सोमवार, 13 नवंबर 2017

आला हज़रत ने ऐसे लिया अंग्रेज़ो से लोहा - मीनू बरकाती

आला हज़रत ने ऐसे लिया अंग्रेज़ो से लोहा - मीनू बरकाती

चौहदवीं सदी के सबसे बड़े आलिम आला हज़रत  फाजिले बरेलवी मौलाना अहमद रजा खां ने दीनी खिदमात के साथ साथ एक सच्चे देशप्रेमी (वतनपरस्त) का भी किरदार अदा किया। अंग्रेजों से वह इतनी नफरत करते थे कि मलिका विक्टोरिया के टिकट को अपमान करने के मक़सद से उन्होंने खतों पर हमेशा उल्टा ही चिपकाया। आपने जंग-ए-आजादी में अंग्रेजों से लड़ने के लिए अपने घोड़े आजादी के दीवानो को दे देते थे। अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ने वाले सिपाही आपके गरीब खाने में ठहरते थे। यही वजह थी कि लार्ड हेस्टिंग जैसे जनरल ने आपका सर कलम करने का इनाम पांच सौ रुपये रखा था। आला हजरत की पैदाइश जंग-ए-आजादी से ठीक एक साल पहले यानी 14 जून 1856 ई. को बरेली के मोहल्ला जसौली में हुई थी। आपके कुनबे का ताल्लुक कंधार (अफगानिस्तान) से है। मुगलिया शासन में आला हजरत के खानदान के बुजुर्ग हिंदुस्तान आए थे। आपके दादा हुजूर मौलाना रजा अली खां किसी जंग के सिलसिले में रूहेलखंड आए और यहीं के होकर रह गए। आला हजरत के वालिद मुफ्ती नकी अली खां भी अपने वालिद की तरह अंग्रेजों की हुकूमत से सख्त नफरत करते थे। कई बार अंग्रेजों ने आपको गिरफ्तार करने की कोशिश भी की, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। उन्हें जैसे ही अंग्रेजी फौज के आने की भनक लगती थी, वह मस्जिद में चले जाते थे। वहां अंग्रेज जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते थे। आला हजरत ने अंग्रेजों के खिलाफ फतवे भी जारी किए। अंग्रेजों द्वारा आयोजित किए जाने वाले तमाशों और भाषणों में मुसलमानों को आला हजरत ने ही जाने से रोका। आपका कहना था कि अंग्रेजों ने हमारे मुल्क के साथ धोखा किया है। फिरंगी तिजारत के बहाने आकर हाकिम बन गए और हमारे मुल्क के लोगों पर जुल्म ढहा रहे हैं। आला हजरत अंग्रेजी दौर में कोर्ट कचहरी जाने के सख्त विरोधी थे। आला हजरत इमाम अहमद रजा खान फाज़िले बरेली का जन्म 10 शव्वाल 1672 हिजरी मुताबिक 14 जून 1856 को बरेली में हुआ  आपके पूर्वज कंधार के पठान थो जो मुग़लो के समय में हिन्दुस्तान आये थें।आला हज़रत ने उस वक़्त अंग्रेज़ो से लोहा लिया जिस वक़्त कुछ मौलाना अपनी रोज़ी रोटी को चलाने और मुल्क को बरगलाने में लगे थे और अंग्रेज़ो से तीन सौ रुपये महीना लेकर उनके एजेंडे पर काम कर रहे थे और ऐसे मदरसे को फरोग दे रहे थे जो इस्लामी लिबास तो पहनते थे और है भी लेकिन वफादारी हमेशा अंग्रेज़ो की ही निभाते थे, निभाते है।
आला हजरत का उर्स  बरेली शरीफ मे हर साल सफर की 25 को मनाया जाता है इस बार यह उर्स 25 सफर चांद की और अंग्रेजी की 15 नवंबर को मनाया जायेगा।इसमे देश विदेश से लाखों की तादात मे जायरीन आते है

मीनू बरकाती शेरपुर कलां
पुरनपुर पीलीभीत उत्तर प्रदेश
9759227686
Meenu.barkaati@gamil.com

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

दलालो से सावधान - मीनू बरकाती टीटीएस

दलालों से साधान।सुनो दलालों

क्यू है लोग टी.टी.एस के खिलाफ तो सुनों एक साहब ने चुनाब मे हमसे कहा था टी.टी.एस हमे सपोर्ट करे तो हम लोगो ने कहा हमे राजनिति से कोई बास्ता नही है।हम लोग चुनाब किसी को नही लड़ायेगे.
तब से कुछ गंन्दी राजनिति के लिये हम लोगो से दलाल कहना शुरू कर दिया जगह जगह लोगो से कहते फिर रहे है.
सुनो तुम अपने बाप की असली औलाद हो तो जो लोग दलाली कर रहे है उसके खिलाफ बोल कर देखो बो मजबूत लोग है तुम्हे छटी का दूध याद दिला देगे।
हम लोग सिर्फ इस्लामी एंव सामाजिक काम करने बाले है क्यूकि हम मरकजे अहले सुन्नत दरगाह ए आला हजरत से जुड़े है।
हम चुनाब किसी को नही लड़ाते है न ही कभी लड़ाये
जो दलाल कह रहा है बो खुद दलाल है जबकि तो खुबसूरत मकान दलाली से बना रखे है.
एक भी साबूत हो किसी के पास टी.टी.एस के खिलाफ तो पेश करो.है हिम्मत।
जो लोग कह रहे है टी.टी.एस शेरपुर दलाली कर रहा है जरा हमे भी तो पता चले किस से दलाली ली है जिस ने दी हो बो  बताये.तुम्हारे मुत मे मार जाओगा.
गांव मे तुम्हारी औकात ही क्या है दलालो.

हम टी.टी.एस बाले हक के साथ है सच्चो के साथ है
बस यही आग लगी है इनके पेटो मे हक के साथ क्यू है यह.
खुब बुराई करो हमे कोई परेशानी नही है शेरपुर बाले सब जानते है हक पर कौन है और दलाली कौन कर रहा हैं।

फ्री मे टी.टी.एस का प्रचार करने के लिये शुक्रिया।।

जलने बाले जलते रहेगे हम ऐसी ही चलते रहेगे।
इंन्शा अल्लाह।

टी.टी.एस शेरपुर कलां की आवाज हक की आबाज
खरी खरी चुभी चुभी
मीनू बरकाती टी.टी.एस शेरपुर कलां।

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

न्यूरिया के नौजवानों से अपील - अकरम हुसैन क़ादरी

ना समझोगे तो नस्ले बर्बाद हो जाएंगी
भाइयों मैं किसी भी उम्मीदवार का नाही समर्थक हुँ और ना ही किसी का मुखालिफ मैं तो अपने कस्बे का एक छोटा सा आप जैसा इंसान हुँ, बस थोड़ा सा अलग सोच लेता हुँ इसलिए लोग तिरछी नज़रों से देखते है मुझे कस्बे की राजनीति से मतलब नही है लेकिन एक रिसर्च स्कॉलर ( तहक़ीक़) का स्टूडेंट होने के नाते मुझे बार बार अपने कस्बे की बर्बाद होती नस्लो के फ्यूचर (भविष्य) की थोड़ी चिंता होती है क्योंकि एक धड़कते दिल और जिंदादिल इंसान होने की यह पहचान भी है।
पिछले लगभग दस साल से बराबर देख रहे है और समझ भी रहे है जो न्यूरिया कभी ज़मीदारों की कही जाती थी आज वो मजदूरों, कारीगरों, दिहाड़ी, करने वालो की न्यूरिया बन चुकी है क्योंकि जितनी भी फैक्टरियां न्यूरिया में आई उसको हमारे पुराने नेताओ ने चकरपुर, खटीमा, या दूसरी जगह पर भेज दिया इसके अलावा बहुत से डिग्री कॉलेज, इंटरमीडिएट कॉलेज, स्कूल और कन्या विद्यालय आये लेकिन वो हमारे नेताओं की वजह से दूसरी जगह चले गए जिससे हमारा नुकसान पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा है जिसको शायद हम लोग सीरियसली नही समझ रहे है, जिस तरीके की लीडरशिप आज न्यूरिया में पनप रही है उसमें तो एक समझदार इंसान को अपनी आने वाली नस्लो का भला नही दिखता है,
सारी कमी हमारी मौजूदा लीडरशिप की ही नही है बल्कि हमारी जनता की भी कमी है वो आने वाले समय की मांग को नही समझ रही है जिससे उनके बच्चे मजदूर के मजदूर ही बन रहे है गुजरात, दिल्ली, देहरादून जैसे शहरों में मजदूरी करने के लिए मजबूर हो रहे है अच्छे और सस्ते स्कूल ना होने की वजह से अच्छी, किफायती और रोजगार के लिए कोई तालीम नही मिल पा रही है जिससे दिन वा दिन न्यूरिया आस पास के गांवों, कालोनियों से पिछड़ते जा रहे है, गरीबो के लिए एक सहारा मदरसा भी बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा है जहां पर एक गैरतमंद इंसान कुछ नही कर सकता था तो वो अपने बच्चे को दीनी तालीम दे सकता था लेकिन मदरसे को बर्बाद करने में भी न्यूरिया की नई, पुरानी लीडरशिप ही जिम्मेदार है जिन्होंने वक़्त के साथ क़दम ताल नही किया जिसका खामियाजा आज गरीब और मिडिल क्लास फैमिली को भुक्तना पढ़ रहा है।
भाइयों आप सब लोगो से दरखास्त है कि अपने वोट को सोच समझकर दे किसी के नाश्ते, चाय, कॉफी, अण्डे, चने को देखकर ना दे।
कितने मासूम है आप लोग किसी भी इंसान को पांच साल अपना और अपने बच्चों का मुस्तकबिल (भविष्य) सौंप देते हो चन्द दिनों के नाश्ते, चाय, फलों में ज़रा समझो अगर पुरानी लीडरशिप अच्छी होती तो बहुत कुछ बचाया जा सकता था अब आने वाली लीडरशिप भी उसी मुहाने पर खड़ी है फैसला करने का वक़्त है आपका और आपके बच्चों के मुस्तकबिल का मामला है वोट करने से पहले अपने ज़मीर और दिल पर हाथ रखकर सोचना.......

"मेरा तरीक अमीरी नही फकीरी है।
खुदी को ना बेच गरीबी में नाम पैदा कर।।"
      अल्लामा इक़बाल

आपका छोटा भाई
अकरम हुसैन क़ादरी
रिसर्च स्कॉलर ( अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी )
फाउंडर - "अलीग्स वेलफेयर सोसाइटी न्यूरिया"

पत्रकार NDTV INDIA, कोहराम, लल्लनटॉप, मीडिया एस्केप, वोटरगिरी

संकट में प्रवासी पक्षी - मीनू बरकाती

संकट मे प्रवासी पक्षी

प्रवासी पक्षी भी संकट मे घिर गये है।ठंडे देश साइबेरिया से हज़ारो मील दूरी तय करके हर साल भारत की सरजमीं को सजदा करने वाले प्रवासी  पक्षियों के प्रति न तो वन विभाग का महकमा गंभीर है और न ही पक्षियों के शिकार पर अंकुश लगाया जा रहा है।चिड़ीमार साइबेरियन पक्षी का शिकार करने के बाद नेपाल आदि जगह मे अच्छे भाव मे बेच रहे है।
साइबेरिया का मौसम सर्दियों मे पक्षियोे के रहने लायक नही रहता है।नवम्बर शुरू होते ही बर्फ जमने लगती है तब यह साइबेरियन पक्षी प्रवास के लिये रुख करते है।उत्तर प्रदेश के तराई क्षेञ की ओर कई दिनों की हजारों मील लम्बी याञा करने के बाद साइबेरियन पक्षी मु्ख्यत:पीलीभीत, इलाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों को अपना आशियाना बनाते है।इन पक्षियों की नजरे बड़ी तेज होती है और उड़ते समय वे  इनका बखूबी इस्तेमाल करते है।रास्ते मे पड़ने वाले विजुअल लैेडमाकर्स जैसे पहाड़, नदियां, तालाब आदि की सहायता से अपना रास्ता तलाश करते  है।अब से करीब एक दशक पहले तक तो साईबेरिया सरकार इन पक्षियों के पैरों में छल्ले नुमा ट्रांसमीटर लगाती थी ताकि यह पता लग सके कि ये पक्षी कब और कहा किस स्थिति में है तथा कितनी दूरी याञा करके वापस लौटते है? साइबेरिया वापस होने पर इनकी जांच होती थी लेकिन अब काफी सालों से पक्षियों के पैरों मे छल्ले दिखाई नही देते है।प्रवासी पक्षियों की परेशानी की वजह जलवायु परिवर्तन भी है।ग्लोबल वार्मिंग के लिये हम भी कम जिम्मेदार नही है। सरकार एवं वन विभाग को इन मेहमान पक्षियों के शिकार को रोकना चाहियें।
हमारी भी जिम्मेदारी है।इन पक्षियों को बचाने के लिये हम सब को जागरुक होना चाहियें।अगर किसी को साइबेरियन पक्षियो का शिकार करता हुआ कोई दिखे तो वन विभाग को सूचना फौरन दे।

मीनू बरकाती शेरपुर कलां पुरनपुर पीलीभीत
9759227686

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

साम्प्रदायिकता का असली गुनाहगार कौन- अकरम हुसैन क़ादरी

साम्प्रदायिकता का उदय किसी धर्म या धार्मिक सोच से नहीं होता है बल्कि राजनैतिक लोलुप्सा, घृणित इच्छाओं की पूर्ति और रातों रात धनी बनने की प्रबल इच्छा से पनपता है। धर्म का अर्थ होता है धारण करना अर्थात प्रेम, सत्य, न्याय, अहिंसा आदि सदगुणों को धारण करना।
दुनियाँ का कोई भी धर्म बुरा नहीं होता है। हर धर्म मानवता का पाठ पढ़ाता है, अच्छे-बुरे में फर्क बताकर सही मार्ग पर चलने को कहता है। हजारों साल से सभी धर्माचार्यों ने इसी का उपदेश दिया है। पर कुछ लोग ने अपने निजी स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल सदियों से करते आ रहे हैं और आज भी कर रहे हैं, ये लोग धर्म में रहकर धर्म से षड्यन्त करने वाले होते हैं जो धर्म को हाथ की कठपुतली बना लेते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए इसका इस्तेमाल तुरुप के इक्के की तरह करते हैं जो अक्सर सटीक ही बैठता है और नेता जी को इसका पूरा लाभ होता है, यदि धर्म इतना ही बुरा होता तो सबसे ज्यादा दुनियाँ में इसके मानने वाले नही होते लेकिन कुछ नास्तिकतावादी विचारधारा के लोग मानते हैं कि सभी बुराइयों की जड़ 'धर्म' है जबकि यह पूर्णतया सच नहीं है धर्म से ही नैतिकता का निर्माण होता है, धर्म ही हमें एक सीमा में बांधकर हमारे भीतर सद्गुणों का निर्माण करता है, धर्म ही हमें कर्तव्य पालन की ओर ले जाता है धर्म ही हमें अच्छे रास्ते पर ले जाता है।
अब यदि कोई आतंकवादी घृणित कार्य करने के पश्चात अल्लाह हो अकबर का नारा लगाए तो इसमें धर्म का कोई दोष नही हैं क्योंकि वह धार्मिक होता तो यह सब होता ही नही, जिस प्रकार से कंधमाल में कुछ अति उत्साही लोग एक महिला का रेप करके जय श्री राम का उद्घोष कर रहे थे, क्या वो धार्मिक है ?? वो बिल्कुल भी धार्मिक नहीं है यदि धार्मिक होते तो ऐसे काम ही नहीं करते, आजकल सोशल मीडिया पर किसी को भी मारते, काटते, हुए वीडियो अक्सर देखने को मिल जाते है जैसे
आईएसआईएस के आतंकवादी एक नारे का उद्घोष करते हैं वो धर्म का हिस्सा ही नहीं है बल्कि वो धर्म का मज़ाक बना रहे हैं अगर धार्मिक होते तो कोई ऐसा घृणित कार्य ही नहीं करते जिससे मानवता शर्मसार होती।
भारत के अंदर अनेक धर्म, पंथ, वर्ण और जाति के मानने वाले लोग मिल जाएंगे है इसका उदाहरण किसी भी दरगाह पर खड़े लोग मन्नत मांगते हुए दिख जाते है चाहे वो अजमेर शरीफ हो या फिर साबिर पाक कलियरी की दरगाह वहां कोई किसी का धर्म नही पूछता है, मंदिरों के सामने अनेक लोग आते है जो अपनी पद्धति के अनुसार पूजा पाठ करते है, स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारे में अनेक लोग जाते है और सब वहां पर सर पर रुमाल बांधकर जाते है और लंगर छक कर वापस आते है वहां पर भी कोई किसी से किसी का धर्म नही पूछता है
मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और धर्म ही मानवता सिखाता है इसमें कोई शक नही होना चाहिए।
कोई भी धर्म बुरा नही होता है बस जो लोग बुरा करते है उन्होंने धर्म को समझा ही नही होता है ना ही धर्म की शिक्षाओं को पड़ा होता है वो लोग धर्म का सहारा लेकर अपनी कुण्ठित इच्छाएं पूरी करते है, मानवता सिखाने के लिए समाज मे धर्म के साथ साथ साहित्य का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है, साहित्य ही किसी व्यक्ति को पूर्णतया मनुष्य बनाने में योगदान देता है

अकरम हुसैन क़ादरी और आसिफ साबरी

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

त्रिमूर्ति करेगी गुजरात की सल्तनत का फैसला- अकरम हुसैन क़ादरी

त्रिमूर्ति करेगी गुजरात की सल्तनत का फैसला - अकरम हुसैन क़ादरी
गुजरात चुनाव आजकल पूरे देश के लिए एक कौतूहल का विषय बना हुआ है जिस प्रकार से बड़े बड़े मीडिया घराने एडके लिए अनेक प्राइम टाइम, हल्ला बोल, ताल ठोक के कर रहे है उससे ज़ाहिर होता है कि यह चुनाव कुछ ज्यादा ही मायने रखता है क्योंकि उसका सबसे बड़ा राज़ यह भी है देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी उसी गुजरात के मुख्यमंत्री के बाद अब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे है वैसे तो भारतीय राजनीति में उत्तर-प्रदेश का प्रधानमंत्री देने में प्रथम स्थान है लेकिन काफी समय बाद गुजरात की धरती से देश को प्रधानमंत्री मिला है वो भी गुजरात मे भाजपा के 22 साल के कार्यकाल के बाद ।
जिस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री को दिल्ली बादशाहत मिली उसके बाद गुजरात की राजनीति में एक अजीब तरीके की उथल पुथल मच गई जिसके कारण सत्तारूढ़ भाजपा कमज़ोर होने की कगार पर पहुंच गई उसके बाद अनेक सामाजिक संगठनों ने भी भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया 2014 में दिल्ली की बादशाहत मिलने के बाद आनंदीबेन और रूपानी के कार्यकाल में अनेक ऐसी दिल को दहला देने वाली घटनाएं हुई जिससे भाजपा लगातार कमज़ोर होती चली गयी
भाजपा को कमज़ोर करने में सर्वप्रथम गुजरात के पाटीदार समाज के 23 वर्षीय हार्दिक पटेल ने आरक्षण के मुद्दे को उठाकर कमज़ोर किया है क्योंकि वो चाहते है कि गुजरात के साढ़े छः करोड़ आबादी में पाटीदारों का लगभग 14 से 17 परसेंट आबादी है जो कि सामाजिक, राजनैतिक तौर पर मजबूत भी है काफी बीजेपी कैबिनेट में मिनिस्टर भी है फिर भी आरक्षण चाहते है और एक ही आवाज़ में 23 वर्षीय हार्दिक पटेल पांच लाख जनता को इकट्ठा करके धरना प्रदर्शन करते है और बीजेपी से पाटीदारों को आरक्षण देने की मांग को मजबूती से रखते है जिसको भाजपा नकार देती है और हार्दिक पटेल पर अनेक धाराओं के साथ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा भी लगा देती है तथा प्रदर्शन करते हुए लगभग 10 से 12 पाटीदार समाज के युवाओं को पुलिस कार्यवाही में अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है जिससे पाटीदार समाज मे एक रोष उतपन्न हो जाता है तथा वो भाजपा को आगामी चुनाव यानी 2017 के चुनाव में धूल चटाने के लिए तैयार हो जाते है जिसके अब चुनाव के समय साफ आसार भी नज़र आ रहे है ।
गुजरात चुनाव में सबसे अहम किरदार निभाने वाले अल्पेश ठाकुर है वो पिछड़ा वर्ग से आते है उनकी संख्या लगभग 40 परसेंट है जोकि गुजरात चुनाव से पहले बीजेपी का अहम हिस्सा थे उन्होंने भी आरक्षण के चलते भाजपा से बगावत का बिगुल फूँक दिया है जो बीजेपी को सत्ता के बेदखल करने मुख्य भूमिका में नज़र आ रहे है।
ऊना कांड से सुर्खियों में आये जिग्नेश मेवानी भी दलित समाज के नए नेता बनकर उभरे उन्होंने दलितों पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाया तथा अपने समाज को नई दिशा देने की सोच को लेकर आगे बढे, जिस प्रकार से सवर्णों ने गौरक्षा के नाम पर अनेक तथाकथित राष्ट्रभक्त संगठन बनाकर दलितों पर अत्याचार किया वो जगजाहिर है जिससे दलितों को एक माला में पिरोने के लिए जिग्नेश मेवानी ने अपनी ऐड़ी चोटी का जोर लगाया और उनको एक सूत्र में बांधकर ऊना कांड के दंरिन्दों को सबक सिखाने की कोशिश की तथा उसके विरोध के लिए मरी हुई गायों को शवो को अनेक कार्यालयों के सामने लाकर फेंक दिया जिससे भाजपा सरकार बैकफुट पर आ गयी, लेकिन सवर्णों ने फिर भी दलितों के साथ न्याय नही किया है बल्कि पॉलिटिकल उनटचबिलिटी का शिकार बनाया गया, दलितों की संख्या पूरे गुजरात मे लगभग 7 से 8 परसेंट गई जो हमेशा भाजपा को वोट देते है इसबार वो भी अलग राग अलाप रहे है और कह रहे है जो भी उनको सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय दिलाने की बात करेगा वो उनके ही साथ जाएंगे लेकिन भाजपा को ज़रूर हराएंगे जिससे उनका गुरुर टूट सके और उनको मालूम हो जो उनको सत्ता तक पहुंचा सकते है वो उनको सत्ता से चुटकियों में बेदखल भी कर सकते है ।
अफसोस की बात यह है कि 2002 का गुजरात नरसंहार झेलने वाले मुस्लिम अब भी नींद की गोलियां खाकर सो रहे है अभी तक गुजरात चुनाव में उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नज़र नही आया है ना ही उनको कोई भी राजनैतिक पार्टी अपना वोट बैंक समझ रही है बस उनको दबा, कुचला, सताया हुआ समझ कर कांग्रेस उनको अपना वोट बैंक समझ रही है लेकिन उनको सत्ता में कोई हिस्सेदारी देने की बात नही कर रही है क्योंकि ऐसे कयास लगाए जा रहे है यदि मुस्लिमो की बात की गई तो चुनाव हिन्दू-मुस्लिम हो जाएगा जिससे अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को ही फायदा होगा, भाजपा की यह पूरी कोशिश है कि चुनाव मुद्दों पर ना लड़कर हिन्दू मुस्लिम पर लड़ा जाए जिससे उसको फिर से गुजरात की सल्तनत मिल जाये लेकिन हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी हर प्रकार से भाजपा को सत्ता से बेदखल करना चाहते है ।
भाजपा की हार में नोटबन्दी, GST भी अहम भूमिका अदा कर सकते है अभी चुनाव कराने की घोषणा हो चुकी है लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है फिर भी त्रिमूर्ति, नोटबन्दी, GST अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार बैठे है रिजल्ट का इंतेज़ार है
जय हिंद
अकरम हुसैन क़ादरी

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

बहुचर्चित उपन्यास 'हलाला' पर डॉ. फ़िरोज़ अहमद की उपन्यासकार 'भगवान दास मोरवाल' से बातचीत... कुछ अंश ......

कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ.एम.फ़िरोज़ अहमद की  बातचीत …कुछ अंश......
1- आप अपने जन्म स्थान घर परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइए...?
- मेरा जन्म हरियाणा के काला पानी कहे जाने वाले मेवात क्षेत्र के छोटे-से क़स्बा नगीना के एक अति पिछड़े मज़दूर और इस धरती के आदि कलाकार कुम्हार जाति के बेहद निम्न परिवार में हुआ l अपने मेरे घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा है l अभी हाल में मैं अपने क़स्बे में गया हुआ था, तो संयोग से कुम्हार जाति की वंशावली का लेखा-जोखा रखने वाले हमारे जागा अर्थात जग्गा आ पहुँचे l मैंने जब इनसे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा, तब इन्होंने कुछ ऐसी जानकारी दी जो मेरे लिए लगभग अविश्वसनीय थीं l जैसे इन्होंने बताया की हमारे मोरवाल गोत्र के पूर्वज उत्तर प्रदेश के काशी के मूल निवासी थे l काशी से पलायन कर बनारस आये l इसके बाद बनारस से पलायन कर सैंकड़ों मील दूर दक्षिण हरियाणा के बावल क़स्बे, जो रेवाड़ी के पास है, यहाँ आये l बावल से चलकर ये दक्षिण दिल्ली के महरोली, महरोली से पलायन कर सोहना (गुडगाँव) के समीप इंडरी गाँव और अंत में यहाँ से चलकर दक्षिण हरियाणा के ही मेवात के इस क़स्बे में जाकर पनाह ली l अपने आप को ऋषि भारद्वाज के वंशज कहलाने वाले इन जागाओं की बेताल नागरी में लिखी इन पोथियों में यह भी दर्ज़ है कि मेरे सड़दादा गंगा राम के पाँच बेटे थे l इनमें से तीसरे नंबर के पल्टू राम के बेटे सुग्गन राम औरसुग्गन राम के चार बेटों में से दूसरे नंबर के बेटे मंगतू राम के तीन बेटों में से दूसरे नंबर का बेटा भगवानदास l मुझ समेत हम तीन भाई और दो बहनें हैं l मैं यहाँ एक बात बता दूं कि हमारा पुश्तैनी काम मिटटी के बर्तन बनाना था, जो 1985 तक रहा l
 मेव (मुसलमान) बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण मेरे क़स्बे और मेरे क़स्बे का वह चौधरी मोहल्ला भी मेव बाहुल्य मोहल्ला हैl यहाँ एक रोचक जानकारी दे दूँ कि मेरे इस चौधरी मोहल्ले का नामकरण हिन्दुओंके चौधरियों के नाम पर नहीं है बल्कि मेव चौधरियों के नाम पर है l मेरे घर के सामने अगर ऐसा ही मेव चौधरी का घर है, तो बाएंतरफ भी ऐसा ही घर है l जबकि हमारे घर का पिछवाड़ा मुसलमान लुहारों से आबाद है l अपने परिवार में उस समय के हिसाब से मैं एकमात्र शिक्षित व्यक्ति था l हालाँकि अपनी क्षमता के अनुसार मैंने अपने दोनों बच्चों अर्थात बेटा प्रवेश पुष्प जिसकी शिक्षा एमसीए है, तो बेटी नैया ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में पीएच.डी किया हुआ है l वैसे मैंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में अपनी स्मृति-कथा की जेठ का गुलमोहर में भी विस्तार से लिखा हुआ है l
2. आप की शिक्षा-दीक्षा कहां से हुई और कहां तक...?

- मेरी प्रारंभिक शिक्षा अपने कस्बे में हुईl हाँ, स्नातक मैंने मेवात के जिले और प्रमुख शहर नूहं से की है l बाकी की शिक्षा जिसे 'शिक्षा' कहना उचित नहीं होगा, ऐसे ही चलते-चलाते पूरी की l स्नातक के बाद पहले राजस्थान विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया l इसके बाद यहीं से हिंदी में एम.ए. किया l बस, मेरठ विश्वविद्यालय से 'हिंदी पत्रकारिता में दिल्ली का योगदान' विषय में पीएच.डी. होती-होती रह गयी l
3. आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों....??
- जहां तक मेरी प्रिय विधा का प्रश्न है तो इस समय निसंदेह मेरी प्रिय विधा उपन्यास है l इसका एक कारण यह है कि एक लेखक द्वारा जिस तरह एक विधा साधनी चाहिए, शायद वह मुझसे साध गयी है l इसका प्रमाण पिछले कुछ सालों में एक के बाद तीन उपन्यासों के रूप में देखा जा सकता है l जबकि आगामी उपन्यास पर धीरे-धीरे काम हो रहा है l मुझे लगता है एक लेखक के रूप में, मैं जितना सहज अपने आपको उपन्यास में पाता हूँ उतना शायद दूसरी विधा में नहीं l इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि जीवन-जगत को प्रस्तुत करने के लिए जिस आख्यान की ज़रुरत होती है, उपन्यास उसे बखूबी अपना विस्तार प्रदान करता है l दूसरे शब्दों में कहूं तो मेरी जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि है उसके दुखों, संतापों और आक्रोश को मैं उपन्यास के माध्यम से ही व्यक्त कर सकता हूँ lइसीलिए मैं जितना अपने व्यक्तिगत जीवन में निर्मम हूँ, उतना ही अपनी रचनाओं में हूँl प्रपंच या नकलीपन न मेरे असली जीवन में है, न मेरी रचनाओं में आपको नज़र आएगा l सच कहूं अब मैं उपन्यास को नहीं जीता हूँ बल्कि उपन्यास मुझे जीता है l मेरी रचनाओं और उनके पात्रों में आपको वह दुविधा या दुचित्तापन दिखाई नहीं देगा जो एक लेखक को कमज़ोर बनाता है l
4. हलाला उपन्यास लिखने का उद्देश्य किया था...?
- आपने हलाला के लिखने के उद्धेश्य के बारे में पूछा है l मेरा मानना है कि किसी भी लेखक से उसके लिखने के उद्धेश्य के बारे में नहीं पूछना चाहिए लेखक या रचनाकार किसी उद्धेश्य को ध्यान में रखकर नहीं लिखता है l क्या प्रेमचन्द ने गोदान, रेणु ने मैला आँचल, राही मासूम रज़ा ने आधा गाँव, अब्दुल बिस्मिल्लाह ने बीनी-बीनी झीनी चदरिया, भीष्म साहनी ने तमस, श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी, अज्ञेय ने नदी के द्वीप किसी उद्धेश्य के तहत लिखे होंगे - नहीं l दरअसल, रचना किसी उद्धेश्य का प्रतिपाद नहीं बल्कि एक लेखक के अंदर अपने समाज में देखी गयी विसंगतियों से पनपे द्वन्द्वों का सत्य होता है l यह वह सत्य होता है जिसे एक व्यक्ति महसूस तो करता मगर उसे व्यक्त नहीं कर पाता l एक लेखक वास्तव में उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व या कहिए ऐसा प्रतिरूप होता है जो एक पाठक को अलग-अलग पात्रों केरूप में नज़र आता है l उसके लिए धर्म-संप्रदाय या स्त्री-पुरुष मायने नहीं रखते हैं बल्कि उसके लिए उनके दुःख-दर्द और सरोकार कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं l एक बेहतर कल्पना उसके लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है l इसलिए यह कहना की हलाला लिखने मेरा क्या उद्धेश्य रहा होगा, इसे आपने उसे पढ़ कर जान और समझ लिया होगा l
5. क्या यह सब लिखने के लिए आपने किसी मुस्लिम महिला से मुलाकात की थी?
-आपने पूछा कि इसे लिखने के लिए मैंने किसी मुस्लिम महिला से मुलाक़ात की थी? ‘हलाला’ की पृष्ठभूमि मेवात की होने के कारण पाठक को ऐसा लगता है मानो हलाला की रस्म मेवात में प्रचलित है l सच तो यह है कि मेवात में यह रस्म बिल्कुल भी चलन में नहीं है l मैंने आज तक हलाला से संबंधित एक भी मामला न देखा न हीं सुना l अब आप पूछेंगे कि फिर आपने इसे मेवात की कहानी क्यों बनाया ? इस पर मैं पलट कर आपसे जानना चाहता हूँ कि क्या ऐसी समस्याएँ सिर्फ़ मेवात की हो सकती हैंl मेवात से बाहर का मुस्लिम समाज ऐसी समस्याओं से नहीं जूझ रहा होगा ? इस उपन्यास की पृष्ठभूमि मेवात देने का कारण मात्र इतना है ही कि मैं उस समाज को गहरे तक जानता हूँ l अपने लेखकीय कौशल का इस्तेमाल कर मैं अपनी बात को अपने चिर-परिचित पात्रों के माध्यम से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से कह सकता हूँ l सच तो यह कि तलाक़ या हलाला जैसी समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ हैं जिन्हें हमने धार्मिकता का वारन ओढा कर और विकराल बना दिया l इस विकरालता को और भयानक हमारे उन मर्दों ने बना दिया जो औरत को महज एक उपभोग की वस्तु और अपनी जागीर मान बैठा है l 
लेखक का पाने पात्रों में ढालना या कहिए परकथा में प्रवेश करना ही उसकी सबसे बड़ी सफलता है l अगर यह उपन्यास काल्पनिक होते हुए भी कुछ सवाल उठाता है तो लेखक के साथ-साथ यह इसकी भी सफलता है l
6. हलाला उपन्यास लिखने के लिए क्या आपने कुरान या हदीस को पढ़ा था?
-यह आप अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी रचना या उपन्यास पर काम करने से पहले एक शोधार्थी की तरह मैं अपनी क्षमता और समझ के मुताबिक़ पूरी मेहनत करता हूँ l विषय से संबंधित हर तरह की उपलब्ध साहित्य और सामग्री का अध्ययन करता हूँ l उपन्यास ‘हलाला’ पर काम शुरू करने से पहले इस रस्म से संबंधित कुरआन की आयतों को खोजा, तो कुरआन में इससे संबंधित सूरा अल-बक़रा की मुझे सिर्फ़ 230वीं एक आयत मिली l बाकी हलाला के बारे में मुझे कोई दूसरी आयत नहीं मिलीl इस आयत को मैं हू-ब-हू यहाँ प्रस्तुत कररहा हूँ – ‘तो यदि उसे ‘तलाक़’ दे दे, तो फिर उस के लिए यह स्त्री जायज नहीं है जबतक कि किसी दूसरे पति से निकाह न करले l फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो फिरइन दोनों के लिए एक-दूसरे की ओर पलटआने में कोई दोष न होगा l’ 
इसे और स्पष्ट करने के लिए कुरआन में लिखा गया है –‘यह दूसरा पति यदि उसे छोड़ दे या उसकी मृत्यु हो जाए, तो यह स्त्री अपने पहले पति के साथ फिर से विवाह कर सकती है l ‘ इस आयत का अलग-अलग कोणों से अध्ययन करने के बाद मेरे मन में एक प्रश्न यह उठा कि अगर कुरआन में ऐसा कहा गया है, तो फिर दूसरे पति से निकाह के बाद उससे सहवास की बात कहाँ से आयी l हालाँकि कुरआन से इतर दूसरे धार्मिक ग्रन्थ जैसे हदीस में इसे क्यों और कहाँ जोड़ा गया कि औरत दूसरे शौहर के लिए उस वक़्त तक हलाल नहीं हो सकती, जब तक कि दूसरा शौहर उसके साथ न कर ले l अगर मैं एक आम मुस्लिम के नज़रिए से सोचूँ तो मेरे भीतर इस सवाल का उठाना स्वाभाविक है कि जब कुरआन में ऐसा कहीं है ही नहीं तो दूसरे पति से सहवास का क्या मतलब है l जहाँ तक हदीस की बात है और जितना मुझे पता है हदीस का आधार भी कुरआन ही है l अब हम यदि कुरआन को एक मुक्कदस आधार ग्रन्थ मानते हैं तो जो बात उसमें है ही नहीं वह कहाँ से आयी l जबकि इसके बरअक्स दूसरे ग्रन्थों में सहवास का न केवल उल्लेख किया गया है बल्कि एक आम मुसलमान को जिस तरह समझाने की कोशिश की गयी है, उसमें मर्दवादी सोच पूरी तरह निहित है l जैसे सैयद अबुल आला मौदूदी की एक पुस्तक में हलाला के बारे में कहा गया है – नबी सल्लाहेवलेअस्ल्लम  ने साफ़ कहा है कि हलाला के लिए केवल दूसरा निकाह ही काफी नहीं है, बल्कि औरत उस वक़्त तक पहले शौहर के लिए हलाल नहीं हो सकती, जब तक कि दूसरा शौहर उससे सहवास का स्वाद न चख ले l इसी तरह मैंने एक पत्रिका इसलाहे समाज में पढ़ा था कि...दूसरा शौहर उससे सहवास का मज़ा ना चख ले l 
अब आप देखिए कि कुरआन की मूल आयात का अर्थ एक पुस्तक से होता हुआ एक  रिसाले तक आते-आते कितने चटखारे और मसालेदार हो गया ? मेरी नज़र में इस रस्म को घृणित और एक तरह से पूरी तरह स्त्री विरोधी उसके बाद के इन अर्थों और व्याख्याओं ने बना दिया है l चूंकि हमारा आम समाज और आम नागरिक अपने धार्मिक दानिशवरों पर बहुत भरोसा करता है इसलिए जब स्वाद और मज़ा उन तकसंप्रेषित होते हैं , उनके मायने और सलीके भी बदल जाते हैं l एक लेखक होने के नाते मैंने अपनी बात बिना किसी उत्तेजना और उकसावे के स्त्री के हक़ में कही है l
7. अधिकांश लेखक दूसरे की प्रथा पर लिखने से बचते हैं आपको नहीं लगा कीकुछ गलत लिख दिया तो...!!
-आपने सही कहा है कि कोई भी लेखक दूसरे की प्रथा विशेष कर धार्मिक प्रथाओं पर लिखने से बचता है और बचना भी चाहिए l मगर यह इस पर निर्भर करता है कि ऐसा विषय चुनते हुए उसकी मंशा और नीयत क्या और कैसी है l ऐसा ही सवाल कई पाठकों ने मेरे दूसरे उपन्यास ‘बाबलतेरा देस में’  को पढ़ने के बाद उठाया था l इस उपन्यास में भी ऐसे मुद्दों को उठाया गया था l इस बारे में मेरा कहना यह है कि मुझे बचना या डरना तब चाहिए जब मैं दूसरे मज़हब या धर्म को आहत कर रहा हूँl आप ‘हलाला’ को पढ़ कर थोड़ी देर के लिए सहमत या असहमत तो हो सकते हैं लेकिन मेरी बदनीयती पर सवाल नहीं उठा सकते l हाँ, अगर मुझे सिर्फ़ विवादास्पद होना होता, या मुझे कुछ हासिल करना होता तो शायद यह बात लागू होती l ऐसी कोई मंशा मेरी न तो ‘बाबल तेरा देस में’लिखने के दौरान थी, न ‘हलाला’ लिखने के दौरान l सनसनी पैदा करने की नीयत से लिखी गयी किसी भी कृति या रचना की उम्र बहुत छोटी होती है l अच्छी रचना वही है जो पाठक को भीतर से बेचैन करे,ना कि मज़े लेने के लिए लिखी जाए l हाँ, कभी-कभी तब डर-सा लगता है जब कुछ लोग इसे अपनी निजता और धार्मिक मामलों में दखल समझ कर लेखक पर सवाल उठाते हैं कि लेखक को इस्लाम की क्या समझ है lमैं मानता हूँ कि समझ नहीं होगी मगर कोई धर्म या धार्मिकता मनुष्यता से तो ऊपर नहीं है l लेखक का एक दायित्व यह भी होता है कि वह निरपेक्ष हो कर अपने विवेकानुसार गलत और सही में फ़र्क करे l किसी एक का पक्षकार होना भी कभी-कभी उसके लिए घातक सिद्ध हो सकता है l गलत और सही का आकलन खुद लेखक से बेहतर और कौन कर सकता है l
8. क्या आप को पता है कि हज और जमात में बहुत अंतर है?
- आपने पूछा है कि क्या आपको पता है कि हज और जमात में बहुत अंतर है l आपका सोचना एक हद तक बहुत सही है और ईमानदारी से कहूँ, तो सचमुच मुझे हज और जमात में क्या अंतर है, नहीं पताl मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि ‘हज ’मुसलमानों का एक ज़ियारत अर्थात तीर्थ-स्थल है l मक्का मदीना स्थित अल्लाह काबा (घर) है जिसके दर्शन का हर मुसलमान इरादा रखता है l वैसे ‘हज’ का मतलब ही इरादा करना होता है l ‘हज’यानी इरादा करना, वास्तव में आदमी कीओर से इस बात का एलान करना है कि उसका प्रेम और श्रद्धा, उसकी इबादत और बंदगी सब कुछ अल्लाह के लिए ही है l ‘हज’ का मूल उद्देश्य यह है कि इंसान अल्लाह की चाह में उन्मत्त हो कर अपना सब कुछ उसकी राह में लगा दे l वास्तव में यह मूल उद्देश्य केवल हज का ही नहीं है बल्कि सभी धर्मों के तीर्थ-स्थलों का है l इस‘मूल’ की अवधारणाएँ इतनी व्यापक हैं कि अगर मनुष्य इन्हें सच्चे मन से धारण करले, तो आज हमारे समाज में जिस तरह की धार्मिक असहिष्णुता घर कर गयी है, वह शायद हमें देखने को न मिले l दरअसल, यह धारण करना ही धर्म कहलाता है l 
अब आता हूँ  ‘तबलीग़ जमात’  पर l अरबी क़में तबलीग़ शब्द का अर्थ होता है ‘किसी के पास कुछ पहुँचाना’, ‘धर्म का प्रचार करना ’या‘ दूसरों को अपने धर्म में मिलाना’ l यहाँ यह एक बड़ा प्रश्न है की तबलीग़ आन्दोलन मुस्लिम मिशनरी है या मुस्लिम धर्म का पुनर्जीवन आन्दोलन l इसी पर अपनी समझ और जानकारी के मुताबिक़ कुछ रोशनी डाल सकता हूँ l शायद आपको यक़ीन न हो, या आपको इसमें कुछ अतिश्योक्ति लगे, मगर आपको सुनकर हैरानी होगी कि तबलीग़ जमात की शुरुआत 1926 में मेरे मेवात से ही हुई और इसके प्रवर्तक और प्रेरक थे मौलाना मौहम्मद इलियास खंडालवी (1885-1944) l वही तबलीग़ जमात जो आज हर मुसलमान के लिए मानो उसकी धार्मिक अनिवार्यता और जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है l मौलाना इलियास ने एक नारा दिया दिया था -ऐ मुसलमानो मुसलमान बनो ! हालांकि तबलीग़ की  स्थापना मौलाना इलियास द्वारा 1920 में की गयी थी l मगर इसकी जड़ें 19 वीं शताब्दी के उत्तर्राद्ध में इनके वालिद मोहम्मद इस्माइल ने बंगले वाली मस्जिद, हज़रत निजामुद्दीन, नई दिल्ली में जमा दी थीं l मौलाना इलियास 1923 ने मेवात के नूहं में मदरसा मोइनुल इस्लाम की स्थापना की l 1926 में तबलीग़ जमात का पहला जत्था सहारनपुर के मौलाना खलील अहमद के नेतृत्व में आया l इस जत्थे ने स्थानीय लोगों की मदद से नूहं क़स्बे में एक सम्मेलन का आयोजन किया था l हज़ारों की तादाद वाले इस सम्मलेन में लोगों से हिन्दू-रीति-रिवाजों को त्यागने और मुस्लिम क्रियाकलापों को अपनाने तथा पूरे मेवात में तबलीग़ आन्दोलन को फैलाने की अपील की गयी थी l मेवात के मेव मुसलमानों से यह अपील इसलिए की गयी थी की यहाँ के मेव मुसलानों की धार्मिकता आधी हिन्दू रीति-रिवाजों पर आधारित थी, तो आधी मुस्लिम रीति-रिवाज़ों पर l यहाँ तक कि उस समय के पुरषों के नाम हिन्दू नामों से प्रेरित थे, जैसे हरिसिंह, धनसिंह, चांद सिंह, लालसिंह आदि l इस तरह तबलीग़ जमात के मेवात से शुरुआत का एक कारण यह भी हो सकता है l लेकिन सूफ़ी इस्लाम सबसे बेहतर है जो तब्लीगी जमात से पहले से भारत मे है जिसके अनुयायी पूरी दुनियां में शांति, सौहार्द की बात करते है।
9. आपने जिन जिन पात्रों का उपन्यास में उल्लेख किया है क्या वह काल्पनिक है या वास्तविक ?
-किसी भी रचना के चरित्र या पात्र वास्तविक और काल्पनिक दोनों होते हैं l बल्कि कहना होगा कि कोई भी पात्र न तो अपने आप में पूरी तरह काल्पनिक होता है,ना पूरी तरह वास्तविक जो पात्र वास्तविक जीवन से लिए गये होते हैं, उनमें लेखक अपनी कल्पना और लेखकीय कौशल इतना विश्वसनीय और प्रामाणिक बना देताहै कि एक पाठक के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है वह कितना काल्पनिक है और कितना वास्तविक l यही बात उन काल्पनिक पात्रों पर लागू होती है l एक लेखक निजी अनुभवों और पात्रों के मिश्रित अनुभवों से अपने इन काल्पनिक पात्रों को अपनी कल्पना शक्ति से इतना जीवंत और प्रामाणिक बना देता है कि पाठक को लगता है मानो ये पात्र यहीं कहीं उसके आसपास खड़े हैं l यह एक लेखक की कल्पनाशीलता और लेखकीय कौशल पर निर्भर करता है कि वह अपने इन पात्रों को कितना और किस तरह जीता है, या कहिए उनको किस हद तक आत्मसात करता है l यह आत्मसात करने की चुनौती तब और बढ़ जाती है, जब उसने अपने किसी पात्र से। ज़िन्दगी में कभी मुलाक़ात ही ना की हो l बल्कि दूसरे धर्म व स्त्री पात्र और पुरुष पात्रों के मनोविज्ञान को व्यक्त करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है l यह चुनौती स्त्री व पुरुष दोनों लेखकों के लिए सामान होती है l मैं यह बात सिर्फ़ ‘हलाला’ केसन्दर्भ में नहीं, बल्कि मेरी सभी रचनाओं के पात्रों पर लागू होती है l आप कल्पना कर सकते है कि एक लेखक अपने पूरे जीवनकाल की अपनी कितनी रचनाओं के कितने काल्पनिक और वास्तविक पात्रों को एक साथ जीता होगा l इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि एक लेखक के असंख्य पात्रों से गुज़रते हुए हम पात्रों के नहीं बल्कि एक लेखक के अनेक रूपों और व्यक्तित्वों से भी गुज़रते हैं l यह आशा-निराशा ख़ुशी-गम, नैराश्य-कुंठा, चतुराई-चालाकियाँ, घात-प्रतिघात पात्रों की नहीं स्वयं लेखक की होती हैं l अब एक लेखक अपने पाठकों को अपने लेखकीय कौशल से उलझाता या भ्रमित करता है, तो यह उसकी सबसे बड़ी सफलता है l