शुक्रवार, 8 मई 2020

मैं तब प्यार के बारे में नहीं जानती थी- रामकुमार सिंह


"मैं तब प्यार के बारे में नहीं जानती थी!" - रामकुमार सिंह

साहित्य महोत्सव का मंच सजकर तैयार हो गया है।रंग बिरंगी रौशनी और जगमगाती हुई लाइटों से पूरा पांडाल प्रकाशित हो रहा है। वह साहित्य महोत्सव का मंच कम किसी ग्लैमरस शादी का मंच ज्यादा लग रहा है। दूसरे महानगरों से साहित्यकार बिजनेस क्लास की हवाई यात्रा करके राजधानी को पहुंच रहे हैं, जहां वे पूरे जोरों से सर्वहारा वर्ग की समस्यायों को लेकर विधवा विलाप करेंगे। पूरे सप्ताह भर का आयोजन है।सभी बुद्धिजीवी एक सप्ताह खुलकर मस्ती करेंगे।ये साहित्य महोत्सव और संगोष्ठियां ही तो हैं जहां पर ये बेचारे थोड़ी बहुत मस्ती कर लेते हैं वर्ना देश और दुनिया की चिंता करने से कब फुर्सत मिलती होगी बेचारों को।
जींस कुर्ता और स्लीपर में अभी-अभी गेस्ट हाउस से निकलकर आ रहे दो बुद्धिजीवियों को मैंने देखा।ये वही लोग थे जो एयरपोर्ट पर मँहगे सूट-बूट में नज़र आए थे।आते ही कायापलट क्यों कर ली इन्होंने? फिर थोड़ा सा सोचने पर मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि हो न हो ये ड्रेसकोड इनकी साहित्यिक मजबूरी हो।
मैं भी बतौर युवा कथाकार  अपनी पत्नी सहित कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचा हुआ था।मेरी पत्नी को साहित्य और साहित्यकारों में कोई खास रुचि नहीं थी।बस उसे तरन्नुम में गाई जाने वाली कविता,गीत और ग़जल ही पसंद थीं।शाम के सत्र में मुझे अपनी कहानी का पाठ करना था।हम दोनों दोपहर में शापिंग करने का कार्यक्रम पहले ही बना चुके थे,लेकिन पत्नी के कहने पर कार्यक्रम रद्द करना पड़ा क्योंकि उसे कविता पाठ सुनना था।वही तो उसकी रुचि का कार्यक्रम था।भला उसे क्यों छोड़े।बाकी दिनों में तो उसे मजबूरी में सबको झेलना ही झेलना है।दोनों तेज़ कदमों से चलते हुए उस पांडाल में पहुंचे जहाँ काव्यपाठ चल रहा था।एक उम्रदराज़ कवि अपना कविता पाठ समाप्त कर चुके थे।तभी संचालक ने बड़े ही जोशोखरोश के साथ एक युवा कवयित्री को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया और साथ ही यह भी बताना नहीं भूला कि वह अपना फलां वाला प्रेम गीत ज़रूर पढ़ें जो जयपुर में पढ़ा था।युवा कवयित्री की उम्र कोई तीस-बत्तीस साल रही होगी।भरा हुआ बदन और साँवली सलोनी सूरत।आँखों पर काले फ्रेम का नज़र का चश्मा।आगे के दोनों दांतों का आकार सामान्य से थोड़ा ज्यादा जो हँसने पर और भी ज्यादा नज़र आता।पर्पल कलर के सूट सलवार और दुपट्टे को सँभालती हुई वह मंच पर एक-एक पैर सँभालकर रखती हुई पहुँचती है।मंच की औपचारिकताओं को निभाते हुए वह सबसे पहले तो आयोजक महोदय का तहेदिल से शुक्रिया अदा करती है, क्योंकि उन्हीं की कृपा दृष्टि से उन्हें युवा कवयित्री बनने का अवसर मिला है।इससे पहले भी एक जगह उनका काव्य पाठ उन्होंने ही कराया था।श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए उन्होंने एक मुक्तक अपने कोकिल कंठ से बयान किया।श्रोताओं में से कुछ लंपट किस्म के लोगों ने वाहवाही दी और कर्तल ध्वनि भी की।कवयित्री ने अपना मोहिनी मंत्र चलते हुए देखकर एक हल्की सी मुस्कान बिखेर दी।दूसरा मुक्तक जिसका विषय कालिज टाइम लव था को उसने और अधिक उत्साह के साथ पढ़ा।श्रोताओं का जोश भी हाई था।मैं अपनी पत्नी सहित सबसे पीछे एक कोने में बैठा हुआ चुपचाप अपने मोबाइल में आ रहे संदेशों को देख रहा था।मेरी पत्नी काव्यपाठ का लुत्फ़ उठा रही थी और जैसे ही तालियां बजतीं तो वह भी उसी उत्साह के साथ तालियां बजा देती।मैं उसके चेहरे की तरफ़ देखकर मुस्कुरा देता और फिर से अपने संदेश देखने लग जाता।अब उसने बताया कि वह उसी प्रेम गीत को पढ़ने वाली है जिसकी फरमाइश की गई थी।मेरी पत्नी ने मुझको लगभग झिंझोड़कर कहा कि अब ये गीत तो सुन लो या मोबाइल में ही घुसे रहोगे। मैंने मुस्कुराते हुए कहा-"जो आज्ञा देवी जी!आपका आदेश सिरोधार्य है।कवयित्री ने पहली लाइन लय,सुर और ताल को ध्यान में रखकर पढ़ी तो दर्शकों की तरफ़ से ग़जब का रिस्पाॅन्स मिला।वाहवाही और कर्तल ध्वनि से पांडाल गूंज उठा।मेरी पत्नी ने इस पर मेरी भी प्रतिक्रिया ये कहते हुए जाननी चाही कि ये बहुत ही अच्छा पाठ कर रही है।हाँ!हाँ! पाठ तो अच्छा ही करेगी क्योंकि संगीत की शिक्षा जो......... इतना कहते ही मैं चुप हो गया।मेरी पत्नी भी मेरा ये कथन नहीं सुन पाई।कवयित्री ने गीत को पूरा किया और श्रोताओं की तरफ से जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला।मेरी पत्नी उस कवयित्री की फैन हो गई और मुझसे जिद करने लगी कि मैं उससे उसे मिलवाकर लाऊं। मैंने कहा कि मैं इधर ही खड़ा हुआ हूँ ,तुम जाकर मिल लो ऐसी भीडभाड़ भी नहीं है।इतना सुनकर उसकी आँखों में लाल डोरे पड़ गए।ऐसा लगने लगा जैसे आँखों से खून टपकने ही वाला हो।बेचारा कथाकार मरता क्या न करता।वह कथाकार होगा अपने लिए और अपने पाठकों के लिए।अपनी पत्नी के लिए तो वह पति ही था, और उतना ही बेचारा जितना कि पति लोग हुआ करते हैं।अपने कुर्ते की जेब में पड़े काले चश्मे को आखों पर चढ़ाकर मैं पत्नी के साथ कवयित्री से मिलने चला गया।मैंने जाकर बताया कि मेरा साहित्यिक नाम राजेश ज्ञानी है और मैं कहानियाँ लिखता हूँ।ये मेरी पत्नी हैं नीलिमा जी।नीलिमा ने लपककर उससे हाथ मिलाया और उसके काव्यपाठ की बहुत ही तारीफ की।कवयित्री ने उसे धन्यवाद दिया।तभी मेरे फोन की घंटी बजी और मैं फोन रिसीव करके बात करने के उद्देश्य से उन दोनों को बातचीत करता हुआ छोड़कर चला गया।बातचीत खत्म करके मैं लौटा और अपनी पत्नी से शीघ्र ही चलने के लिए कहा क्योंकि मेरे कहानी पाठ का समय हो चुका था।दोनों महिलाओं ने एक दूसरे से हाथ मिलाते हुए बाय कहा।
शाम को अपनी कहानी का पाठ करके मैं अपने गेस्ट हाउस में पहुंचा। नीलिमा काव्यपाठ के बाद ही सिरदर्द के चलते कमरे पर आकर आराम फरमा रही थी।उसने मुझसे पूछा कि मेरा कहानी पाठ कैसा रहा? अच्छा रहा!आपने कौनसी कहानी सुनाई? ज़रूर आपने 'कसक' पढ़ी होगी!वह बहुत चर्चित कहानी है न आपकी!नहीं!वह नहीं पढ़ी!तो फिर कौनसी पढ़ी?वही कहानी जो मैंने आजतक नहीं लिखी।मतलब!ऐसे कैसे बिना लिखे कोई कहानी पढ़ सकता है!ये कोई आशु भाषण प्रतियोगिता तो है नहीं कि जो भी विषय मिल गया उसी पर पाँच मिनट बोल दिए।अरे यार आशु भाषण प्रतियोगिता न सही आशु कहानी प्रतियोगिता ही मान लो।ऐसे कैसे मान लूँ?आपको मेरी योग्यता पर संदेह है? नहीं तो!पर मैंने आपको कभी आशु कहानियों के सत्र में प्रतिभाग करते हुए नहीं देखा है।आज देख सकती थीं लेकिन तुमको सिरदर्द हो रहा था।यू आर सो अनलकी!आज मैंने वही कहानी सुनाई थी जो तुमने तब सुनी थी जब हमारी नयी-नयी शादी हुई थी।अच्छा वो कहानी जिसका बड़ा सा शीर्षक था।हाँ याद आया-"मैं तब प्यार के बारे में नहीं जानती थी!" यही शीर्षक था न?हाँ यही था!लेकिन ये कहानी तो तुमने मुझे तब सुनाई जब मैंने तुमसे तुम्हारी यूनिवर्सिटी वाली दोस्त के विषय में पूछा था।लेकिन वो कहानी इतने बड़े मंच पर तो नहीं सुनाई जानी चाहिए थी।उसमें तो ऐसा कुछ नहीं था।हाँ !तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो मैंने उस कहानी को थोड़ा सा विस्तार दे दिया है।वो लड़की जिसके विषय में मैंने तुमको बताया था कि उसे मैंने एमए के दिनों में प्रपोज किया था और उसने मेरे प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।मैं उन दिनों बहुत दुखी रहता था और मुझे अवसाद ने घेर लिया था।किसी तरह में अवसाद से निकल गया।फिर पीएचडी के दौरान जब मैंने उससे पूछा था कि तुमने मेरे प्रेम प्रस्ताव को क्यों ठुकरा दिया था?तब उसने कहा था-"मैं तब प्यार के बारे में नहीं जानती थी!" ये सब रामायण तो मुझे मालूम है अब इससे आगे की कहानी बताओ क्या विस्तार किया है?बताता हूँ!बताता हूँ!थोड़ा धैर्य रखो डियर।वही लड़की जो तब प्यार के बारे में नहीं जानती थी।आजकल प्रेमगीत गाने लगी है।अच्छा!फिर आगे? थोड़ा सब्र करो मेरी जान!आगे की कहानी तब सुनाऊँगा जब तुम ट्राॅली बेग में पड़ी मेरी ब्राउन कलर की डायरी निकालकर दोगी।नीलिमा फुर्ती के साथ बैग खोलकर ब्राउन कलर की डायरी निकालकर उसकी तरफ बढ़ाती है।मुझे मत दो इसे खोलो!नहीं!नहीं!मैं भला कैसे खोल सकती हूं ये आपकी पर्सनल डायरी है।अरे यार मैं कह रहा हूँ कि खोलो तो फिर किस बात का संकोच।पेज नंबर 148 खोलो।नीलिमा धीरे-धीरे पेज पलटती है।एक सौ छियालिस! एक सौ सैंतालिस!एक सौ अड़तालिस!अब इसे पढ़ो।नीलिमा कवयित्री के गाए हुए प्रेम गीत की पंक्तियों को दोहराने लगती है।गीत के नीचे की पंक्ति के नीचे उसके पति का नाम राजेश कुमार एमए (उत्तरार्द्ध) दिनांक सहित बतौर लेखक अंकित था।नीलिमा राजेश की तरफ़ ईर्ष्या मिश्रित मुस्कान के साथ देख रही थी।तभी राजेश ने उसकी तरफ आँख मार दी और दोनों के ठहाकों से गेस्ट हाउस का कमरा नंबर आठ गूंज उठा।

- रामकुमार सिंह
शोधार्थी एएमयू हिन्दी विभाग एवं
युवा कथाकार

मंगलवार, 5 मई 2020

पक्ष, विपक्ष और जनपक्ष - अकरम क़ादरी

पक्ष, विपक्ष और जनपक्ष - अकरम क़ादरी

भारतीय लोकतंत्र में आज तक हमने सत्ता के दो पक्ष सुने है जिसमें एक पक्ष होता है दूसरा विपक्ष, जो भारतीय संविधान के अनुसार चलता है, पक्ष वो होता है जिसको संसदीय प्रणाली के अंतर्गत सबसे ज़्यादा वोट मिलते है अर्थात जिसके सबसे ज्यादा लोकसभा सदस्य होते है, विपक्ष वो होता है जिसके लोकसभा सदस्य कम होते है। ऐसे ही राज्यसभा होती है जिसमे जिस पार्टी के जितने विधायक होते है उसी के अनुसार उस पार्टी के उतने ही राज्यसभा सदस्य होते है और लोकतंत्र संविधान के अनुसार चलता रहता है जिसमे एक सत्तापक्ष किसी मुद्दे पर अपनी राय देता है और विपक्ष उसका एनालिसिस करके उसमें कुछ जोड़ता है या फिर उसके बिंदुओं पर चर्चा करके उस मुद्दे को खत्म कराता है या फिर संसोधन करके उस बिल को पास किया जाता है वरना उसको रोक दिया जाता है। अगर लोकसभा में सत्ता पक्ष के मैजोरिटी से ज्यादा सदस्य है तो थोड़ी बहुत बहस के बाद  पास हो जाता है जिसको फिर राज्यसभा में विपक्षी दल चैलेंज करता है यदि फिर भी इस बिल में कोई कमी महसूस होती है तो वो बिल सुप्रीम कोर्ट में जाता है, उसके बाद फैसला आता है अतः हमारा लोकतंत्र बहुत मजबूत स्थिति में प्रतीत होता है,
लेकिन पिछले कई वर्षों से देश मे विपक्ष लगभग दोनो हाउस में नगण्य स्थिति में आ गया है अर्थात विपक्ष के लिए जितने वोट और सदस्य होना चाहिए वो भी नहीं हो पा रहे है तो देश मे तीसरे पक्ष की भूमिका बाहर सशक्त हो जाती है क्योंकि डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि अगर सड़क वीरान हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी उनकी इस युक्ति में मुझे दम प्रतीत होता है क्योंकि बहुत से सरकारों के फैसले सड़क के माध्यम से भी बदले गए है और उनपर चुनी हुई सरकार भी बैकफुट पर आई है दरअसल वो लोग जो यह सब धरना प्रदर्शन करते थे वो अधिकतर हर प्रलोभन से दूर थे वो किसी भी पक्ष के चाटुकार और लोभी नहीं थे बल्कि वो जननेता थे जो अपनी आवाज़ इतनी साइंटिफिक तरीके से उठाते थे कि जनता को नज़र आता था कि यह पक्ष एकदम सही है लेकिन कुछ वर्षों से तीसरा पक्ष खत्म होता जा रहा है ।
दरअसल इस तीसरे पक्ष में वो लोग होते थे जो कलाकर्मी, रंगकर्मी, संस्कृति प्रेमी, लेखक, पत्रकार, सामान्यता जिनको बुद्धिजीवी समझा जाता था लेकिन वर्तमान समय मे टी.वी डिबेट में बैठा हुआ बुद्धिजीवी ज्यादातर किसी एक पक्ष की बात करते हुए नज़र आता है क्योंकि उसको भी पता है जनता राजनैतिक पार्टियों का चुनाव धर्म, मज़हब, जाति, पंथ, देखकर करती है तो वो क्यों विरोध करके स्वयं को खतरे में डाले, क्योंकि कुछ सिरफिरे लोग ऐसे लोगो पर हमला करा देते है। तीसरे पक्ष का उखड़ने का सबसे बड़ा कारण है मीडिया जो ज़्यादातर गोदी हो चुका है। जो हमेशा सत्ता की गोद मे बैठकर लॉलीपॉप का मज़ा लेता रहता है उन मुद्दों पर बहस करता है जो भावुक है एक धर्म की तरफ झुके होते है या फिर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता की हिमायत करते हुए नज़र आते है जिनको आने वाले चुनाव में लाभ होता है अधिकतर मीडिया गोदी मीडिया हो चुका है। इस कठिन दौर में जो भी असली पत्रकारिता करता है उसको बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ वो पक्ष जो ना ही जनता द्वारा चुना हुआ और ना ही वो किसी भी पार्टी का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से सदस्य है वो विशुद्ध रूप से लोकतंत्र और संविधान का रक्षक है वो सत्ता का विरोध करता है क्योंकि वो देश, समाज और मानवता का भला चाहता है, उसकी जो समाज मे कमी आई है एक वो भी बहुत बड़ी वजह है जिससे सरकारे भावुकता की तरफ मुड़ गयी है उनका जनता के असली मुद्दों से ज्यादा कोई मतलब नहीं है इसका सीधा नुकसान जनता को ही होगा वो राजनेता अपनी सत्ता भोग कर निकल लेंगे लेकिन जनता के सवाल यूं के यूँही रहेंगे... आज हमारे देश को तीसरे पक्ष की ज़रूरत है जिसमे सच्चे लेखक, कलाकर्मी, रंगकर्मी, हास्य कलाकार, व्यंग्यकर्मी ही हो सकते है जिनको नाममात्र का भी सत्ता का मोह ना हो ...वर्तमान समय मे अगर कोई लेखक किसी मुद्दे पर कुछ बोलता, लिखता, पढ़ता है तो जो सत्ता के समर्थक है या फिर फैन बन चुके है वो पूरी कुतर्को की जमात खड़ी कर देते है और वो लोग अपने नुकसान से भी बेपरवाह है। जिससे वो बुद्धिजीवी बोलना तो नहीं छोड़ता है बल्कि आवाज़ उठाता रहता है उसके बाद सत्ता के लोग उस पर व्यक्तिगत आक्षेप लगा देते है या फिर व्यक्तिगत हमला करते है फिर उसको अपनी अपनी आई. टी. सेल के द्वारा बदनाम किया जाता है। 
मेरी अपने देश के नोजवानो से अपील है कि संविधान, देश और मानवता को बचाना है तो किसी भी पार्टी का फैन मत बनिये जिसको भी अच्छा लगे वोट दीजिये लेकिन एक सीमा के बाद उसपर सवाल ज़रूर कीजिये जिससे आपकी छवि एक ज़िम्मेदार नागरिक की बने नाकि किसी पार्टी विशेष के भक्त की.....
आखिर तीसरे पक्ष का मज़बूत होता लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है 
जय हिंद
जय भारत

जनपक्ष
(सत्ता का परमानेंट विपक्ष और देश का सजग प्रहरी)

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर एंड पॉलिटिकल एनालिस्ट

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

कोरोना की जंग में शहीद होते डॉक्टर - अकरम क़ादरी

कोरोना की जंग में शहीद होते डॉक्टर - अकरम क़ादरी

जबसे दुनिया मे इस महामारी ने अपने पैर पसारे है तब से देश का हर ज़िम्मेदार नागरिक अपने अपने स्तर पर लड़ रहा है कोई सड़क पर लड़ रहा है तो कोई घर पर स्वयं को बंद करके लड़ रहा है, कोई बीमारी के साथ-साथ भूख से लड़ रहा है तो कोई हॉस्पिटल में खड़े होकर अपनी जान को जोखिम में डालकर लड़ रहा है। जबसे इस बीमारी की शुरुआत हुई है इसने कॉमन इंसान के अलावा है डॉक्टर्स को भी निगलना शुरू कर दिया है क्योंकि यह वो बीमारी है जो एक दूसरे में खुद ट्रांसफर हो जाती है और चौदह दिन में उसके लक्षण दिखना शुरू हो जाते है। चीन के वुहान शहरमे जो पहला डॉक्टर इस बीमारी की चपेट में आया था तो उसने पहले ही आलेख लिखकर इस बीमारी के बारे में सबको आगाह कर दिया था कि यह बहुत खतरनाक बीमारी है जो मरीज़ों के साथ-साथ डॉक्टर्स को भी निगल जाती है उसके साथ-साथ पैरामेडिकल स्टाफ़, नर्सेस की भी ज़िन्दगी खतरे में रहती है ना जाने कितने स्वास्थ्य विभाग से ताल्लुक रखने वाले लोग इस भयानक बीमारी की चपेट में आकर इस दुनिया को अलविदा कह गए उसके बाद भी कुछ मानसिक विकलांग लोग इस समय भी कुंठित मानसिकता का परिचय देते हुए भी अपनी नफरती एवं साम्प्रदायिक राजनीति का एजेंडा सेट करने में लगे है जिसको कुछ गोदी मीडिया के चैंनल और पत्रकार भी शामिल है जिनको आजकल व्यंग्य की भाषा मे पत्तलकार कहा जाता है अर्थात वो पत्रकार जिसकी पत्तल में कुछ टुकड़े, निवाले कुछ एजेंडा सेट करने वालो ने डाले हुए होते हैं। 
कोरोना वारियर्स में जहां पर एक एम्बुलेंस का ड्राइवर तक शामिल है, वहां पर सफाईकर्मी, सपोर्टिंग स्टाफ उसके अलावा पैरामेडिकल स्टाफ, नर्सेज और दवा देने वाले मेडिकल वाले भी शामिल है जो सब एक समूह मिलकर एकता के साथ इस भयानक बीमारी से लड़ रहे है।
इस बीमारी में जो सबसे फ्रंट पर लड़ रहे है वो हमारे देश के जांबाज़ डॉक्टर्स ही है जो बिना अपनी जान की परवाह किए हुए इस पुनीत कार्य मे अपनी आहुति दे रहे है और देश को कोरोना मुक्त करने के लिए दिलो जान से लगे हुए है। 
अंग्रेज़ी अखबार दा हिन्दू के अनुसार 22 अप्रैल 2020 तक भारत मे 412 मेडिकल कार्यकर्ता कोविड 19 पॉजिटिव पाए गए है जिनमे अनेक डॉक्टर्स ने अपनी जान भी गवा दी है। जिनमे लगभग 156 नर्सेज, 96 डॉक्टर्स, 145 मेडिकल वर्कर्स, हॉस्पिटल स्टाफ 11 तथा 4 टेक्निकल स्टाफ भी शामिल है। इस कठिन परिस्थिति में भी डॉक्टर्स पर जनता के हमले भी हो रहे है फिर भी वो अपने कमिंटमेंट के लिए उदार है और देशसेवा में लगे हुए, कुछ राजनेताओ ने भी अशोभनीय टिप्पणी भी की है जबकि इस कठिन समय मे उनको हौंसला देना चाहिए उनकी दिक्कतों को दूर करना चाहिए फिर भी हमारे देश के डॉक्टर बगैर भेदभाव के जनसेवा में रात-दिन लगे हुए है। 
पिछले दिनों कोरोना से लड़ने वाले दो डॉक्टर्स के बारे में पढ़ा तो दिल भर आया है वो नोजवान डॉक्टर आजकल अपनी फॉर व्हीलर को ही अपना घर बनाये हुए थे जिसमें किताबे, कपड़े, टूथ पेस्ट, उसके अलावा कुछ हल्का फुल्का खाने का सामान।
कभी कभी अपने प्रिय बच्चों और अर्धांगनी को भी देखने जाते है उनको दूर से देखकर ही वापस अपने काम पर लौट आते है जिसको एक सच्ची समझ का व्यक्ति अगर देखेगा तो निश्चित ही उसका हृदय भावुकता और संवेदना से भर जाएगा और हो सकता है उनके इस कठिन कार्य को देखकर वो रो भी दे। 
इतना कुछ करने के बावजूद भी उनके लिए अच्छे मास्क, पीपीई किट का सही प्रबन्ध नहीं हो पा रहा है जिसको हमारे राजनेताओ को सोचना चाहिए और उनको उच्चस्तरीय सेवाओ से लैस करना चाहिए जिससे हम इस वैश्विक महामारी से निजात पा सके।
पिछले दिनों एक इटली से आई तस्वीर ने सभ्य समाज को रोने पर मजबूर कर दिया। पति-पत्नी दोनों ही कोरोना पॉजिटिव का इलाज कर रहे थे जब कुछ दिन पहले दोनों को मालूम हुआ कि घटिया किट के कारण वो खुद भी कोरोना पॉजिटिव हो गए है और जल्दी ही उनकी मौत हो जाएगी तो उन्होंने इच्छा जाहिर की हम दोनों एक बार मिलना चाहते है जब वो दोनों मिले तो उन्होंने एक दूसरे को चुम्बन किया जिस तस्वीर को देखकर दिल भर आया जबकि इटली जैसा देश दुनिया मे मेडिकल फैसिलिटीज में दूसरे नम्बर पर आता है वो भी इससे नहीं बच पाया वो अपने डॉक्टर को भी नहीं बचा पा रहा था तो इस भयावह बीमारी को समझते हुए सुरक्षा और सतर्कता ही बचाव है बगैर किसी महत्वपूर्ण काम से घर से बाहर न निकले और ना ही ऐसे ज़्यादा लोगो के साथ बैठे बल्कि अकेला में रहे और देश को सुरक्षित रखे बल्कि पूरे मानवजाति को बचाये।

अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर &
पॉलिटिकल एनालिस्ट

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

कोरोना से कैसे लड़ रही है पुलिस- अकरम क़ादरी

कोरोना से कैसे लड़ रही है पुलिस - अकरम क़ादरी

कहा जाता है कि 'पुलिस की ना दोस्ती अच्छी ना ही दुश्मनी' बात भी सही है क्योंकि दोस्ती घर का निजी मामला है और दुश्मनी भी लेकिन पुलिस तो जो कार्य करती है वो संविधान के दायरे में रखकर करती है वो किसी भी प्रकार का ऊंच-नीच, भेदभाव नहीं करती है अगर उनके ऊपर कोई राजनैतिक दबाब ना हो तो वो कुछ भी कुकर्म करने ना दे। 
देश के नोजवान जब सिंघम, राउडी राठौर, दबंग जैसी फिल्में देखते है तो उनके सामने पुलिस का एक आदर्शवादी रूप देखने को मिलता है और वो भविष्य में उस जैसा बनना भी चाहते है दरअसल ज्यादातर पुलिस वाले गांव देहात के ही रहने वाले होते है जो सही से आदर्शवाद को समझते भी है ।
वर्तमान समय मे कोरोना जैसी भयानक बीमारी का सामना देश कर रहा है, इस कठिन समय मे डॉक्टर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और नर्सेस हॉस्पिटल के अंदर लड़ रही है तो दूसरी तरफ भारतीय पुलिस सड़को पर खड़े होकर लोगो को गाना गाकर जागरूक कर रही है और इस महामारी की भयावाह स्थिति से अवगत भी करा रही है उसके अलावा पागल, बूढ़े एवं दिव्यांगों को जगह जगह खाना भी मुहैया करा रही है। उसके अलावा देश मे दूसरी सबसे भयानक बीमारी फैल रही है मानसिक साम्प्रदायिकता से भी लड़ रही है क्योंकि कुछ राजनैतिक षड्यंत्रकारी दूसरे सम्प्रदाय के लोगो को इस भयानक बीमारी का जिम्मेदार ठहरा रहे है जिसको पुलिस बार-बार खंडन करके सच दिखा रही है। उसके अलावा जो लोग बगैर किसी ज़रूरत के बाहर घूम रहे है उनको भी समझा रही है, डांट रही है जिससे इस महामारी का पब्लिक ट्रांसमिशन ना हो सके। अगर पब्लिक ट्रांसमिशन हो गया तो बहुत भयावह स्थिति में देश फंस जाएगा और देश मे लाशो का तहखाना बन जायेगा जो आज स्थिति अमेरिका, इटली जैसे देशों की हो रही है उससे बत्तर हो जाएगी क्योंकि हमा
रे पास इतने संसाधन नहीं है जितने संसाधन इटली और अमेरिका जैसे विकसित देशों के पास है इसलिए देश के ज़िम्मेदार जानते है पहले जनता को लॉक डाउन के माध्यम से घर पर ही रोका जाए उसके बाद उनकी कोरोना टेस्टिंग कराई जाए जिससे इस बीमारी से देश को निजात मिल सके। गवर्मेंट के इस कानून और एडवाइजरी को पुलिस ततपरता से लागू कराने के लिए वचनबद्ध है जिसके लिए उनको अनेक परेशानियों से भी गुज़रना पड़ रहा है।
आज जिस प्रकार से पुलिस सड़को पर नज़र आ रही है वो जनता की मित्र है वो अपनी जनता को इस बीमारी से बचाना चाहती है वरना इस मुश्किल समय मे जब सब अपने घर पर रुके है वो क्यों सड़को पर घूम रहे है उनको क्या ज़रूरत है वो स्वयं और स्वयं के आश्रितों को परेशानी में डालकर देश की जनता के लिए लड़ रहे है कुछ बेवकूफ उनको गलत समझकर हमला कर रहे है जिसकी जितनी कड़ी निंदा की जाए वो कम है। 
अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर कई ऐसी तस्वीरें देखी है जब पुलिस अफसर अपने घर मे बाहर बैठकर खाना खा रहे है जैसे किसी बाहर के भिखारी को दिया जाता है। 
उसके अलावा अपने बच्चों तक से मिलने की सावधानी बरत रहे है वो किसी भी प्रकार से समाज को इस बीमारी में झोकना नही चाहते है बल्कि बचाना चाहते है। 
जितने भी कोरोना महामारी से मर रहे है उनके अंतिम संस्कार तक पुलिस को करना पड़ रहे है क्योंकि अगर कोई दूसरा बन्दा उनका अंतिम संस्कार करेगा तो हो सकता है वो वायरस दूसरे को भी इन्फेक्ट करदे और बीमारी अपना विकराल रूप धारण करले।
मेरी देश की समस्त जनता से हाथ जोड़कर आग्रह है कि वो इस महामारी में पुलिस और डॉक्टर का सहयोग करे और अपने देश की जनता की रक्षा करने में अपना योगदान दे। 
किसी भी जगह यह पुलिस के वीर निकले तो उनका हाथ जोड़कर अभिवादन करदे उनपर कुछ फूल बरसा दे जिससे उनका हौसला बड़े और वो अपने कार्य को मेहनत से करे। 
हमारी रक्षा करे।
अकरम क़ादरी
फ्रीलांसर
पॉलिटिकल एनालिस्ट

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

पालघर लिंचिंग के पीछे की मानसिकता - अकरम क़ादरी

पालघर लिंचिंग के पीछे की मानसिकता - अकरम क़ादरी

पालघर लींचिंग वाली वीडियो देखकर वास्तव में दिल दहल गया लेकिन सोचने की बात यह है कि हमारा समाज और पुलिस इतनी निकम्मी कैसे हो सकती है कि उसके ही सामने एक बुजुर्ग साधु को लिंच किया जाता है। इस घटना को समझने के लिए हमे थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा कि आखिर कैसे हमारे छोटे-छोटे मासूम बच्चों ने हाथ मे डंडा, लाठी और कुछ धारदार हथियारों से कबसे खेलना शुरू कर दिया ? तो आपको बताता चलूं की यह सब इतनी हिम्मत उन बच्चों में कैसे आई 2012 से मीडिया में नफरत का कंटेंट सबसे ज्यादा नज़र आता है जिसकी वजह से जो किशोरावस्था में बच्चे होते है उनकी मानसिकता कैसी बनेगी जब एक बच्चे से सामने एक पार्टी का नेता चिल्ला चिल्ला कर कहेगा 'मुल्ला तू चुप हो जा' मुल्ला तू घोड़े खोल ले ............वही होगा इससे शुरुआत होती है उसके बाद देश मे लींचिंग की एक बाढ़ से आ जाती है हर महीने में कमसेकम एक घटना तो मिल जाती है। ज्यादा घटनाओ का वर्णन नहीं करूंगा बल्कि चन्द घटनाओ का बात करूंगा जिससे पुलिस एवम कुछ समाज के ज़िम्मेदार लोगो के सामने होने वाली लिंचिंग का पता चल सके पहलू खान की लिंचिंग हुई तो बहुत लोग उसमे थे जिसमें से किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि जो पहलू खान को बचा ले कोई बात नहीं वो एक धर्म विशेष का व्यक्ति था मीडिया और सोशल मीडिया पर आई टी सेल से नफ़रत फैलाकर बताया है यह ऐसे होते है वैसे होते है झूठी खबरों फैलाई नफरत आगे बढ़ती गयी।
इसके बाद पहलू खान को मार दिया गया अभी शायद केस विचाराधीन है आगे इंसाफ होगा उम्मीद है।
उसके बाद हापुड़ के पास पुलिस के सामने एक बुजुर्ग की लिंचिंग हुई जिसमें उस बुज़ुर्ग को कुछ लोग हाथ,  पैर पकड़ खचेड़कर ला रहे है पुलिस सामने चल रही है वो भी अभी केस न्यायालय में विचाराधीन है। जबकि उसमे कुछ लोगो को जमानत मिल चुकी है NDTV के सौरभ शुक्ला ने उसका स्टिंग ऑपरेशन किया था अपराधी ने कैमरे पर गुनाह कुबूल किया था उसका भी पता नहीं।
आश्चर्य तो तब हुआ जब पुलिस के ही एक एस. आई सुबोध सिंह को कुछ लोगो ने शहीद कर दिया और उसको शहीद करने वाले जमानत पर बाहर आये तो उनका फूल मालाओं से स्वागत किया गया कुछ धार्मिक नारे भी लगाए गए जो सच मे देश के सभ्य समाज के लिए चैलेंज का विषय बन रहा है।
उपर्युक्त घटनाओ से मासूम बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका विश्लेषण एक मनोचिकित्सक अच्छा कर सकता है फिर भी मैं समझता हूं सच मे उनकी मानसिक स्थिति बदल गयी होगी कि ऐसा करने से कुछ नही होता है और समाज मे हमको नायक की तरह दिखाया जाता है जिससे वो सीना चौड़ा करके घूमते है और उनको धर्म रक्षक समझा जाता है जबकि सच मे वो एक अपराधी है जो आने वाले वक्त में स्वयं के प्रियजनों को भी नुकसान पहुंचा सकता है।
पालघर की घटना भी ऊपर वाली घटना का एक क्रम है बाकी उसमे कुछ नया नहीं है बस समझने वाले बात एक ही है अगर हमने इस पर कठोर कदम नहीं उठाये तो हमारे बच्चे हिंसात्मक प्रवृति में संलग्न हो जाएंगे देश निश्चय ही पिछडेगा, बचपन खत्म हो जाएगा, मासूमियत दूर दूर तक नहीं रहेगी फिर यही बच्चे अपने माँ-बाप और सगे सम्बन्धियो के लिए खतरनाक हो जाएंगे आपराधिक प्रवृत्ति में आ जाएंगे हो सकता है। नशा लूट खसोट भी शुरू करदे......
नफरत से नहीं मोहब्बत से देश चलेगा
जय हिंद
निष्पक्ष, निर्भय, निरबैर, निडर

अकरम क़ादरी
पॉलिटिकल एनालिस्ट

रविवार, 12 अप्रैल 2020

कोरोना के गणित को समझो वरना लाशों का तहखाना बन जायेगा देश- अकरम क़ादरी



कोरोना महामारी को आखिर कैसे समझें- अकरम क़ादरी
देश-दुनिया में अनेक महामारी आई और कुछ समय बाद उनके वैक्सीन भी आये है जिससे ऐसी वबा से निजात मिली है। ऐसी ही एक  महामारी पूरी दुनिया में अपने पैर पसार चुकी है यह इतनी ख़तरनाक़ बीमारी है जो एक इंसान से दूसरे इंसान में सांस, हाथ मिलाने और उसके सम्पर्क में आने के बाद जकड़ लेती है जिससे बचने के लिए डॉक्टर बार-बार विनती कर रहे है कि किसी भी जगह पर बेमतलब खड़े ना हो एकदूसरे से 6 मीटर की दूरी बनाए रखो। 
दरअसल इस बीमारी को समझने के लिए एक उदाहरण पेश करता हूँ फिर आप इसको आसानी से समझ सकते हो.....गांव, देहात में दरबे में मुर्गियां बन्द होती है कुछ दिन बाद बीमारी के कारण सुबह में एक मुर्गी उघने लगती है तो दोपहर में दूसरी मुर्गी उघने लगती है फिर शाम को एक मुर्गी मरती है फिर दूसरी मरती है ऐसे ही सिलसिला जारी रहता है फिर वो मुर्गियां जितनी भी गांव, देहात की मुर्गियों के सम्पर्क में आती है वो भी मरती रहती है इस प्रकार पूरे गाँव, कस्बे, जिले और प्रदेश फिर देश को भी अपनी चपेट में ले लेती है। 
इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय सरकार और राज्य सरकारों ने लॉक डाउन का फैसला लिया है जिसका मतलब है देश को ट्रिलियन रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है जिससे इस कोविड 19 की चैन को तोड़ा जा सके और लोगो को बचाया जा सके वरना देश-विदेश की सरकारें क्यों इतना जोखिम लेकर खरबो का नुकसान करती। हमारे विकासशील देश मे ही अब तक हज़ारों खरबो का नुकसान हो चुका है जिस ट्रेन के पहिये को देश का विभाजन नहीं रोक पाया उसको इस महामारी ने रोक दिया तो ज़रा समझिए यह कितनी खतरनाक और विस्फोटक बीमारी होगी। 
साइंस के स्टूडेंट ने दसवीं या बाहरवीं में नाभकीय विखंडन पड़ा होगा जिससे 1 से 3, 3 से 27, 27 से 81..... मॉलिक्यूल निकलते थे जोकि अणुबम का एक मॉडल है। 
ठीक इसी प्रकार यह इससे भी ज्यादा भयानक बीमारी है जो हाथ मिलाने से छीकने, हाथ से पकड़े नल, हैंडल और अनेक प्रकार से सभी को संक्रमित करती हुई चलती है। जिसका सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों को होता है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम ज्यादा मजबूत नहीं होता है फेफड़े कमज़ोर होते है इसलिए उनको बचाने में ज्यादा दिक्कत होती है। इसलिए इस भयानक बीमारी से बचने के लिए हमें भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के द्वारा जारी एडवाइजरी का पूरी तरह पालन कर स्वयं को, रिश्तेदारों को, मोहल्ले, गांव, कस्बे, जिले, प्रदेश और देश को बचाये जिससे मानवता बच जाएगी। 
इस दरमियान जो अमीर लोग है वो देश के गरीबो को भी भुखमरी से बचाये क्योंकि यहीं वो लोग है जो आपको और हमको धनवान बनाते है। दूसरा हमारा यह फ़र्ज़ भी है कहीं पर भी हो इंसानियत को बचाया जाए, चाहे वो हिन्दू हो मुसलमान,सिक्ख, ईसाई या कोई भी 
सभी भेदभाव भुलाकर भारत होकर सोचो देश को बचाओ। 
दूसरी बात रहा सवाल इन सरकारों का तो एक समय बाद इनकी नीतियों का भी विरोध वक़्त रहते हो जाएगा। लेकिन होगा तभी जब हम और आप ज़िंदा रहेंगे। 
सरकारों के पास पर्याप्त साधन नहीं है इसलिए जिससे जो मदद हो सके वो खुद दुसरो की मदद करे.....आपको मालूम होगा ही दुनिया की टॉप क्लास की स्वास्थ्य सेवाओं वाले देश भी इस भयंकर महामारी से हार मान चुके है दुनिया मे नम्बर की स्वास्थ्य सेवा वाला देश खून के आंसू रो रहा है उसके नागरिक मर रहे है और वो मजबूर है कुछ कर नहीं सकता .....वर्तमान में यहीं स्थिति अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की हो चुकी है इसलिए हमें सोचना चाहिए हम विकासशील देशों की लिस्ट में आते है स्वास्थ्य सेवाएं क्या है आप सब लोग बेहतर समझते है इसलिए इस महामारी से सावधानी ही बचाव है...भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में ना जाये घर रहे और स्वस्थ्य रहे....
मुझे लगता है जिस प्रकार से हम प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे है अब प्रकृति हमे वापस कर रही है इसलिए हमें प्रकृति प्रेमी बनना चाहिए
जय हिंद

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ते हैं फुले के विचार - सिराज राज

'भारत में राष्ट्रीयता की भावना का विकास तब तक नहीं होगा, जब तक खान-पान एवं वैवाहिक सम्बन्धों पर जातीय बंधन बने रहेंगे।' यह बात कही थी महात्मा ज्योतिबा फुले ने. 11 अप्रैल 1827 को पुणे में जन्मे फुले ने महिलाओं और दलित समाज के उन्नति के लिए  अनेकों महत्वपूर्ण कार्य किए. सदियों से भारतीय समाज में प्रचलित धार्मिक विश्वासों, आस्थाओं, मान्यताओं, कर्मकाण्डों का मुख्य आधार ईश्वर को ही माना जाता है। दरअसल  सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक आदि प्रकार के शोषण धर्म की आड़ में ही किए गए। महात्मा फुले का मानना था कि जब तक ईश्वर से संबंधित स्वार्थियों एवं पाखण्डियों की कल्पनाओं, अंधविश्वासों, कुप्रथाओं को दूर नहीं किया जाता, तब तक समाज में सुधार असंभव है। इसीलिए फुले ने ईश्वरवाद, अवतारवाद, पुनर्जन्म, मूर्ति-पूजा आदि का खंडन किया। साथ ही समाज में व्याप्त इस व्यवस्था के लिए धर्म के ठेकेदारों व पुरोहितों को जिम्मेदार ठहराया। उनके अनुसार स्वार्थी ब्राह्मण पंडितों ने आमलोगों, शूद्रों एवं महाशूद्रों को सदा के लिए गुलाम बनाए रखने एवं अपने स्वार्थ के लिए इन सभी सारी चीज़ों को वजूद में लाया। और इन बातों की पुष्टि के लिए अनेक ग्रंथों की रचना की, जिसमें केवल पाखण्ड और काल्पनिक कहानियां भरी पड़ी हैं। जिनके जाल में अनपढ़, अशिक्षित व आम जनता को फंसाकर वे अपनी रोटियां सेकना चाहते थे। दरअसल भारत में जाति प्रथा, पुरोहितवाद, स्त्री-पुरुष असमानता और अंधविश्वास के साथ- साथ समाज में व्याप्त आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामाजिक परिवर्तन की जरूरत सदियों से रही है। इसी संकल्प को लेकर आधुनिक युग में समाज को जागरूक व बदलने का सार्थक प्रयास करने का श्रेय समाज सुधारक ज्योतिबा फुले को ही जाता है। इन्होने समाज में परिवर्तन लाने के लिए 24 सितंबर, 1873 को ‘सत्य शोधक समाज’ की स्थापना की। जिसका प्रमुख उद्देश्य था- शूद्रों-अतिशूद्रों को पुजारी, पुरोहित, सूदखोर आदि की सामाजिक-सांस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाना, धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यों में पुरोहितों की अनिवार्यता को खत्म करना, शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना, ताकि वे उन धर्मग्रंथों को स्वयं पढ़-समझ सकें, जिन्हें उनके शोषण के लिए ही रचा गया है, सामूहिक हितों की प्राप्ति के लिए उनमें एकजुटता का भाव पैदा करना, धार्मिक एवं जाति-आधारित उत्पीड़न से मुक्ति दिलाना, पढ़े-लिखे शूद्रातिशूद्र युवाओं के लिए प्रशासनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आदि। जब कभी शिक्षा का ज़िक्र किया जाता है तो फुले के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दरअसल इन्होंने  हजारों सालों से शिक्षा से वंचित दलित और स्त्री समाज को शिक्षित करने के लिए कदम उठाया। उनका कहना था लड़का पढ़ता है तो एक परिवार शिक्षित होता है और अगर लड़की पढ़ती है तो पूरा समाज शिक्षित होता है। इसीलिए स्त्री समाज को शिक्षित करने के लिए सन 1848 में स्कूल खोला। जिसमें अपनी जीवन साथी सावित्रीबाई को अध्यापन कार्य की जिम्मेदारी दी। इसीलिए भारतीय इतिहास में सावित्रीबाई को प्रथम महिला शिक्षिका का श्रेय जाता है। समाज में चेतना एवं जागरूकता फैलाने के साथ-साथ रूढ़िवादी परंपरा, अंधविश्वास, धर्माडंबर, जातिवाद, शोषण, अत्याचार, भ्रष्टाचार आदि के यथार्थ से रूबरू होने के लिए महात्मा फुले की रचनाएं मिल का पत्थर हैं। जो इस प्रकार हैं-  
1- तृतीय रत्न (नाटक 1855)
2- छत्रपति राजा शिवाजी का पंवड़ा (1869) 

3- ब्राह्मणों की चालाकी (1869) 
4- ग़ुलामगिरी(1873)
5- किसान का कोड़ा (1883) 
6- सतसार अंक-1 और 2 (1885)     
7- इशारा (1885)
8- अछूतों की कैफियत (1885)
9- सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1889) 
10- सत्यशोधक समाज के लिए उपयुक्त मंगलगाथाएं तथा पूजा विधि (1887)
अतः कहा जा सकता है कि महात्मा फुले का जीवन संघर्ष और विचार भारत को एक शिक्षित राष्ट्र बनाने और समाज को जाति मुक्त बनाने में बीता। वर्तमान समय में फुले, अम्बेडकर और भगतसिंह के विचारों को अमल में लाने की जरूरत है। फुले ने कहा था-
'नए नए विचार तो दिन भर आते हैं,
उन्हें अमल में लाना ही असली संघर्ष है।'

सिराज राज
रिसर्च स्कॉलर, युवा कवि, आलोचक, व्यंग्यकार एवं राजनैतिक विश्लेषक
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी
हैदराबाद