगा और उनकी सोच को आगे बढ़ाने का मौका भी मिलेगा
हिंदुस्तान में अल्लाह ने सर सय्यद के ज़रिए कमसेकम 2 लाख लोगों को तीन वक़्त का कहना मुहैया कराया, यह उन लोगो पर भी करारा तमाचा है जो वसीले का इनकार करते है

जय हिंद

अकरम हुसैन क़ादरी

गुरुवार, 18 मई 2023

सर्पदंश होने पर झाड़, फूंक नहीं इंजेक्शन अपनाए- अकरम क़ादरी

सर्पदंश होने पर झाड़, फूंक नहीं इंजेक्शन अपनाए - अकरम क़ादरी

बरसात का महीना चल रहा है,एसे में सांप, बिच्छू का खतरा बना रहता है।खेतो की मेड़ पर ही विषेले जीव होते है ज़्यादातर ऐसे जहरीले जीव पानी से बचने की वजह से सूखे जगह पर ही रहते है, इसलिए पहले तो ध्यान से जाए, अगर कोई सांप बग़ैरा काट ले तो कभी भी किसी बाबा, वैद्य, हरे, नीले, पीले, काले, सफेद, और भगवा कुर्ते वालो से बचे और सीधा सरकारी जिला अस्पताल की तरफ जाएं। चौमास के दौरान सरकारी अस्पताल में एंटी डोज उपलब्ध होती है।अगर फिर भी किसी वजह से वहां पर "एन्टीवेनम" इंजेक्शन नहीं है तो किसी प्राइवेट हॉस्पिटल को जाए और अपना प्रॉपर इलाज कराए।इलाज लंबा और खर्चीला हो सकता है परन्तु सरकारी अस्पताल में यह पूर्णतः मुफ्त है।सही इलाज करवाने से  आपकी ज़िंदगी बच सके और आपका परिवार भी सुरक्षित हंसता खेलता रहें। 
बहुत से हमारे मित्र कहेंगे मिसाल के साथ कि फलां तारीख को फलां इंसान को ढिंका बाबा ने मन्त्र से ठीक कर दिया था, दोस्तों यह कोरी अफवाह है इससे कुछ नहीं होता है दरअसल जिस सांप ने काटा होता है वो ज़हरीला नहीं होता है और थोड़ी बहुत सूजन आ जाती है। लेकिन जिस भी बाबा या वैद्य के पास ऐसे मरीज़ को लेकर जाओ तो वो बताता है कि इसको किंग कोबरा ने ही काटा है जबकि किंग कोबरा जंगलो, पहाड़ो या फिर साउथ इण्डिया में पाया जाता है। हां कोबरा ज़रूर खेतो, घरों में होता है फिर यह बाबा क्यों इतना अधकचरा ज्ञान बांटते है क्योंकि उनको अपनी दक्षिणा और अपने पुरखों के नाम पर डकैती करना है। वो केवल आपको लूटते है और अपनी जीविका चलाते है। घरों में ज़्यादातर वही सांप पाए जाते है जो "नॉनवेनम" होते है बस एक सांप ज़्यादा घर, मकान में मिलता है वो है कॉमन करैत जिसको गांव में हिरूआ,  धामन या फिर दूसरे इलाक़ाई नामो से जाना जाता है। उत्तर भारत में सांप की सभी प्रजातियों में केवल तीन प्रजातियां ही विषेली होती हैं।इनमें कोबरा, करेंत, रसेल वाइपर है।  इसलिए जब भी कभी आपको कोई सांप काटे तो पहले काटी हुई जगह को पानी से धोएं और उसपर किसी चीज का लेप या चीरा बिल्कुल भी न लगाए।सबसे पहले शांत रहें और घबराए नहीं क्योंकि घबराहट से हृदय गति तेज हो जाती है और ज़हर तेजी से फैलने लगता है। बिना घबराए शांत  रहें और काटी जाने वाली जगह या उसके आसपास जगह पर किसी भी चीज को न बांधे।यदि संभव हो तो गर्म पट्टी को काटे गए स्थान से ऊपर नीचे से ऊपर की ओर लपेटे ,ठीक वैसे ही जैसे किसी डंडे या दूसरी वस्तु को कपड़े या रस्सी से ढका जाता है।लेकिन इसे कसकर बिल्कुल भी ना बांधे।ध्यान रहे कि संभव हो तो पैदल न चले और यदि बैल्ट या नाड़े वाला कोई वस्त्र पहने हो तो उसे ढीला कर दे और जल्दी से सीधे हॉस्पिटल जाएं ।सर्पदंश का इलाज संभव है और यह आपके आसपास प्राथमिक स्वास्थ केंद्र अथवा जिला अस्पताल में आसानी से उपलब्ध होता है। बाबा, ओझा, वैद्य से झाड़, फूंक ना कराए।यह बिल्कुल अंधविश्वास है । हिंदुस्तान में ऐसी मौतों की संख्या ज़्यादा है जो सांप के कटने से होती है परन्तु उसका मुख्य कारण अंधविश्वास ही होता है।  भारत में सर्पदंश से मरने वाले लोग अधिकांशतः अंधविश्वास और सही इलाज के अभाव में मरते है। लोग अस्पताल जाने के बजाय बाबा और दूसरे ढोगियो के चक्कर में फंसकर जान और माल का नुक़सान करते है। यकीन रखे कि कोई भी सर्प काटे उसका इलाज आपके पास सरकारी अस्पताल और जिला अस्पताल में मौजूद है।भारत सरकार भी जनता को इससे अवगत कराते हुए जागरूक का प्रोग्राम चलाए जिससे किसान, मज़दूर का जीवन बच सके और वो अच्छा जीवन व्यतीत कर सके। वर्तमान समय मे सरकार सर्पदंश से मरने वालों को काफी पैसा भी देती है।

शनिवार, 20 नवंबर 2021

डॉ. आज़ममीर ख़ान पीलीभीत की पहली पसंद- अकरम क़ादरी

डॉ. आज़ममीर ख़ान पीलीभीत की पहली पसंद- अकरम क़ादरी


चुनावी सरगर्मियों में नेता लम्बे-लम्बे लिखे हुए भाषण देकर खुद को बहुत अच्छा समझते है जबकि जनता केवल नेता के काम पर विश्वास करती है। हद से ज़्यादा बोलना भी कैंडिडेट के लिए नुकसानदायक हो जाता है। क्योंकि वो जनता और उसके असल मकसद को समझ ही नहीं पाता है। और झूठे वादे करके लॉलीपॉप देकर रफूचक्कर हो जाता है। मौजूदा सरकार में बोलने वाले ऐसे-ऐसे धनुर्धारी है जो कुछ सेकण्ड में ही पानी मे आग लगा दे। लेकिन जनता के बीच उनका काम निल है। जिसके कारण उनको मुंह की भी खानी पड़ती है। 
पीलीभीत की जनता ऐसे लोगो को एक लम्बे समय से जानती है जो नफरती बातें करके आपसी चैन सुकून, मेलजोल ख़त्म करना चाहते है। मेरा बड़ा साफ मक़सद है कि कोई भी ज़िला तब ही तरक़्क़ी करेगा जब सब धर्म, जाति, पंथ के लोग मिलकर कोशिश करेंगे। 
मेरे अपने शहर के भाइयों/बहनो से विनती है कि राजनीति अलग चीज़ है सबसे पहले अपना भाईचारा, अमन क़ायम रखो जहां पर मोहब्बत होती है वहां राजनीति भी अच्छी होती है और ज़िला भी विकास की ओर गामज़न होता है। अंततः मेरा मकसद मोहब्बत है जहां तक फैले।
डॉ. आज़ममीर ख़ान जब 2012 में नई नवेली पीस पार्टी से कैंडिडेट थे जनता ने इसी प्रेम, मोहब्बत और अमन वाले पैग़ाम के कारण उनको बत्तीस हज़ार वोट से नवाज़ा था, जबकि उस वक़्त सूबा ए उत्तरप्रदेश के कद्दावर नेता, पुराने राजनीतिक पांच बार के विधायक मरहूम हाजी रियाज़ अहमद साहब ज़िंदा थे। हाजी साहब का इस दुनिया मे जाना सच मे बहुत दुःख का विषय है लेकिन इस समय पीलीभीत की जनता कोई ऐसा नेता नज़र नहीं आया जिसमे हाजी जी के बराबर दमदारी हो, जो जनता के मुद्दों को मज़बूती से उठा सके। 
डॉ. आज़ममीर ख़ान साहब में पीलीभीत की जनता को वो खूबियां नज़र आती है जो पीलीभीत की जनता चाहती है क्योंकि डॉ. आज़ममीर ख़ान साहब को राजनीति का अच्छा अनुभव है वो एएमयू से ही छात्र राजनीति में सक्रिय चेहरा रहे है और अपने ज़िले के बहुत लोगो को उन्होंने इलाज, शिक्षा जैसे बुनियादी मसलों को हल करने का काम किया है। 
वास्तव में पीलीभीत की जनता की कुछ ही डिमाण्ड रही है जिसमे शिक्षा और स्वास्थ्य मुख्य है। डॉ. आज़म मीर खान इन मुद्दों को भलीभांति समझते भी है क्योंकि वो स्वयं एक डॉक्टर है और शिक्षा के मैदान में भी उनका अहम योगदान है। अलीगढ़, जामिया, दिल्ली और इलाहाबाद में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की आपने उनके एंट्रेंस में भी मदद की है। कई छात्र-छात्राओं को कोचिंग के ज़रिए अच्छे कोर्स में एडमिशन कराया है इस कारण ही पीलीभीत की जागरूक जनता आज़म मीर ख़ान को अपने विधायक बनाने के लिए आतुर है। 
डॉ. साहब ने जबसे समाजवादी पार्टी जॉइन की है तबसे जनता में भी उम्मीद की किरण नज़र आती है क्योंकि जब वो किसी पद पर नहीं थे तो लगातार जनता की मदद कर रहे थे। आने वाले समय मे अगर पार्टी प्रमुख का आशीर्वाद मिला और जनता ने अपना अप्रितम समर्थन दिया तो पॉवर के साथ जनता के मुद्दों पर जमकर काम करने का प्रयत्न करेंगे।
समाजवादी पार्टी की नीतियों का प्रचार-प्रसार में संलग्न आज़म मीर खान ने बताया कि जनता का उत्साह, पार्टी के पिछले कार्यो को पॉजिटिव रेस्पांस निश्चित ही 2022 में सफलता दिलाएंगे फिर से जनता से न्याय होगा सबको समानता का अधिकार मिलेगा

बुधवार, 17 नवंबर 2021

किसान आंदोलन और यूपी, उत्तराखंड चुनाव- अकरम क़ादरी

किसान आंदोलन और यूपी, उत्तराखंड चुनाव- अकरम क़ादरी

किसान आंदोलन को लगभग ग्यारह महीने हो चुके है। आंदोलित किसानों ने हाड़-मास कपाती सर्दी भी देखी है, पिघलने वाली गर्मी भी और सर्द हवा के साथ बारिश भी। कई बार ज़ोरदार आंधी में टेंट भी उड़ गए फिर भी भीगते हुए किसान धैर्य से बैठे रहे, अनेक मुसीबतों का सामना करते रहे उसके अलावा प्रशासनिक धमकियां, पत्रकारों की उलूल-जुलूल मीडिया डिबेट (ट्रायल), सत्ता समर्थित पत्रकारों और तथाकथित मीडिया वालों ने किसानों की इमेज कभी खालिस्तानी बनाई, कभी आतंकवादी कहा, तो कभी किसी भी विपक्ष पार्टी का प्रोपगंडा कहकर नकारने की भरपूर कोशिश करते रहे। सत्ता, मंत्री और उनका आई.टी सेल इवेंट मैनेजमेंट करने में लगा रहा है, बदनाम करने की कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी, सत्ता पक्ष के लोगो का ब्रह्मास्त्र 'हिन्दू-मुस्लिम' का रूप देने की भी कोशिश बर्बाद हो गयी। क्योंकि वास्तव में देश मे धार्मिक विविधता तो है वो अनेक धर्मो का मानने वाला हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई तो है लेकिन उससे पहले वो एक किसान है उनकी आजीविका का मुख्य साधन फसल ही है जहां से वो अपने बच्चे का लालन-पालन करता है, अपनी लड़की के हाथ पीले करता है, बेटे को फ़ौज की नोकरी में भेजता है खुद खेती करके देश की जनता की पेट की आग बुझाता है।
आंदोलित किसानों के साथ लगातार घटनाएं हो रही है, अभी कुछ दिन पहले ही लखीमपुर की हृदय विदारक घटना हुई है जिससे कथित तौर पर मंत्री के बेटे ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे  किसानों को अपनी महेंद्रा थार से कुचल दिया जैसा बताया जा रहा है।  कई किसान मौके पर ही शहीद हो गए, जिसमें एक पत्रकार भी शहीद हुआ है। जो लोग गाड़ी में सत्ता पक्ष के थे उन्होंने जब भागना शुरू किया तो उत्तेजित भीड़ ने उनको दौड़ाकर पीटा, सुनने में आ रहा है उनकी भी मृत्यु हो गई जिसकी ज़िम्मेदार अप्रत्यक्ष रूप से केंद्र और राज्य सरकार है। इस पूरे कांड में गृह राज्यमंत्री आशीष मिश्रा उर्फ टेनी महाराज के बेटे का नाम आ रहा है। जो महेंद्रा थार में मौजूद था, अभी उसकी गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन उसका पिता अभी भी गृह राज्यमंत्री बना हुआ है तो प्रतीत होता है कि वो जांच में कुछ दखल अवश्य करेगा जिससे शहीद किसानों को न्याय नहीं मिल सकता। किसान नेता और सभी पंजाब के जत्थेबंदी उसको बर्खास्त करने की मांग कर रहे है। जिससे शहीद किसानों को न्याय मिल सके और असली गुनहगार सलाखों के पीछे जा सके। 
किसान आंदोलन बहुत मज़बूती से दिल्ली के चारो तरह बॉर्डर पर चल रहा है। सभी किसानों के दल बैठे हुए है और वोट की चोट से अपनी मांग मंगवाने के लिए रणनीति तैयार कर रहे है हालांकि वो वेस्ट बंगाल में कामयाब भी हुए है लेकिन हिंदी हार्टलैंड में भी मज़बूती से लड़ रहे है। हो सकता है इसमें भी उनको कामयाबी मिल जाएं।
भाजपा के लिए इस समय देश में पांच जगह चुनाव है जो आगे-पीछे ही  चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तावित है। किसान नेताओ ने लखनऊ, देहरादून में अपनी मौजूदगी दिखाना शुरू कर दिया है क्योंकि जितनी भी मीडिया डिबेट हो रही है उसमें किसान नेता ज़रूर एक दो सेशन में दिख रहे है। इससे यह साबित होता है किसान आंदोलन भी यूपी, उत्तराखंड के चुनाव पर भरपूर असर करेगा। क्योंकि पश्चिमी उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड लगभग एक जैसी ही पृष्ठभूमि रखते है क्योंकि संस्कृति, भाषा और खान पान लगभग समान ही है। 
इस क्षेत्र का किसान जागरूक भी है और अपना हक लेना जानता भी है।
पिछले कई महीनों से किसानों के लिए बीजेपी नेताओ द्वारा आवाज़े उठना शुरू हो चुकी है जो पार्टी चुनाव के लिए अच्छे संकेत नज़र नहीं आते है।
पूर्व बीजेपी नेता और वर्तमान में गवर्नर सत्यपाल मलिक बराबर किसानों के मुद्दों को लेकर मुखर प्रतीत हो रहे है। वो जो बातें जनता के सम्मुख रख रहे है वो एकदम यथार्थ है। लेकिन पार्टी अपनी हठधर्मिता छोड़ना नहीं चाहती है।
पीलीभीत से बीजेपी के सांसद संजय  और मेनका गांधी के सपुत्र वरुण फ़ीरोज़ गांधी भी किसानों के लिए अपनी भावनाएं बता चुके है और मुखर रूप से अपनी ही सरकार का विरोध दर्ज करा चुके है। 
गौरतलब है किसानों के मुद्दे पर ही भाजपा का सबसे पुराना अकाली दल भी बाहर हो चुका है। और किसानों के मुद्दे पर डटकर सामना कर रहा है। बाकी हिंदी हार्टलैंड से न जाने कितने विधायक, नेता बीजेपी छोड़ चुके है जो निश्चित ही उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड के चुनाव में अपना असर दिखाएंगे ही उसके वाला बाकी तीन राज्यों में किसान आंदोलन का जबरदस्त प्रभाव देखने की उम्मीद है।

शनिवार, 19 जून 2021

हाँ-हाँ राजनीति में अनफिट है, राहुल गांधी - अकरम क़ादरी

हाँ-हाँ राजनीति में अनफिट है राहुल गांधी - अकरम क़ादरी

नेहरू-गांधी परिवार का कोई चश्मों चिराग़ अगर भारतीय राजनीति में अनफिट है तो सच में यह बहुत कुछ सोचने-समझने पर मजबूर करता है। आखिर ऐसा देश मे क्या हो गया कि इतने बड़े परिवार का व्यक्ति मुझ दो कौड़ी के इंसान को राजनैतिक अनफिट लग रहा है जिसको मैं लिखकर बता भी रहा हूँ।
एक लम्बे अरसे से भारतीय राजनीति में विचारधारा का घोर अकाल है मुठ्ठीभर लोग ही बचे है जो अपनी विचारधारा से समझौता नहीं करते है। वरना सुबह में जिन नेता जी के गले मे हरा पट्टा देखा था शाम होते ही भगवा होकर उसी पार्टी को बुरा भला कहते हुए देखा है जिसके लिए सुबह कसमें खा रहे थे। शाम को उन्हीं कसमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रहीं है। (दरअसल राजनीति में भी एक वाशिंग मशीन है जो सुबह में पड़े हुए पट्टे को धोकर साफ कर देती है अर्थात इधर से भ्रष्टाचारी मशीन में डालो उधर से सदाचारी निकलता है) वर्तमान सत्तारूढ़ दल में भी कांग्रेस से भगौड़े नेताओ की लंबी फेहरिस्त है। क्योंकि यह अधिकांशतः दागी तो है जिनका मकसद राजनीति में धनोपार्जन करना, ऐश, अय्याशी करना, आय से अधिक सम्पत्ति रखना, तथा कुकर्मों में रोज़ ही नाम आना और उन नामों को छुपाने का प्रयत्न करना। ऐसे नेताओं के लिए हमेशा सत्ताधारी दल अपने पालतू सरकारी तोते और तोतियाँ नामक परजीवी छोड़ देता है जो डायरेक्ट, इनडाइरेक्ट उस नेता को समझाती है कि अगर ऐसा करोगे वो सब चीज़ों से बच जाओगे और बिल्कुल ऐसा ही फिल्मी सीन होता भी है जो पार्टी दस दिन तक उस नेता के खिलाफ ट्विटर पर दलाली का ट्रेंड चला रही हो उसी को ही डिफेंड करना शुरू कर देती है। 
आखिर में बात यही आती है पिछले दो दशक से राजनीति के 'मूल' जीर्ण-शीर्ण अवस्था से विमुख होकर भरभराकर गिर चुके है। 
राहुल गांधी की काबिलियत पर शक करना तो शायद मुझे उचित नहीं लगता है क्योंकि वो वक्ता नहीं कर्ता है। जिस प्रकार से डॉ. मनमोहन सिंह जी अच्छे वक्ता नहीं थे लेकिन काम करता लाजवाब थे, डिग्रियों का अंबार था उनके खाते में ऊपर से क़लम भी वही पांच रुपये वाला रेनॉल्ड्स का जिसको देखकर कोई भी शरमा जाए। एक आज वाले नेता है जो वक्ता बहुत शानदार है, दस मिनट में ही रसगुल्लों की बारिश करा दे और जनता को एहसास भी करा दे कि उन्होंने बगैर चासनी के रसगुल्ले लील लिए है लेकिन मज़ा बाद में आएगा। 
दरअसल यह वो व्यापारी हैं जो पुराने सड़े-गले माल को नई पैकिंग के साथ करोड़ो में बेच देते है। जिससे लम्बे समय तक चलने वाले रिश्ते कुछ समय में ही खराब  हो जाते है।
इतना ज़्यादा कॉन्फिडेंट में बोलने के कारण कभी-कभी ऐसा बोल जाते है जिससे उनके समर्थकों को भी डिफेंड करने में हिचकिचाहट होती है। फिर भी वो बेचारे करते है(उनकी बुद्धिमत्ता को नमन) 
पिछले दिनों एक सिफोलॉजिस्ट कम पॉलिटिशियन एंड किसान नेता को सुन रहा था वो कह रहे थे- "देश मे बहुत प्रधानमंत्री आये, बहुत-बहुत निकम्मे, कामचोर भी थे, आलसी भी थे लेकिन इतना सफेद झूठ बोलने वाला पहली बार देखा है" यह विचार उनके सुनकर बहुत सोचा कि आखिर यह इंसान जो कह रहा है वो सच तो है, फिर राहुल गांधी के संदर्भ में सोचा तो कहानी बिल्कुल अलग लगी क्योंकि पिछले दिनों से लगातार एनालिसिस कर रहे है जो राहुल गांधी भविष्य के बारे में बताते है वो सच ही हो रहा है। जिसका नुकसान हमारे साथ -साथ मासूम स्टूडेंट्स का भी होता है।
मौजूदा बतौलेबाज़ ने ऐसे-ऐसे झूठ गढ़ दिए है जिसकी वजह से जागरूक जनता में उस पद की इज़्ज़त भी कम हुई है। कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण पेश कर रहा हूँ जिससे आपको पता चल सके मौजूदा राजनीति में राहुल गांधी क्यों अनफिट है
जब उन्होंने एक इंटरव्यू में बोला कि उन्होंने पहला ईमेल 1988 में किया था, उनके पास डिजिटल कैमरा भी था, फिर किसी भी बड़े प्राइम टाइम न्यूज़ एंकर ने उसकी पड़ताल की ...शायद किसी  पर भी नहीं हो सकता है NDTV ने कर दी हो लेकिन किसी भी गोदी मीडिया के पत्रकार ने दो लफ्ज़ भी इस वैज्ञानिक खोज पर बोले हो तो कोई हमें दिखा दे। 
हालांकि आजकल झूठ का सबसे ज्यादा प्रोपेगैंडा गोदी मीडिया के पत्रकार ही दो हज़ार के नोट में चिप दिखाकर कर रहे है।
हिंदी के तीन महान महापुरुषों को एक ही कालावधि का बता दिया जबकि उनकी उम्र में कम-से-कम 100 वर्ष का अंतर है। इस पर भी किसी प्राइम टाइम गोदी मीडिया ने कुछ नहीं बोला।
महानता का स्तर देखिए टीवी इंटरव्यू में गोदी मीडिया के पत्रकार से कह रहा है बादल की वजह से राडार काम नहीं करता है। 
पत्रकारों/ कैनेडियन कलाकारों के प्रश्न देखेंगे तो आंसू ही आ जाएंगे फिर भी वो मीडिया ट्रायल देते हुए कुछ नहीं बोलते है
आम आप चूसकर खाते है या काटकर?
आप कौनसा टॉनिक लेते है, आप थकते क्यों नहीं है?
आप बटुआ (पर्स) रखते है क्या?? 
दरअसल यह इंटरव्यू ज़्यादातर फिक्स ही होते है जिसको देखकर लगता है एक तरफा चल रहा है। 
दूसरी तरफ तथाकथित देशभक्त पार्टी की आई.टी. सेल ने एक पढ़े-लिखे युवा नेता को 'पप्पू घोषित करने के लिए मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक अपना जाल बिछाया और बहुत हद तक कर भी दिया' लेकिन पिछले दिनों अचानक एक सच्चाई निकल कर सामने आई जो भी राहुल गांधी ने भविष्यवाणी की थी वो एक एक करके सच साबित हो रही थी, इस बार बगैर किराए की जनता ने दूसरे लोगो को पप्पू बोलना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ कोरोना की सेकंड वेब ने पार्टी को धराशायी कर दिया है हर तरफ उनकी सच्चाई सामने आ गयी हैं। 
किसानों की समस्या का भी निपटारा नहीं कर पाए है बल्कि खुद के अन्नदाता को देशद्रोही, खालिस्तानी, आतंकवादी कहना शुरू कर दिया जिसका समर्थन गोदी मीडिया ने भी अपरोक्ष रूप से खूब किया लेकिन किसान आईटी सेल ने इनकी धज्जियां उड़ा दी और देश को सच्चाई पता चलती रही जिससे किसानों पर होने वाले दुष्प्रचार का सामना खुद किसान और उनके जागरूक पुत्रों ने किया है।

जय हिंद

अकरम क़ादरी

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

जिस पिता ने ज़िन्दगी दी, बेटे ने लीवर देकर अपना फ़र्ज़ निभाया - अकरम क़ादरी

जिस पिता ने ज़िन्दगी दी, बेटे ने लीवर देकर अपना फ़र्ज़ निभाया - अकरम क़ादरी
एक कहावत है- "बुरे वक्त पर ही अपने और गैरों का एहसास होता है" जो अपना होता है उसको कहने की ज़रूरत नहीं होती है और गैर से कोई कुछ कहता नहीं है। कुछ ऐसा ही हुआ है बेटे और वालिद के रिश्तों में-  रामपुर के हसनात अली खान अलीग ने पेश की मिसाल यह वो बेटा है जिसने अपने पिता को नया जीवन दिया है हालांकि यह ज़िन्दगी उन्हीं की दी हुई है। हसनात अली ख़ान ने अपना लीवर देकर इतना ही नहीं आजकल के बेटों के प्रति जागरुगता पैदा की है और मां-बाप की प्रति सेवा-भाव का उदाहरण भी पेश किया है। जबकि प्रोफेशनल लाइफ की वजह से संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है आजकल के रिश्तों में भावुकता नहीं है। जब हसनात को मालूम हुआ कि उनके पिता को लीवर की ज़रूरत है तो उन्होंने बड़ा दिल दिखाकर अपने पिता के लिए फ़र्ज़ अदा करने की एक छोटी से कोशिश की। पिता को भी अपने बेटे पर गर्व महसूस होता है।
रामपुर निवासी विज़ारत अली खान लम्बे समय से लीवर की बीमारी से पीड़ित थे सन 2015 में लीवर डैमिज होने के कारण डॉक्टर ने उन्हें जीवित रहने के लिए ट्रांसप्लांट ही अंतिम विकल्प बताया था, पिता को बचाने के लिए बेटा हसनात आगे आया उसने अपना 60 पर्सेंट लिवर पिता को मेदांता हॉस्पिटल गुरुग्राम में को प्रत्यारोपित करा दिया उसके ट्रांसप्लांट को लगभग 6 साल पूर्ण होने के उपलब्ध में मेदांता हॉस्पिटल लीवर ट्रांसप्लांट डिपार्टमेंट के डिरेक्टर पद्मश्री डॉक्टर ए. एस. सोनी ने बधाई देते हुए ट्वीट किया जिसकी बड़े-बड़े जर्नलिस्ट ने सराहना की तथा उस ट्वीट को कई जागरूक नागरिको ने रिट्वीट भी किया जिनमे मिस्टर राघव भल  फ़ाउंडर नेटवर्क 18 अथवा मिस्टर संजय पुगलिया प्रेसिडेंट एंड एडिटोरीयल डिरेक्टर दा क्विंट इण्डिया ने रिट्वीट कराकर हौंसला अफजाई करते हुए हर बेटे को ऐसा गौरवशाली काम करने का एहसास दिलाया आजकल लोग अपने माँ-बाप को चंद वजह से वृद्धाश्रम में छोड़कर चले आते है यह विदेशी अपसंस्कृति हमारे देश मे बहुत तेज़ी से पैर पसार रही है जिसको हसनात जैसे नोजवानो से सीख लेकर आजकल के बच्चों को अपने माँ-बाप की सेवा करना चाहिए। 
हसनात ने जब लीवर ट्रांसप्लांट कराया था जो साथ मे उनके हमदर्द, दोस्त, अजीजों अकारिब भी थे जिसमें फैज़ान शाहिद, अकरम क़ादरी ने उन्हें मुबारकबाद पेश की तथा खुद को गौरवान्वित महसूस किया और कहा कि ऐसे दोस्त पर हमें फक्र है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

किसान की लाठी, किसान का ही सिर- अकरम क़ादरी

किसान की लाठी, किसान का ही सिर- अकरम क़ादरी

एक पत्रकार दिल्ली में बगैर हेलमेट के जा रहा था, रास्ते मे एक पुलिस वाले ने रोका और बड़े रौब से पूछा कहाँ जा रहे हो ? पत्रकार ने बेधड़क होकर कहा "ग़ाज़ीपुर बॉर्डर किसान आंदोलन को कवर करने" इतने पर ही पुलिस वाले भाई साहब बिखर गए और आंखों में आंसू लिए बोले "बड़ी बदकिस्मती है भाई आज हम अपने ही बाप-भाइयों की पीठ पर लाठियां बरसा रहे हैं। उसी पीठ पर जिसपर बैठकर हम बड़े शौक़ से खेत पर जाया करते थे। पुलिस के आक़ाओं के हुक्मों का हवाला देते हुए उसने दबी आवाज़ से कहा अब उस बाप पर कैसे लाठियां बरसाई जाए जिसने खेती में रात-रात भर कपकपाती सर्दी में सिंचाई करके मुझे इस क़ाबिल बनाया है। एक भाई बॉर्डर पर दूसरा भाई भी बॉर्डर पर गाज़ीपुर वाले और माँ बाप सड़क पर ये क्या खेल रही है सरकार।

इतनी देर में पत्रकार साहब समझ चुके थे कि अंदर तक कितना हिला हुआ है यह पुलिस वाला, उनको संवेदनाए देते हुए कहा "चिंता ना करो जब तक हम है असली और सच्ची पत्रकारिता करेंगे चाहे हमारी जाति के बड़े गिद्ध कितने भी बिक जाए। हम आपके दर्द को बखूबी समझ रहे है और पेट की आग बुझाने की मजबूरी को भी।

पत्रकार महोदय को थोड़ा आगे ले जाकर पुलिस महोदय ने 500₹ का नोट दिया और कहा "वहां जाकर लंगर में दे देना"। उम्मीद की नज़रों से देखते हुए कहा भाई अपने पेशे से समझौता नहीं करना अभी तो लाखों लोग भूखे सो रहे है आने वाले वक्त में करोड़ो सोएंगे, हो सकता है उसमें आपकी और मेरी आने वाली पीढियां भी हो"

पत्रकार महोदय जब वहां से निकले तो पुलिस की जो दंगाई वाली इमेज आजतक बनाई गई थी यह तस्वीर उससे भी बिल्कुल अलग थी। कुछ देर आगे चलने के बाद उसके शब्दों की तासीर को समझते-समझते कब ग़ाज़ीपुर बॉर्डर आ गया पता नहीं चला, फिर अपने काम पर लग गया।

शनिवार, 23 जनवरी 2021

पिछले छः वर्ष का फ्लैशबैक है 'तांडव' - डॉ. शाबान ख़ान

सत्तापरक राजनीति और प्रतिरोध का तांडव - शाबान

     मौजूदा दौर में ओ.टी.टी प्लेटफॉर्म बॉलीवुड को भी पीछे छोड़ता जा रहा है और उसका कारण है कि कम समय में बहुत सारा मनोरंजन! इसके साथ ही आसानी, सहूलियत और दर्शकों की सीधी पहुंच ने इसे और अधिक लोकप्रिय बना दिया है। इस प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने वाली वेब सीरीज की सफलता और लोकप्रियता का एक कारण अच्छा कन्टेंट और नॉन सेंसरशिप भी है। नए लेखक, निर्देशक और कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है। यही कारण है कि बॉलवुड के पकाऊ राइटर्स और थकाऊ निर्देशकों की पिटी हुई पटकथा से इतर इस प्लेटफॉर्म पर नयापन है जो दर्शकों को पसंद आ रहा है।
      पिछले सप्ताह अमेज़न प्राइम पर अली अब्बास जफर निर्देशित 'तांडव ' वेबसीरीज रिलीज़ हुई। इस वेब सीरीज के लेखक गौरव सोलंकी तथा निर्माता हिमांशु कृष्ण मेहरा हैं। सीरीज के रिलीज़ होने के साथ ही इस पर विवाद और इसका विरोध होना भी आरंभ हो गया। बीजेपी विधायक राम कदम ने इसके विरोध में मोर्चा निकाला। दी इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक लखनऊ के  हज़रतगंज थाने के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में अमेज़ॉन प्राइम, निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और अभिनेता सैफ अली ख़ान, तथा मोहम्मद जीशान अय्यूब के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यही नहीं बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय चेयरपर्सन मायावती जी ने भी ट्विटर के माध्यम से विवादित सीन पर आपत्ति जताई। 
    'तांडव' वेबसीरीज पर विवाद होने का कारण उसमे दिखाए गए वीएमयू नामक शिक्षण संस्थान में मंचित होने वाले शिव और नारद नाटक का मंचन है। इस नाटक में शिव और नारद को आधुनिक वेशभूषा में दिखाया गया और उनके संवाद भी अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी में हैं। यही नहीं शिव जी का किरदार निभा रहा अभिनेता अंग्रेज़ी में गाली का भी प्रयोग करता है। इस सीन पर विवाद होना लाज़िमी है। जहां तक मेरा मानना है कि इस दृश्य की सीरीज में कोई आवश्यकता नहीं थी। फिर भी इस सीन का ड्रामे में होने  का उद्देश्य परिवेश का परिचय देना मात्र है। फिर भी इस सीन का होना ड्रामे में मात्र एक संयोग है।
    यदि देखा जाए तो धार्मिक भावनाओं का आहत होने के बहाने दिखाए गए राइटिस्ट राजनीति और वामपंथी प्रतिरोध के परिदृश्य को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। वेबसीरीज का आरम्भ किसान आंदोलन से होता है जो कि वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन से मेल खाता है, साथ ही उसका समर्थन भी करता है। ड्रामे का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष कॉलेज की राजनीति और सरकार के खिलाफ वामपंथी प्रतिरोध है। वामपंथी छात्रनेता शिवा किसानों और अल्पसंख्यकों का समर्थन करता है मुस्लिम छात्र की नाजायज़ गिरफ्तारी और फ़र्ज़ी एनकाउंटर का विरोध छात्रनेता शिवा ओर उसकी वामपंथी यूनिट करती है। ड्रामे में सत्ता में दक्षिणपंथी पार्टी को दिखाया गया है; इस सीरीज की पूरी कहानी दक्षिणपंथी सत्ताधारी पार्टी और वाम प्रतिरोध के इर्दगिर्द घूमती है। यह पूरा परिदृश्य वर्तमान सत्ता पक्ष और हाल में ही घटित घटनाओं के ताने बाने से बुना गया है। इसमें दिखाया गया  वीएमयू शिक्षण संस्थान जेएनयू का ही रूपांतरित नाम है। इसके साथ ही मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित छात्रनेता शिवा का चरित्र और उसके साथ घटित घटनाएं दर्शकों को कन्हैया कुमार से तुलना करने के लिए बाध्य करती है। देखा जाए तो पटकथा लेखक ने शिवा का चरित्र और छात्र राजनीति को कन्हैया कुमार और जेएनयू को सामने रखकर गढ़ा है।
       इस सीरीज का केंद्रीय मर्म और अभिव्यंजना तब उभरकर सामने आती है जब विजय प्राप्त दक्षिणपंथी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लेने जा रहे देवकीनंदन सिंह की हत्या उनके ही पुत्र द्वारा कर दी जाती है। उसके बाद देवकीनंदन का पुत्र समर प्रताप सिंह, अनुराधा किशोर और गोपालदास मिश्र प्रधानमंत्री बनने के लिए आपराधिक षड्यंत्र रचने लगता हैं। यहीं पर सीरीज अपने आरोही विकास पर पहुंचती है । प्रधानमंत्री बनने की होड़ में यह तीनों पात्र कहीं ना कहीं आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते है। यदि सीरीज के केंद्रीय भाव की बात करें तो वह सत्तापरक आपराधिक राजनीति और छात्रराजनीति के बीच होने वाला द्वंद ही है। अब सवाल यह है कि इसपर विवाद होने का क्या कारण है? तो यह साफ हो जाता है कि इसमें जिन नेताओं के काले कारनामो को सामने रखा गया है; उनका संबंध राइटिस्ट विचारधारा से है और वर्तमान समय में केंद्र की सत्ता पर दक्षिणपंथी पार्टी काबिज़ है। इसके साथ ही सीरीज में दिखाया गया है कि शासन में मौजूद पार्टी बहुजन, किसान तथा मुस्लिम विरोधी है जो राजनीतिक लाभ उठाने के लिए बहुजनो को साथ तो रखती है परन्तु अपने ब्राह्मणवाद का त्याग नहीं कर पाती है तथा अल्पसंख्यको का फ़र्ज़ी एनकाउंटर कराकर बहुसंख्यको को अपने पाले में कर लेती है। इत्तेफ़ाक़न वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी का चरित्र भी बहुत हद तक इसी तरह का है। बहुजनो को साथ लाने का प्रयास तथा अल्पसंख्यको के खिलाफ घृणा का माहौल बनाकर, बहुसंख्यको की भावनाओ से लाभ उठाने का काम मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी करती आ रही है। वेब सीरीज में रूलिंग पार्टी और उसकी आंतरिक राजनीति को दिखाया गया है परंतु इसमे पिटा हुआ विपक्षी दलपति और समस्त विरोधी पार्टियां नदारद है जैसे वर्तमान में भारतीय राजनीति से विपक्षी दल ग़ायब है। ड्रामे में सत्ताधारी पार्टी किसान विरोधी और पूंजीपतियों की समर्थक है। इसी कारणवश वह किसानों पर गोली भी चलवा देती है। देखा जाए तो इस वेब सीरीज ने वर्तमान भारतीय राजनीति को हमारे सामने, अतीत में घटित घटनाओं के साथ रखा है। इसी कारण सत्ताधारी पार्टी के समर्थक और कुछ अभिनय एवं कॉमेडी मंच से जुड़े अवसरवादी लोग तांडव का विरोध कर रहे है। ऐसे लोगो को डर है कि कहीं दर्शक इस ड्रामे को देखकर मौजूदा राजनैतिक ड्रामे और उनके असली तांडव को ना समझ जाये।

डॉ. शाबान खान 
एएमयू 
अलीगढ़

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

वैश्विक रचनाकार पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का हुआ उर्दू अनुवाद - अकरम क़ादरी

वैश्विक रचनाकार पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का हुआ उर्दू अनुवाद-   अकरम क़ादरी

अभी वर्तमान में उर्दू भाषा को यूनाइटेड स्टेट (संयुक्त राष्ट्र) के सेक्रेटरी जनरल (महासचिव)  एंटोनियो गुटर्स ने अपना संदेश उर्दू में दिया है जिससे प्रतीत होता है कि आने वाले समय में छः भाषाओं के साथ उर्दू भी यूनाइटेड स्टेट की भाषाओं में शामिल हो जाएगी। यह भारत के लिए अच्छी ख़बर है क्योंकि उर्दू की पैदाइश ही भारत में हुई है लेकिन कुछ मानसिक दिवालियापन के शिकार राजनेताओं ने इस भाषा में हिन्दू-मुस्लिम देखकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण किया है और भाषा का लगातार अपमान हो रहा है जबकि भाषाएं कभी भी किसी धर्म, जाति या प्रान्त की नहीं होती है बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर अधिकता या कमी से बोली या लिखी जाती है। भाषाएँ सीखना चाहिए इसमें कोई दिक्कत नहीं है बल्कि उस पर किसी तरह का लबादा नहीं चढ़ाना चाहिए। इससे देश की भाषाई आज़ादी को नुकसान होगा जो भाषा की दृष्टि से सही नहीं होगा। मुझे अभी तक हिंदी उर्दू का कोई ऐसा लेखक नहीं मिला जिसने केवल एक ही भाषा में अपने साहित्य का सृजन किया हो बल्कि उसकी रचना में सभी भाषाओं के शब्द प्राप्त होते हैं चाहे वो पात्र के चरित्र को दर्शाने हेतु उसकी ज़रूरत हो, मांग हो या फिर स्थान विशेष का भाषिक महत्त्व जिससे कि उस कही गई बात का संप्रेषण और प्रभावी हो सके। 

भाषाओं के मामले में महात्मा गांधी जी हिंदुस्तानी भाषा के पैरोकार थे। वो हिंदी-उर्दू में किसी भी प्रकार का भेद नहीं करते थे बल्कि ऐसी हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग करते एवं उस पर बल देते थे जिसमें कई भाषाओं, बोलियों का समन्वय हो और एक दूसरे को सबकी बात समझ में आये तथा किसी भी तरह से देश बटें नहीं बल्कि अनेकता में एकता का पुष्प भाषा के माध्यम से भी पुष्पित एवं पल्लवित हो। 

पिछले दो वर्षों में अनुवाद का कार्य चरम पर है और यह सही भी है। इससे वैचारिक ज्ञान का आदान-प्रदान भी होगा। साहित्य को एक सूत्र में पिरोने के मानवतावादी-कल्याणकारी कदम भी उठाए जाएंगे।

यायावर, प्रेम की कवयित्री, सूरीनाम गध साहित्य की अनन्य रचनाकार पुष्पिता अवस्थी एक वैश्विक रचनाकर हैं। उनके साहित्य अधिकतर सूरीनाम की भारतवंशी ज़मीं के संदर्भ में लिखा गया है और भारतवंशी की एकता का वर्णन मिलता है कि वो किस प्रकार भाषाई सामंजस्य
के माध्यम से सरनामी भाषा को हिंदुस्तानी भाषा कहते है। हिंदुस्तानी का अर्थ गांधी जी की भाषा से है जिस पर कई प्रवासी विशेषांक भी निकल चुके है।

पुष्पिता अवस्थी की तीन पुस्तकों का अनुवाद पिछले दो वर्षों में कई भाषाओं में हो चुका है लेकिन सबसे ज़्यादा स्वीकार्यता उर्दू में मिली है। उनकी पुस्तकों के अनुवादक, अफ़सानानिगार, तनक़ीदकार कई पुस्तकों के युवा लेखक डॉ. फरहान दीवान ने छिन्नमूल उपन्यास का अनुवाद किया है जिसमें वो कहते हैं कि "अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध रचनाकार प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी का भारतवंशी भारतीयों के जीवन पर लिखा गया उपन्यास "छिन्नमूल" भारतीय संस्कृति, संस्कार, भाषा और भारतवंशियों के कठोर परिश्रम की दारुण गाथा है। 

"छिन्नमूल" में दर्शाई गई विभिन्न संस्कृतियों के संगम, धर्म, समाज, राजनीतिक दांव पेंच और प्रेम की बेमिसाल दास्तान ने मुझे आकर्षित किया और इसका अनुवाद उर्दू में करने की इच्छा मैंने प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी जी से ज़ाहिर की।  उनकी अनुमति के बाद छिन्नमूल को " बोहरान " के नाम से उर्दू में अनुवाद किया जिसको के.एन.जी. प्रकाशन, बडगाम जम्मू और कश्मीर भेजा जा चुका है। जल्द ही " बोहरान " प्रकाशित होकर हमारे सामने होगी और हिंदी साहित्य के बाद उर्दू साहित्य में भी इसकी चर्चा समय के गर्भ में है। यह हिंदी में अन्तिका प्रकाशन गाज़ियाबाद से प्रकाशित है। सुधि पाठक वहां से लेकर दोनों भाषाओं में पढ़ सकते है।

इस उपन्यास के अतिरिक्त पुष्पिता अवस्थी के कहानी संग्रह "गोखरू" का अनुवाद मशहूर अफ़सानानिगार, कई संग्रहों के रचयिता 
सृजन साहित्य के मूर्धन्य विद्वान डॉ. तौसीफ बरेलवी ने किया है और वो कहानी संग्रह के बारे में कहते है:- 'गोखरू' डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की कहानियों का संकलन है जिसमें उन्होंने समाज के निचले तबक़े से लेकर आला तबक़े
तक के किरदारों पर लिखा और न केवल लिखा बल्कि उन कहानियों के ज़रिये समाज के सामने हक़ीक़त का आईना पेश किया। उनकी कहानियों का हिंदी से उर्दू में तर्जुमा करते वक़्त इस बात का एहसास भी हुआ कि उन्होंने अपनी कहानियों में छोटी- छोटी सी चीज़ों का भी खासा ध्यान रखा है जिससे उनकी कहानियों की मानवीयत बढ़ जाती है और उनकी बारीक-बिनी का भी अंदाज़ा बख़ूबी हो जाता है। गोखरू की कहानियों के शीर्षक भी कुछ ऐसे हैं जिनके ज़रिये से हिंदुस्तानी तहज़ीब का वो मंज़र आंखों के सामने आ जाता है कि जिसके लिए हिंदुस्तान जाना पहचाना जाता है और यही वजह रही कि इन
कहानियों को उर्दू में अनुवाद करते वक़्त बहुत ख़ुशी महसूस हुई"। 

यह कहानी संग्रह हिंदी में राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है और उर्दू में एडुकेशनल बुक हाउस दिल्ली से प्रकाशित है जिसको साहित्य जगत के पाठक लेकर पढ़ सकते हैं। हॉलैंड या नीदरलैंड की संस्कृति, संस्कार, समाज, सभ्यता एवं भाषा को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तक नीदरलैंड डायरी का अनुवाद भी उर्दू में हुआ है जिसको उर्दू-अदब के उभरते हुए सृजनात्मक लेखक, तनक़ीदनिगार, अफसानानिगार, जोश अफ़रोज़ कविताएं लिखने वाले, मुर्दा दिल में वतन का जज़्बा भरने वाले 
अग़्यार के विरुद्ध बुलन्द आवाज़ के मालिक हाफ़िज़ डॉ. शाहिद खान मिस्बाही ने नीदरलैंड डायरी का उर्दू अनुवाद किया है जिसके बारे में वो कहते है कि ""नीदरलैंड डायरी" वो किताब है जो यूरोपीय संस्कृति और समाज की गिरहें खोलती है। वहीं दूसरी ओर यूरोप में अपनी जड़ें मज़बूत करती हुई हिन्दुस्तानी संस्कृति और ज़बानों की
सूरत-ए-हाल से आगाह करती है। यह किताब अपने मौज़ू और अपने मवाद दोनों ऐतबार से अहम है। यह किताब इंडो-यूरोपियन संस्कृति और समाज पर और खास तौर से ज़बान और साहित्य पर प्रकाश डालती है। जी.एन.के. पब्लिकेशन से प्रकाशित है जिसको अदब के पाठक हिंदी में किताबघर प्रकाशन दिल्ली से प्राप्त कर सकते है और यूरोपीय संस्कृति को बारीकी से जान सकते है। 

पुष्पिता अवस्थी के साहित्य का उर्दू जगत में छपना हिंदी-उर्दू के बीच उत्पन्न नफ़रत की खाई को कम करेगा। दोनों भाषाओं का सम्मान अपने-अपने स्थान पर होगा और दोनों ही तहज़ीब को समझने का मौका दोनों प्रकार के पाठकों को प्राप्त होगा । इसके अलावा अनुवाद के विद्यार्थी, शोधार्थी, भी आने वाले समय में शोध करेंगे और इन किताबों की महत्ता पर प्रकाश डालेंगे और मुझे उम्मीद ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि पुष्पिता अवस्थी जी का अग्रिम साहित्य उर्दू में जल्द प्रकाशित होगा और उर्दू के पाठकों तक पहुंचेगा

अकरम क़ादरी
शोधार्थी
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
अलीगढ़

रविवार, 27 सितंबर 2020

नया किसान अध्यादेश आने वाली पीढ़ियों के लिए डेथ वारण्ट है- अकरम क़ादरी

नया किसान अध्यादेश आने वाली पीढ़ियों का डेथ वारण्ट है -अकरम क़ादरी


देश की संसद ने जिसप्रकार से कृषि अध्यादेश को पारित किया है तबसे किसानों में रोष व्याप्त है उसके अलावा कई सांसदों ने भी इसका दोनो सदन में भरपूर विरोध भी किया लेकिन सरकार के पास बहुमत होने के कारण यह किसान विरोधी अध्यादेश ध्वनि मत से पास हो गया जिससे किसान लगातार सड़को पर नज़र आ रहे है जिनके साथ मुख्य रूप से कांग्रेस और उसके घटक दलों के साथ-साथ दूसरे विपक्षी दल भी विरोध कर रहे है। इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सबसे वफादार अकाली दल भी साथ छोड़कर रवाना हो गयी है क्योंकि इस फैसले के विरुद्ध अकाली दल ने कई बार विरोध किया लेकिन उनको दरकिनार कर दिया गया जिसके चलते अकाली दल की एकमात्र केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने इस्तीफा दे दिया और किसानों के आंदोलन के साथ हो गयी। जिस फैसले को मोदी जी ऐतिहासिक बता रहे थे उस फैसले को वो अपनी केंद्रीय मंत्री को ही नही समझा सके तो फिर किसान कैसे समझ सकते थे फिर इस बार किसान दो-दो हाथ करने को तैयार है क्योंकि वो जानते है कि जो अध्यादेश पारित हुए है उनके माध्यम से उनकी खेती तो पूंजीपतियों के नाम मे हो जाएगी और वो केवल अपनी ही ज़मीन में मज़दूर बनकर रह जायेगा। वैसे भी इस देश मे प्राचीन काल से आजतक किसान ही सबसे ज्यादा सताया गया है किसान पहले भी लगान देता था उसके बाद साहूकारों, सेठों और जमींदारों ने लूटा फिर अंग्रेज़ो के साथ मिलकर डकैती हुई जिसका वर्णन हिंदी साहित्य के कई साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में किया है प्रेमचंद का "गोदान", श्रीलाल शुक्ल का "रागदरबारी" और वर्तमान में पंकज सुबीर का "अकाल में उत्सव" पढ़ेंगे तो किसानों की व्यथा को आसानी से समझा जा सकता है आज देश की सरकारें अपने पूंजीपति मित्रों के साथ मिलकर लूट कर रही है।
इस अध्यादेश का विरोध सबसे ज़्यादा  कृषि बाहुल्य प्रदेशो में पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, में हो रहा है इसके बाद दूसरे प्रदेशों में भी आग की तरह फैल चुका है और किसान हर माध्यम से अपना दुःख बता चुके है जबकि इस अध्यादेश का विरोध जिन किसान संगठनों ने भारत बंद का ऐलान किया है, उनमें अखिल भारतीय किसान संघ (AIFU), भारतीय किसान यूनियन (BKU), अखिल भारतीय किसान महासंघ (AIKM) और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) प्रमुख हैं। किसानों के आंदोलन का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखने को मिल रहा है, लेकिन कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के किसानों निकायों ने भी बंद का आह्वान किया है। यही नहीं किसानों के इस बंद को देश की कई ट्रेड यूनियंस ने भी अपना समर्थन दिया है। मज़ेदार बात यह है कि इस अध्यादेश का विरोध भारतीय जनता पार्टी की मातृसंस्था आरएसएस के किसान संगठन ने भी किया है।
जबकि सरकार का पक्ष है कि मूल्य आश्वासन पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश से कॉरपोरेट खेती को बढ़ावा मिलेगा?
सरकार का तर्क है कि यह अध्यादेश किसानों को शोषण के भय के बिना समानता के आधार पर बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाएगा। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं कि इससे बाजार की अनिश्चितता का जोखिम किसानों पर नहीं रहेगा और किसानों की आय में सुधार होगा, लेकिन कृषि विशेषज्ञ तो कुछ और ही कह रहे हैं।
मध्य प्रदेश के युवा किसान नेता और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष राहुल राज कहते हैं कि ''इससे मंडी की व्यवस्था ही खत्म हो जायेगी। इससे किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट और बिचौलियों को फायदा होगा।" वे आगे कहते हैं, "फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस में वन नेशन, वन मार्केट की बात कही जा रही है लेकिन सरकार इसके जरिये कृषि उपज विपणन समितियों (APMC) के एकाधिकार को खत्म करना चाहती है। अगर इसे खत्म किया जाता है तो व्यापारियों की मनमानी बढ़ेगी, किसानों को उपज की सही कीमत नहीं मिलेगी।" फिर किसान की बड़े स्तर पर लुटाई होगी इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े किसान हितैषी, किसानों के लिए अनेक धरना प्रदर्शन करने वाले सरदार वीएम सिंह कहते हैं, "30 साल पहले पंजाब के किसानों ने पेप्सिको के साथ आलू और टमाटर उगाने के लिए समझौता किया था। इस अध्यादेश की धारा 2(एफ) से पता चलता है कि ये किसके लिए बना है। एफपीओ को किसान भी माना गया है और किसान तथा व्यापारी के बीच विवाद की स्थिति में बिचौलिया भी बना दिया गया है। इसमें अगर विवाद हुआ तो नुकसान किसानों का है।"
"विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के अंदर समझौता मंडल में जाना होगा। वहां न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा। एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसानें को भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा। देश के 85 फीसदी किसान के पास दो-तीन एकड़ जोत है। विवाद होने पर उनकी पूरी पूंजी वकील करने और ऑफिसों के चक्कर काटने में ही खर्च हो जाएगी।" यह तर्कसंगत भी प्रतीत होता है अगर किसान यहीं करता रहा तो वो अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाएगा, अपनी बेटी के हाथ पीले करने की सोचेगा, माता-पिता की सेवा करेगा या फिर अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सोचेगा यह वो प्रश्न है जिसका उत्तर किसी के भी पास नहीं है। 
लम्बे अरसे से किसानों के लिए संघर्षरत, स्वराज इण्डिया के संस्थापक प्रोफेसर योगेंद्र यादव कहते है कि "किसानों के लिए यह बिल ऐसा है कि जैसे पहले किसान के सिर पर छप्पर था उसमें कुछ छेद थे, पानी तो आता था लेकिन बारिश में वो कुछ बचाव कर लेता था, लेकिन इस सरकार ने सिर के ऊपर की छत ही ग़ायब कर दी और किसान को लॉलीपॉप के रूप में बताया गया अब आप आत्मनिर्भर और आज़ाद है। इस जुमले को पुराने ज़माने के किसान तो नहीं समझ सकते है लेकिन वर्तमान दौर के युवा किसान इस पूरे फ़र्ज़ी ऐतिहासिक निर्णय को अच्छे से समझते है बल्कि पिछले जितने भी ऐतिहासिक फैसले बताये गए है वो सब आज फुस्स ही नज़र आ रहे है चाहे वो स्किल इण्डिया हो, स्वच्छ भारत अभियान हो, या फिर 15 किसान को न्यूनतम मूल्य वाला, किसान लागत का डेढ़ गुना मूल्य मिलने का जुमला हो वो सबको अब अपनी खुली आँखों से देख रहा है और इसका बराबर विरोध कर रहा है। निजीकरण के खिलाफ ज्यादातर सभी संगठन रोड पर है लेकिन भारत की मुख्य धारा की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रिया, सुशांत, दीपिका में व्यस्त है क्योंकि यह मुद्दा बिहार चुनाव में भुनाने की साज़िश चल रही है। लेकिन कुछ मीडिया के असली पत्रकार आज भी भारत के मुख्य मुद्दों को स्थान दे रहे है जबकि वो टीआरपी में पिछड़ रहे है फिर भी देश और जनमानस के मुद्दों के साथ खड़े है। 
जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय हिंद
जय भारत...

अकरम क़ादरी

रविवार, 13 सितंबर 2020

हिंदी को दोयम दर्जे का क्यों समझा जाता है.?- पुष्पिता अवस्थी

हिंदी को दोयम दर्जे का क्यों समझा जाता है ?- पुष्पिता अवस्थी

अक्सर देखा यह गया है कि देश में हिंदी की जयकार करने वाले लोग, मंच, माला और माइक के साथ जब हिंदी का जयघोष करते है तो एक सामान्य भारतीय नागरिक को गर्व होता है होना भी चाहिए क्योंकि यह घोषित रूप से राष्ट्रभाषा तो नहीं है लेकिन राजभाषा तो है जिसको अधिकतर भारतीय बोलते, समझते और लिखते है और उनकी आम जनजीवन की भाषा भी हिंदी है जो देश को नाभिनाल से जोड़े रखने में सहायक है लेकिन भारत के राजनेताओ ने इस संदर्भ में ध्यान ही नहीं दिया। उन्होंने हिंदी भाषा का नाम लेकर, माइक, मंच से खूब हिंदी में लच्छेदार भाषण तो दिए लेकिन अमलीजामा पहनाने में नाकामयाब रहे है जिसको देखकर मुझे बहुत ताज्जुब होता है कि जो यह वादा करते है आखिर वो पूरा क्यों नहीं करते है।
हिंदी भाषा का प्रचार यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो प्रवासियों से ज़्यादा भारतवंशी प्रसार कर रहे है वो हमेशा देश और भाषा को स्वयं से जोड़े रखने में सेतु मानते है और भारतीय संस्कृति, संस्कार को विदेशों में फैलाने का एक मुख्य स्रोत समझते है इसलिए वो विदेशों में मंदिर, मस्ज़िद, मठ में हिंदी को सीखते है और जब वो आपस मे मिलते है तो हिंदी भाषा या भारतीय भाषाओं में ही बात करते है जबकि यूरोपियन देशों में रहकर यह भारतवंशी वहां की राजकीय भाषा को तो सीखते ही है फिर भी अपनी हिंदी को जोड़े रखते है कहा जा सकता है कि हर तरह से आधुनिक हुए है लेकिन कभी भी अपनी भाषा, संस्कृति और संस्कार से उन्होंने समझौता नहीं किया है। अगर समझौता कर लिया होता तो वो भी वही दिखते जो दूसरे दिखते है। हिंदी और भारतीय संस्कृति को साथ लेकर चलने वाले यह वो लोग है जो कभी भारत तो नहीं आये लेकिन अपने पूर्वजों के देश को बहुत सम्मान देते है। आज भी वो त्यौहार, तीज़, उत्सव, को मनाते ही है उसके अलावा भारत के स्वंतत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती को अपना त्यौहार समझते है। 
भारत मे अनेक सेमिनार, संगोष्ठियों में हिस्सेदारी करने के दौरान मैंने देखा है ज़्यादातर लोग मंच से नीचे उतरते ही फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बात करते है यधपि मुझे भाषाओं से कोई वैमनस्य नहीं है लेकिन हिंदी को दोयम दर्जे का समझना कतई बर्दाश्त नहीं है। यदि सामने वाले व्यक्ति को हिंदी या कोई दूसरी भारतीय भाषा नहीं आती है तो अंग्रेज़ी में बात करने से कोई गुरेज़ नहीं है लेकिन जो हिंदी कार्यक्रम में शामिल हुए है और हिंदी के अच्छे जानकार है जब वो अंग्रेज़ी मे बात करते है तो अजीब सा प्रतीत होता है जबकि विदेशों में हिंदी में ही बात करते है जहां पर भी भारतवंशी या फिर प्रवासी मिलता है क्योंकि मातृभाषा में बात करने से ह्रदय का हृदय से मिलन होता है शब्द सही से समझ और उनकी भावना भी समझ आती है। 
देश की जितनी भी भारतीय भाषाएं और बोलियां है वो बहुत व्यवस्थित है उनका व्याकरण बहुत अच्छा है शब्द सम्पदा भी अद्वितीय है फिर क्यों हम दूसरी भाषाओं का प्रयोग करें?
हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार भारत से ज़्यादा वैश्विक स्तर पर हो रहा है क्योंकि इसका सबसे अच्छा उदाहरण है विदेश में रह रहे भारतवंशी आज भी जब मिलते है तो वो हिंदी या भारत की बोलियों में ही बात करते है जबकि भारत में हिंदी के पुरोधा कहे जाने वाले लोग हिंदी मंच से उतरते ही फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बोलकर भाषा का अपमान करते है। देश की वर्तमान सरकार से मेरी विनती है कि भारत को राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी जैसा उपहार दे। यद्यपि यूरोपियन देशों में किसी भी नागरिक को नागरीकता देने का अधिकार ही भाषा है यदि उसको उस देश की भाषा आएगी तो वो नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है।

पुष्पिता अवस्थी
अध्यक्षा
आचार्यकुल वर्धा एवं हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन नीदरलैंड

शनिवार, 5 सितंबर 2020

उस्तादों ने इंसान बनने में मदद की - अकरम क़ादरी

उस्तादों ने इंसान बनने में मदद की- अकरम क़ादरी

"रचनात्मक अभिव्यक्ति और ज्ञान में आनंद जगाना शिक्षक की सर्वोच्च कला है" यह अल्बर्ट आइंस्टीन के शब्द है जिन्होंने बताने का प्रयत्न किया कि इंसान में रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से ज्ञान के भंडार को गुरु हीं जगाता है, वो ही एक पत्थर इंसान को तराशने का कार्य करता है जिससे वो सभ्य समाज मे रहने के लायक हो जाये और समाज को मानवतावादी दृष्टिकोण से देखे और इंसाफ के लिए सदा आगे आये। 
जिस प्रकार से आज शिक्षण संस्थानों में मशीन बनाने की जो प्रक्रिया चल रही है वो उसके एकदम ख़िलाफ़ हूं बल्कि यूं कहिए कि हर एक आदर्श शिक्षक इसके ख़िलाफ़ ही होगा। मेरे गुरुओं ने मुझे कभी मशीन बनने के लिए तैयार नहीं किया, बल्कि कुछ नया सोचने, समझने और लिखने के लिए प्रेरित किया जिसकी वजह से मैं लगातार कोशिश भी करता रहा।
आज इस समय किस उस्ताद के बारे में लिखूं सबने मुझे आगे बढ़ाने के लिए कोशिश की है बचपन में मेरे कस्बे के उस्ताद जहां से मेरी शुरुआती तालीम शुरू हुई उनमें हाजी इरफ़ान ख़ान साहब, हाजी रिज़वान ख़ान ने मुझे आगे बढाने के लिए कोशिश की उसके बाद उत्तराखंड के सैंट पैट्रिक के अध्यापकों में सिस्टर सैलिन, सिस्टर प्रेसी, राजेश सर, पंकज सर, ज्योत्सना मैम, रश्मि मैम, अलका मैम, पवन सर, रेनुका मैम, अबरार सर जैसे कुशल गुरुओं ने शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत मन से पढ़ाया जिससे हमारा किशोरावस्था में सही विकास हो सका जिसकी वजह से लगातार आगे बढ़ने के लिए तत्पर है। उसके बाद लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज का सफर तय हुआ वहां के भी टीचर्स ने खूब आगे बढ़ाया, 2008 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेकर लिटरेचर में अपना कैरियर बनाने की सोची और आज उसी तरफ आगे बढ़ रहे है। स्नातक, स्नातकोत्तर करने के बाद एम. फिल. मौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी हैदराबाद से करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जहां पर प्रोफेसर टीवी कट्टीमनी, डॉ. सेषु बाबू जी के कुशल मार्गदर्शन में अपना शुरुआती शोध पूरा किया जिसमें विशेष सहयोग मातातुल्य प्रोफेसर शकीला ख़ानम का रहा जिन्होंने अपने सही मार्गदर्शन में मुझे अच्छा शोध करने के लिए प्रेरित किया उसके बाद दोबारा एएमयू में पीएचडी के लिए लौटना हुआ तो प्रोफेसर अब्दुल अलीम सर, प्रोफेसर रमेश रावत, प्रोफेसर आशिक़ अली बलौत, प्रोफेसर मेराज अहमद सर, प्रोफेसर इफ्फत असग़र मैम ने भी पिछला शोधकार्य देखकर मुझे आगे बढ़ने के लिए, अच्छे शोध के लिए सहयोग दिया जिनका मैं शब्दो मे शुक्रिया अदा नहीं कर सकता हूँ उनका आजीवन ऋणी रहूंगा। 
वर्तमान परिस्थिति में प्रोफेसर मेराज अहमद सर के कुशल मार्गदर्शन में पीएचडी सूरीनाम जैसे नए विषय पर कर रहा हूँ जिसमे वाङ्गमय पत्रिका के सम्पादक डॉ. फ़ीरोज़ ख़ान सर एवं डॉ. शगुफ़्ता नियाज़ मैम लेखन के प्रति मुझे बहुत सहयोग दिया, वक़्त, बेवक्त बहुत समझाया, डांटा छोटे भाई जैसा प्रेम दिया और कुछ नए विषयों पर लेखन के लिए प्रोत्साहित किया जिनके अथक सहयोग के कारण मैं तीन पुस्तकें जिसमे एक मौलिक और दो सम्पादित कर सका, फिलहाल कई संस्थाओं में काम कर रहा हूँ और वाङ्गमय का सहसंपादक हूं। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओ में कमसेकम तीन दर्जन शोधालेख प्रकाशित हो चुके है। वैश्विक लेखिका यायावर, प्रेम की कवयित्री प्रोफेसर पुष्पिता अवस्थी ने मेरे शोध में भी बहुत सहयोग दिया है वो अनवरत रूप से मुझे समझाती रहती है किसी भी नए विषय पर लिखने के लिए आईडिया देती है। आजकल उन विषयों पर लिखने के लिए अधिक प्रोत्साहित करती है जिन विषयों पर कोई लिखना नहीं चाहता। 
स्वयं की इस ज़िंदा लाश को मैं कंधे पर लेकर इन्हीं सब गुरुओं की बदौलत चल रहा हूं आगे भी उम्मीद करता हूँ कि यह मुझे सहयोग करेंगे जिसके लिए मैं जीवनभर शुक्रगुज़ार रहूंगा और एहसानमन्द करूँगा....आपकी दुआओं का आकांक्षी - अकरम क़ादरी
जय हिंद

बुधवार, 26 अगस्त 2020

आलोचना से सँवरती है संस्था और व्यक्तित्त्व- अकरम क़ादरी

आलोचना से सँवरती है संस्था और व्यक्तित्त्व- अकरम क़ादरी

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है।
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ।।

बशीर बद्र ने यह शेर लिखते वक्त बहुत सोचा होगा लेकिन कभी यह नहीं समझा होगा कि ऐसा वक़्त आ जायेगा लोग एक-दूसरे की आलोचना करते वक़्त इतने व्यक्तिगत हो जाएंगे कि पर्सनल अटैक करेंगे जिसमे उनके घर, परिवार और निजी सम्बन्धो को भी लपेट देंगे फिर कुछ लोग ऐसे भी पैदा हो गए है कि जो तनक़ीद के नाम पर एक दूसरे के जान के प्यासे हो जाएंगे और मौत के घाट उतार देंगे। 
दरअसल अभी भी हमारे देश मे लोग आलोचना और व्यक्तिगत दुश्मनी में फ़र्क़ ही नहीं समझते है इसलिए वो ऐसे कदम उठा देते है जिससे किसी भी व्यक्ति का ज़मीर तक को रौंद देते है फिर वो सहिष्णुता को नहीं समझता है और ऐसा क़दम उठा लेता है जो सभ्य समाज के लिए सही नहीं है।
असली तनक़ीद वही है जिससे सामने वाले व्यक्ति को फ़ायदा हो आखिर आलोचना भी वही करता है जिसमे आपकी गलतियां पकड़ने का हुनर हो
जो आपको सही रास्ते पर लाने के लिए कोशिश करता हूँ।
आलोचना एवं सहिष्णुता का इतिहास इस देश का बहुत पुराना है क्योंकि जब कबीर काशी में बैठकर हिन्दू-मुस्लिम दोनो को सुनाते थे दोनो की कमियों पर बोलते थे लेकिन कभी भी किसी ने कुछ नहीं कहा आजकल अगर कोई, किसी व्यक्ति विशेष पर ज़रा सी बात कह दे तो वो मान-हानि का केस करने लगता है जबकि उसकी स्वयं की मान की हानि सवा रुपये से ज़्यादा नहीं होगी।
वर्तमान परिस्थिति में देश के जाने-माने वकील ह्यूमन एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने कुछ कह दिया तो उससे किसी संस्था की मान-हानि हो गयी जबकि मेरा देश बहुत विशाल एवं सहिष्णु है किसी एक दो ट्वीट से कुछ नहीं हो जाता है यह तो चलता ही रहता है जबकि दूसरी तरफ कानून में बोलने का अधिकार भी है। आप किसी संस्था की कानून संगत आलोचना कर सकते है जिससे उस संस्था में जो सुधरने, सही होने की गुंजाइश है वो ठीक हो सके और उससे अंततः देश को ही लाभ होगा। प्रशांत भूषण वो वकील है जिनके पिता शांति भूषण ने इंदिरा गांधी जैसी मज़बूत नेत्री को भी कोर्ट में खड़ा करा दिया था, प्रशांत भूषण देश के कई ऐसे मुद्दों पर जनहित याचिका डाल चुके है और उनको कामयाबी भी मिली है कांग्रेस की सरकार में टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला जैसे मुद्दों पर अन्ना हज़ारे के साथ सरकार का विरोध कर चुके है हालांकि इन मुद्दे पर कुछ हुआ नहीं ज्यादातर केस फ़र्ज़ी ही पाए गए लेकिन उनको लगता था कि इनमें कुछ घोटाला हुआ है तो जनपक्ष और देश की अच्छाई के लिए उन्होंने जनहित याचिका दाखिल की है। पिछले दिनो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक संस्था के मुद्दे पर भी वो अपनी राय दे चुके है और इसका विरोध करते है कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्था नहीं है। हालांकि यह केस अभी विचाराधीन है अंतिम फैसला माननीय कोर्ट का ही होगा। 
बिहार के डॉन शाहबुद्दीन जब जेल से बाहर आये थे तो प्रशांत भूषण ने ही जनहित याचिका डालकर उनको दोबारा जेल में पहुंचाया था। दरअसल वो हर मुद्दे का विरोध करते है जो उनको ग़लत और तर्कसंगत नहीं लगता है वो ह्यूमनिस्ट होने के कारण किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करते है ज़्यादातर केस में उन्होंने जनहित याचिका दाखिल की है और देश के हित में कार्य किए है अब बहुत लोगो के अलग अलग दृष्टिकोण हो सकते है वो दूसरा पहलू है हालांकि इसपर बहस होना चाहिए। 
प्रशांत भूषण पर माननीय कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है जो भी होगा वो सबको मानना पड़ेगा। लेकिन कोर्ट ने उनको तीन दिन सोचने समझने का मौका दिया और माफ़ी मांगने को भी कहा लेकिन उन्होंने कहा यदि मैं ग़लत होता तो माफी मांग लेता जब मैं ग़लत नहीं हूं तो माफी मांगने का कोई फ़ायदा ही नहीं है कोर्ट जो भी सज़ा देगा उसको मैं भुगतने को तैयार हूं। दूसरा उनका तर्क था कि अगर मैं हार मान जाऊंगा तो जो लोग सरकार की आलोचना करते है, लिखते है, बोलते है, उनका हौसला पस्त हो जाएगा और प्रतिरोध की आवाज़ बन्द हो जाएगी फिर एकछत्र राज चलेगा जिससे अंततः देश का नुकसान होगा मानवतावादी ढांचे में कमी आएगी। इसलिए मैं देश के खातिर कुछ भी सहने को तैयार हूं। हमें अपनी संस्थाओं को मजबूत करना है जिससे संविधान की रक्षा हो सके।

जय हिंद
अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

सुरीनामी राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी ने बढ़ाया भारतवंशियों का मान- अकरम क़ादरी

सुरीनामी राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी ने बढ़ाया भारतवंशियों का मान - अकरम क़ादरी

यह लगभग 05 जून 1834 के आसपास की बात है जब लालारुख जहाज़ कलकत्ता प्रवासी घाट से उत्तर भारतीयों को कैरिबियाई देशों में ले जा रहा होगा तो उन गिरमिटिया मज़दूरों ने सोचा भी नहीं होगा कि जो लोग (डच कॉलोनाइजर) उनको दास बनाकर ले जा रहे है उनकी आने वाली पीढियां कभी उसी देश का नेतृत्व करेंगी। शायद एक श्रमिक के लिए यह सोचना बहुत मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं है। सूरीनाम जैसे विषय पर शोध एवं आदरणीया पुष्पिता अवस्थी के साहित्य का विश्लेषण करते हुए मुझे महसूस हुआ कि भारतवंशियों की भले ही यह पांच या छः पीढियां हो लेकिन उनकी भारतीयता अभी तक खत्म नहीं हुई बल्कि शोध से पता चलता है वो हमसे ज़्यादा भारतीय है क्योंकि वो आज भी हमारी संस्कृति, सभ्यता, समाज, संस्कार और भाषा को इतनी मज़बूती से पकड़े हुए है कि उनकी कई पीढियां बदल जाने के बाद भी वो नहीं बदले वो मेहनतकश भारतवंशी आज भी कई पीढ़ियों के गुज़र जाने के बाद भी वर्तमान समय के आधुनिकीकरण के दौर में भी आधुनिक खूब हुए लेकिन कभी भी अपनी संस्कृति, संस्कार, तीज़, त्यौहार, परंपराओं से समझौता नहीं किया बल्कि हिंदी भाषा को सीखने के लिए आज भी मंदिर, मस्ज़िद, मठ जाकर वो मन लगाकर सीखते है। भारत का सूरीनाम की राजधानी पारामारिबो में स्थित दूतावास भी उनकी सहायता करता है लेकिन जो कार्य प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी ने 2001 के आसपास जाकर फर्स्ट सेक्रेटरी के रूप में किया वो सच मे काबिले तारीफ़ है उस पर भी गौर करना चाहिए। पुष्पिता अवस्थी ने सबसे पहले उनको भारतीय संस्कृति की अलख को दोबारा प्रज्वलित करने का संघर्ष किया है हालांकि यह उनके डीएनए में मौजूद थी लेकिन उसको सही दिशा देने में पुष्पिता अवस्थी ने साहित्य के माध्यम से जो काम किया वो विशिष्ट है। 
पूरी दुनिया मे छाए हुए भारतवंशियों की हाड़-मास तोड़ देने वाली मेहनत एकाग्रता और मेघा के ही बल पर पूरी दुनिया में अपना नाम रोशन कर रहे है। एक तो भारतवंशी रंग-रूप से तो अलग दिखते ही है फिर भी कुछ नस्लभेदी टिप्पणी करने वाले लोगो की आंखे की किरकिरी भी बने रहते है फिर भी अपनी मेहनत के द्वारा उन्होंने भारत का नाम रौशन किया है। 
सुरीनाम के भारतवंशी आज भी स्वयं को भारतवंशी ही कहलाने में गौरवान्वित महसूस करते है और अपने पूर्वजों की ज़मीन से पहुंचने वाले हर व्यक्ति का सम्मान वैसे ही करते है जैसे हमारे भारत मे होता है।
सुरीनामी की राजनीति में 42 प्रतिशत भारतवंशियों ने स्वयं को वहां सिद्ध किया है उसके अलावा इस छोटे से देश मे चायनीज़, जापानी, नीग्रो, मोरक्की और दूसरे देशों के भी नागरिक रहते है लेकिन गर्व का विषय यह है कि भारतवंशियों का डंका आज भी बज रहा है क्योंकि उसके पीछे उनका असाधारण विवेक, संस्कृति और उस देश के लोगो मे अपनी अलग पहचान को स्थापित करना है। यदि सूरीनाम के भारतवंशियों के बारे में जानने की उत्सुकता है तो पुष्पिता अवस्थी का साहित्य पढ़ना होगा जिसमें उन्होंने सूरीनाम नाम से ही दो किताबे लिखी है जिनमे सूरीनाम का इतिहास एवं भारतवंशियों के संघर्ष का विस्तृत वर्णन मिलेगा। उसके अलावा भारतवंशियों पर लिखे गए एक उपन्यास को भी पढ़ना चाहिए जो 2018 में कुसुमांजलि फॉउंडेशन द्वारा सम्मानित हुआ है। छिन्नमुल उपन्यास पर कई पत्रिकाओं ने अपने विशेषांक भी प्रकाशित किए है। 
अंततः कहा जा सकता है कि आज संतोखी जो राष्ट्रपति बने है वो भारतवंशियों की एकता, अपनत्त्व का भाव, संस्कृति से प्रेम, भाषा के प्रति अनुराग का ही परिणाम है क्योंकि वो दूसरे देश मे पीढ़ियों से रह रहे है लेकिन उन्होंने भारतीयता को खत्म नहीं होने दिया अपनी पहचान को बनाये रखा। कहा जाता है मानसिक रूप से हमे आधुनिक होना चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति, संस्कार को कभी नहीं छोड़ना चाहिए इसी कारण भारतवंशी विश्वपटल पर अपने को स्थापित कर रहे है और देश को गौरवान्वित महसूस करा रहे है। 
सूरीनाम के राष्ट्रपति ने शपथ वेद को हाथ मे लेकर ली हालांकि वहां की राजनीति में धर्मगत गठजोड़ नहीं है, ना ही किसी भी प्रकार से धर्म से नफरत की राजनीति की जाती है फिर भी अपने संस्कार को अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए ऐसा किया है कि मैं अपने देश के प्रति वफादार हूं और ईमानदारी से देश की सेवा करूँगा।
समाज का एका बनाने में  साहित्य की महती भूमिका है। अगर पुष्पिता अवस्थी जी द्वारा हिंदुस्तानियों के साहित्य को संग्रहित कर ,उनपर 15 वर्षों से लेखन कर जो महान कार्य किया गया है। उसका परिणाम आज
सामने है उन्होंने 2003 में साहित्य मित्र, और विद्यानिवास सूरीनाम साहित्य सन्स्थान, का गठन किया। जहाँ से शब्द -शक्ति और हिंदीनामा पत्रिका का प्रकाशन किया साथ ही यह वही पुष्पिता अवस्थी है जिन्हें कवि और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भेजते समय यह कहा था इस बार मै एक कवि को भेज रहा हूँ और उन्होंने वहाँ सातवे विश्व हिंदी सम्मेलन को आयोजित करने में सरकार के साथ मिलकर इसे सिद्ध कर दिया। भारतीय सांस्कृतिक केंद्र ,सूरीनाम में बतौर हिंदी प्रोफेसर सृजनात्मक काम करके देश का नाम  रौशन किया।

जय हिंद

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

अवाम की ज़ुबान थे, राहत इंदौरी - अकरम क़ादरी

अवाम की ज़बान थे, राहत इंदौरी- अकरम क़ादरी

बहुत से शायर, कवि गुज़रे है, जिन्होंने समसामयिक राजनीति या मुद्दों पर खुलकर बोला, लिखा है और जो बोला वो कड़वा सच भी था लेकिन कभी सत्ता वालो ने उनके साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया बल्कि उनसे सीख लेकर अच्छा करने का प्रयास किया, अगर अच्छा नहीं कर पाए तो खामोश रहे लेकिन कभी कुतर्क नहीं किया उनको जेलों में नहीं पहुंचाया उनपर संगीन धाराएं नहीं लगाई बल्कि आलोचना (तनक़ीद) को सिर माथे पर लेकर उनके सजेशन को समझा वाद-विवाद हुआ, कुछ अच्छा निकल कर आया जिससे मानवता का लाभ हुआ।
 डॉ. राहत इंदौरी कबीर के मानिंद एक फक्कड़ शायर, जनमंच की कड़वी और सच्ची आवाज़, जनपक्ष का नायक, दुनियाभर के मुशायरों की जान, मिजाज़ से ज़िद्दी, मीडिया की बुज़दिली के आलोचक, मज़हब के दौर में उसकी पहचान की राजनीति के घोर विरोधी।
राहत साहब इस देश मे धर्म निरपेक्षता के पक्षधर शायर थे, जो अपनी शायरी के माध्यम से शानदार कटाक्ष करते थे जिसको बहुत कम लोग समझते थे, जो समझते थे- वो बहुत हंसते थे और सोचने को मजबूर  भी हो जाते थे, जो कहना चाहते है वो कह चुके है और सत्ता के कानों तक उनकी आवाज़ पहुंच भी रही है जिसमे उन्होंने मशहूर शेर भी कहा है-
"हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते है।
मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते है।।"
इस शेर के माध्यम से वर्तमान स्थिति को बताना चाहते थे कि आखिर किस तरह से एक अल्पसंख्यक तबके को परेशान करने की साज़िश चल रही है। फिर भी वो इस देश की मिट्टी से बेइंतेहा मोहब्बत का सबूत पेश करते करते थक गया है लेकिन बहुसंख्यकवाद की राजनैतिक लोलुपसा ने देश को बर्बादी की तरफ मोड़ दिया है। वो हमेशा मंच, मुशायरों के माध्यम से देश के सभी राजनेताओ को हमेशा देश की उन्नति का संदेश देते रहे क्योंकि एक शायर रास्ता ही बता सकता है लेकिन अमल करना या नहीं करना यह राजनेताओ पर होता है। आजकल राजनेता के कान में जूं भी नहीं रेंगती है क्योंकि उनको पता है कि उनका सेक्युलरिज्म से कुछ नहीं होने वाला है उन मुद्दों को हवा दो जिससे उनका मकसद पूरा हो जिसमे वो कटाक्ष लहज़े में कहते भी है- 
"जुगनुओं को साथ लेकर रात रौशन कीजिये।
रास्ता सूरज का देखो तो सहर हो जाएगी।।"
इस शेर के ज़रिए वो कहना चाहते है कि देश मे अल्पसंख्यक नाम के जो छोटे छोटे जुगनू है उनको भी साथ लेकर चलो जिससे उजाला निश्चित ही होगा लेकिन तुम जिस सूरज को साथ लेकर चल रहे हो उसका अस्त होना निश्चित है और उसके ज़्यादा पास जाओगे तो जल भुन जाओगे इसलिए नफ़रत का रास्ता छोड़ो, देश को मोहब्बत से जोड़ना सीखिए इसी संदर्भ में वो कहते है कि- 
"मिरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे।
मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले।।"
भारत मे मोहब्बत के पैरोकार के रूप में राहत साहब को पहचाना जाता है, वो चाहते थे कि सभी लोग इस देश मे उसी मोहब्बत से रहे जिस मोहब्बत से अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ लड़कर उनको भगाया था, भाईचारा, प्रेम, मोहब्बत देश का गौरव है इसको बचाकर रखिये वरना आने वाला समय बहुत खराब होगा आज देश के पड़ोसी चारो तरफ से हमारे दुश्मन बने हुए है क्योंकि उनको पता है हमारे देश मे राजनेता अंदरूनी कलह को ज़िंदा रखना चाहते है पहले वो धर्म के नाम पर बांटते है फिर जाति, वर्ण के नाम पर भेद करते है फिर भी अगर पेट नहीं भरता या अभिलाषा पूरी नहीं होती है, तो क्षेत्र के नाम पर बांटकर अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करते है। पहले के नेता देश को जोड़ने की बात करते थे, लेकिन आज के नेता देश को तोड़ने की बात करते है। बहुसंख्यक राजनीति को वरीयता देते है हर पार्टी विशेष ने अपने-अपने खांचे तैयार कर लिए है अगर उन खांचों पर कोई मुद्दा फिट बैठता है तो उस पर आवाज़ उठाते है वरना खामोश रहते है। जिससे देश की धर्मनिरपेक्ष आत्मा को आघात पहुंचता है देश का ताना-बाना टूटने का डर बना रहता है जिस पर वो स्वयं कहते है - 
"घर के बाहर ढूंढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है"
इस दौर में मतलबी अदब के लोगो को उन्होंने अपने तरीके से जवाब दिया है क्योंकि इस देश मे अनेक अदब वालो की संस्थाएं है- लेकिन बहुत कम संस्थाएं आज दलित, आदिवासी,महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आवाज़ को उठाती है अपनी अदब बिरादरी को भी ललकारते हुए वो कहते है कि-
"हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे।
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते।।" 
साहित्य जगत से वो कहना चाहते है जिस प्रकार से वर्तमान समय मे ज्यादातर लेखक सहित्य से जुड़े लोग सरकारो की ग़ुलामी में लगे है देश की मानवता का चीर-हरण हो रहा है वो खामोश है उससे भी देश को बहुत खतरा है। हमे मिलकर एकजुट होकर देश को बचाने का प्रयास करना चाहिए सबको बिना किसी लाग-लपेट, धर्म-जाति, वर्ण-विभेद, ऊंच-नीच के देश की अखण्डता, एकता, संप्रभुता को बचाने का प्रयास करना चाहिए। 
एक जिंदादिल शायर जिसने अपना बचपन बहुत तंगियो में गुज़ारा फिर भी कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की खामोशी से इतनी मेहनत की इस देश का नाम पूरी दुनिया मे रौशन किया हर जगह इसकी पहचान को ज़िंदा रखा लेकिन जब भारत मे मुशायरा पढ़ा तो इश्क-मोहब्बत की शायरी भी की और सियासी तंज़ का भी जादू बिखेरा जो आज भी प्रासंगिक नज़र आती है। 
"बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए।
मैं पीना चाहता हूं पिला देनी चाहिए।।"
हिंदुस्तान के महबूब शायर के बारे में ज़्यादा लिख पाना मेरे बस की बात तो नहीं है लेकिन कुछ बातों को बताने का प्रयत्न ज़रूर किया है यह वो अज़ीम शायर था जिसको उसके दुश्मन भी इस्तेमाल करते थे और दोस्त भी, राहत इंदौरी ने कभी तुकबंदी और मंचीय शायरों को ज़्यादा तरज़ीह नहीं दी क्योंकि जो लोग केवल तुकबंदी करके जनता की भावनाओ को बस में करके उनको केवल भावुक करदे वो इसके ख़िलाफ़ थे बल्कि वो चाहते थे कोई भी मुशायरे में आये तो वो कुछ सीखकर जाए जो उसको तमाम उम्र काम आए आजकल ज्यादातर मुशायरों में फालतू की भगदड़, हू-हल्ला बचा है इसलिए एक दो शायर के साथ उन्होंने मंच शेयर करना बंद कर दिया था क्योंकि उन मुशायरों में वही लोग होते थे जो भावुक होते है लेकिन जहां गम्भीर और सीरियस लोग मुशायरा सुनने आते थे वहां पर राहत साहब ज़रूर जाने की कोशिश करते थे। आखिर में हिंदुस्तान की मोहब्बत के लिए उन्होंने जो शेर लिखा है उसको इस देश के सभी वर्गों को समझना चाहिए 
"मैं मर भी जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना।
लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना" 
राहत साहब ने तमाम उम्र अवाम के बीच में  रह कर अवाम की अवाज़ उठाई, उन के शेर हिन्दुस्तान के बच्चे बच्चे की ज़बान पर रटे  हुए थे, पिछ्ले कुछ  दिनों  में  उनकी ग़ज़ल  का एक शेर बहुत चर्चा में  रहा,
बुलाती है मगर जाने का नई
ये दुनिया है इधर आने का नई
बाद में  इस ग़ज़ल  पर राहत साहब ने बहुत से शेर जोड़े,  जिन में ये शेर अवाम के अन्दर के हौसले को ज़िन्दा रखने के लिए सदियों  तक याद किया जाता रहेगा
वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर ज़ालिम से डर  जाने का नई

डॉ. अकमल पीलीभीती का यह शेर राहत इन्दौरी की अचानक मौत के भाव को प्रदर्शित करता है-
अब तेरे शहर में  रुकने की इजाज़त ही नहीं, 
जा बचाने को कोई रख्त-ए-सफ़र चाहता  है


अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

बुधवार, 5 अगस्त 2020

नई शिक्षा प्रणाली से कैसे पैदा होंगे शास्त्री और कलाम- अकरम क़ादरी

नई शिक्षा प्रणाली से कैसे पैदा होंगे शास्त्री और कलाम - अकरम क़ादरी

देश में एक लंबे अरसे के बाद नई शिक्षा नीति आई, लेकिन इसमें सबकी प्रतिक्रियाएं अलग-अलग नज़र आई. कुछ सत्ता के लोभी लोगों ने इसको बग़ैर किसी विश्लेषण एवं दूरदृष्टि के अद्वितीय घोषित कर दिया तो कुछ विपक्षियों ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में विरोध किया लेकिन हकीकत कोई भी सामने नहीं रख सका. इस दौर में जहाँ एक तरफ़ वैश्विक महामारी (दुनियावी वबा) है जिसकी वजह से सड़कें सूनी है. उन पर जनपक्ष के लोगों का विचरण नहीं हो रहा है. कोई भी कुछ बोलने को राज़ी नहीं है. फिर भी ज़्यादा ना लिखते हुए चन्द बातों की तरफ ध्यान दिलाना चाहूंगा कि यह जो शिक्षा नीति है, इससे शिक्षा का बाज़ारीकरण हो रहा है जिसको देश के बड़े-बड़े पूंजीपति चलाएंगे, जिसके कारण देश के गरीब, मज़दूर, किसान, आदिवासी, दलित और 'सलीम' पंचर वाले क़ा बच्चा नहीं पढ़ पायेगा क्योंकि मुझे लगता है आत्मनिर्भर बनाने के चक्कर मे शिक्षा को तीन हिस्सों में विभाजित कर दिया गया है जिसमें रिसर्च यूनिवर्सिटीज को स्वायत्तता प्रदान की गई है जिसका सीधा मतलब पूंजीवाद से है जिसको अंग्रेज़ी में फाइनेंशियल ऑटोनोमी कहते है इसके तहत किसी भी यूनिवर्सिटी को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने ख़र्चों को खुद उठाना होगा जिससे जो शिक्षा गरीबों, दबे, कुचलों को मिल रही थी शायद वो ख़त्म हो जाएगी, उसकी जगह पर केवल अमीर के ही बच्चे पढ़ सकेंगे और "गुदड़ी के लाल" वाली कहावत समाप्त हो जाएगी. फिर जो लाखो रुपये में रिसर्च या पढ़ाई करेगा तो वो क्यों ना ज़्यादा पैसा कमाने की बात करेगा जिसके लिए वो चित-अनुचित सारे काम करेगा, प्राइवेटाईज़ेशन को बढ़ावा मिलेगा. पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटीज़ को बंद कर दिया जाएगा. फिर अगर आपके पास पैसा होगा तो आप पढ़ाइये वरना जो मेहनत मजदूरी बाप करता था वही मेहनत मज़दूरी बच्चा करेगा जिससे देश का असली टैलेंट मारा जाएगा. नेपोटिज़्म और फ़ेवरटिज़्म को बढ़ावा मिलेगा. 
जिस प्रकार से एक गरीब मछुआरे का बेटा साइंटिस्ट बनकर राष्ट्रपति  कलाम बन गया, एक गुदड़ी का लाल "लाल बहादुर शास्त्री" देश का प्रधानमंत्री बन गया, एक चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन गया तो क्या आने वाले समय में यह सोचा जा सकता है- जब शिक्षा महंगी हो जाएगी हम ऐसे साइंटिस्ट, राजनेता, उद्यमी, पब्लिक सर्वेंट पैदा कर पाएंगे जो देश को ख्याति प्रदान करे, जिससे देश विकास कर सके, शायद बहुत मुश्किल है फिर भी नामुमकिन नहीं है क्योंकि जो खुशबू होती है वो बाहर ज़रूर आती है. कुछ परेशानियां तो महसूस होती है लेकिन संघर्ष का फल बहुत अच्छा होता है. ऐसे प्रतिभावान लोग अपने दादा, परदादा, बाप की संपत्ति बेचकर शिक्षा ग्रहण करेंगे और  कोशिश करेंगे कि दूसरे लोगो के बराबर आ सके. देश में जितने भी मोस्ट सक्सेसफुल लोग हुए हैं वो ज़्यादातर गरीब, मज़दूर ही रहे है चाहे वो कोई भी हो इस शिक्षा नीति से मुझे नहीं महसूस होता है. ऐसे लोगों को बढ़ावा मिलेगा बल्कि इनके हौंसलो को कम किया जाएगा. इनको शिक्षा की पहुंच से दूर रखकर वो लोग सत्ता पर काबिज रहेंगे क्योंकि बाबा अम्बेडकर जी ने कहा था "शिक्षा वो शेरनी का दूध है जी पियेगा वो शेर की भांति दहाड़ेगा" जब वो पढ़ेगा ही नहीं तो बोलेगा कहाँ से फिर एक समय ऐसा आ जायेगा कि वो स्वयं को ज़िंदा रहने को ही बड़ी उपलब्धि मानकर ख़ामोश रहेगा. डेमोक्रेसी का धीरे-धीरे गला दबा दिया जाएगा. सत्ता में बैठे लोग हमेशा उस कुर्सी का मज़ा लेंगे. गरीब, मज़दूर, किसान, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक केवल मेहनत करेंगे और दो वक्त की रोटी का इंतेज़ाम करते रहे जाएंगे.

मुझे उमीद थी कि जब नई शिक्षा नीति आ रही है तो कुछ अच्छा होगा उसमे देश को फ्री शिक्षा दी जाएगी जो के.जी. से लेकर पीएचडी तक होगी क्योंकि शिक्षा लेना एक फंडामेंटल राइट के तहत आता है लेकिन यहां बहुत से अधिकार पहले ही छिन चुके है अब व्यापारी बनाने की कोशिश हो रही है.

स्कूल के मुख्य दरवाजे पर लिखा देखता हूँ "शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये" शायद वो अब हो जाएगा बाज़ारीकरण में आइये, व्यापारी बनकर जाइये" इससे सामाजिकता को तहस-नहस किया जा सकता है। 
सामाजिक बन्धुता को नुकसान पहुंच सकता है। देश की शिक्षा व्यवस्था को व्यापारीकरण से रोकना चाहिए पूंजीवाद जो शिक्षा व्यवस्था पर गिद्ध की तरह नज़रे गड़ाए बैठा है उसके मंसूबो को खत्म करना चाहिए। इसका उदाहरण एक वो यूनिवर्सिटी है जो अभी तक ज़मीन में आई ही नहीं है और उसको "यूनिवर्सिटी ऑफ एमिनेंस" का दर्जा मिल चुका है। लाखो करोड़ो रूपये उसको सत्ताधीशों ने दे दिए है क्या वो लोग गरीब, मज़दूर, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों के साथ साथ महिलाओं को फ्री में शिक्षा दे पाएंगे। जबकि अज़ीम प्रेमजी ने शिक्षा के विस्तार के लिए पूरे देश मे ऐसे फैलाया है कि उनके वालंटियर सरकारी स्कूलों में जाकर पढ़ाते है, गरीबो की मदद करते है कोई उनसे पैसा नहीं लेते है। क्योंकि वो शिक्षा को आम करना चाहते है हर गरीब के बच्चे को मजबूत आधार देना चाहते है जिससे देश नए आयाम स्थापित करे और विकास के पथ पर अग्रसर हो सके।
जय हिंद