गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

कोरोना महामारी में एएमयू के छात्र-छात्राओं ने कैसे रखा गरीबो का ख्याल- अकरम क़ादरी

एएमयू के बारे में चाटुकार मीडिया ने आपके ज़हन और दिल मे जो इमेज बनाई हो लेकिन हमने हमेशा उनको जवाब दिया है उनकी नफरतों का भंडाफोड़ भी किया है और उनके मंसूबो को नाकाम भी किया है और आगे भी इंशाअल्लाह करेंगे....हमने नफरतों का जवाब मोहब्बत से देकर यह साबित किया है कि जंगे आज़ादी से लेकर हम इस देश के वफादार थे, वफादार है वफादार रहेंगे जिसको जो सोचना है सोचे हमे फ़र्क़ नहीं पड़ता है देश मे जितनी भी इंसानी या आसमानी परेशानियां आये हम अपने मदद के हाथ कभी भी रोकेंगे नहीं ....नफरती चिंटूओ को जो लिखना है लिखे यहां हर मज़हब और धर्म के लोग पड़ते और नफरतों से लड़ते है .....आज पूरी दुनिया मे कोरोना महामारी ने विकराल रूप ले लिया है फिर एएमयू तलबा की दर्ज़नो ऑर्गनाइजेशन गरीब, बेसहारा, मज़दूरों और रिक्शा चालकों की मदद करने के लिए अपनी जान को जोखिम में डालकर हर तरह की मदद पहुंचा रही है..हमारी सत्ता और उनकी गोदी मीडिया से हज़ारों मतभेद है लेकिन हमने कभी संविधान और इंसानियत से मुंह नहीं मोड़ा जब भी देश को हमारी ज़रूरत महसूस हुई तो हमने उनका साथ दिया जो लोग पढ़े-लिखे है वो एएमयू के हवाले से गांधी जी को पढले मौलाना आज़ाद को पढ़ ले समझ जाएंगे हमारी तारीख और हमारा काम ....हम ही वो अलीगढ़ है जिन्होंने जामिया जैसी यूनिवर्सिटी दी राजा महेंद्र प्रताप सिंह जैसा नेता दिया ... और ना जाने कितने देश और विदेशों को नेता दिए जिन्होंने अपने मुल्कों का नेतृत्व किया .....आज एएमयू के लड़के अलीगढ़ में जहां भी कोई गरीब, मज़दूर तकलीफ में होता है उसको हर तरीके से मदद कर रहे है उसके अलावा पूरी दुनिया मे फैले अलीग अपने अपने हिसाब से इंसानियत की मदद कर रहे है लोगो को बचाने की कोशिश कर रहे है ..... आपकी नॉलेज के लिए कुछ नाम बता रहा हूँ जिससे आपको मालूम हो कि अलीगेरियन ने कितना काम किया है मौजूदा महामारी से निपटने के लिए ...कितने चूल्हे जलवाकर इंसानों की पेट की आग बुझाई है.....फिर भी हमे कोई कुछ कहे... अलीगढ़ सबको  जवाब अपने तरीके से देता है......कुछ नाम दे रहा हूँ जो अभी काम कर रहे है अगर कुछ रह गए हो तो माफी चाहता हूं

-एएमयू कॉर्डिनेशन कमेटी
-MSO एएमयू यूनिट
-दारुल मुखलिसिन
-सोच
-रहबर फॉउंडेशन
-मेडिक्स
-वीर अब्दुल हमीद फेडरेशन
एएमयू रिलीफ कमेटी

अकरम हुसैन क़ादरी
रिसर्च स्कॉलर
एएमयू

सोमवार, 30 मार्च 2020

महामारी छोड़ो, नेतागिरी चमकाओ बस -अमान अहमद


महामारी में भी अपनी राजनीति चमका रहे हैं नेताजी..
 ऐसी महामारी के वक्त में पार्टी नेता लोगों की मदत कर रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन कुछ पार्टी नेता अपनी राजनीति भी चमका रहे हैं। खाने के डिब्बों पर भी अपनी पार्टी का प्रचार करने से नहीं चूक रहे हैं। उनका ये तरीका बहुत अफसोसजनक है। नेता गरीबों को जरूरत का सामान देने के दौरान पार्षदों और ग्राम प्रधानों को साथ लेकर चल रहे हैं। पार्षद और ग्राम प्रधान भी ऐसे लोगों को खाने पीने का सामान दिलवा रहे हैं , जो पहले से ही सम्पन्न हैं, और जिन्होंने उनको वोट दिया था। जबकि खाने पीने का सामान उनको मिलना जरूरी है जो दो वक्त का खाना जुटा नहीं पाते हैं। शहरों में पार्षद और गांव में प्रधान , अपनी मर्जी से लोगों का चुनाव करके लोगों की आईडी प्रूफ ले जाता है औऱ उनके नाम की लिस्ट नेता जी को सौंप देते हैं। और पैकिट उनके नाम से आ जाते हैं। मैं अपने ही इलाके का वाक़या आपको बताता हूँ। कल एक नेता जी मेरे इलाके में आये और कुछ ज़रूरत का सामान देकर चले गए। उन्होंने ये तक नहीं देखा कि समान जरूरतमंद लोगों तक पहुंच पायेगा कि नहीं। मैंने अपनी आंखों से देखा कि सुखी और सम्पन्न लोग समान के पैकिट ले जा रहे थे और गरीब लोग उनका मुंह ताक रहे थे। और अपना नाम बड़ी उत्सुकता से लिस्ट में देख रहे थे। एक पार्षद उनसे झूट बोलते हुए समझ रहा था कि ये लिस्ट सरकार की तरफ से आई है। इसमें आपका नाम नहीं है। गरीबों को क्या ख़बर की खाने का सामान किसने भेजा है। इस घटना को देखकर मेरा दिल बहुत दुःखी हुआ। क्या फायदा है ऐसी मदत का।
इन नेताओं से ज्यादा बड़े देशभक्त हमारे देश के किन्नर हैं। जो दिल खोलकर लोगों की मदत कर रहे हैं। वो खुद जाकर अपने हाथों से जरुरतमंद तक खाने-पीने का सामान पहुंचा रहे हैं। उनकी नजरों में हर व्यक्ति एक समान है, वो लोगों के सम्मान का भी ख्याल रख रहे हैं। क्योंकि वो जानते हैं कि वो लोगों को भीख नहीं दे रहे हैं।आज  बहुत बड़ा फर्क नज़र आ रहा है किन्नर और नेताओं में। मेरी नजरों में किन्नर देश के सम्मानित इंसान हैं। जो देश हित में अपनी भूमिका बख़ूबी निभा रहे हैं।
मैं ऐसे नेताओं से दरखास्त करना चाहता हूँ कि अगर उनको गरीबों की मदद करनी ही है ,तो खुद अपने हाथों से करें। जिससे उनके आत्म सम्मान को कोई ठेस ना पहुँचे। और खाने-पीने का सामान जरूरत मंदों के हाथों तक सही से पहुंचे। वरना वो ये सब बन्द कर दें। गरीबों का बे बजह दिल न दुखाएं। क्योंकि वो भी एक इंसान हैं।😔😔
अमान अहमद
शोधार्थी
एएमयू हिंदी विभाग 

रविवार, 29 मार्च 2020

आनंदबिहार दिल्ली में भीड़ जमा करने का दोषी कौन- डॉ. आज़र खान

स्तब्ध हूँ 😥
वास्तविकता ये है कि सत्ता के मोह में फँसे देश के सत्ताधारियों को यह पता ही नहीं है कि जिस देश में उनका राज है, वहाँ की कितने प्रतिशत जनता अपना घर छोड़कर दूसरे शहरों में रहती है। इन्होंने सोचा दो ढाई सौ लोग होंगे, जो पैदल चलकर आ रहे हैं, उन्हें उन्हें घर पहुँचाकर उनकी हमदर्दी ले सकें। उन्हें ये भी नहीं पता जनता वहाँ कैसे रहती है ? क्या करती है ? कैसे कमाती है ? कैसे खाती है ? कैसे अपने परिवार पालती है। देश के मुख्यमंत्रियों को यही नहीं पता कि उनके राज्य के कितने नागरिक दूसरे या उनके राज्यों में मजदूरी करके कमाते खाते हैं। एक महाशय कुछ स्कूलों में मजदूरों के खाने का इंतज़ाम का भरोसा टीवी के माध्यम से दिलवाते हैं। उन्हें अगर ये पता होता कि हजारों की संख्या में कितने मजदूरों को टीवी देखने का समय मिकता है या कितने मजदूरों के पास टीवी है भी या नहीं, कितने के पास एंड्राइड फ़ोन है। कुछ चैनेल्स के माध्यम से उन्होंने एलान करवाकर ये समझ लिया सबके पास समाचार पहुँच गया। कितने 4 दिन से भूख से तड़प रहे हैं, ये सुध नहीं ली। साथ ही मकान मालिकों के दुर्व्यव्हार ने उन्हें पैदल घर की ओर प्रस्थान को मजबूर कर दिया। उन्हें इस बात की ख़बर नहीं थी कि घर परिवार छोड़कर दो-दो पैसे की ख़ातिर दूसरे शहरों में पड़े रहते हैं, अपना और परिवार का पेट भरने की ख़ातिर। अगर पता होता तो ये लॉकडाउन इतनी देरी से नहीं 10 दिन पहले ही किया जाता, वो भी सभी मजदूरों को उनके घरों में पहुँचाकर, अगर पता होता तो हिंदू-मुस्लिम, भारत-पाकिस्तान न करके इनकी नौकरी का बंदोबस्त किया जाता, अगर पता होता तो CAA और NRC के तहत दूसरे देशों के नागरिकों नागरिकता देने और अपने देश नागरिकों से नागरिकता लेने संबंधी कानून नहीं पास कराए जाते। ऐसे कानून बनाए जाते, जिनसे हर राज्य के नागरिक बेरोजगार न रहें, दूसरे शहरों में काम न करके मजदूर अपने घरों में रहें, कोई भूखा न रहे, कोई किसी को प्रताड़ित न करे, धार्मिक और जातिपरक या किसी तरह का भेदभाव न हो। लेकिन ऐसे करने से राजनीतिक रोटियाँ सेकने को नहीं मिलती। अचानक से लिये गए निर्णयों से हमेशा देश का नुकसान ही हुआ है। अब मुश्किल घड़ी में सत्तासीन कुछ कद्दावर नेताओं ने ख़ुद नज़रबन्द कर लिया है। जब गरीबों की सहायता करने का समय आया तो ये भूमिगत हो गए।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

खैरियत तो है ना! - मेराज अहमद


खैरियत तो है ना!

प्रतिदिन की भांति ही आज भी भोर में सैर के लिए साइकिल से निकला। विश्वविद्यालय में दाखिल होने वाले गेट का पहरुआ हमेशा की तरह ही चुपचाप एक तरफ के गेट को आधा खोलें बैठा था। उसने मुझे देखा मगर लगा कि वह आज अन्देखा कर रहा है। विश्वविद्यालय की सड़कों पर निकला सुबह वैसी ही थी जैसी अमूमन हर रोज की होती है।अंदर सब कुछ वैसे का वैसा ही जैसा हमेशा रहता था। इक्का-दुक्का सुबह की सैर वाले वही लोग भी वहीं मिले जो रोज जहां मिलते थे। एक नौजवान लड़का जो दिसंबर और जनवरी की भोर में भी सिर्फ आधी बांह की टी शर्ट पहने दौड़ लगाता मिल जाता वह भी मिला। मैंने आगे बढ़ते हुए निकलते हुए दिन के साथ वातावरण में प्रतिदिन की भांति ही धीरे-धीरे उठने वाली पंछियों की आवाजों को सुनने की कोशिश की… वैसे ही धीरे-धीरे शुरू होकर के पक्षियों की चहचहात बढ़्ती जा रही थी लेकिन ना जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा कि आज इस कलरव में उत्साह की ऊर्जा नहीं शोक का संगीत है। मेरी साइकिल के आगे की तरफ मुझे घसीटते हुए पहियों के साथ ले जाने में कोई कोर-कसर नही छोड़ रही थी, पर ना जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि सुबह में वातावरण की चमक फीकी पड़ती जा रही है। विश्वविद्यालय के निर्माता सर सैयद अहमद खान के घर के पीछे बने नए मैनेजमेंट डिपार्टमेंट को जाने वाली सड़क का छोटा गेट जो अक्सर अंदर से बंद होता आज वह खुला था। ठीक गेट के सामने प्राक्टर ऑफिस के वाहन में बैठे सुरक्षाकर्मी ने मुझे देखा तो मगर आज मुझे देखकर ना जाने क्यों नहीं मुस्कुराया ? बाकी अन्दर जाने वाली सड़क वैसी की वैसी ही थी लेकिन दोनों तरफ़ की क्यारियों में उगे पौधों पर खिले और खिलने की तैयारी मे बहुरंगी फूल सुस्त से लगे। भीतर भी अलग-अलग छोटे-छोटे टुकड़ों में सलीके से तराशे घास के मैदान ओस से भीगे हुए तो थे पर बूदों की चमक मध्यम थी। प्रतिदिन की भांति ही मेरे एक किनारे से दूसरे किनारे को तेज़ क़दमों नापते रहने के लगभग आधे घंटे बाद प्रतिदिन आने वाले लोग भी इक्का-दुक्का करके आने लगे। कुछ देर में कुछ एक को छोड़कर सभी पहुंच भी गए जो सब दिन आते थे। सलाम दुआ भी हुई लेकिन सब दूसरे दिनों की अपेक्षा खामोश चलते-फिरते, हल्की-फुल्की कसरत करते चुप-चुप और मुझे ना जाने लगातार ऐसा क्यों लगता रहा की सब बेहद उदास हैं।… पेड़ पौधे पर भांति भांति के फूल भी थे। कसरत से खिले हुए क्यारियों के चटक रंग के गुलाब सब सोये-सोये से थे। पूरब की ऊँची इमारत के पीछे सूरज का बड़ा दायरा दिखने लगा था, लेकिन उसमे वह बेताबी नहीं थी जो सारी क़ायनात में चमक बिखेरने के लिये होनी चाहिये थी। और तो और ! हाथ में पकड़े हुए बेंत को सड़क पर खट-खट बजाते लंबे-लंबे कदमों से आगे बढ़ते हुए 15 साल पहले रिटायर हुए प्रोफेसर ने भी सलाम के जवाब में बस इतना ही कहा, सब खैरियत तो है ना! मैनें  हमेशा की तरह आज न तो उनसे कुछ कहा न ही वह क्षण भर के लिये रुके जैसे रोज़ रुकते थे।

प्रोफेसर मेराज अहमद
कथाकार
उपन्यास - आधी दुनिया
अज़ान की आवाज़, घर के ना घाट के, दावत
Samay srujan


शुक्रवार, 6 मार्च 2020

सच्चे हिन्दू और कट्टर हिन्दू में फ़र्क़ - प्रोफ़ेसर अजय तिवारी

सच्चे हिन्दू और कट्टर हिन्दू में फ़र्क़- प्रो. अजय तिवारी
नयी शुरूआत
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दिल्ली के आयोजित-प्रायोजित सांप्रदायिक ‘दंगों’ के बाद नयी तस्वीर उभर रही है।

यमुना विहार के सुभाष मुहल्ला में एक शिवमंदिर पूरी तरह सुरक्षित रहा, इसकी ख़बरें और तस्वीरें आयीं । साथ ही यह प्रेरणादायी सच भी कि वहाँ ३३ साल से साथ रह रहे हिंदू-मुसलमानों ने मिलकर उस मंदिर की रक्षा की। हालाँकि यहीं तीन मस्जिदें तोड़ी गयी थीं।

लेकिन ज़्यादा महत्वपूर्ण बात दूसरी है। मंदिर में हिंदू-मुसलमान मिलकर भोजन पका रहे हैं और बिना भेदभाव के साथ खा रहे हैं।

इसकी शुरूआत हुई दंगों से प्रभावित लोगों के लिए राहत कार्य से। जैसे मुसलमानों की ओर से राहत का काम शुरू हुआ और वह बिना भेदभाव के सभी की मदद के लिए तत्पर है, वैसे ही हिंदुओं की ओर से भी राहत के काम में कोई भेदभाव नहीं है। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक है दोनों का मिल-जुल कर भोजन पकाना, वह भी मंदिर में, और दूसरों को बाँटने के अलावा स्वयं साथ-साथ खाना!

पुजारी अंचल शर्मा सुबह का पूजा-पाठ करते हैं, आसिफ़ खान और पत्नी नुसरत सहायता के कामों का ज़िम्मा सँभालते हैं। अंचल पण्डित की माँ आश्वस्त हैं कि यहाँ के सभी मुसलमान मंदिर के लिए जान दे देंगे लेकिन हममें से किसी को नुक़सान नहीं होने देंगे।

इस तरह के विश्वास और भाईचारे के उदाहरण दिल्ली के मौजूदा दंगों में पहले की घटनाओं से बहुत ज़्यादा मिले। लेकिन नयी बात मिली खान-पान में हिंदू-मुसलमान का अंतर मिट जाना— साथ बनाना और साथ खाना। हम विश्वास करते हैं कि यह नयी शुरूआत हमारे समाज के अंतर्गठन को मज़बूत करेगी और साझेदारी की ऐसी पहलकदमियाँ देश भर में बढ़ेंगी। सांप्रदायिकता, नफ़रत, वहशत और अविवेकपूर्ण हिंसा से हम अपने समाज और देश को तभी मुक्त कर सकेंगे।
—अजय तिवारी

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

दलित साहित्य महोत्सव के मायने ? - अकरम हुसैन

दलित साहित्य महोत्सव के मायने ? - अकरम हुसैन

दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में सम्पन्न हुए द्वितीय दलित महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ जिसमें दलित, आदिवासी, स्त्री एवं घूमंतु-अर्ध-घूमंतु समुदाय के साथ अल्पसंख्यक समुदाय पर साहित्यिक चर्चा हुई ।
 इस महोत्सव में वर्तमान सत्ता के द्वारा लगातार हो रहे असंवैधानिक हमलें पर गहरी चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम में शामिल वक्ताओं ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आखिर किस तरह डॉ.भीमराव अंबेडकर के संविधान को बचाया जाए और किस प्रकार से उपेक्षितों एवं वंचितों के अधिकारों की रक्षा की जाए और उनके पुनरुत्थान के लिए क्या किया जाएँ ?
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान की रचना कर हमारे देश के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए मिसाल कायम की | भारतीय संविधान मानवतावादी दृष्टिकोण पर आधारित होते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करता है इसलिए दुनिया का यह सर्वोत्तम संविधान माना जाता है | जिसमें हर वर्ग, पंथ, सम्प्रदाय यहां तक कि ट्रांसजेंडर के अधिकारों को भी इसमें शामिल किया गया है ।
इस अवसर पर हमें सबसे अच्छी बात यह लगी कि किसी पर भी आरोप-प्रत्यारोप नहीं मढ़ा गया बल्कि सकारात्मक परिवर्तनकामी सोच के साथ उपेक्षित एवं वंचित समाज को शिक्षा की तरफ कैसे अग्रसर किया जाए ? आयोजन में साहित्यिक, सामाजिक और राजनैतिक मसलों पर भी चर्चा हुई ।
दलित बुद्धिजीवियों ने समाज के विकास के कई ब्लूप्रिंट सामने रखें, जिसमे सबसे अहम है मानवता, इसमें मानवता एवं मानवतावादी मूल्यों पर चर्चा हुई क्योंकि ज्यादातर विद्वानों को यह महसूस हो रहा है कि समाज में साम्प्रदायिकता अपने नित् नए अनेक रूपों में सामने आ रही है जिसको रोकने के लिए शिक्षा ही कारगर हथियार के रूप में उपयोगी हो सकती है।
आयोजकों ने महोत्सव का प्रारम्भ संविधान की प्रस्तावना पढ़कर और वहां पर उपस्थित सभी बुद्धिजीवी और विद्वानों को हाथ उठाकर शपथ दिलाई कि हम सब लोग संविधान की रक्षा के लिए सदैव कार्य करते रहेंगे जिससे मानवीय मूल्यों की रक्षा हो सके ।
सबसे अधिक साधुवाद मैं उन आयोजको को प्रेषित करता हूँ जिन्होंने किसी भी संस्था, राजनैतिक दल या फिर पूंजीवादी वर्ग से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लिया बल्कि स्वयं मिलकर इस भव्य कार्यक्रम को कराया इसके पीछे आयोजको का सीधा सोचना है जिससे भी हम सहायता लेंगे तो उसकी बात भी मानना पड़ेगी और आने वाले समय में वो दबाब भी बना सकता है जो संविधान सम्मत नहीं है। इसलिए आपस में ही डोनेशन करके इतने भव्य समारोह का आयोजन सम्भव हो सका मुझे यह सुनकर बेहद प्रसन्नता हुई कि समाज के लिए जिस साहित्य का निर्माण हो रहा है उस साहित्य सम्मेलन को उसी के पैसे से किया जाए और जनता सोई हुई है जनता को उसके अधिकारों के लिए जागरूक किया जाये ।
दो दिन के इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रसिद्ध जनकवि बल्ली सिंह चीमा, प्रोफेसर विवेक कुमार, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, स्त्रीवादी लेखिका ममता कालिया, वरिष्ठ आलोचक चिन्तक प्रो. चौथीराम यादव, आलोचक एवं चिन्तक प्रो. कालीचरण स्नेही, प्रसिद्ध दलित साहित्यकार डॉ. जयप्रकाश कर्दम, प्रो. राजेश पासवान, प्रो. विमल थोराट, डॉ उर्वशी गहलोत, रमेश भंगी, एच. एल.  दुसाध, रजनी दिसोदिया, डॉ. मुकेश मिरोठा, डॉ. सुजीत कुमार, डॉ नामदेव, डॉ. नीलम और डॉ. बलराम सिंहमार जैसे अनेक साहित्य प्रेमियों ने महोत्सव की सफलता का मार्ग प्रशस्त कर दिया इसमें लेखन की दुनिया में उभरते हुए शोधार्थी, लेखक भी शामिल हुए जिन पर निकट भविष्य में साहित्य एवं संविधान को बचाने की ज़िम्मेदारी है | उन्होंने बुद्धिजीवियों के विचारों को सुनकर भविष्य के लिए अनेक रास्तों पर साहित्यिक माध्यम से शोषितों के अधिकारों के लिए जागृत करने का काम किया | इसमें पत्रकार डॉ. ओम सुधा, डॉ. राजेश माझी, धर्मेंद्र कुमार, हेमंत बौद्ध, तरन्नुम बौद्ध, डॉ धर्मवीर गगन, डॉ. बालगंगाधर बागी, डॉ. संतोष यादव, डॉ. बलराम बिंद निषाद, दिनेश कुमार 'दिव्यांश',  ईश्वर चंद्र, ज्ञानप्रकाश यादव, हरिकेश गौतम, दुर्गेश देव, शुभम यादव, मिथिलेश कुमार, सदानंद वर्मा, सुनील यादव, कल्याणी, कोमल रजक, मुकेश यादव, कुसुम सबलाणीयां उभरते हुए लेखक आशीष कुमार दिपांकर और कामिनी के साथ अन्य नाम लिए जा सकते है |
इस शानदार एवं अविस्मरणीय भव्य आयोजन के लिए आयोजक मण्डल में डॉ.नामदेव, डॉ. सूरज बड़त्या, डॉ. बलराज सिंहमार, डॉ. नीलम, डॉ.मुकेश मिरोठा, सुदेश तनवर, डॉ. अशोक कुमार, हेमलता कुमार, संजीव डांडा, प्रो. प्रमोद मेहरा एवं अशोक बंजारा के साथ अन्य सहयोगी भी साधुवाद के पात्र है | उम्मीद है आगे भी इसी प्रकार का भव्य आयोजन होता रहे | और भविष्य की संकल्पना निर्मित होती रहें |

जय भीम
जय मूलनिवासी

अकरम हुसैन
सहसंपादक
वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका

आंशिक सहयोग
आशीष कुमार दिपांकर भय्या की फेसबुक वॉल से


गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

एक पूरी कौम को आबादी से निकालने की कवायद है नागरिकता संशोधन अधिनियम- जावेद क़ादरी


देश के गृहमंत्री अमित शाह ने सोमवार को नागरिकता संशोधन अधिनियम को लोकसभा में प्रस्तुत किया जिसे लोकसभा में पूर्ण बहुमत ( 311 ) मत के साथ उस अधिनियम को संशोधित करने की अनुमति दी गई है। इसके बाद इस बिल को राज्यसभा से भी मंजूरी मिल गयी हैं। इस अधिनियम को लाने की वजह जो बताई जा रही है वो किसी भी स्तर पर उचित नहीं है।

ग्रहमंत्री का कहना था, कि 1947 में देश का बँटवारा धर्म के आधार पर हुआ था, और जब हम इस अधिनियम को धर्म के आधार पर लागू कर रहे हैं तो इन लोगो के पेट मे दर्द क्यों हो रहा है? ये दर्द इसलिए हो रहा है क्योंकि यह संविधान के ख़िलाफ़ है मानवता के ख़िलाफ़ है सिर्फ एक समुदाय को टारगेट किया जा रहा है।

सांसद में सभा को संबोधित करते हुए देश का ग्रहमंत्री झूठ बोलता है और वहाँ बैठे तमाम लोग और स्पीकर चुपचाप तालियां बजाकर इस झूठ का साथ देते हैं, जो निंदनीय है। झूठ ये बोला गया कि पाकिस्तान और बांग्लादेश की अल्पसंख्यक जनसंख्या की प्रतिशत में गिरावट जैसे, 1947 में बांग्लादेश में 22% अल्पसंख्यक लोग रहते थे, जो 2011 में सिर्फ 7.8% बचे तब वाकी के लोग कहाँ गए?

सबसे पहले मैं यह बात साफ करदूँ कि बांग्लादेश 1947 में नहीं बल्कि 1971 में बना था इससे पहले इसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। अब बात करते हैं अल्पसंख्यक जनसंख्या में इतनी गिरावट कैसे आई तो बुद्धिजीवियों इतना तो आप लोग जानते होंगे कि जब जनसंख्या बढ़ती है तब प्रतिशत में भी गिरावट आती है। बांग्लादेश की आबादी 1947 में 4,00,00,000 (4 करोड़) थी जिसमें 88 लाख लोग अल्पसंख्यक थे। जब इसका प्रतिशत निकलेंगे तब 22% आएगा ।

2011 में बांग्लादेश की आबादी 4 करोड़ से बढ़कर 16 करोड़ के आसपास आ गई, और अल्पसंख्यकों की संख्या 88 लाख से बढ़कर 1,28,70,000 (1.30 करोड़) के आसपास पहुँच गई और जब हम इसका प्रतिशत निकालेंगे तो यह 7.8% आएगा।

भारतीय संस्कृति कहती है कि वासुदेव कुटुम्बकम यानी पूरी दुनिया मेरा परिवार है। लेकिन देश का गृह-मंत्री एक ऐसा विधेयक लेकर आता है कि जो पीड़ित और असहाय लोगों में भी धर्म के नाम पर भेद करता है। सवाल यह है कि नए क़ानून के वजूद में आने से जैन, बोद्ध, पारसी, सिंधी, हिंदू, सिख, ईसाई, को तो नागरिकता मिल जाएगी लेकिन म्यांमार, मालदीव, श्रीलंका से आए शरणार्थियों का क्या किया जाएगा?

यह नागरिकता संशोधन अधिनियम सिर्फ एक समुदाय को सताने के लिए लाया जा रहा है। CAB के ज़रिए पूरे देश से एक पूरी कौम को आबादी से निकालने की कवायद शुरू करदी गई है। मुसलमानों को खुले-आम गालियाँ दी गई वह शाँतं रहा। गाय के नाम पर मोब-लिंचिग की गई पर वह शांत रहा। मुसलमान अयोध्या और कश्मीर पर भी शांत रहा मुसलमानों द्वारा मुसलमानों से शांति बनाए रखने की अपील की गई। पर मुझे नहीं लगता की की अगर उससे उसका घर उसका वतन छीनोगे तो वह शाँत रहेगा हम और आपको सड़कों पर आकर आन्दोलन करना चाहिए। जब JNU के छात्र फ़ीस को लेकर सड़कों पर आँदोलन कर सकते हैं तो तुमसे तो तुम्हारा घर तुम्हारा वतन छीनने की तैयारी चल रही अब नहीं निकलोगे तो कब निकलोगे?

आज फिर मुझे अकबरुद्दीन ओवैसी की वो बात याद आती है कि ऐ मुसलमानों तुम्हारी तबाही और बर्बादी के नापाक़ मंसूबे और कानून की शक्ल में और कहीं नहीं बल्कि देश की संसद में बनाए जाते हैं। इसलिए मुसलमानों तुमको भारी तादाद में सियासत में हिस्सा लेना पड़ेगा।

हिजरत न की तो लोगो ने गद्दार कह दिया
ए मुल्क़ हम तो तेरी मोहब्बत में मर गए

 *Written by
Mohammad Javed Alig

Mohammad Javed is an Independent freelance Journalist, based in Delhi. He actively writes on socio-political and human rights issues of the country. He is Post-Graduate in Media.
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