गुरुवार, 14 मई 2020

विकलांगता के दायरे से बाहर किन्नर-विमर्श - डॉ. भारती अग्रवाल

विकलांगता के दायरे से बाहर किन्नर विमर्श  डॉ. भारती अग्रवाल
लॉकडाउन ने शारारिक दूरी को बढ़ावा तो दिया है पर सामाजिक दूरी को कम कर दिया है। इस समय हम सोशल मीडिया के द्वारा अधिक जुड़ाव महसुस हो रहा है। लगातार साहित्यिक विषयों की चर्चा ने सोशल मीडिया को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। वाङमय पत्रिका से सम्पादक फ़िरोज भाई ने दस दिन की वेब संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी के केन्द्र में किन्नर विमर्श रहा। अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने इस विषय पर अपने विचारों से अवगत कराया। दिल्ली विश्वविद्यालय की साहयक प्रोफेसर डॉ. भारती अग्रवाल ने किन्नर विमर्श पर बात रखते हुए यह साफ किया कि किन्नर को किसी भी तरह यौन विकलांग नहीं कहा जा सकता। यद्यपि फेस बुक पर अनेक व्याख्यान माला चल रहीं हैं जहाँ किन्नरों को यौन विकलांग कहा जा रहा है तथा उन्हें यौन विकलागंता की श्रेणी में ऱखने की बात की जा रही है। चित्रा मुदगल अपने उपन्यास नाला सोपारा में भी यौन विकलांगता का जिक्र करती हैं जबकि स्वयं किन्नर वर्ग इस विकलांगता को सिरे से खारिज करते हैं। साथ ही किसी भी तरह के विकलांग आरक्षण का विरोध करते हैं।
किन्नर विकलांग हैं या नहीं इस स्थिति को समझने के लिए हमें अंग्रेजी के एल. जी. बी. टी. आई. क्यू को समझना होगा। भारतीय समाज में इस टर्म के लिए एक शभ्द है हिजड़ा या फिर किन्नर। इसे अंग्रेजी के टर्म से ही समझा जा सकता है। सब जानते ही होगें कि एल. माने लेस्बियन जी. माने गे बी. माने बॉयोसेक्सुल आई. माने इंटरसेक्स। यह इंटरसेक्स समाज में उलझा हुआ है। इंटरसेक्स का अर्थ होता है वह प्राणी जो एक साथ दो जनांगों को ग्रहण करता है अथार्त वह शुक्राणु और अंडकोश साथ-साथ ग्रहण करता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जैसे किसी व्यक्ति का होंठ कटा हो या ऊपर का होंठ नाक से मिला हो तो उसे हम विकलांग नहीं कह सकते। इसी प्रकार इंटरसेक्स को भी विकलांग नहीं कह सकते। गूगल की एक रिपोर्ट के अनुसार दो हजार में से एक व्यक्ति इंटरसेक्स होता है।
                                   साहयक व्याख्याता डॉ. भारती अग्रवाल ने किन्नरों के बारे में फैले अंधविश्वास का निराकरण करने की भी कोशिश की। उन्होंने कहा जब तक किन्नर समाज जन-साधरण से सम्पर्क नहीं साधेगा यह अंधविश्वास दूर नहीं हो पायेंगें। सबसे बड़ी भ्रांति किन्नरों की मृत्यु को लेकर है। ऐसा माना जाता है कि जब किन्नर की मृत्यु हो जाती है तो उसके शव को सफेद कपड़े में बाँध कर क्रॉस पर लटका दिया जाता है फिर शव को जूतियों से मारा जाता है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। किन्नर भी हमारी तरह इंसान होते हैं। इनकी भी भावनाएँ होती हैं। सुख-दुख होता है। ऐसी स्थिति में किसी के शव को भी किस तरह लटकाया जा सकता है या फिर जूतियों से मारते हुए ले जाया जा सकता है। यदि किन्नर अपने परिवार से जुड़े होते हैं तो शव किन्नर के परिवार को सौंप दिया जाता है फिर परिवार अपने धर्म, रीति-रिवाजों के अनुसार दाह-संस्कार करता है या दफनाता है। यदि किसी का परिवार किन्नर को नहीं अपनाता तो किन्नर के गुरु की जाति, धर्म के अनुसार उसका क्रिया-कर्म किया जाता है।
                                 किन्नर समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए सबसे पहले परिवार को आगे आना होगा। जब तक परिवार अपने बच्चों को नहीं अपनायेगा तब तक कुछ भी सुधार संभव नहीं। जितने प्रतिष्ठित किन्नर हैं अधिकतर सभी को परिवार का सहयोग प्राप्त है। जब परिवार बच्चे को समाज की दृष्टि से देखना शुरु करता है विडम्बनाएँ और त्रासदियाँ वहीं से शुरु हो जाती हैं। बच्चा खुद को एलियन समझने लगता है। उसे परिवार और समाज से शारारिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इन सब से तंग आकर वह स्वयं घर छोड़ कर चला जाता है। ऐसी स्थिति में उनके पास केवल तीन काम बचते हैं। बधाई, नेग, नाच-गाना, भीख माँगना, शेक्स वर्कर के रुप में काम करना। यदि इन पारम्परिक कार्यों से बाहर हमें किन्नर समाज को देखना है तो आगे आकर हाथ बढ़ाना होगा।
            फेसबुक लाइव में प्रिंसिपल डॉ. तनवीर अहमद, डॉ. इरशाद हुसैन, डॉ. मुस्तकीम, डॉ. विजेंद्र, डॉ. अनवर हुसैन सिद्दीकी वर्धा, डॉ. लवदेश दत्त, अंजू गुप्ता, श्रेया अग्रवाल, डॉ. लता अग्रवाल, डॉ. विजेन्द्र प्रताप सिंह, विजय अग्रवाल, डॉ. शमीम, माई मनीषा महंत, डॉ. संध्या गर्ग, अनिल अग्रवाल, डॉ. फिरोज़ अहमद,अनुसंधान पत्रिका की संपादक डॉ. शगुफ्ता नियाज़ बहुत से शोधार्थी तथा वाङमय पत्रिका के सहसंपादक अकरम हुसैन के साथ अनेक देश विदेश से लोग लाइव हुए। फिरोज़ भाई का यह काम अत्यंत सराहनीय है।
                       इस प्रोग्राम को लाइव सुनने के लिए भी vangmya ptrika hindi के पेज पर लाइव सुना जा सकता है और यूट्यूब पर AKRAM HUSSAIN QADRI के चैनल को सब्सक्राइव करके भी दोबारा इस कार्यक्रम को सुना जा सकता है।

https://youtu.be/if36_ps2Bw4
सुनिए दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद विद्यालय की डॉ. भारती अग्रवाल को जिन्होंने किन्नर विमर्श को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयत्न किया है.... 
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बुधवार, 13 मई 2020

लैंगिकता नहीं मानवता को तरजीह दे समाज - गौरव तिवारी

लैंगिकता नहीं मानवता को तरजीह दे समाज- गौरव तिवारी

किन्नरों की विपन्न स्थिति का कारण उनकी लैंगिक विकलांगता है। जिस प्रकार स्त्री को उसकी उस यौनिक पहचान से जो उसे हम , बिस्तर, मनोरंजन या सेवा की वस्तु मात्र समझती थी, से मुक्त करके समाज की मुख्य धारा में लाया गया उसी प्रकार किन्नरों को उनकी लैंगिक विकलांगता के दायरे से निकालकर देखने से ही उनकी स्थिति में सुधार किया जा सकता है।समाज और सरकार द्वारा उन्हें अगर लैंगिक विकलांग के रूप में देखा जाय तो उनके प्रति संवेदनशीलता के साथ न्याय किया जा सकता है। उक्त बातें वाङ्गमय प्रकाशन की अनुसंधान पत्रिका के फेसबुक पृष्ठ पर आयोजित व्याख्यानमाला के अंतर्गत "त्रासदी की संवेदना अर्थात किन्नर जीवन" पर बोलते हुए बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर के डॉ गौरव तिवारी ने कहीं। 
उन्होंने कहा कि किन्नरों को जीवन एक बंद समाज का जीवन है। बंद समाज के बारे में शेष समाज के लोगों में अनेक शंकाएं, जिज्ञासाएँ और अफवाहें होती हैं। जबतक इस समाज के विविध पहलुओं पर समाज में संवेदनशील चर्चा नहीं होगी, तबतक इस समाज को ठीक से समझा नहीं जा सकेगा। किन्नरों पर आई कविताएं, उपन्यास और कहानियां और उनकी समीक्षाएँ इस दिशा में सकारात्मक माहौल के निर्माण का कार्य कर रही हैं।
डॉ गौरव ने कहा कि किन्नर जीवन जबतक अपनी यौनिक विकृति को अपनी पहचान बनाकर ढोता रहेगा तबतक वह इससे मुक्त नहीं हो सकता।  इनकी यौनिक विकृति के अतिरिक्त शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विशिष्टता सामान्य मनुष्यों के समान होती है। लेकिन ये अपनी शेष सभी विशिष्टताओं को इस विकलांगता या विकृति से मुक्त नहीं कर पाते इसीलिए यह समस्या बनी हुई है।
डॉ गौरव ने किन्नरों के समाज के विविध पहलुओं की भी चर्चा की और बताया कि रामायण और महाभारत काल में भी अपनी उपस्थिति दर्शाता हुआ यह समाज अपनी भावनात्मक संवेदनशीलता के बावजूद आज प्रायः नकारात्मक निगाहों से इसलिए देखा जाता है क्योंकि इनमें से एक वर्ग अपनी उजड्डता और उत्शृंखलता को अपना अधिकार समझ बैठा है। और इसे अपने रोजगार से जोड़ रहा है।
अपने व्याख्यान में डॉ गौरव ने तीसरी ताली और पोस्ट बॉक्स नम्बर 203 नाला सोपारा को एक दूसरे के पूरक उपन्यास के रूप में पढ़ने की बात की और कहा कि तीसरी ताली में जहाँ  किन्नरों की ऐतिहासिकता से लेकर उनके जीवन, संघर्ष उनके प्रेम, झगड़े, उजड्डता , गद्दी, पीठ, संगठन आदि प्रायः प्रत्येक पहलुओं पर चर्चा हुई है वहीं नाला सोपारा में इस समस्या से मुक्ति के उपायों को तलाशने का प्रयास हुआ है।
व्याख्यान के आरम्भ में प्रसिद्ध आलोचक प्रो नन्द किशोर नवल जी के दुःखद निधन पर वक्ता, वाङ्गमय प्रकाशन और अनुसंधान पत्रिका की ओर से शोक संवेदना व्यक्त किया गया।
फेसबुक लाइव में  डॉ. लवलेश दत्त, 'अनुसंधान' पत्रिका की संपादक डॉ. शगुफ्ता नियाज़, एएमयू हिंदी विभाग के प्रोफेसर मेराज अहमद,  प्रोफेसर कमलानंद झा एवं डॉ. शमीम, डॉ. ए. के पाण्डेय, प्रिंसिपल तनवीर अहमद, विकास प्रकाशन कानपुर के पंकज शर्मा, डॉ. रमाकांत राय, डॉ. लता अग्रवाल, डॉ. रमेश कुमार, माई मनीषा महन्त जी, मनीषा गुप्ता,  बहुत से शोधार्थी तथा वाङ्गमय पत्रिका के सहसंपादक अकरम हुसैन, के साथ साथ देश विदेश के  अनेक रचनाकर इस फेसबुक लाइव में शामिल हुए 
इस प्रोग्राम को लाइव सुनने के लिए भी vangmya ptrika hindi के पेज पर जाकर लाइव सुना जा सकता है और यूट्यूब पर AKRAM HUSSAIN QADRI के चैनल को सब्सक्राइब करके भी दोबारा इस कार्यक्रम को सुना जा सकता है

https://youtu.be/NUtoVISU-2Q
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महामारी में कैसे रच दी पांच पुस्तकें- शाबान ख़ान

 
कासगंज: मुझे एक मित्र ने बताया कि एक अध्यापक ने इस लॉकडाउन में पांच किताबें लिख डाली। मुझे सुनकर हैरत हुई कि ऐसे नकारात्मकता भरे माहौल में कोई लेखन कर सकता है? वो भी साहित्यिक! ज़ाहिर है कि किताबें लिखना अथवा रचना करना कोई सहज काम नहीं है। लेखन के विषय मे धारण यही है कि व्यक्ति जब अपार शांति में हो अथवा ह्रदय पर चोट खाकर घायल हो तभी वह सृजन कर सकता है। पर पांच किताबें लिखने की घटना से अनुभव हुआ कि "आह से निकला होगा गान" की पुरानी अवधारणा टूट रही है।
      बहरहाल मै स्वयं इस पर विचार करने लगा कि देश मे महामारी की भयावह स्थिति बनी हुई है, शरीर एक मुख़तसर कमरे में क़ैद है, कल्पनाएँ आज़ाद है और मन व्याकुल और व्यथित है। इन दिनों मैं चाहकर भी एक लेख न लिख सका। जब भी लिखने बैठता तो कारोना पॉजिटिव और मजदूरों के संकटों की खबरों से अशांत हो जाता। अशांति या पीड़ा से काव्य तो रचना जा सकता है परंतु उसकी समीक्षा नहीं की जा सकती है। पर जब चिंतन की गहराई में धंसा तो धस्ता ही चला गया और जब बाहर निकला तो साथ में कुछ सवालों के जवाब भी लेकर लौटा।
      क्या इस लॉकडाउन में हम अपना काम नहीं कर सकते? बिल्कुल कर सकते हैं। विद्यार्थी पढ़ाई कर सकते हैं, शोधार्थी अपना शोध प्रबंध लिख सकते हैं, इंजीनियर नई इमारत की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं, बॉक्सर नए स्किल डेवलप कर सकते हैं। मने कि हम सबकुछ तो कर सकते हैं। माना कि वर्तमान स्थिति में फुटबॉलर, फुटबॉल नहीं खेल सकता, क्रिकेटर क्रिकेट की प्रैक्टिस नहीं कर सकता, धावक अपनी रेस पूरी नहीं कर सकता। पर घर बैठकर विचार कर सकता है। बॉलर इस पर विचार करे कि बॉलिंग की लाइन कैसे सही करे और फुटबॉलर गोल करने की नई ट्रिक खोज सकता है। मतलब इस लॉकडाउन में बिना नियम तोड़े और बिना कानून भंग किए हर काम किया जा सकता है। विद्यार्थियों को अपने पिछले वर्ष के अंकों पर विचार करना चाहिये और जाने कि आख़िर कमी कहाँ रह गई थी? जिन विषयों में कमज़ोर हैं उन्हें ढंग से तैयार करें। पर हो इसके बिल्कुल विपरीत रहा है।
      लॉकडाउन में ज्यादातर कंपनियां घाटे में हैं या बंद होने के कगार पर है। पर टेलीकॉम कंपनियों के साथ ऐसा नहीं हैं उनकी स्थिति वही है जो पहले थी। इसका कारण है कि उपभोक्ताओं द्वारा इंटरनेट का अधिक प्रयोग किया जाना। लॉकडाउन के भूत से हम इस कदर डरे हुए हैं कि काम को एक किनारें रखकर दूसरे फ़िजूल के कामों में उलझ गए। अपने काम, पेशे या कर्तव्य से विमुख हो गए और मन को बहलाने के लिये इस तर्क का सहारा ले रहे है कि लॉकडाउन है घर से निकल नहीं सकते, स्कूल जा नहीं सकते, ऑफिस जा नहीं सकते। पर गौर करने वाली बात यह है कि हम अपने मुख्य पेशे या काम को छोड़कर दूसरे काम में ही लगे हैं। मसलन टाइम पास करने के लिये फिल्में देख रहे हैं, मोबाइल पर गेम खेल रहे हैं। लेकिन काम तो फिर भी कर रहे हैं, पर उस काम को छोड़कर जो हमारा मुख्य काम है या रोज़गार का साधन है। ये सब मध्यम वर्ग के साथ हो रहा है।
       मध्यवर्गीय समाज इस लॉकडाउन में हॉटस्टार, नेटफिलिक्स, ज़ी थ्री, यूट्यूब पर वेब सीरीज़ या फिल्में देख रहाहै। विद्यार्थियों का लेवल ही दूसरा है वो सामान्य स्थिति में भी अलग दुनिया में विचरण करते थे, आजकल तो दिन रात पबजी की फैंटेसी में खोए हुए हैं। इस लॉकडाउन में स्ट्रीमिंग, गेम और इन्टरटेंटमेंट की ऐप्स की डाउनलोडिंग में भारी बढोत्तरी दर्ज की गई है। भारत में इस ऐप का सब्सक्रिप्शन सबसे अधिक हुआ है। युवा पीढ़ी पहले ही मोबाइल पर चिपकी रहती थी, अब तो और अधिक डूबी हुई है क्यों?  स्कूल - कॉलेज और ऑफिस जाना नहीं है। पर क्या सच में इस लॉकडाउन में हम अपना काम नहीं कर सकते हैं? विचार करो तो रास्ते अवश्य निकल सकते हैं। लॉकडाउन हुआ है पर हाथों और मन पर बेड़ियां नहीं डाली गईं हैं, इसलिए लॉकडाउन का रोना मत रोइये बल्कि इस पर विचार करें कि हम अपना काम कैसे करें।
एम.शाबान ख़ान 
शोधार्थी (एएमयू अलीगढ़)
(लेखक के निजी विचार हैं)

मंगलवार, 12 मई 2020

थर्ड जेण्डर को मुख्यधारा में लाने के लिए समाज और निजी क्षेत्र को आगे आना होगा- डॉ. लवलेश दत्त

थर्ड जेण्डर को मुख्यधारा में लाने के लिए समाज और निजी क्षेत्र को आगे आना होगा- डॉ. लवलेश दत्त
https://youtu.be/9ww_2vuj3Mo (फेसबुक लाइव पूरा सुनने के लिए इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक कीजिए)


लॉकडाउन के चलते सभी प्रकार के साहित्यिक क्रिया कलाप रुक जाने से टेक्नोलॉजी ने उन क्रिया कलापों को ज़ारी रखने के लिए वरदान दिया है, फिर समय भी तो कभी रुकता नही है। निश्चित ही इस महामारी का अंत होगा। साहित्य जगत की चर्चित "वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी" पत्रिका के माध्यम से दस दिवसीय व्याख्यान माला के अंतर्गत "हमारा समाज और थर्ड जेंडर" विषय पर वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका के फेसबुक पेज से लाइव कार्यक्रम में आज दूसरे दिन चर्चित साहित्यकार डॉ. लवलेश दत्त ने अपने विचार रखे। उन्होंने सबसे पहले किन्नर समुदाय की पौराणिक मान्यताओं को बताया। उन्होंने कहा कि थर्ड जेंडर विमर्श सबसे पहले फिल्मों में आया और फिर साहित्य में। साहित्य में इस विमर्श पर उल्लेखनीय काम हो रहा है। लगभग 20 उपन्यास और कई कहानियाँ इस विषय पर आ चुकी हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य में आकर ही कोई विमर्श कालजयी बन जाता है। इससे साहित्यकारों का दायित्व और बढ़ जाता है। उन्हें केवल किताबों तक सीमित न रहकर थर्ड जेंडर की स्थिति को सुधारने के लिए समाज में आगे आना होगा। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को आगे आना होगा और थर्ड जेंडर्स को अपने प्रतिष्ठानों और संस्थानों में नौकरी और रोजगार के अवसर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि थर्ड जेंडर को मुख्य धारा में लाना है तो उनके लिए आरक्षण भी दिया जा सकता है। इसके अलावा मंदिरों में पुजारी, अस्पतालों में सेवा, होटलों, रेस्टोरेंट, प्रेस आदि अनेक क्षेत्रों में नौकरी दिए जाने के लिए कहा। इसी क्रम में उन्होंने इस समुदाय पर लिखे गए अनेक उपन्यासों का विवेचन किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से किन्नरों की दशा, उनकी सामाजिक स्थिति, उनकी समस्याएं आदि को उपन्यासों के माध्यम से रचनाकारों ने उठाने का प्रयत्न किया है।
इस फेसबुक लाइव कार्यक्रम को देश-विदेश के अनेक बुद्धिजीवी लाइव देख रहे थे।  इसका उद्देश्य थर्ड जेण्डर विषय पर आम पाठकों और लेखकों की मानसिकता में बदलाव लाना भी था।
फेसबुक लाइव मे 'अनुगुंजन' पत्रिका की पूरी टीम, 'अनुसंधान' पत्रिका की संपादक डॉ. शगुफ्ता नियाज़, ककसाड़ पत्रिका की संपादिका श्रीमती कुसुमलता सिंह, एएमयू हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर शम्भुनाथ तिवारी, डॉ. शमीम, रजनी गुप्ता, डॉ. ए. के पाण्डेय, प्रिंसिपल तनवीर अहमद, विकास प्रकाशन, कानपुर के पंकज शर्मा, मनीषा गुप्ता तथा वाङ्मय पत्रिका के सहसंपादक अकरम हुसैन के साथ बरेली के डॉ पंकज शर्मा, डॉ हितु मिश्रा, विकास शुक्ला, निधि अरोड़ा, डॉ कामरान खान, श्रीमती यामिनी दत्त, श्रीमती कृष्णा दत्त आदि के  अलावा देश विदेश से लगभग 2000 लोगों ने सुना और 100 से ज्यादा लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी।

सोमवार, 11 मई 2020

थर्ड जेण्डर की पीड़ा को संवाद कायम करके कम किया जा सकता है - डॉ. रमाकान्त राय

थर्ड जेण्डर की पीड़ा को संवाद कायम करके कम किया जा सकता है- डॉ. रमाकान्त राय

लॉकडाउन के चलते सभी प्रकार के साहित्यिक क्रिया कलाप रुक जाने से टेक्नोलॉजी ने उन क्रिया कलापों को ज़ारी रखने के लिए वरदान दिया है, फिर समय भी तो कभी रुकता नही है। निश्चित ही इस महामारी का अंत होगा। साहित्य जगत की चर्चित "वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी" पत्रिका के माध्यम से दस दिवसीय व्याख्यान माला के अंतर्गत आज "थर्ड जेंडर और हिंदी उपन्यास" विषय पर वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका के फेसबुक पेज से लाइव कार्यक्रम में डॉ. रमाकान्त राय ने अपने विचार रखे। उन्होंने सबसे पहले किन्नर समुदाय के नामकरण के बारे में विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा कि हिन्दी समाज को इस समुदाय के लिए अधिक मानवीय, मौलिक और गरिमायुक्त संज्ञा तलाशनी होगी। उन्होंने इस समुदाय पर लिखे गए अनेक साहित्यिक रचनाओं में से सबसे मजबूत विधा उपन्यासों का विवेचन किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से किन्नरों की दशा, उनकी सामाजिक स्थिति, उनकी समस्याएं आदि को उपन्यासों के माध्यम से रचनाकारों ने उठाने का प्रयत्न किया है। डॉ रमाकांत राय ने स्थापना दी कि हिन्दी में थर्ड जेंडर समुदाय का विमर्श अन्य उत्तर आधुनिक विमर्शों की तरह आत्मकथा से नहीं, बल्कि उपन्यासों से आया। उन्होंने इस समुदाय से संबंधित सभी चर्चित उपन्यासों का ज़िक्र अपनी वार्ता में किया तथा निष्कर्षतः कहा कि किन्नर समाज की पीड़ा को अगर कम किया जा सकता है तो उसके लिए उनसे संवाद ज़रूरी है। उनके सुख दुःख में शामिल होकर इन दंश को कम किया जा सकता है। उन्होंने रेखांकित किया कि ज्यादातर उपन्यासों में मिलता है कि बचपन में ही इस समुदाय का व्यक्ति सबसे पहले अपने माँ-बाप और खून के रिश्तों से ही प्रताड़ित किये गया है। इस लिहाज से उनकी पीड़ा कितनी अधिक होगी, उसके बाद महन्त, माई जैसे गद्दीनशीन प्रथा में आकर भी उनको अपने पेट की आग को बुझाने के लिए बधाई लेंने जाना पड़ता है। इस तरह उनका जीवन संघर्षों की अकथ कथा है।
अपने वक्तव्य में डॉ. रमाकान्त राय ने एक बहुत ही विचारणीय बात कही कि किन्नर समाज अपने सदस्य का अंतिम संस्कार रात में करता है। उन्होंने विभिन्न संदर्भों से बताया कि उनको रात में ही अंतिम क्रिया के लिए क्यों लाया जाता है और दूसरे किन्नर उनके शव को जूते-चप्पल मारते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि अगले जन्म में इस दुनिया मे इस योनि में नहीं आना होगा। इस अंतिम संस्कार की प्रविधि से आप उनके जीवन के संघर्ष और चुनौतियों को समझ सकते हैं। 
इस फेसबुक लाइव कार्यक्रम को देश-विदेश के अनेक बुद्धिजीवी लाइव देख रहे थे।  इसका उद्देश्य थर्ड जेण्डर विषय पर आम पाठकों और लेखकों की मानसिकता में बदलाव लाना भी था।
फेसबुक लाइव मे 'गुंजन' पत्रिका के संपादक लवलेश दत्त, 'अनुसंधान' पत्रिका की संपादक डॉ. शगुफ्ता नियाज़, एएमयू हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर शम्भुनाथ तिवारी, डॉ. शमीम, रजनी गुप्ता, डॉ. ए. के पाण्डेय, प्रिंसिपल तनवीर अहमद, प्रवासी कथाकार अर्चना पैन्यूली, शैल अग्रवाल, तेजेन्द्र शर्मा, विकास प्रकाशन, कानपुर के पंकज शर्मा, मनीषा गुप्ता तथा वाङ्मय पत्रिका के सहसंपादक अकरम हुसैन के अलावा देश विदेश से लगभग 2500 लोगों ने सुना और 100 से ज्यादा लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी।

https://youtu.be/VimZNhwUhgI
सुनिए वाङ्गमय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका व्याख्यान माला के अंतर्गत थर्ड जेण्डर समाज और हिंदी उपन्यास -  डॉ. रमाकान्त राय
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शनिवार, 9 मई 2020

संवेदनाओं का अंत, तुरंत ट्विटर है ना - सफी नक़वी

ट्विटर की हक़ीक़त और प्रवासी मज़दूरों की पदयात्रा को बयान करती शब्दों से बनी एक तस्वीर.....
पदयात्रा द्वारा मज़दूरों का पलायन गम्भीर विषय है,परंतु चिंतन का भी...कहावत याद आई, कान में तेल डालना अथवा सुनकर भी अनसुना कर देना। वर्तमान में कुछ ऐसा ही हो रहा है,बहुसंख्यक निर्धन प्रवासी मज़दूरों द्वारा हज़ारों मील पदयात्रा करनी पड़ रही है,इसके चलते न तो इनके लिए कोई यातायात के साधन अभी तक सुलभ हुए, न ही कोई अन्य सहायता,अरे बाबू साहिब आपकी अंतरात्मा को क्या दीमक खा गई.....ओरंगाबाद में दुर्भाग्यपूर्ण घटना से सोलह व्यक्तियों की कटकर मौत हो गई,आपको  इस विषय में कुछ पता नहीं..पता तो थी आपको  साहिब पर क्या करते?ट्विटर है ही,ट्विटर तो वर्तमान युग में ऐसा इनके लिए वरदान सिद्ध हुआ कि सभी अभिव्यक्तियों एवं सहानुभूतियों का सशक्त माध्यम यही हो...देश में कुछ भी घटित हो,आपको ट्वीट,रीट्वीट एक से बढ़कर एक अतिश्योक्तियां, शब्दों के बुनेजाल...ऐसे प्रकट होंगे कि मानों शब्दकोश सामने रखकर ही टंकण किया गया हो...अरे साहिब इस ख्याली पुलाव से....औपचारिकता से बाहर आ जाओ... मुझे साहिब बता सकते हो कि क्या उन मज़दूरों की कीमत सिर्फ उतनी ही थी? कि सोफासेट पर विराजमान होनर...मखमली रुएदार गद्दों पर लेटकर....उन असहाय प्रवासियों के प्रति सूखी सहानुभूति प्रकट करें? घिनआती है,ऐसे व्यक्तियों से...अरे आपको मालूम हो कि गरीब कीचड़ में पैर दो वक्त की रोटी के लिए ही डालता है,जिसका यथार्थ,मौलिक, वास्तविक रूप आमजन ने देखा,जिसे जनता जनार्दन कहा जाता है...अर्थात देश की सारी जनता, जो ईश्वर का रूप मानी जाती है...और आपने प्रवासियों का दर्द ट्विटर पर प्रकट कर दिया...इतना ही बहुमूल्य अंतर है,आप में और जनता जनार्दन में वह सूखी रोटी ही उसका जीवन थी तेईस घण्टों की पदयात्रा करके उसे क्या मिला...एक मौत..जो उसके लिए जीवनचर्या से अधिक मूल्यवान् साबित हुई... आपकी फ़र्ज़ी सहानुभूतियों की उसको आवयश्कता नहीं...काशआप इतना समझने योग्य होते कि निम्नवर्गीय मज़दूर,गिरमिटिया मज़दूर, प्रवासी मज़दूर वह तो सिर्फ कोल्हू का बैल है,उसे घर चलाने के लिए...रोज़मर्रा का जीवन व्यतीत करने के लिए एक ग्लास पानी,और दो रोटी चाहिए, तन ठापने के लिए वस्त्र, रहने के लिए साधारण झोपड़ी की आवयश्कता होती है,वह पदयात्रा क्यों करता यदि उसको सभी रोजमर्रा की वस्तुएं उपलब्ध होतीं?साहिब.....आप हैं कि कान पर जूँ तक नहीं रेंगती....उनकी मौत की क़ीमत का आकलन मामूली क़ीमत से लगाया जाता है... मरणोपरांत ही साहिब आपको गरीबों के प्रति  प्रतिक्रिया देनी होती है वह भी ट्विटर पर...ऐसा क्यों? इससे पहले हमारे देश के साहिब चैन की नींद सो रहे होते हैं....एक के बाद एक घटना घटित होती हैं...लखनऊ से मध्यप्रदेश के लिए कर्ज़ लेने हेतु अपने वतन पति-पत्नी और उनके दो मासूम बच्चे साइकिल द्वारा यात्रा करतें है, कुछ की मिनटों में मासूम बच्चे, निशब्द बच्चे, यतीम हो जाते हैं ऐसे ही न जाने बहुसंख्यक निम्नवर्गीय मज़दूरों की दुर्भाग्यपूर्ण घटनायें इस वैश्विक महामारी के समय देखने को मिली...जिसे देखकर कलेजा मुँह को आने लगता है,अरे साहिब जागो,उठो और देखो आखिरकार ये गिरमिटिया मज़दूर, प्रवासी मज़दूर,दिहाड़ी मजदूर,अपने गंतव्य पर क्यों नहीं जा पा रहा? वह क्यों हज़ारो मील पदयात्रा करने को मजबूर है?उसके पीछे क्या नीति है? मैं बताऊं साहिब वह ऐसा क्यों  कर रहा है, वह भूखा है...साहिब भूखा..धन का नहीं साहिब दो वक्त की रोटी का... उसके लिए करो कुछ करो साहिब वरना कोरोना संक्रमण से भयानक भयावह  तस्वीर ऐसे ही निर्धन व्यक्तियों की...आमजन की होगी...जो ईश्वर  का रूप है। कुछ मत सोचों साहिब बस इतना सोचलो ये आपके वोटर हैं साहिब..इन्हें अपने-अपने स्थान पर सुरक्षित भेज दो साहिब.....कोई दो दिन का भूखा है साहिब...कोई महिला गर्भवती है,उसके पैरों  में छाले चलते-चलते कोख में दर्द होता है... वह बेदम है साहिब...और आपकी हमारी तरहं किसी की मां....किसी की बहन...किसी की बहू...किसी की पत्नी है साहिब....इस आपदा की मार हम और आप नहीं इस समय हर एक वह व्यक्ति जो इस तालाबन्दी के कारण बीच रास्ते में फंसा हुआ है, लंबी अवधी के चलते वह यातायात बाधित होने...जेब खाली होने की मार झेल रहा है...ऐसे कष्टों का निवारण शीघ्र हो,सभी को अपना गंतव्य नसीब हो, इस आपदा, महामारी के कारण जन्में भीषण अकाल की कायापलट हो....जाने दो  साहिब आप भी कोरोना योद्धाओं की तरहं अपनी अहम भूमिका दिखा दो पुष्प वर्षा कर आपका भी भव्य स्वागत किया जाए...साहिब वाली जनता को 136 करोड़ जनता मुझसे बेहतर जानती है,उनकी सूची अगर गिनाना आरंभ की जाती तो शब्दों की तस्वीर में बाधा उत्पन होती... इस लेख में भी ट्विटर जैसी बाढ़ आ जाती,ट्विटर वाले साहिब ट्विटर को ही मुबारक़।🙏🙏🙏🙏
      धन्यवाद।
     सफी हसन नक़वी
          शोधार्थी,
   हिंदी विभाग,अमुवि  अलीगढ़।
       
        

आकृति शावेज़ ख़ान

आकृति 
                         द्वारा 
                       शावेज़ ख़ान
                               
खड़ी चढ़ाई वाली काली डामर की सड़क स्ट्रीट लाइट्स से जगमगाती हुई। बारिश के कारण कुछ और काली दीख पढ़ती थी, जो अनायास किसी तेज़ रफ्तार वाहन की हेडलाइट से ऐसे चमक उठती थी, मानो कोई साँप भरी दोपहरी में लहराता हुआ जा रहा हो, इतनी तेज़ कि किसी की नज़र में न आ जाए। आठ बजे टेकरी वाले मंदिर पर मिलने का जो वादा हुआ था अब वह धीरे धीरे धुंधला पड़ता दीख रहा था। हर एक मिनट झुंझलाहट और गुस्से में तब्दील होता जा रहा था... लेकिन कदम टस से मस न हो रहे थे जैसे इस सड़क के बनते वख्त आप यहीं थे। दूर नीचे एक आकृति धीमी-धीमी सी गति में ऊपर की ओर बढ़ रही थी। तब पहली बार महसूस हुआ की कमबख़्त नज़र कमज़ोर होने का क्या नुक्सान है। अब आकृति केवल आकृति न थी, वह सामने थी और हाँफते हुए उसने हाथ उठाकर ज़बरदस्ती चहरे पे लाई हुई एक मुस्कान के साथ कहा "हैलो...! कैसे हो आप!", जी तो चाह रहा था की कह दूँ तुम्हें देखकर ही तो जीता हूँ,  लेकिन ढोंग रचता हुआ बोला 'कि कितनी देर कर दी तुमने, ये भी कोई तरीका है?' 

कभी कभी जीवन में बहुत कुछ अप्रत्याशित होता है। आप सोचते कुछ हैं और होता कुछ है। वह कुछ देर तक खामोश खड़ी रही और बोली "हमारा एक दूसरे से अलग होना बहतर होगा। तुम्हारी वजह से मैं अपने सिद्धांतों का उल्लंघन कर रही हूँ, लेकिन मैं अपनी स्मृतियों में हमेशा तुम्हें जीवित रखूंगी, तुम जो चाहें मर्ज़ी समझ सकते हो लेकिन यही सही है और यही होना चाहिए। " 

फिर धीमे-धीमे वह आकृति नीचे की ओर चलती गई और कुछ ही क्षणों में आँखों से ओझल हो गई और मैं एकटक मंदिर की जगमगाती रौशनी को देखता रहा, नहीं जानता कितने समय तक। न जाने कितने प्रश्न मेरे मन में मंदिर के घंटे की तरह बजते रहे। बहुत कुछ अकारण ही हो गया बड़ा अजीब होता है जब बिना गलती के आपको सज़ा मिलती है। कहने को तो स्कूल में कई बार मास्टर जी ने स्टील के स्केल से बेवजह हाथ के गट्टे तोड़े थे, पर आज उस पीड़ा ने अपना अस्तित्व खो ही दिया था। एक घुटन, एक मायूसी और अंतहीन प्रश्नों की श्रंखला। आँखें सारी-सारी रात चाह कर भी न बंद हो पातीं, बंद होतीं तो वही जाते हुए छोटे-छोटे कदम मन को भारी कर देते और मैं सिगरेट पीता हुआ उसी टेकरी की ओर चल देता जहां अक्सर बैठ कर मैं दुनिया से निजात पा जाता था। कुछ कहता था और बहुत कुछ सुनता था। 


वो घंटों तक हमें आगोश में लिए बैठे रहते थे। उनकी गरम-गरम सांसें मेरी गर्दन पे जैसे उनका  नाम लिख देती थीं। पकड़ आहिस्ता-आहिस्ता कसती ही जाती थी। वैसे तो मेरी कद काठी पे सभी रश्क करते थे पर न जाने क्यों उसके सामने मेरा कोई ज़ोर न चलता था। आज भी याद है जब वो  सीने में ख़ुद को एक दफ़ा छिपाकर बोले थे “मुझे कभी ख़ुद से अलग न होने देना” और मैंने कुछ न कह कर उनके माथे को चूम लिया था। कभी सोचता हूँ कि क्या मेरे कुछ न कहने की वजह से ये सब हुआ? लफ़्ज़ इतने माइने रखते हैं, तो यही वजह होगी! फिर एक ख्याल ये आता है कि जब यही वजह थी तो वो मुझे देख कर मुस्कुरा क्यों दिए थे? 

आज एक महीना होने को आया, जिस दौरान न तो कोई फोन आया और न ही कोई संदेश। आस छोड़ने के बाद भी एक आस इस आस को न छोड़ने को मजबूर करती है। न जाने क्यों उम्मीद टूटने को तैयार नहीं होती, न जाने क्यों उनकी तस्वीर आँखों के सामने से हटती नहीं, कुछ न सोचकर भी उन्हीं को सोचना। अपने जीवन में बहुत सी स्त्रीविरोधी रचनाएँ पढ़ीं और उनका अध्ययन भी किया किंतु रचनाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्कों से कभी मेल न बैठा सका हमेशा उन्हें गलत ठहराता रहा। पर आज न जाने क्यों वो सब मुझ पर हंसते से दिखाई पड़ते हैं जैसे कह रहें हो ‘क्यों बच्चू बड़ा पक्ष धरता था, अब क्या हुआ?’ और मैं निःशब्द उनकी इन प्रतिध्वनियों को सुनता रहता हूँ। 

उस टेकरी पर बैठा सिगरेट पी ही रहा था कि इतने में एक सुंदर कद-काठी वाला एक लड़का वहाँ आ धमका और मुझे नमस्ते किया। उसे जानता तो नहीं था पर प्रतिकृया अवश्य दे दी। उसे ऊपर से नीचे तक देख ही रहा था कि इतने में एक आकृति फिर दिखाई पड़ी और मैंने मंदिर की तरफ पलट कर देखा, वह अब भी जगमगा रहा था। वहाँ से हट जाना ही मैंने उचित समझा और धीमे-धीमे ढलान से उतरते हुए मैंने उस लड़के को देखा। वह भी मुझे देख रहा था और आँखों ही आँखों में उससे कहा “मित्र यदि कल तुम्हें सिगरेट की आवश्यकता हो तो संकोच किए बिना मांग लेना” और मैं मुसकुराता हुआ नीचे की ओर बढ़ गया।